Category Archives: Novels and Books

संकटमोचक 02 अध्याय 28

Sankat Mochak 02
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“इस प्रदर्शन को रोकने के लिये बहुत पैसा ऑफर किया गया, बहुत दबाव बनाया गया और बहुत सी साजिशें भी की गयीं। लेकिन जैसा कि आप सब लोग जानते ही हैं, वरुण शर्मा ने न्याय के पक्ष में लड़ते समय न तो कभी भी किसी लालच या दबाव के सामने सिर झुकाया है और न ही कभी किसी साजिश से डर कर अपना एक भी कदम पीछे हटाया है”। सिंह की तरह गर्ज रहे थे प्रधान जी, और उनके दायें हाथ खड़े राजकुमार की नज़रें बहुत तेजी से आसपास की स्थिति का जायज़ा ले रहीं थीं। उनके बायें हाथ खडा राजू भी ऐसा ही कर रहा था और इन तीनों के आस पास मज़बूत शरीरों वाले आठ दस लड़के एक दम सतर्क मुद्रा में खड़े थे, मानों अंगरक्षक का काम करे हों।

दूरदर्शन के मुख्य गेट के बाहर ही खड़े संबोधित कर रहे थे प्रधान जी, हज़ारों की संख्या में उमड़ आने वाले लोगों के उस समूह को, जो आस पास के सारे इलाके में बिखरा नज़र आ रहा था। बड़ी संख्या में तैनात पुलिस कर्मचारी इस प्रकार मुस्तैद दिखाई दे रहे थे जैसे कोई विशेष निर्देश दिये गयें हों उन्हें, इस प्रदर्शन में होने वाली किसी दुर्घटना को रोकने के लिये। संबंधित थाना के प्रभारी सहित कई अन्य पुलिस अधिकारी भी मौजूद थे प्रदर्शन स्थल पर, और इन सब अधिकारियों का संचालन करे रहे थे एस पी सिटी वन रमन दुग्गल, जो स्वयम मौजूद थे मौके पर।

“सुखविंद्र, वरुण की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना है हमें, अगर इस प्रदर्शन में किसी ने उसपर हमला कर दिया तो बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो जायेगी इस शहर में। वरुण के प्रभाव को तो तुम जानते ही हो, आधा शहर जला देंगे उसके समर्थक। इसलिये बहुत सतर्क रहना है हमें”। रमन दुग्गल के चेहरे पर चिंता के गहरे भाव थे।

सुखविंद्र सिंह स्पैशल ऑप्रेशनस को अंजाम देने वाला पुलिस का एक बहुत कुशल इंस्पैक्टर होने के साथ साथ रमन दुग्गल का विश्वसनीय भी था, जिसके चलते इस काम के लिये स्पैशल डयूटी पर बुलाया गया था उसे।

“आप निश्चिंत रहिये सर, पुलिस पूरी मुस्तैदी के साथ अपना काम कर रही है। सिविल कपड़ों में किसी भी स्थिति से निपटने में सक्षम पुलिस के दस कमांडो भीड़ में बिल्कुल आगे ही खड़े कर दिये हैं मैने। ऐसी किसी भी स्थिति के पैदा होते ही किसी के कुछ भी समझने से पहले ही प्रधान जी कवर कर लेंगे ये कमांडोज़”। सुखविंद्र ने पूरी मुस्तैदी के साथ जवाब दिया।

इन सारी बातों से अंजान, प्रदर्शन स्थल पर आये हुये हज़ारों लोग प्रधान जी के क्रांतिकारी भाषण का आनंद ले रहे थे। इन्हीं लोगों के बीच में खड़ा एक पगड़ीधारी युवक अपनी जैकेट की अंदर की जेब में हाथ डालकर कुछ निकालने ही वाला था कि अपनी पीठ पर हल्की चुभन का एहसास हुआ उसे।

“ये आज पगड़ी किस खुशी में पहन कर आया है काले, वैसे तो बड़े हीरो जैसे बाल बना के घूमता रहता है तू?” सुनते ही पहचान गया था काला नाम का वह युवक कि ये आवाज़ जगतप्रताप जग्गू की थी।

“वो……बस……वो………जग्गू भाई”। कोई जवाब नहीं सूझ रहा था काले को। इतनी देर में उसने ये भी भांप लिया था की उसे सब ओर से जग्गू के जांबाज़ लड़ाकों ने इस तरह घेर रखा था कि न तो वो भाग सकता था और न ही अकेला उनसे लड़ सकता था।

“तेरी इतनी जुर्रत काले, कि तू जग्गू के रहते प्रधान जी पर हमला करने की सोच सके? भूल गया वो पुराने दिन?” अंदर तक कांप गया था काला, और इसके दो कारण थे। पहला कारण था जग्गू की ज्वालामुखी के लावे से भी अधिक जलती हुयी आवाज़, और दूसरा कारण थी वो शीत लहर जो उसकी पीठ में तेज होती जा रही चुभन के कारण उसके शरीर में दौड़ गयी थी। काला समझ गया था कि ये चुभन जग्गू के उसी प्रसिद्ध छुरे की है जिसका इस्तेमाल कभी वो लोगों का पेट फाड़ने के लिये करता था, और अब प्रधान जी की रक्षा के लिये।

“माफ कर दो जग्गू भाई, गलती हो गयी, अंग्रेज़ भाई का हुक्म था”। भेड़ के उस बच्चे की तरह मिमया उठा था काला, जिसके गले तक पहुंच चुके हों शेर के दांत।

“तेरे इस अंग्रज़ भाई को तो मैं बाद में देख लूंगा, फिलहाल तू ये बता कि और कितने लोग आये हैं तेरे साथ और कहां कहां खड़े हैं ये लोग? ज़रा सा भी झूठ बोला तो ये छुरा तेरी पीठ को फाड़ता हुआ तेरे पेट के सामने की तरफ से नज़र आयेगा तुझे। इसलिये जल्दी बोल काले, ज़्यादा वक्त नहीं है मेरे पास”। ज्वालामुखी का लावा बनकर घुसती जा रही थी काले के कानों में जग्गू की खौलती हुयी आवाज़। उसकी पीठ पर जग्गू के छुरे का दबाव इतना बढ़ गया था कि कभी भी घुस सकता था उसके शरीर में।

अपने सामने थोड़ी ही दूर भाषण दे रहे प्रधान जी में भगवान शिव का महाकाल रूप साक्षात दिखाई दे रहा था उसे, और जग्गू की आवाज़ में यमराज का मृत्यु नाद सुनायी दे रहा था काले को।

हिमांशु शंगारी

संकटमोचक 02 अध्याय 27

Sankat Mochak 02
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सत्यजीत समाचार के संपादक हरजिंद्र सिंह अपने कार्यालय में बैठे हुये थे और रोज़ की तरह ही उनका दरबार सज चुका था। लगभग पांच बजे से लेकर देर शाम तक उनके पास आने वालों का तांता लगा रहता था जिसके कारण उनके कार्यालय में शहर के विभिन्न वर्गों के लोग देखे जा सकते थे इस समय के दौरान। उनसे मिलने आने वाले इन लोगों में आम आदमी से लेकर शहर और प्रदेश के बड़े अधिकारी तथा स्थानीय से लेकर प्रदेश एवम देश के राजनेता भी रहते थे।

बुद्धिजीवी होने के साथ साथ बहुत प्रभावशाली व्यक्तिव रखने वाले हरजिंदर सिंह को कला और कलाकारों से भी बहुत प्रेम था जिसके कारण विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित कलाकार अक्सर आते रहते थे उनके पास। गायकी की कला से विशेष रूप से बहुत लगाव था उनका और इसी कारण देश के बहुत से बड़े बड़े गायक उनके संपर्क में थे। अपने सामने बैठे किसी व्यक्ति की बात को सुन कर हंस रहे थे हरजिंद्र सिंह, जब प्रधान जी की आवाज़ ने उनका ध्यान खींचा।

“ओ मेरे भाजी जिन्दाबाद, ओ मेरे भाजी जिन्दाबाद”। अपने उसी जाने पहचाने नारे के साथ प्रधान जी ने हरजिंद्र सिंह के कार्यालय में प्रवेश किया। हरजिंद्र सिंह को जानने वाले अधिकतर लोग उन्हें प्रेम एवम आदर से भाजी ही कहते थे।

“आओ वरुण आओ, आज बड़ा मज़ेदार माहौल चल रहा है और तुम्हारे आने से ये माहौल और भी मज़ेदार हो जायेगा”। कहते हुये भाजी ने प्रधान जी और राजकुमार के अभिवादन का उत्तर देते हुये उन्हें बैठने का इशारा किया। प्रधान जी और राजकुमार उनके सामने लगी कुर्सियों पर बैठ गये, जहां पहले से ही शहर के 5-6 गणमान्य व्यक्ति बैठे थे जिन्होने प्रधान जी को अभिवादन किया था।

“हां तो सिंह साहिब, अब आपकी बारी है, कोई जोरदार चीज़ हो जाये आज”। भाजी के कहने के साथ ही प्रधान जी और राजकुमार ने अंदाज़ा लगा लिया था कि आज शायद सामने बैठे सब लोगों से कोई चुटकुला या मज़ेदार बात सुनाने के लिये कहा जा रहा है। भाजी बहुत जिंदादिल इंसान थे तथा बहुत व्यस्त रहने का बावजूद भी जीवन को जीने का और हंसने हंसाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे वो। इसलिये उनके दरबार में अक्सर हंसी मजाक चलता रहता था और ठहाके गूंजते रहते थे।

“जी भाजी, एक बार एक ससुर अपने दामाद को डांट रहा होता है। ‘तुम्हें शर्म आनी चाहिए, रोज शराब पीते हो, शादी से पहले तो तुमने या तुम्हारे माता पिता ने नहीं बताया था कि तुम शराब पीते हो?’। दामाद ने भी तीखे व्यंग्य के साथ कहा, ‘जी बताया तो आपने भी नहीं था कि आपकी बेटी खून पीती है’…”। सिंह साहिब नाम के उस व्यक्ति ने एक चुटकुला सुनाते हुये कहा।

“हा हा हा………मजा आ गया सिंह साहिब। वरुण अब तुम्हारी बारी है”। कमरे में गूंज रहे ठहाकों के बीच में ही कहा भाजी ने प्रधान जी की ओर देखते हुये। भाजी के शब्द सुनते ही प्रधान जी कोई चुटकुला सोचने में लग गये थे।

“एक बार एक आदमी एक शोरूम पर जाकर एक टी वी का दाम पूछता है तो दुकान का मालिक उसे चिढ़ाने वाले अंदाज़ में कहता है, ‘हम जाहिलों को सामान नहीं बेचते, किसी और दुकान से खरीद लो’। इस बात से चिढ़ कर वो आदमी तय कर लेता है कि अब उसे टी वी तो इसी दुकान से लेना है। दूसरे दिन वो सूट बूट पहन कर उसी दुकान पर पहुंच कर टी वी का भाव पूछता है। दुकानदार फिर वही जवाब देता है, ‘मैने कहा था न कि हम जाहिलों को सामान नहीं बेचते, किसी और दुकान से खरीद लो’।

“उस आदमी की ज़िद अब और भी पक्की हो जाती है और दो तीन दिन के बाद पाश्चत्य कपड़े पहनकर वो इन दिनों के दौरान रटी हुयी अंग्रेज़ी की लाइन में पूछता है, ‘हाउ मच डस दिस टीवी कॉस्ट?’ दुकानदार जवाब देता है, ‘तुम फिर आ गये, मैने कहा था न हम जाहिलों को सामान नहीं बेचते?’ आदमी की हैरानी की कोई सीमा नहीं रहती और वो दुकानदार से पूछता है, ‘टीवी मत बेचिये बेशक, पर ये तो बताईये कि आप मुझे हर बार पहचान कैसे लेते हैं, जबकि मैं अपना पूरा हुलिया बदल कर आता हूं?’ दुकानदार मुस्कुराते हुये जवाब देता है”। कहते हुये प्रधान जी ने सस्पैंस बनाने के लिये दो पल का विराम दिया अपने शब्दों को और फिर बोले।

“वो इसलिये कि केवल तुम अकेले ही हो जो हर बार मेरी दुकान पर आकर माईक्रोवेव को टीवी बोलते हो”। प्रधान जी ने गहरी मुस्कुराहट के साथ कहा।

“हा हा हा…………हा हा हा………………वरुण ये वाला तो सबसे मजेदार था, इस बात पर तो आज पैप्सी कोला के बाद चाय भी बनती है, और साथ में बिस्किट भी”। जोरदार ठहाकों के बीच कहा भाजी ने। कमरे में बैठे सभी लोग प्रधान जी के इस चुटकले पर हंस रहे थे। एक कर्मचारी तब तक प्रधान जी और राजकुमार को पैप्सी कोला के गिलास दे चुका था।

“ओ मेरे भाजी जिन्दाबाद”। प्रधान जी ने एक बार फिर नारा लगाया और बड़ी तेजी से पैप्सी कोला गटक गये। लगभग दस मिनट के बाद प्रधान जी और राजकुमार भाजी के निजी केबिन में उनके साथ बैठे थे और टेबल पर चाय लग चुकी थी। भाजी को शायद पहले से ही पता था कि आज की बातचीत का विषय दूरदर्शन वाला मामला ही होगा, इसलिये उन्होंने कर्मचारी को चाय उनके निजी केबिन में ही लगाने के लिये कहा था।

“और सुनाओ वरुण, क्या चल रहा है आजकल?” भाजी ने बात शुरु करने के इरादे से कहा। प्रधान जी के साथ केबिन में बैठे राजकुमार को बहुत ध्यान से देखा था उन्होंने एक बार। इन चार महीनों में तीन बार आ चुका था राजकुमार प्रधान जी के साथ, भाजी से मिलने।

“बस भाजी वही दूरदर्शन वाला मामला चल रहा है। कुछ ही दिन बचे हैं प्रदर्शन में, इसलिये आपका आशिर्वाद लेने चला आया। वैसे पहले भी एक दो बार कोशिश की थी मैने, पर आप शायद कहीं व्यस्त थे”। प्रधान जी ने बातचीत को आगे बढ़ाते हुये कहा।

“पिछले दिनों शहर से बाहर रहा हूं मैं कई बार। वैसे ये मामला तुमने बहुत अच्छा पकड़ा है, कलाकारों के साथ बहुत ज़्यादती की है अधिकारियों ने पिछले कुछ सालों में। कोई कसर मत छोड़ना इस प्रदर्शन में, कलाकारों को बहुत राहत मिलेगी, इस मामले की जांच होने के बाद”। कहते हुये भाजी के चेहरे पर कला और कलाकारों के लिये सहानुभूति के भाव आ गये थे।

“आप चिंता मत कीजिये भाजी, इस बार बहुत जोरदार प्रदर्शन की तैयारी है हमारी। हज़ारों की तादाद में कार्यकर्ता पहुंचेगे दूरदर्शन के बाहर, प्रदर्शन वाले दिन”। प्रधान जी ने अपनी तैयारी से अवगत कराते हुये कहा भाजी को।

“ये तो बहुत अच्छी बात है, एक बात का ध्यान रखना वरुण। दूरदर्शन बहुत संवेदनशील संस्थान है और इसके अधिकारियों की पहुंच बहुत उपर तक है। किसी भी तरह का षड़यंत्र रच सकते हैं ये लोग, अपनी इस पहुंच के चलते। अगर किसी भी समय इस मामले में कोई समस्या आये पुलिस, प्रशासन या शासन की ओर से, तो फौरन चले आना मेरे पास”। बड़े ही अपनेपन के साथ कहा था भाजी ने।

“आपके रहते हुये तो मुझे वैसे भी किसी समस्या का कोई डर नहीं, भाजी। ऐसी कौन सी समस्या है जो हमारे भाजी का नाम सुनते ही खुद अपना हल नहीं ढूंढ लेती? मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक सब राजनेता आपके एक फोन पर ही हर काम कर देते हैं, भाजी।” प्रधान जी ने भाजी के अपनेपन से खुश होकर उनकी तारीफ करते हुये कहा।

“तारीफ करके सामने वाले को खुश कर देने की जबरदस्त कला है तुझमें वरुण, तू भी बहुत बड़ा कलाकार ही है। शायद इसीलिये कलाकारों के हक में लड़ाई लड़ रहा है”। भाजी ने सब कुछ समझकर प्रधान जी की ओर देखकर मुस्कुराते हुये कहा।

“और इतने बड़े मुकाम पर होने के बाद भी मुझ जैसे अदने लोगों के साथ इस तरह प्यार जता कर उन्हें जीत लेने की जबरदस्त कला है आपके अंदर, भाजी। उस हिसाब से तो…………………”। भाजी की तारीफ करते हुये प्रधान जी ने शरारत के साथ अपनी बात को अधूरा ही छोड़ते हुये कहा।

“उस हिसाब से तो मैं भी कलाकार ही हुआ। हा हा हा……………ये बात भी खूब कही तूने वरुण”। भाजी का जोरदार ठहाका गूंज उठा था कमरे में। इसके बाद लगभग पंद्रह मिनट तक विभिन्न विषयों पर बातचीत करते रहे भाजी और प्रधान जी, और राजकुमार बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनता जा रहा था। बातचीत के बाद बड़े अपनेपन से विदा दी थी भाजी ने उन्हें।

लगभग तीस मिनट के बाद भाजी से विदा लेकर प्रधान जी और राजकुमार न्याय सेना के कार्यालय में पहुंचे ही थे कि राजकुमार के मोबाइल की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर यूसुफ आज़ाद का नाम फ्लैश कर रहा था। राजकुमार ने प्रधान जी को आज़ाद का नाम दिखाते हुये फोन रिसीव किया।

“कहां है आप लोग?” बिना किसी औपचारिकता के और बड़ी तेजी के साथ कहा था दूसरी ओर से आज़ाद ने। उनकी आवाज़ में छिपी बैचेनी को एकदम से भांप गया था राजकुमार।

“कार्यालय में ही हैं, भाई साहिब। क्या बात है, आज आपकी आवाज़ में कुछ बैचेनी झलक रही है, सब ठीक तो है?” राजकुमार ने फौरन उत्तर देते हुए कहा।

“बात ही कुछ ऐसी है, आप लोग फौरन मेरे कार्यालय पहुंचिये। इस मामले से जुड़ी एक बहुत बड़ी डेवेल्पमैंट का पता चला है मुझे अभी अभी, फोन पर बात नहीं की जा सकती इस मामले में। बहुत संवेदनशील विषय है। आप जल्द से जल्द आ जाईये मेरे पास, प्रधान जी हैं न आपके साथ?”। एक बार फिर उसी बेचैन आवाज़ में कहा आज़ाद ने।

“बस पांच मिनट में पहुंच जाते हैं भाई साहिब, प्रधान जी मेरे साथ ही हैं। पर थोड़ा बहुत तो कुछ बताईये, आखिर क्या हो गया है ऐसा अचानक?” राजकुमार की उत्सुकुता एकदम से आसमान को छू रही थी जैसे।

“बहुत बड़ा षडयंत्र रचा है दूरदर्शन अधिकारियों ने आप लोगों के प्रदर्शन को विफल करने के लिये, और साथ ही साथ प्रधान जी पर हमला करने की योजना भी बनायी गयी है। इसीलिये कहा था, आप फौरन चले आईये, बाकी बातें मिलकर”। कहते हुये आज़ाद ने बिना किसी औपचारिकता के फोन डिस्क्नैक्ट कर दिया था तेजी से।

एक के बाद एक बम विस्फोट हो रहे थे राजकुमार के दिमाग में, जिनसे उठने वाला धुआं उसके सारे चेहरे पर फैलता जा रहा था। यही हाल साथ में बैठे प्रधान जी का भी था, जिन्होनें मोबाइल से कान लगा कर सारी बात सुन ली थी।

आखिर क्या था ये षड़यंत्र? कैसे करने वाले थे ये लोग उनके प्रदर्शन को विफल? कौन, कहां, कब और कैसे करने वाला था प्रधान जी पर हमला? ऐसे कई सवाल बहुत तेजी से एक के बाद एक बम फोड़ते जा रहे थे राजकुमार के मन में, और इन सभी सवालों का जवाब शायद एक ही आदमी के पास था, जिसका नाम था यूसुफ आज़ाद।

 

हिमांशु शंगारी

संकटमोचक 02 अध्याय 26

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उसी दिन शाम के लगभग साढ़े चार बजे प्रधान जी न्याय सेना के कार्यालय में इस मामले से जुड़े कुछ पहलुओं पर राजकुमार के साथ विचार विमर्श कर रहे थे।

“पैसों की कमी की समस्या तो अपने हेतल भाई ने हल कर दी पुत्तर जी। और कौन कौन से काम बचते हैं इस मामले में करने वाले?” प्रधान जी ने राजकुमार की ओर देखते हुये कहा।

“मेरे ख्याल से कल सुबह हमें गाड़ियों का, खाने पीने की चीज़ों का और इस प्रदर्शन से जुड़ी बाकी आवश्यक चीज़ों का प्रबंध सुनिश्चित कर लेना चाहिये प्रधान जी। इससे बाद में हमें किसी प्रकार की परेशान नहीं होगी”। राजकुमार ने अपनी राय व्यक्त करते हुये कहा।

“तो ठीक है फिर, कल सुबह सबसे पहले यही काम करेंगे”। प्रधान जी के चेहरे से साफ था कि राजकुमार ने उनकी अपेक्षा के अनुसार ही जवाब दिया था। शायद ये प्रश्न उन्होंने राजकुमार की प्रबंधकीय समझ परखने के लिये ही किया था।

“और कल ही कल में हमें न्याय सेना के बचे हुये युनिट्स को भी प्रदर्शन के लिये तैयार रहने के लिये बोल देना चाहिये……………………” अधूरी ही रोक देनी पड़ी थी राजकुमार को अपनी बात। कार्यालय का दरवाजा खोलते हुये हरजीत राजू ने अंदर प्रवेश किया था।

“चिट्टी का फोन आया था अभी प्रधान जी, आपसे बात करना चाहता है। मैने कहा कि उसका मैसेज दे दूंगा आपको। सुबह भी एक बार फोन आया था उसका। क्या आदेश है इस बारे में?” आदरपूर्वक स्वर में कहा राजू ने।

“फिर कहीं फंस गया होगा और मदद के लिये फोन किया होगा। चलो करवा दो बात, तुम्हारा अच्छा दोस्त है फिर भी”। प्रधान जी ने कुछ सोचते हुये कहा।

“ठीक है प्रधान जी, मैं अभी करवाता हूं आपकी बात”। प्रसन्न होते हुये कहा राजू ने, और अपने मोबाइल से एक नंबर मिला दिया। राजकुमार इस सारे वार्तालाप को दिलचस्पी से सुन रहा था। पहली बार सुना था उसने चिट्टी नामक इस व्यक्ति का नाम।

“हां चिट्टी, प्रधान जी बात करेंगे तुमसे, ये लो बात करो”। दूसरी ओर से किसी के बोलते ही राजू ने फोन प्रधान जी को दे दिया।

“पैरी पौना प्रधान जी, चिट्टी बोल रहा हूं”। प्रधान जी के फोन पर आते ही कहा चिट्टी नाम के उस शख्स नें।

“ओ जीते रह मेरे चिट्टी पुत्तर, क्या हाल हैं तेरे, बड़े समय के बाद फोन किया इस बार, अपने प्रधान की याद नहीं आती तुझे कभी?” बड़े ही अपनेपन के साथ कहा था प्रधान जी ने। इसी अपनेपन के कारण सहज ही किसी के दिल में भी उतर जाते थे वो।

“जी ऐसी बात नहीं है प्रधान जी, आप बहुत वयस्त रहते हैं, इसलिये बेकार में आपको तंग करना ठीक नहीं समझता मैं। वैसे राजू से आपके बारे में बात होती रहती है अक्सर”। पूरे आदर के साथ कहा चिट्टी ने।

“और बताओ, अगर कोई काम हो तो?” प्रधान जी ने चिट्टी के फोन करने का उद्देश्य जानने के लिये कहा।

“काम तो है प्रधान जी, पर आपसे मिलकर ही बात करना चाहता हूं”। चिट्टी ने सीधा काम की बात पर ही आते हुये कहा।

“तो ठीक है फिर, कल सुबह 11 बजे दफ्तर आ जाओ, बैठ कर बात करेंगे आराम से”। प्रधान जी ने उसी अपनेपन के साथ कहा।

“जी दो निवेदन थे आपसे प्रधान जी, एक तो समय आज का ही दे दीजिये अगर हो सके तो। दूसरा मैं आपके घर पर मिलना चाहता हूं आपको, कार्यालय में नहीं। काम थोड़ा जल्दी करने वाला भी है और थोड़ा गोपनीय भी”। विनम्र स्वर के साथ कहा चिट्टी नें।

“ऐसी क्या एमरजैंसी आ गयी चिट्टी पुत्तर, सब ठीक तो है न?” प्रधान जी की आवाज़ में अपनापन और स्नेह और भी बढ़ गया था।

“जी आपकी कृपा से सब ठीक है प्रधान जी, बस एक आवश्यक और जल्दी करने वाला काम है। इसीलिये आपसे ये निवेदन किया है। मुझे पता है आपका समय बहुत कीमती है प्रधान जी, और बिना किसी जरूरी काम के इसे खराब करने के बारे में तो मैं सोच भी नहीं सकता”। एक बार फिर आदर और विनम्रता के साथ कहा था चिट्टी ने।

“तो ठीक है फिर चिट्टी पुत्तर, आज शाम आठ बजे मेरे घर पर ही आ जाओ”। प्रधान जी ने चिट्टी की आवश्यकता को समझते हुये कहा।

“जी बिल्कुल ठीक है प्रधान जी, मैं आज शाम आठ बजे राजू को साथ लेकर ही पहुंच जाऊंगा आपके घर। अच्छा अब आज्ञा दीजिये”। चिट्टी के कहने के बाद प्रधान जी ने औपचारिकता के बाद फोन डिस्कनैक्ट कर दिया था।

“ये चिट्टी कौन है, प्रधान जी?” राजू के बाहर जाने के तुरंत बाद ही कर दिया था राजकुमार ने ये सवाल।

“हा हा हा, मुझे पता था कि तेरे पेट में ये जानने के लिये जोर की गड़बड़ चल रही होगी। हर बात को जानने की इच्छा रहती है तु्झे। चिट्टी अपने राजू का जिगरी दोस्त है और अन्य कई युवा लड़कों की तरह ही लड़ाई झगड़े के कामों में लगा रहता है। कई बार मुसीबत में फंसने पर मुझसे सहायता मांग लेता है और मैं इसकी सहायता कर देता हूं, राजू का दोस्त होने के नाते”। प्रधान जी ने राजकुमार की जिज्ञासा शांत करते हुये कहा।

“आपकी ये बात मुझे अभी तक समझ नहीं आयी, प्रधान जी? आप खुद तो कोई गलत काम करते नहीं पर शरण में आने वाले कई लोगों के गलत काम भी करवा देते हैं आप?” राजकुमार के चेहरे पर इस सवाल का जवाब जानने के लिये गहरी उत्सुकुता थी।

“वो इसलिये पुत्तर जी, कि एक तो ये लड़के अभी छोटी उम्र के हैं, अधिक समझ नहीं है इनको। आगे चलकर कब ये ठीक रास्ता पकड़ लें कोई पता नहीं। दूसरी बात ये है कि लड़ाई झगड़े जैसे मामले में फंसने पर तो इन लोगों की मदद कर देता हूं मैं, किसी संगीन मामले में फंसने पर नहीं”। प्रधान जी ने राजकुमार को समझाते हुये कहा।

“और उस दिन आपने करतार की सिफारिश भी की थी, जुआ खेलते हुये पकड़े जाने पर?” राजकुमार को जैसे कुछ और भी याद आ गया था।

“जुआ खेलना भी वैसा ही काम है पुत्तर जी, और करतार भी चिट्टी की तरह ही युवा उम्र का है। इस उम्र में कई लड़के इस तरह के काम करने लग जाते हैं, जिनसे समाज का कम और इनका अपना नुकसान अधिक होता है। ऐसे युवाओं को प्यार से रास्ते पर लाने की कोशिश करनी चाहिये। अगर सब लोग इन्हें नफरत से ही देखेंगे तो ये लोग सभ्य समाज से पूरी तरह ही कट जाते हैं, और फिर पहले से भी अधिक बुरे काम करने लग जाते हैं”। एक पल सांस लेने के लिये रुके प्रधान जी, और फिर दोबारा शुरू हो गये।

“इसलिये मैं ऐसे युवाओं की सहायता कर देता हूं और साथ ही साथ उन्हें अच्छे रास्ते पर लगाने की कोशिश भी करता हूं। क्योंकि मैं उनकी सहायता कर देता हूं, वो मेरा आदर करते हैं और मेरी कही गयी अच्छी बातों को नज़र अंदाज़ नही करते। तुझे ये जानकर हैरानी होगी कि न्याय सेना के बहुत से युवा पदाधिकारी पहले ऐसे ही कामों में लगे रहते थे। मेरे समझाने पर इन लोगों ने वो सारे काम छोड़ कर अपनी उर्जा को न्याय सेना की सेवा में लगा दिया”। प्रधान जी ने अपनी बात पूरी करते हुये कहा।

“ये उर्जा वाली बात तो आपने बिल्कुल ठीक कही, प्रधान जी। वास्तव में इस तरह के युवाओं के पास सामान्य युवाओं की तुलना में कहीं अधिक उर्जा होती है, केवल उस उर्जा का सही दिशा में प्रयोग करने की कला नहीं आती इन्हें, इसलिये भटक जाते हैं”। राजकुमार ने प्रधान जी की बात के साथ सहमति जताते हुये कहा।

“और मैं इन्हें वो दिशा दिखाने की कोशिश करता हूं। तुझे ये जानकर हैरानी होगी पुत्तर, कि युवा उम्र में मैं भी पहले लडाई झगड़े वाले कामों में बहुत उलझा करता था। दोस्तों की सहायता करने के चक्कर में बहुत लोगों को पीटा है मैने। मुझे भी ऐसे ही मेरे गुरू ने मेरे अंदर छिपी प्रतिभा की पहचान करवाते हुये इसका प्रयोग सही दिशा में करने के लिये प्रेरित किया था, बहुत धीरे धीरे और बहुत प्यार से”।

“इसलिये जब इस तरह के युवा लड़के मेरे पास सहायता मांगने आते हैं तो मैं उन्हें नफरत से नहीं देखता बल्कि प्यार से उन्हें बदलने की कोशिश करता हूं, जैसे मेरे गुरु ने की थी। जब मैं बदल सकता हूं तो ये लोग क्यों नहीं? बहुत बड़ा सबक सिखाया था मेरे गुरु ने मुझे। ‘किसी पर दोष लगा कर नफरत तो कोई भी कर सकता है वरुण, पर जो बुरा काम करने वाले को भी रास्ते पर लाने की कोशिश करे, वही सच्चा समाज सुधारक है’। आज भी याद हैं मुझे अपने गुरु के वो शब्द”। कहते हुये प्रधान जी जैसे अतीत में खोकर भावुक हो गये थे।

“ओह, तो इसी लिये आप पहले हर मामले में विरोधी को सम्मान के साथ अपनी गलती मान लेने का मौका देते हैं। वैसे आपने इससे पहले अपने गुरु जी के बारे में कभी बात नहीं की, और अपनी जवानी का कोई किस्सा भी नहीं सुनाया।………………………… कोई मारा मारी वाली बात सुनाईये न, प्रधान जी। आप कैसे लोगों को पीटते थे, ये जानने की तीव्र इच्छा हो रही है मुझे?” राजकुमार ने गंभीर अदाज़ में शुरु की थी अपनी बात पर फिर अंत तक जाते जाते उसे शरारत में बदल दिया था।

“ओये खोते वो सब बाद में बताऊंगा, भूल गया क्या? भाजी से पांच बजे मिलने का समय लिया था?” प्रधान जी ने राजकुमार को नकली रोष से देखते हुये कहा।

“अरे सचमुच प्रधान जी, आपके इस रोचक किस्से के चक्कर में मैं भाजी से मुलाकात वाली बात तो भूल ही गया था”। कहते कहते राजकुमार ने अपनी कुर्सी से उठते हुये गाड़ी की चाबी उठा ली थी।

 

हिमांशु शंगारी

संकटमोचक 02 अध्याय 25

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लगभग 45 वर्ष के हेतल विज की गिनती शहर के सबसे अमीर लोगों में होती थी और कहने वाले कहते थे कि उनके पास कितना धन है, इसकी गिनती खुद उन्हें भी नहीं थी। शहर के धन कुबेर कहे जाने वाले हेतल विज जितना अधिक अपने पैसे के लिये जाने जाते थे, उतना ही अधिक किसी न किसी बात के चलते चर्चा में रहने की अपनी आदत के कारण।

मध्यम से थोड़े लंबे कद के हेतल विज का व्यक्तित्व गजब का था और उनके व्यक्तित्व की पहली विशेषता थी उनका दिमाग। शहर के सबसे तेज़ चलने वाले दिमागों में से एक दिमाग था हेतल विज के पास और जोड़ तोड़ करने की अपार क्षमता। किसी भी प्रकार की स्थिति में अपने लिये फायदेमंद विकल्प निकाल लेना उनके लिये कोई विशेष मुश्किल काम नहीं था।

वाणी पर जोरदार पकड़ रखने वाले हेतल विज बातचीत की कला में दक्ष होने के कारण किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति को इस कला के प्रयोग से अपने पक्ष में मोड़ेने मे सक्ष्म थे। उनकी वाणी में हालांकि कई बार हल्का या तीखा व्यंग्य होता था, किन्तु इस व्यंग्य को इतनी कलाकारी से मिलाते थे अपनी वाणी में हेतल विज, कि कोई तेज़ दिमाग वाला ही भांप पाता था उसे।

बड़े भोले मुंह के साथ दो या दो से अधिक अर्थों वाली बातें कह देने की कला में उनका कोई सानी नहीं था, जिसके चलते बहुत से लोग उनकी कई बातों का वास्तविक अर्थ समझ ही नहीं पाते थे। अपनी अनेक विशेषताओं के चलते और अपने अथक परिश्रम के कारण ही हेतल विज ने अपार धन कमाया था, और कई अन्य धनी लोगों की तरह बाप-दादा से नहीं मिला था उन्हें ये धन।

लेकिन इन सारी विशेषताओं के अलावा एक और विशेषता थी उनमें, जिसके कारण शहर में कई राजनेताओं से भी अधिक लोकप्रिय थे हेतल विज। ये विशेषता थी, किसी भी अच्छे कार्य के लिये सहायता मांगने आये किसी भी अच्छे संगठन की मदद करने की विशेषता। मां भगवती के बहुत बड़े भक्त थे हेतल विज, और धार्मिक कार्यों में बहुत बढ़ चढ़ कर योगदान देते थे।

बहुत महात्वाकांक्षी होने के कारण हेतल विज ने कुछ ही सालों में सफलता की सीढियों को बहुत तेजी से चढ़ा था। इस कारण शहर के कई अन्य धनी तथा प्रभावशाली लोग इनके काम करने के तरीके और इनकी कई आदतों को गलत मानते थे और इनमें से कई लोग इनकी पीठ के पीछे इनके बारे में बुरा बोलते थे। लेकिन एक बात को लेकर इन लोगों सहित शहर के सभी गणमान्य व्यक्ति सहमत थे और वो बात ये थी कि, किसी भी धार्मिक या सामाजिक कार्य में धन की आवश्यकता होने पर सबसे पहले और सबसे अधिक योगदान डालने के लिये हाज़िर हो जाते थे हेतल विज। उनकी यही आदत शहर में उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण थी।

मिशन चौक के पास स्थित अपने आलीशान घर में बैठे कुछ कारोबारी काम कर रहे थे हेतल विज, जब एक कर्मचारी ने आकर प्रधान जी के आने की सूचना दी। प्रधान जी को सीधा अंदर ही ले आने के लिये कहते हुये उन्होंने चाय का प्रबंध करने का आदेश भी दे दिया।

“ओ क्या हाल है मेरे हेतल भाई का?” बुलंद आवाज़ में कहे गये इन शब्दों को सुनते ही मुस्कुरा दिये थे हेतल विज। प्रधान जी उन्हें हेतल भाई कहकर ही बुलाते थे।

“आईये आईये प्रधान जी, शहर का सबसे बड़ा प्रधान आज मेरे गरीबखाने में कैसे आ गया?” अपनी आदत के अनुसार फौरन एक से अधिक अर्थों वाली इस बात के साथ स्वागत किया था प्रधान जी का, हेतल विज नें। उनके चेहरे पर छाये भोलेपन से बिल्कुल ऐसा लग रहा था कि जैसे वो सच ही बोल रहे हैं जबकि उनकी आवाज़ इस बात का संकेत दे रही थी कि वो प्रधान जी को छेड़ रहे हैं।

“सारा शहर आपकी गरीबी का राज़ जानने की कोशिश में जुटा हुआ है हेतल भाई, और आप हैं कि और गरीब होने के तरीके ढूंढते रहते हैं दिन प्रतिदिन”। प्रधान जी ने भी छिपे अर्थ वाली बात से ही जवाब दिया।

“हा हा हा, ये भी खूब कही आपने, आईये बैठिये”। हंसते हुये हेतल विज ने प्रधान जी के साथ आये राजकुमार को बहुत गौर से देखा था जैसे पहली बार देख रहे हों, हालांकि इससे पहले भी दो बार मिल चुके थे वो उससे।

“और सुनाईये प्रधान जी, बड़े छाये हुये हो आजकल अखबारों में। बहुत बड़ी बड़ी खबरें लगा रहीं हैं अखबारें आपके बारे में”। एक बार फिर दो अर्थी बात कह दी थी हेतल विज ने। राजकुमार समझ गया था कि उनका इशारा आज सुबह प्रधान जी को ब्लैकमेलर लिखने वाली खबर की ओर था, हालांकि उनके कहने के अंदाज़ से ये पता कर पाना आसान नहीं था।

“क्या करें हेतल भाई, पैसे की कमी को पूरा करने के लिये दूसरों को ब्लैकमेल करना ही पड़ता है”। हेतल विज की बात का दूसरा अर्थ भी समझ चुके थे प्रधान जी।

“यहां दूध का धुला कौन है जो दूसरे पर इल्ज़ाम लगाते हैं ये लोग? चलो छोड़ो इन बातों को और चाय पीते हैं”। चाय की ट्रे लेकर आ रहे कर्मचारी को देखते हुये कहा हेतल विज ने।

“और कैसे आना हुआ आज? सब ठीक ठाक तो है?” दो मिनट के बाद चाय की चुस्की लेते हुये कहा हेतल विज ने।

“आप तो जानते ही हैं इस दूरदर्शन वाले मामले को हेतल भाई, पांच दिन बाद बहुत बड़ा प्रदर्शन करना है हमें और इंतज़ाम अभी अधूरे हैं”। प्रधान जी ने मुस्कुराते हुये अपनी बात को यहीं तक कहकर छोड़ दिया।

“इसकी चिंता आप अपने इस गरीब भाई पर छोड़ दो और सेवा लगाओ। बताओ कितने पैसों की आवश्यकता है?” प्रधान जी की अधूरी बात का मतलब समझते हुये तुरंत ही कह दिया था हेतल विज ने, एक बार फिर अपने आप को गरीब कहते हुये, उसी दो अर्थों वाले अंदाज़ में। ‘सेवा लगाओ’ उनके तकिया कलाम जैसे ही था और सहायता मांगने वाले लगभग हर आदमी से यही कहते थे वो।

“अभी तो फिलहाल 25 हज़ार ही कम पड़ रहे हैं हेतल भाई, अगर इसमें से कुछ मदद हो जाती तो………”। एक बार फिर अपनी बात को बीच में ही छोड़ दिया था प्रधान जी ने।

“बस इतनी सी बात, एक मिनट में आया मैं, आप लोग चाय पीयो जब तक”। कहते हुये हेतल विज अपने बैडरूम की ओर गये और दो मिनट से भी कम समय में प्रधान जी के हाथ में पांच पांच सौ के कुछ नोट पकड़ा दिये।

“25 हज़ार हैं, और कोई जरुरत है तो हिचकिचाओ मत, सेवा लगाओ”। प्रधान जी को प्रोत्साहित करते हुये कहा हेतल विज नें।

“अभी तो इसके अलावा अपने को सिर्फ चाय और बिस्किटों की ज़रूरत थी, वो भी आपने पूरी कर दी है”। प्रधान जी ने प्रसन्न स्वर मे कहा और पैसे राजकुमार को पकड़ा दिये।

“लो पुत्तर जी, हो गयी अपनी सारी की सारी समस्या हल, देखा अपने हेतल भाई का दिल। एक मिनट से भी पहले सारे के सारे पैसे लाकर दे दिये। शहर में देखा है कोई ऐसा दिलवाला?” प्रधान जी ने हेतल विज की प्रशंसा के पुल बांधते हुये कहा।

“नहीं देखा प्रधान जी, तभी तो मां भगवती ने सबसे अधिक कृपा की है इनपर इस शहर में। इनके गले में सदा मां जगदम्बा और इनके घर के कोने कोने में मां लक्ष्मी रहती हैं”। राजकुमार ने भी हल्की मुस्कुराहट के साथ प्रधान जी की बात का समर्थन किया। हेतल विज सदा सोने की चेन में जड़ित मां जगदम्बा का सोने का एक लॉकेट धारण किये रहते थे।

“बातें बहुत अच्छी करता है आपका ये नया साथी प्रधान जी, आपके दूसरे साथियों से बहुत अलग है ये”। हेतल विज ने राजकुमार को ध्यान से देखते हुये कहा।

“वो कैसे हेतल भाई?” प्रधान जी ने मज़ा लेते हुये कहा।

“चेहरे के भावों पर बड़ा नियंत्रण है इसका, बड़ी से बड़ी बात को भी ऐसे सुनता रहता है जैसे कोई मतलब ही न हो इसे उस बात से। केवल उचित मौका देखकर ही बोलता है और सीधा निशाने पर मारता है अपनी बातों के तीरों को। ऐसे लोग बड़े खतरनाक होते हैं प्रधान जी, संभल के रहना”। गंभीर चेहरे के साथ अपनी बात शुरू की थी हेतल विज ने लेकिन आखिरी लाईन बोलने तक मुस्कुराने लगे थे। स्वभाव के अनुसार एक बार फिर एक से अधिक अर्थों वाली बात कर दी थी उन्होंने।

“हा हा हा, आपकी पारखी नज़र नें बिल्कुल ठीक पहचाना है इसे हेतल भाई, ये सचमुच बड़ा खतरनाक है। पर अपना तो पुत्तर है, खतरा तो अपने दुश्मनों के लिये बनता है ये”। प्रधान जी ने हंसते हुये कहा। राजकुमार के चेहरे पर हेतल विज की बातों को सुनकर मुस्कुराहट आ गयी थी।

“अच्छा अब एक काम की बात सुनिये, प्रधान जी”। हेतल विज ने एकदम से विषय बदलते हुये कहा।

“जी कहिये हेतल भाई”। प्रधान जी के साथ साथ राजकुमार भी सतर्क हो गया था।

“इस दूरदर्शन वाले मामले में बहुत ध्यान से चलना। अडवानी बहुत पुराना खिलाड़ी है ऐसे खेलों का, किसी भी स्तर तक गिर सकता है जीतने के लिये”। हेतल विज ने छिपे अर्थ वाली अपनी इस बात को इतना ही कहकर छोड़ दिया और प्रधान जी की ओर देखने लगे।

“मैं आपका इशारा समझ गया हेतल भाई, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा”। प्रधान जी ने कहा और अपनी बची हुयी चाय पीने लगे।

बातचीत का सिलसिला कुछ देर तक चला, उसके बाद प्रधान जी और राजकुमार हेतल विज से विदा लेकर न्याय सेना के कार्यालय की ओर चल दिये।

“हेतल विज किस बात से सावधान करना चाहते थे हमें, प्रधान जी?” राजकुमार ने कुछ सोचते हुये कहा। गाड़ी न्याय सेना के कार्यालय की ओर दौड़ी जा रही थी।

“अपने से बहुत प्यार करते हैं हेतल भाई, इसलिये सावधान रहने के लिये बोल रहे थे। ऐसे लोगों से तो अपना वास्ता पड़ता ही रहता है। तू चिंता छोड़, समय आने पर देख लेंगे अडवानी के किसी भी दांव को”। प्रधान जी ने बेफिक्री के अंदाज़ में कहा।

“लो छोड़ दी फिर चिंता, अब बताईये आगे क्या करना है?” राजकुमार ने मुस्कुराते हुये कहा। उसका दिमाग अभी भी किसी जोड़ तोड़ में लगा हुआ था, हालांकि उसने अपने चेहरे को सामान्य बना लिया था अब।

“मेरे ख्याल से आज भाजी से मुलाकात की जाये, इस मामले में एक दो बार प्रयास करने के बाद भी अभी तक भाजी से मुलाकात नहीं हो पायी है हमारी”। प्रधान जी ने कुछ सोचते हुये कहा।

“फर्स्ट क्लास विचार है प्रधान जी, वैसे भी बड़े दिनों से मेरा दिल कर रहा है पैप्सी कोला पीने को”। राजकुमार के कहते ही मुस्कुरा दिये थे प्रधान जी। अपने से मिलने वालों को पैप्सी पिलाते थे भाजी अक्सर, और इस पेय को हमेशा पैप्सी कोला ही कहकर बुलाते थे वो।

“तो लो मैं अभी समय ले लेता हूं फिर”। कहने के साथ ही प्रधान जी ने अपने मोबाइल से सत्यजीत समाचार के कार्यालय का नंबर मिलाया और दूसरी ओर से फोन रिसीव किये जाने की प्रतीक्षा में लग गये।

“सत श्री अकाल अमरप्रीत जी, भाजी आज कार्यालय आयेंगे क्या?……………चार बजे आयेंगे……………मैं पांच बजे आ जाऊं मिलने फिर?…………………ओके जी ठीक है फिर, सत श्री अकाल”। प्रधान जी ने फोन डिस्कनैक्ट किया और फिर राजकुमार की ओर देखा।

“भाजी से पांच बजे मिलने का समय फिक्स हो गया है। मेरे ख्याल से अब कुछ खा लिया जाये, बहुत भूख लग आयी है। बटर चिकन खाया जाये आज फिर?”। खाने की बात करते करते प्रधान जी के चेहरे पर बड़े आनंदमयी भाव आ गये थे। तरह तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों के शौकीन थे प्रधान जी, और बटर चिकन तो उनका सबसे फेवरिट था।

“मेरे ख्याल से हमें इस बात का बहुत ध्यान रखना चाहिये प्रधान जी, कि ये जानकारी किसी भी हाल में अडवानी के पास न पहुंच पाये”। राजकुमार के चेहरे पर एकदम से गंभीरता आ गयी थी, जैसे कुछ याद आ गया हो अचानक से।

“कौन सी जानकारी पुत्तर जी?” राजकुमार के अचानक बदल गये इस मूड ने प्रधान जी के मन में उत्सुकुता पैदा कर दी थी।

“यही कि जो काम आपने पच्चीस लाख में भी करने से मना कर दिया, उसे आप बटर चिकन की एक प्लेट में ही कर देते। अपना तो बहुत नुकसान हो जायेगा, प्रधान जी”। एक बार फिर तेजी से अपने चेहरे के भाव बदलते हुये शरारत के साथ कहा राजकुमार ने।

“ओये बड़ा बदमाश है तू कंजर, हेतल भाई ठीक ही कहते हैं, बड़ा खतरनाक है तू। कब एकदम से अपने चेहरे के भाव बदल कर क्या बात करदे, किसी को पता नहीं चलता”। प्रधान जी ने ठहाका लगाते हुये कहा।

“तो फिर खाना है बटर चिकन? अडवानी को कहूं बढ़िया सा बटर चिकन बनवाये आपके लिये?” राजकुमार अभी भी छेड़ रहा था प्रधान जी को।

“ओये मैं सब समझता हूं तेरी बदमाशियों को, आज तेरा खुद का कुछ और खाने का मन कर रहा होगा। इसीलिये बटर चिकन खाने के नुकसान गिनाता जा रहा है, बता क्या खाना है आज?” प्रधान जी इस बार शायद राजकुमार की इन बातों का मतलब समझ गये थे। किसी भी काम से किसी को रोकने के लिये अप्रत्यक्ष रूप से उसके नुकसान गिनवाने लग जाता था राजकुमार, जिससे सामने वाले पर उस काम को न करने के लिये मनोवैज्ञानिक दबाव बन जाये।

“मेरे ख्याल से आज अमृतसरी कुलचे खाये जायें प्रधान जी, बहुत देर हो गयी तंदूरी कुलचे खाये हुये”। अपना तीर निशाने पर लगता देखकर मुस्कुराते हुये कहा राजकुमार ने।

“ओये तो सीधा नहीं बोल सकता था कि आज बटर चिकन की बजाये अमृतसरी कुलचे खाते हैं? मेरे बटर चिकन की इतनी बुराई करने की क्या ज़रूरत थी?” प्रधान जी ने नकली क्रोध प्रदर्शित करते हुये कहा।

“इस शहर के ज़्यादातर महत्वपूर्ण लोग पहेलियों में ही बात करते हैं प्रधान जी, इसलिये मैं भी इस भाषा को सीखने की कोशिश कर रहा हूं”। राजकुमार की इस बात में छिपे गहरे अर्थ को फौरन भांप गये थे प्रधान जी। एक बार फिर बड़ी तेजी से अपनी बात को मज़ाक से फिलॉसफी में बदल दिया था उसने।

“ये बात तो तेरी ठीक है पुत्तर, यहां अधिकतर लोग पहेलियों की भाषा में ही बात करते हैं। वैसे तू भी कुछ कम नहीं, पूरा गिरगिट है, एक पल में ही रंग बदल लेता है अपना। चल अब गाड़ी फ्रैंडस सिनेमा के सामने वाली गली की ओर ले ले, अमृतसरी कुलचे ही खाते हैं आज”। प्रधान जी ने राजकुमार को छेड़ते हुये कहा। इस गली में बनने वाले तंदूरी कुलचे सारे शहर में प्रसिद्ध थे।

“अगर आप इतना कह रहे हैं प्रधान जी, तो चलिये आज कुलचे ही खा लेते हैं फिर”। राजकुमार ने एकबार फिर अपना अंदाज़ बदलते हुये इस प्रकार कहा जैसे कुलचे खाने का फैसला लेकर बहुत बड़ा अहसान कर रहा हो प्रधान जी पर। उसकी इस बात पर प्रधान जी एक बार फिर ठहाका लगा कर हंस दिये थे।

 

हिमांशु शंगारी

संकटमोचक 02 अध्याय 24

Sankat Mochak 02
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दूसरे दिन सुबह लगभग दस बजे प्रधान जी अपने कार्यालय में बैठे हुये थे। उनके आगे विभिन्न समाचार पत्र पड़े थे और सामने की कुर्सियों पर न्याय सेना के बहुत से पदाधिकारी बैठे हुये थे।

“मेरे ख्याल से आप सब लोगों ने आज की अखबारें पढ़ लीं होंगीं। मीडिया ने पूरा साथ दिया है हमारा इस मामले में और सोमेश पुरी की प्रैस कांफ्रैंस की धज्जियां उडा कर रख दीं हैं”। कहते हुये बहुत प्रसन्न नज़र आ रहे थे, प्रधान जी। उनके पास ही बैठा राजकु्मार विभिन्न अखबारों को बार बार उठा कर अभी भी कुछ पढ़ता जा रहा था, जैसे हर खबर की तह तक पहुंचने का प्रयास कर रहा हो।

प्रधान जी के कहे अनुसार ही सब अखबारों ने न्याय सेना के पक्ष में और दूरदर्शन के खिलाफ जमकर छापा था। “दूरदर्शन अधिकारियों पर लगाये आरोपों की जांच होनी चाहिये : सोमेश पुरी”, ये था पंजाब ग्लोरी की खबर का शीर्षक। “कलाकारों ने की जस्सी के आरोपों की जांच करवाने की मांग”, दैनिक प्रसारण ने छापा था इस खबर को। “अगर चोर नहीं दूरदर्शन अधिकारी, तो जांच करवायें : सोमेश पुरी”, शिव वर्मा ने थोड़ा तोड़ मरोड़ दिया था सोमेश पुरी के बयान को, सत्यजीत समाचार में छपी इस खबर को सनसनीखेज बनाने के लिये।

लेकिन राजकुमार का सबसे अधिक ध्यान खींच रही थी अमर प्रकाश की वो खबर जिसे खुद आज़ाद ने अपने नाम से छापा था और जिसका शीर्षक था, “वरुण शर्मा ब्लैकमेलर, दूरदर्शन पर लगा रहे हैं झूठे आरोप : सोमेश पुरी”। सब अखबारों में से केवल अमर प्रकाश ने ही सोमेश पुरी का ये बयान छापा था कि वरुण शर्मा दूरदर्शन को ब्लैकमेल कर रहे हैं।

प्रधान जी का नाम सीधे तौर पर आरोपों में लिखने के कारण आज़ाद की इस खबर को उतना पसंद नहीं किया था उन्होंने, और राजकुमार को आज़ाद से बात करके इस प्रकार का नकारात्मक शीर्षक इस्तेमाल करने का कारण जानने के लिये कहा था। राजकुमार ने उन्हें थोड़ा संयम बरतने की सलाह देते हुये कहा था कि आज होने वाली न्याय सेना के पदाधिकारियों की इस मीटिंग के बाद इस बारे में आज़ाद से बात करेगा वो। राजकुमार एक बार फिर से इस खबर को बीच बीच में से पढ़ता जा रहा था।

“एक सामाजिक संगंठन चलाने का दावा करने वाले शहर के एक विवादस्पद और स्वयंभू नेता सोमेश पुरी ने आज एक प्रैस कांफ्रैंस में न्याय सेना के प्रधान वरुण शर्मा पर दूरदर्शन मामले में अधिकारियों को ब्लैकमेल करने के आरोप लगाये हैं। सोमेश ने कहा कि दूरदर्शन में कोई भ्रष्टाचार नहीं है और वरुण शर्मा ये सारा दबाव केवल दूरदर्शन अधिकारियों से पैसा ऐंठने के लिये बना रहे हैं, जिससे अधिकारी बदनामी के डर से उन्हें समझौता करने के लिये कहें”।

“सोमेश दूरदर्शन में कलाकारों से काम के बदले में पैसे की मांग करने के न्याय सेना के आरोप को झूठा साबित करने के लिये अपने साथ कुछ कलाकारों को भी लाये थे। सोमेश के अनुसार ये कलाकार मीडिया को बताने वाले थे कि ऐसे सभी आरोप झूठे हैं और इनमें कोई सच्चाई नहीं है। किन्तु रोचक बात ये है कि पत्रकारों के पूछे जाने पर इन कलाकारों ने एक मत से ये कह दिया कि दूरदर्शन अधिकारियों पर मशहूर गायक जस्सी द्वारा लगाये गये आरोपों की जांच अवश्य होनी चाहिये। इससे प्रैस कांफ्रैंस करने आये इन लोगों के आपसी मतभेद मीडिया के सामने ही जाहिर हो गये”।

“एक और विषय पर बात करते हुये सोमेश ने कहा कि मशीनों की खरीद में घोटाला करने का आरोप भी झूठा है न्याय सेना का, और ऐसा कोई घपला नहीं होता दूरदर्शन में। इस बयान के बाद के रोचक घटनाक्रम में पत्रकारों के कुछ प्रश्नों का जवाब देते हुये खुद सोमेश पुरी ने ही कहा कि यदि दूरदर्शन अधिकारी भ्रष्ट नहीं हैं तो उन्हें इस जांच से कोई ऐतराज़ नहीं होना चाहिये। एक ही मामले में दो बिल्कुल विरोधाभासी बयान देने से सोमेश पुरी ने इस मामले को जहां एक ओर रोचक बना दिया है, वहीं कुछ गंभीर प्रश्नों को भी जन्म दे दिया है”।

“आखिर किसने पैसा दिया इन लोगों को इतने महंगे होटेल में दूरदर्शन के पक्ष में और न्याय सेना के खिलाफ प्रैस कांफ्रैंस करने के लिये? क्यों प्रैस कांफ्रैंस करने वाले सभी लोगों के बीच तालमेल की कमी इस प्रकार दिखाई दे रही थी, जैसे इन लोगों ने इस विषय पर पहले से सहमति न बनायी हो और अलग अलग जगह से सीधे ही पहुंचे हों इस प्रैस कांफ्रैंस के लिये?”

“सारी प्रैस कांफ्रैंस के दौरान ये आभास क्यों होता रहा पत्रकारों को, कि ये लोग केवल किसी के कहने में आकर ऐसे बयान दे रहे हैं, जिनसे ये लोग खुद ही सहमत नहीं हैं? ऐसे और भी कई प्रश्न हैं जिनके जवाब शायद इस प्रैस कांफ्रैंस के पीछे छिपा मास्टरमाइंड ही दे सकता है, जो शायद इनमें से तो कोई भी नहीं है”।

“गौरतलब है कि सोमेश पुरी पिछले बहुत वर्षों से पैकेट वाला दूध बेचने की छोटी सी दुकान चलाते हैं। इसके अतिरिक्त उनकी आय का कोई साधन नहीं है और इस काम से बहुत कम आमदनी होने का हवाला देते हुये वो इन्कम टैक्स तक नहीं भरते कभी। इसके बावजूद भी उनके पास अपनी गाड़ी और मंहगा मोबाइल फोन होना तथा इतने महंगे होटेल में उनका यूं प्रैस कांफैंस करना एक ओर जहां उनकी ईमानदारी पर प्रश्न चिन्ह लगाता है, वहीं दूसरी इस प्रैस कांफ्रैंस के पीछे कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा की जा रही साजिश का संकेत भी देता है”। न्यूज़ के अंत में छापी गयी थी यूसुफ आज़ाद की ये विशेष टिप्पणी। राजकुमार के खबर पढ़ते पढ़ते प्रधान जी बोलते जा रहे थे।

 

“जांच के लिये दिये गये हमारे पंद्रह दिनों के समय में से नौ दिन निकल चुके हैं, लेकिन अभी तक कोई जांच शुरू नहीं करवायी गयी। इसलिये अब हम लोगों को प्रदर्शन की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। सभी प्रमुख अखबारों ने जिस प्रकार से हमारा साथ दिया है इस मामले में, उससे बहुत बड़ा दायित्व आ गया है हमारे उपर। कहने का अर्थ ये है कि अब हमें इस प्रदर्शन में न्याय सेना का अधिक से अधिक बल लगाना होगा, जिससे हमारे पत्रकार भाईयों का सिर ऊंचा हो सके और भ्रष्टाचारियों की नींद हराम हो जाये”। प्रधान जी के इन जोशीले शब्दों ने राजकुमार का ध्यान आकर्षित किया।

“आप चिंता मत कीजिये प्रधान जी, मैने तो पहले ही दिन से तैयारी शुरू कर दी थी इस प्रदर्शन की। मेरी ओर से सैंकड़ों युवाओं का दल पहुंच जायेगा इस प्रदर्शन में”। सबसे पहले बोलते हुये कहा जगतप्रताप जग्गू ने। उसके चेहरे पर जोश की लहरें ठाठें मार रहीं थीं।

“और मेरे सारे भाई-मित्र भी तैयार हैं प्रधान जी, बस आपके हुक्म का ही इंतज़ार है”। अगली आवाज़ हरजीत राजू की थी।

“हमारे मजदूर भाईयों की क्या स्थिति है कमलकांत जी?” प्रधान जी ने मजदूर युनिट के प्रधान कमलकांत यादव की ओर देखते हुये कहा।

“केवल एक दिन पहले बता दीजियेगा प्रधान जी, आप जहां कहोगे सब लोग वहां पहुंच जायेंगे”। कमलकांत यादव भी किसी से पीछे रहने वाले नहीं थे।

“बुद्धिजीवी सदस्यों का समूह भी तैयार है प्रधान जी, आप चिंता मत कीजिये”। डॉक्टर पुनीत ने प्रधान जी को अपनी ओर देखता पाकर उनके पूछने से पहले ही जवाब दे दिया।

“बस तो फिर ठीक है सब। पुत्तर जी, तुम और मैं हमारे राजस्थानी भाईयों के समूह को, सफाई कर्मचारियों के समूह को और ऐसे ही अन्य कई समूहों को निर्देशित करेंगें, इस प्रदर्शन में आने के लिये”। प्रधान जी ने राजकुमार की ओर देखते हुये कहा तो उसने फौरन सिर हिला कर सहमति दी।

“अब अगर किसी को कुछ पूछना है इस मामले में, तो पूछ सकता है”। प्रधान जी ने एक बार फिर सब पदाधिकारियों की ओर देखते हुये कहा।

“हमें प्रदर्शन स्थल पर अपने मज़दूर भाईयों को लाने और वापिस ले जाने के लिये छोटे ट्रक जैसीं कम से कम दस गाड़ीयां चाहिये, प्रधान जी”। कमलकांत ने अपनी आवश्यकता की ओर ध्यान खींचते हुये कहा।

“आप चिंता न करें, आप लोगों को बारह ऐसी गाड़ियां दे दीं जायेंगी, जिनमे से हर गाड़ी में 70 से 100 लोग आ जायें। इस सारी व्यवस्था के बारे में आपको प्रदर्शन से एक दिन पहले सूचित कर दिया जायेगा। और किस किस को कितनी गाड़ियां चाहियें?” प्रधान जी ने सब लोगों की ओर देखा तो एक एक करके सब लोगों ने अपनी जरूरत के अनुसार गाड़ियों की संख्या बता दी जिसे राजकुमार ने ध्यान से नोट कर लिया।

“गाड़ियों वाला काम तो हो गया, कोई और बात कहनी हो किसी को?” प्रधान जी ने एक बार फिर सबको संबोधित करते हुये कहा।

“पिछली बार का प्रदर्शन कई घंटे तक चलने के कारण पीने के पानी और खाने की समस्या का सामना करना पड़ा था हमारे बहुत से भाई बहनों को, प्रधान जी”। पुनीत ने अपनी बात को अधूरा ही छोड़ते हुये कहा।

“मैं आपकी बात समझ गया डॉक्टर साहिब, इस बार के प्रदर्शन में दस हज़ार लोगों के लिये पीने के पानी का और पांच हज़ार लोगों के लिये खाने की ऐसी चीज़ों का प्रबंध किया जायेगा, जिससे दो चार घंटे आराम से निकल जायें। और कोई बात?” प्रधान जी ने पुनीत की बात का जवाब देते हुये कहा। लगभग आधे मिनट तक भी किसी की ओर से कोई प्रश्न नहीं किया गया।

“तो ठीक है फिर, अब आप लोग अपने अपने काम पर लग जाईये और अगले निर्देश की प्रतीक्षा कीजिये”। प्रधान जी के इतना कहने के बाद अन्य कई मामलों से संबंधित स्थानीय स्तर की अपनी अपनी कुछ समस्यायें शेयर करने के बाद लगभग एक घंटे में सभी पदाधिकारी चले गये। भीतर के कार्यालय में एक बार फिर राजकुमार और प्रधान जी ही रह गये थे।

“लो पुत्तर जी, सब लोगों की तैयारी तो तगड़ी है इस बार। पूरा जोर लगा देंगें इस प्रदर्शन में और दिखा देंगें इन लोगों को कि न्याय सेना पर ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाने का अंजाम क्या है”। सोमेश पुरी के आरोप को याद करके एक बार फिर कुछ उत्तेजित हो गये थे प्रधान जी।

“तो वो बात अभी भी चल रही है आपके दिमाग में”। राजकुमार ने धीमी सी मुस्कुराहट के साथ कहा।

“और नहीं तो क्या, पुत्तर जी। मुझे एक बात समझ नहीं आ रही, सारी की सारी खबर हमारे पक्ष में लिखकर भी आज़ाद भाई ने शीर्षक मेरे खिलाफ क्यों लगा दिया है। आखिर क्या सोचा है उन्होंने, इस खबर को लगाते समय?” राजकुमार जानता था कि प्रधान जी को इस बात का उत्तर जाने बिना चैन नहीं आयेगा। किसी बात को लेकर एक बार भावुक हो जाने पर जल्दी सामान्य नहीं हो पाते थे प्रधान जी।

“मैं अभी पूछ लेता हूं कि क्या राज़ है उनकी इस खबर के पीछे, वो कार्यालय पहुंच गये होंगे अब तक?” कहने के साथ ही राजकुमार ने मुस्कुराते हुये आज़ाद का नंबर डायल कर दिया था अपने मोबाइल से।

“नमस्कार भाई साहिब, कैसे हैं आप?” राजकुमार ने दूसरी ओर से आज़ाद के फोन रिसीव करते ही औपचारिकतावश कहा था।

“सब ठीक है, आप सुनाईये क्या हाल हैं हमारे प्रधान जी के?” मसखरे अंदाज़ में कही गयी आज़ाद की इस बात को सुनते ही राजकुमार मुस्कुरा दिया था और उसके पास ही फोन को कान लगा चुके प्रधान जी कुछ असहज हो गये थे।

“जब सब जानते हैं आप तो फिर पूछते क्यों हैं, भाई साहिब?” राजकुमार ने शरारत के साथ कहा।

“प्रधान जी से कहिये, इस खबर से बहुत लाभ होगा उन्हें”। आज़ाद ने राजकुमार के पूछे बिना ही खबर को इस तरह लगाने का कारण बताना शुरू कर दिया था। शायद उन्हें यकीन था कि राजकुमार ने फोन इसीलिये किया है।

“ज़रा गौर कीजिये, आप लोगों की सहायता करने के चक्कर में न तो किसी अन्य अखबार ने ये छापा है कि सोमेश पुरी ने प्रधान जी पर इस मामले में ब्लैकमेल करने के आरोप लगाये हैं, और न ही ये कि उसने दूरदर्शन अधिकारियों के ईमानदार होने की बात की पुष्टि की है। सबने इसी प्रकार से खबर लगायी है जिससे ये लगे कि ये प्रैस कांफ्रैंस शायद आपके पक्ष में ही की गयी थी”। अपनी बात को कहते जा रहे थे आज़ाद।

“इन लोगों के बयानों का रिकार्ड पर आना बहुत ज़रूरी था, इससे आप को अनेक लाभ होंगें। एक तो अब इसके बाद प्रधान जी को कोई सिफारिश नहीं कर पायेगा इस मामले में, सीधा हमला जो बोल दिया है दूरदर्शन वालों ने उनपर। अर्थ ये कि इस खबर के साथ ही मैने समझौते के आसार समाप्त कर दिये हैं। दूसरी बात, इस मामले में जांच होने पर इस प्रकार का बयान दिलवाने के लिये भी जवाब मांगा जायेगा दूरदर्शन अधिकारियों से”।

इस प्रकार की साज़िशें करना अधिकारियों के चरित्र की कालिख को उजागर करता है और उनसे ज़रूर पूछा जायेगा इतने निचले स्तर पर उतर कर खेलने का कारण। तीसरी बात, जांच में अधिकारियों के दोषी साबित होने पर सोमेश पुरी का बचा खुचा करियर भी समाप्त हो जायेगा, आखिर उसी ने तो कहा है कि अधिकारी दोषी नहीं हैं इस मामले में”।

“इसीलिये पहले उसके सारे आरोपों को छापा है और फिर उनकी चीरफाड़ की है। उसे गंदा भी कर दिया और मामला रिकार्ड पर भी ले आया ताकि कल को कोई मुकर न सके आप पर लगाये गये आरोपों से”। अपनी बात को पूरी करते हुये कहा आज़ाद ने। राजकुमार के कोई जवाब देने से पहले ही प्रधान जी ने फोन उससे लगभग छीन ही लिया था।

“मैने आज तक के अपने समाज सेवा के कार्यकाल में एक से एक पत्रकार देखा है आज़ाद भाई, पर आपके जैसा कोई नहीं देखा। आपकी बात बिल्कुल ठीक है, अमर प्रकाश की इस खबर के अलावा कोई सुबूत नहीं है हमारे पास कि इस मामले में दूरदर्शन अधिकारियों ने ऐसी भी कोई साज़िश की है हमारे खिलाफ। सोमेश पुरी के आपके अखबार में छपे बयान ही बाद में इन सब लोगों की मुसीबत का कारण बन जायेंगे, और इस मामले में न्याय सेना की जीत के साथ ही बहुत बड़ी लानत लग जायेगी सोमेश पुरी के नाम पर”। आज़ाद के लिये प्रशंसा के ये शब्द उनके मुंह से नहीं, सीधे दिल से निकल रहे थे।

“अब तो आपको मुझसे कोई शिकायत नहीं, प्रधान जी?” आज़ाद ने हंसते हुये कहा।

“बिल्कुल नहीं आज़ाद भाई, बस अपना साथ बनाये रखियेगा, हमेशा के लिये”। प्रधान जी ने कृत्ज्ञता भरे स्वर में कहा।

“साथ बना रहेगा और काफिले आगे बढ़ते रहेंगे। चलिये अब रखता हूं, राजकुमार को मेरा सलाम दीजियेगा”। कहते ही एक बार फिर फोन डिस्कनैक्ट कर दिया था आज़ाद ने।

“क्या बात है प्रधान जी, दस मिनट पहले तक तो बड़ा गुस्सा था आज़ाद भाई पर, ये अचानक इतना प्यार क्यों आ रहा है अब?” राजकुमार ने प्रधान जी को छेड़ा।

“कमाल के पत्रकार हैं आज़ाद भाई, कितनी दूर की सोचते हैं। मैने आज तक ऐसा ज़बरदस्त पत्रकार और ऐसी कमाल की पत्रकारिता नहीं देखी, पुत्तर जी”। प्रधान जी पूरी तरह प्रभावित थे आज़ाद की कलम की ताकत से।

“इसमें तो कोई शक नहीं प्रधान जी, आज़ाद भाई गज़ब के पत्रकार हैं। चलिये अब आगे का प्लान बना लेते हैं। आपने वादे बहुत बड़े बड़े कर दिये हैं जनता से और खजाने का हाल इतना अच्छा नहीं है”। राजकुमार ने आज़ाद की प्रशंसा करने के बाद मुद्दे की बात पर आते हुये कहा, मुस्कुराते हुये।

“मैं तुम्हारा इशारा समझ गया पुत्तर जी, बहुत खर्च होने वाला है इस प्रदर्शन पर, और संगठन के पास इतना धन है नहीं। यही कहना चाहते हो न?” प्रधान जी ने राजकुमार के शब्दों का अर्थ निकालते हुये कहा।

“बिल्कुल ठीक समझा अपने प्रधान जी, खर्च बहुत अधिक है और पैसा कम है हमारे पास। कम से कम पच्चीस हज़ार और चाहिये होंगे, इस प्रदर्शन के लिये समुचित प्रबंध करने के लिये। इसलिये अपने मन का चिराग रगड़िये और कोई जिन्न निकालिये उसमें से, जो पैसों का प्रबंध कर सके”। राजकुमार ने मुस्कुराते हुये कहा।

“बस इतनी सी बात, तो ले अभी रगड़ देते हैं चिराग। इसमें से वो जिन्न निकलेगा जो आवश्यकता पड़ने पर इस सारे शहर को खाना खिला सकता है, फिर ये पांच हज़ार लोग क्या हैं?” कहने के साथ ही प्रधान जी ने अपने मोबाइल से कोई नंबर डायल कर दिया था। राजकुमार अपना दिमाग दौड़ा रहा था कि प्रधान जी ने किसको फोन किया है?

“नमस्ते भाई……………… कैसे हैं भाई………………बस आपके आशिर्वाद से सब ठीक है भाई, बस मिलना था आपसे ज़रा………………………अभी आ जाऊं, घर पर…………………………दस मिनट में आपके पास पहुंचा मैं”। प्रधान जी के फोन डिस्कनैकट करने तक राजकुमार समझ चुका था कि प्रधान जी ने जालंधर के बहुत बड़े धन कुबेर कहे जाने वाले अरबपति उद्योगपति हेतल विज को फोन लगाया था।

“चल जल्दी से गाड़ी निकाल पुत्तर, हेतल भाई घर पर ही हैं अभी”। प्रधान जी के कहते ही राजकुमार ने गाड़ी की चाबी उठायी और दोनों तेजी से कार्यालय से बाहर निकल गये।

 

हिमांशु शंगारी

संकटमोचक 02 अध्याय 23

Sankat Mochak 02
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“ये प्रैस कांफ्रैंस तो बिल्कुल उल्टी पड़ गयी, बहुत बुरा हाल किया है हमारे लोगों का पत्रकारों ने। एक अखबार से मेरे सूत्र ने बताया है कि कल की अखबारों में बहुत बुरा छपेगा हम लोगों के बारे में”। प्रैस कांफ्रैंस समाप्त होने के लगभग दो घंटे के बाद अडवानी अपने सामने बैठे उन्हीं तीन अधिकारियों से कह रहा था।

“जी मुझे भी यही पता चला है सर, पत्रकारों ने इसे अपनी निजी लड़ाई बना लिया है। वरुण शर्मा के खिलाफ एक भी शब्द सुनने के तैयार नहीं है कोई भी पत्रकार”। जौहल ने अडवानी की बात का समर्थन करते हुये बुझे स्वर में कहा।

“मेरी समझ में नहीं आता कि ऐसा क्या है इस वरुण शर्मा और उसकी इस न्याय सेना के पास? हमारे पास इतने साधन और प्रभाव होते हुये भी कोई सहायता नहीं कर रहा हमारी इस मामले में। उसका नाम सुनते ही हर कोई भाग जाता है”। खुद को संभालने की कोशिश करने के बावजूद भी झुंझलाहट के भाव आ गये थे अडवानी के चेहरे पर।

“उसने अपनी छवि ही कुछ इस तरह की बनायी है सर। मैं बहुत सालों से देख रहा हूं उसके काम करने के तरीके को। दोस्ती करने वाले का हाथ नहीं छोड़ता कभी और दुश्मनी करने वाले को पाताल में छिप जाने पर भी नहीं छोड़ता। इसलिये कोई दुश्मनी नहीं करना चाहता उससे, सब दोस्ती ही रखना चाहते हैं”। जौहल ने अपना अनुभव बताते हुये कहा।

“इसीलिये बंस भी शायद इस मामले में एक सीमा से अधिक दबाव नहीं बना पाया उसपर। उसे डर होगा कि कहीं अधिक दबाव बनाने की कोशिश में उसके ही खिलाफ न हो जायें ये लोग। बंस पर बहुत भरोसा था मुझे, और इसी चक्कर में हमने सात दिन भी बिना कुछ किये निकाल दिये। अब समय बहुत कम है हम लोगों के पास और काम बहुत अधिक। हमें कुछ भी करके इस प्रदर्शन को होने से रोकना है, आप लोग कोई तरीका सोचिये इस काम को करने का”। अडवानी ने चिंतामय आवाज़ में कहा।

“वैसे सर, मंत्रालय में बैठे उच्च अधिकारियों ने आपको आश्वासन तो दे ही दिया है कि वो इस मामले में हमारे साथ हैं। फिर इतनी चिंता क्यों करते हैं आप, आखिर कार्यवाही तो उन्हें ही करनी है”। बहल ने अपना पक्ष रखते हुये कहा।

“अभी तक हर मामले में हम लोगों से इक्कीस साबित हुआ है ये वरुण शर्मा और उसकी न्याय सेना। इसलिये ये मानकर चलना चाहिये कि समय आने पर ये लोग मंत्रालय में बैठे हमारे आकाओं पर भी भारी पड़ सकते हैं”। कठिन समय में भी मुस्कुराते हुये कहा अडवानी ने।

“लेकिन सर, आपकी बात तो मंत्रालय में बहुत उपर के अधिकारियों के साथ हुयी है। इसके बाद तो केवल माननीय मंत्री जी या प्रधानमंत्री जी ही बचते हैं। तो क्या ये लोग वहां तक भी पहुंच लगा सकते हैं?” सुरिंदर सिंह के स्वर में हैरानी भरी पड़ी थी।

“कुछ भी कर सकते हैं ये लोग, मेरे अनुमान से कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली हैं ये। इसलिये हमें जल्दी से जल्दी इस प्रदर्शन को रोकने की कोई तरकीब सोचनी होगी”। अडवानी ने एक बार फिर काम की बात पर आते हु्ये कहा।

“सर मेरे ख्याल में अब हम इन लोगों को प्रदर्शन करने से रोक नहीं पायेंगे। लालच, दबाव और डरावा सब कुछ इस्तेमाल करके देख लिया हम लोगों ने, पर इस वरुण शर्मा को कोई फर्क नहीं पड़ा। अब तो ये प्रदर्शन होना लगभग तय ही है। वैसे भी अपने इतने वर्षों के कार्यकाल में वरुण शर्मा ने आज तक एक बार भी प्रदर्शन करने की घोषणा करके उसे टाला नहीं है, बिना किसी उचित कारण के”। जौहल ने एक बार फिर शहर में बहुत सालों से होने के कारण अपना अनुभव बताया था।

“फिर तो एक ही रास्ता बचता है”। कहते हुये अडवानी कुछ इस तरह की मुद्रा में था जैसे अपने दिमाग के तराजू में किसी विचार का वज़न तोल रहा हो।

“ऐसा कौन सा रास्ता है सर?” बहल ने जैसे सबके मन की बात कह दी हो। हर कोई उत्सुक दिखाई दे रहा था इस रास्ते को जानने के लिये।

“वही बताने जा रहा हूं। जौहल साहिब, आप इस मामले में आज ही ‘अंग्रेज़’ के साथ मुलाकात कीजिये”। कहने के बाद रहस्यमय अंदाज़ में देखा था जौहल की ओर अडवानी ने। ‘अंग्रेज़’ शब्द को विशेष जोर देकर बोला था उसने

“जी बिल्कुल ठीक है सर, पर इस मामले में वो भला क्या काम आ सकता है हमारे? क्या आप उसके माध्यम से वही काम करवाना चाहते हैं जो हम अक्सर करवाते हैं? मुझे नहीं लगता सर कि इससे कुछ विशेष लाभ हो पायेगा हमें”। एक साथ कई प्रश्न कर दिये थे जौहल ने।

“इस बार उससे वो काम नहीं, कुछ और काम करवाना है जौहल साहिब। आप ध्यान से सुनिये मेरी योजना को, और इसपर अमल करना शुरू कर दीजिये”। और भी रहस्यमयी अंदाज़ में कहा अडवानी ने और फिर जौहल को कुछ समझाने लग गया। जौहल समेत सब लोगों की आंखें उसकी योजना सुनकर चमकने लगीं थीं।

“कमाल का प्लान बनाया है आपने सर, मैं फौरन लग जाता हूं इस पर और जल्दी ही आपको रिपोर्ट देता हूं”। जौहल ने बच्चों की तरह खुश होते हुये कहा।

“तो ठीक है फिर, अब आप लोग जा सकते हैं”। अडवानी के इतना कहते ही तीनों एक एक करके निकल गये उसके कार्यालय से और वो तेजी से कुछ सोचने में लगा हुआ था।

 

हिमांशु शंगारी

संकटमोचक 02 अध्याय 22

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“दूरदर्शन अधिकारियों पर न्याय सेना द्वारा लगाये गये सब आरोप झूठे हैं, और किसी प्रकार का कोई भ्रष्टाचार नहीं हैं दूरदर्शन के अंदर। असल में वरुण शर्मा इस मामले में दूरदर्शन के अधिकारियों को डरा कर ब्लैकमेल करना चाहते हैं। इसलिये आप सब पत्रकार भाईयों से निवेदन है कि इस मामले में न्याय सेना के पक्ष में खबरें मत लगाईये”। अपनी बात शुरू करते हुये कहा सोमेश पुरी ने। शहर के एक महंगे होटेल में आयोजित इस प्रैस कांफैंस को कुछ कलाकारों के साथ मिलकर संबोंधित कर रहा था वो। लगभग सभी अखबारों के पत्रकार पहुंच चुके थे प्रैस कांफ्रैंस में।

“खबरें बनाने का ही काम करते हैं हम सब लोग, और अच्छी तरह से जानते हैं कब किसके पक्ष में और कब किसके खिलाफ खबरें लगानी हैं, सोमेश जी। इसलिये अच्छा होगा कि आप हमें हमारा काम न समझायें और जो काम करने के लिये भेजा गया है, उसे कीजिये”। तीखे व्यंग्य के साथ कहे थे ये शब्द शिव वर्मा ने और लगभग हर कोई ही उनकी इस बात का समर्थन करता दिख रहा था। सोमेश के बात शुरु करने का ढंग किसी को भी पसंद नहीं आया था।

“आप तो नाराज़ हो गये शिव जी, मेरा वो मतलब नहीं था”। पत्रकारों के चेहरों पर आयी तल्खी के भावों को भांपते हुये कहा सोमेश पुरी ने। उसने जानबूझकर शिव वर्मा की इस बात को नज़र अंदाज़ कर दिया था कि उसे ये काम करने के लिये भेजा गया है।

“तो क्या मतलब है आपका, योगेश जी? बड़ी ही मीठी वाणी में और बड़ी ही चतुरायी के साथ सोमेश पुरी को उसी की बात में फंसा दिया था अर्जुन कुमार ने।

“वो अर्जुन जी………………वो मेरे कहने का मतलब था”। एकदम हुये इस हमले को झेलने के लिये शायद तैयार नहीं था सोमेश पुरी, इसलिये अर्जुन की बात का जल्दी से कोई जवाब नहीं सूझा उसे। अपने सामने पड़े गिलास को उठाकर उसमें से पानी का घूंट भरने लग गया था वो।

“आराम से सोचकर बताईये सोमेश जी, हमें कोई जल्दी नहीं है। इतनी अच्छी अच्छी चीज़ें मंगवायीं हैं आपने, तब तक हम इनका मज़ा लेते हैं”। कुटिल अंदाज़ में सोमेश पुरी को छेड़ते हुये अर्जुन ने सामने पड़ी प्लेट से पनीर की एक डिश उठायी और मज़ा लेकर खाने लगे। सब पत्रकार स्थिति का मज़ा ले रहे थे।

“जी मैं तो ये कहना चाहता था कि न्याय सेना वाले केवल ईमानदारी का ढोंग कर रहे हैं। आप लोगों की खबरों से दूरदर्शन के अधिकारियों पर दबाव बना कर बड़ी रकम की मांग करेंगे, इस मामले से हटने के लिये”। सोमेश पुरी ने अपने शब्दों का चुनाव करने में सावधानी बरती थी इस बार।

“वैसे कितने पैसे मिल जाते हैं ऐसे मामलों में, सोमेश जी?” शिव वर्मा ने इतने तीखे अंदाज़ से किया था ये प्रश्न कि कमरे में मौजूद हर शख्स को पता चला गया था कि शिव वर्मा सोमेश से पूछ रहे हैं, उसने कितना पैसा लिया है इस मामले में प्रैस कांफ्रैंस करने के लिये?

“वो तो मुझे पता नहीं………………”। गले में थूक निगलते हुये कहा सोमेश पुरी ने, उसकी हार बात उल्टी पड़ रही थी। पत्रकार पूरी तैयारी करके आये थे शायद। सोमेश के साथ बैठे कलाकारों के चेहरे पर ऐसे भाव आ गये थे जैसे इस प्रैस कांफ्रैंस में आकर कोई बहुत बड़ी भूल कर दी हो उन्होंने।

“तो क्या पता है आपको, योगेश जी?” फिर उसी मीठी आवाज़ के साथ पूछा था अर्जुन ने शरारती अंदाज़ में।

“वो अर्जुन जी…………………दूरदर्शन में किसी कलाकार से कोई पैसा नहीं मांगा जाता, और ये सब कलाकार भाई उसके गवाह हैं”। हर तरफ से अपने को फंसता देखकर सोमेश पुरी ने कलाकारों को चारा बना कर फैंक दिया था पत्रकारों के सामने।

“क्या कहना चाहते हैं आप लोग, राजीव जी?” फिर उसी सौम्य आवाज़ के साथ अर्जुन ने एक कलाकार से पूछा, जो उन सबमें सीनियर था।

“जी यही अर्जुन जी, कि हम बहुत सालों से काम कर रहे हैं दूरदर्शन में, हम लोगों से कभी कोई पैसा नहीं मांगा गया”। कहते हुये राजीव ने बाकी कलाकारों की ओर देखा तो सबने जल्दी से सिर हिला कर उसकी बात का समर्थन किया, जैसे शीघ्र से शीघ्र निकल जाने चाहते हों इस कमरे से बाहर।

“इससे क्या साबित होता है?” शिव वर्मा का तीखा स्वर एक बार फिर मज़ाक उड़ा रहा था उन सबका।

“जी यही कि दूरदर्शन में काम मांगने वाले कलाकारों से पैसा नहीं मांगा जाता”। डरते डरते कहा था राजीव ने। पत्रकारों के तीखे तेवरों ने उसके होश उडा दिये थे।

“मेरे दो सवालों का जवाब दीजिये, राजीव जी। क्या आप इस बात की गारंटी ले सकते हैं कि किसी और भी कलाकार से पैसा नहीं मांगा गया कभी? यदि हां, तो क्या आप ये कहना चाहते हैं कि मशहूर पंजाबी गायक जसकरण सिंह जस्सी झूठ बोल रहे हैं?” शुरू से ही चुपचाप सारे मामले को सुन रहे अश्विन सिडाना ने बड़े ही सधे हुये स्वर में किये थे ये सवाल। ज्यादातर प्रैस कांफ्रैंसों में एक या दो बार ही सवाल पूछते थे वो, और उन सवालों के जवाब अक्सर दे नहीं पाते थे सामने वाले।

“जी मैने ऐसा तो नहीं कहा, किसी और कलाकार से पैसे मांगे हैं या नहीं, ये मुझे नहीं पता। और जस्सी भाई जैसे बड़े कलाकार पर कौन झूठा होने का आरोप लगा सकता है? वो तो मेरे बड़े भाई जैसे हैं”। राजीवे के चेहरे पर दुविधा और डर के भाव साफ आ गये थे। जस्सी जैसे बड़े गायक से उलझने का अंजाम पता था उसे।

“तो क्या आपके उसी बड़े भाई समान जस्सी के लगाये हुये भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच होनी चाहिये या नहीं? केवल हां या न में जवाब दीजियेगा और बात को घुमाने की कोशिश मत कीजियेगा”। अश्विन सिडाना के क्लू को वहीं से पकड़ कर आगे बढ़ा दिया था अर्जुन ने।

“जी………………होनी चाहिये”। हलाल होते बकरे की सी आवाज़ में केवल इतना ही कह पाया था राजीव। पत्रकारों ने सब ओर से घेर कर शिकार कर लिया था उसका, और उसके इतना कहते ही सबने जल्दी से उसका ये बयान नोट कर लिया था।

“हां तो सोमेश जी, आपके ये कलाकार भाई तो कह रहे हैं कि जस्सी के आरोपों की जांच होनी चाहिये। यानि के न्याय सेना के पक्ष में बयान दे रहे हैं ये, क्योंकि न्याय सेना भी तो यही कह रही है”। अर्जुन के तीर का निशाना एक बार फिर सोमेश पुरी बन चुका था, जो राजीव के जांच करवाये जाने वाले बयान के बाद अपना सिर पकड़ कर बैठ गया था।

“केवल यही आरोप नहीं लगाये उन्होंने, और भी बहुत कुछ अनाप शनाप बोला है दूरदर्शन के बारे में न्याय सेना वालों ने?” पहली बार सोमेश पुरी ने आपा खोया था। शायद एक के बाद एक हो रहे हमलों से बौखला गया था वो।

“अगर ऐसी बात है तो आप खुलकर कहिये वो सब, सारा मीडिया आपके साथ है”। अर्जुन ने फिर उसी कुटिल मुस्कान के साथ सोमेश पुरी को उकसाते हुये कहा।

“वरुण शर्मा ने कहा है कि दूरदर्शन में नयीं मशीनें खरीदने के समय धांधली की जाती है। सस्ती मशीनें खरीदकर अधिक मूल्य के बिल्स बनवा लिये जाते हैं। ये सारे आरोप झूठे हैं, कोई सुबूत तक नहीं दिया उसने अपने आरोपो के पक्ष में”। तैश में आकर अपना संयम खोता जा रहा था सोमेश पुरी।

“और आपके पास ऐसा कौन सा सुबूत है जो ये साबित करे कि ये धांधली नहीं की जा रही? जांच करके नतीजा घोषित करना जांच एजेंसियों का काम है, आपका नहीं। फिर आप कैसे क्लीन चिट दे सकते हैं दूरदर्शन वालों को, क्या अधिकार है आपको ये कहने का?” इतना तीखा कटाक्ष शिव वर्मा के अलावा कोई और कर ही नहीं सकता था।

“सुबूत इल्ज़ाम लगाने वालों को देने चाहिये, मैने तो नहीं लगाया ये इल्ज़ाम। तो आप वरुण शर्मा और उसकी न्याय सेना से क्यों नहीं मांगते ये सुबूत?” शिव वर्मा के तीखे कटाक्ष को झेल न पाने के कारण बड़े तीखे स्वर में बोला था सोमेश पुरी। माहौल में गर्मी बढ़ती ही जा रही थी और सभी पत्रकार इसका आनंद ले रहे थे।

“मेरी एक बात का जवाब दीजिये, सोमेश जी। मान लीजिये किसी शोरूम में कोई ग्राहक कोई कीमती चीज़ चुरा लेता है और शोरूम वाले सब ग्राहकों से तलाशी देने का अनुरोध करते हैं। अगर आप भी उन ग्राहकों में हैं और आपने चोरी नहीं की, तो क्या आप तलाशी की इस बात पर कोई एतराज़ जतायेंगे?” अपनी आदत के अनुसार ही बड़े सधे हुये, संतुलित और सौम्य अंदाज़ में पूछा था ये सवाल अश्विन सिडाना ने।

“जब मैने चोरी की ही नहीं, तो मुझे तलाशी देने में क्या एतराज़ होगा अश्विन जी? एतराज़ तो उसी को होगा जिसने चोरी की होगी। लेकिन इस प्रश्न का आज के इस मुद्दे के साथ क्या लेना देना है?” सोमेश पुरी दुविधा में नज़र आ रहा था जबकि सारे पत्रकार समझ गये थे कि एक बार फिर अश्विन सिडाना ने वो सवाल कर दिया था, जिसके जवाब में खुद ही फंसने वाला था सोमेश पुरी।

“अश्विन जी के कहने का अर्थ है कि जब दूरदर्शन वालों ने कोई धांधली की ही नहीं तो जांच से घबरा क्यों रहे हैं? होने दीजिये जांच और हो जाने दीजिये दूध का दूध और पानी का पानी। जांच में निर्दोष साबित हो जाने पर दूरदर्शन अधिकारी फिर खुलकर बोल सकते हैं वरुण शर्मा और न्याय सेना के खिलाफ। इसमें तो उनका फायदा और न्याय सेना का नुकसान है। अब बताइये सोमेश जी, दूरदर्शन वालों को अपने फायदे के लिये ये जांच करवा लेनी चाहिये या नहीं?” अर्जुन ने सोमेश पुरी पर शब्दों का जाल फेंकते हुये कहा।

“मैं आपको पूरी बात फिर से समझाता हूं, अर्जुन जी”। अपनी बात में खुद को ही फंसता देखकर विषय बदलने के लिये कहा सोमेश पुरी ने। पूरी तरह से घबरा गया था वो।

“बात को बदलने की कोशिश मत कीजिये सोमेश जी, और सीधी बात का सीधा उत्तर दीजिये। अगर दूरदर्शन वाले भ्रष्ट नहीं हैं तो उन्हें अपने आप को निर्दोष साबित करने के लिए ये जांच करवानी चाहिये या नहीं? और इस बार सिर्फ हां या न में जवाब दीजियेगा”। शिव वर्मा साफ तौर पर सोमेश पुरी को धमका रहे थे।

“जी……………………करवा लेनी चाहिये”। न चाहते हुये भी कहना पड़ा सोमेश पुरी को और कहते समय उसका चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे खुदकुशी कर रहा हो। उसके साथ बैठे कलाकारों का भी लगभग यही हाल था।

“आपके जैसे सच्चे नेता से हमें यही उम्मीद थी, सोमेश जी। और भी अगर कोई आरोप लगाना हो आपको वरुण शर्मा और न्याय सेना के खिलाफ, तो बेझिझक कहिये। सब पत्रकार भाई बिल्कुल इसी तरह आपका साथ देंगे”। अर्जुन कुमार के मीठे शब्दों में छिपे कटाक्ष और धमकी, दोनों की ही भांप गया था सोमेश पुरी।

“जी नहीं अर्जुन जी………………………आज के लिये बस इतना ही काफी है”। थूक निगलते हुये कहा सोमेश पुरी ने।

“तो फिर आज्ञा दीजिये जाने की सोमेश जी, कल के अखबार में अपना बयान पढ़ना मत भूलियेगा। खूब अच्छे से छापेंगे आपका बयान। आखिर इतनी अच्छी अच्छी चीजें जो खिलायीं हैं आपने हम लोगों को। यही तो सही तरीका है पत्रकारों से बड़ी बड़ी खबरें लगवाने का”। एक बार फिर कुटिल अंदाज़ में व्यंग्य किया अर्जुन ने और महंगे स्नैक्स का एक और टुकड़ा उठा कर इस तरह मुंह में रख लिया, जैसे सोमेश पुरी से कह रहे हों कि तुम्हारी ये रिश्वत कुबूल है हमें।

“जी बस मेरा ध्यान रखियेगा आप सब लोग, मैं आपका सबका छोटा भाई हूं”। लगभग गिड़गिड़ा ही उठा था सोमेश पुरी, आने वाले कल के समाचार पत्रों की खबरों का अंदाज़ा लगाकर। पत्रकारों ने उसके कहते कहते ही उठकर जाना शुरू कर दिया था।

“कल का अखबार पड़ना मत भूलियेगा सोमेश जी, जम कर ठोकूंगा आपको और आपके आकाओं को”। अपने रुद्र स्वभाव के अनुसार ही कहे थे, बेबाक और सीधे अंदाज़ में शिव वर्मा ने ये शब्द, बिल्कुल उसके पास आते हुये उसके कान में। सोमेश पुरी की रीड़ की हड्डी में इस तरह कंपन हो रहा था जैसे उसकी आत्मा को परमात्मा का साक्षात्कार बस होने ही वाला हो। इससे पहले वो अपने आप को संभाल पाये, अर्जुन भी उसके पास आ गये कुछ कहने के लिये।

“आपने मुझे बड़ा भाई कहा है सोमेश जी, तो एक सलाह देना चाहूंगा आपको। अगर दूरदर्शन के अधिकारियों ने अपनी ईमानदारी की कमाई में से आपके संगठन को कुछ फंड देने का वायदा किया है, जिसे आप समाज कल्याण के कामों में लगा सकें, तो आज शाम तक ले लीजियेगा ये सारा फंड। शायद कल का अखबार पढ़ने के बाद धर्म कर्म के कार्यों से उनका विश्वास ही उठ जाये और वो आपको भलाई के कामों के लिये फंड देने से मना कर दें”। अर्जुन के मीठे शब्दों में किये गये इस तीखे व्यंग्य ने सोमेश पुरी के घावों पर नमक का काम किया था।

सारे पत्रकार एक एक करके जा रहे थे और सोमेश पुरी अपना सिर पकड़ कर बैठ गया था। राजीव सहित सभी कलाकार मुर्दा चेहरों के साथ एक दूसरे को देख रहे थे, मानो पूछ रहे हों कि मीडिया द्वारा किये गये इस शाब्दिक ब्लातकार की सूचना दूरदर्शन अधिकारियों को कौन देगा?

 

हिमांशु शंगारी

संकटमोचक 02 अध्याय 21

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शाम के करीब साढ़े पांच बजे प्रधान जी न्याय सेना के कार्यालय में ही बैठे थे, जब उनके पास ही बैठे राजकुमार के मोबाइल की घंटी बजने लगी। स्क्रीन पर फ्लैश होता यूसुफ आज़ाद का नाम दिखाते हुये राजकुमार प्रधान जी के पास आ गया और फोन रिसीव किया।

“एक और बड़ा घटनाक्रम शुरू हो गया है अभी अभी। सोमेश पुरी ने कल सुबह प्रैस कांफ्रैंस रखी है इस मामले में, दूरदर्शन के पक्ष में। पता चला है कि छोटे से लेकर मध्यम स्तर के कुछ कलाकार भी साथ शामिल होंगें इस प्रैस कांफ्रैंस में, और दूरदर्शन अधिकारियों के पक्ष में बोलेंगे। अभी दो घंटे पहले ही आपने बंस से हुयी प्रधान जी की बात का परिणाम बताया था। इतने दिनों की चुप्पी के बाद एक ही दिन में इस मामले में दो बड़े घटनाक्रम होने का अर्थ समझते हैं आप?” बिना किसी भूमिका के कहा आज़ाद ने और अपनी आदत के अनुसार राजकुमार को एक नयी पहेली सुलझाने के लिये बोल दिया।

“मेरे ख्याल से ये लोग इस प्रैस कांफ्रैंस की योजना कई दिनों से बना कर बैठे थे, और केवल बंस के साथ प्रधान जी की बात का परिणाम जानने के लिये ही रुके हुये थे। प्रधान जी के बंस को समझौते के लिये मना करते ही उन्होंने अपनी अगली चाल चल दी है”। राजकुमार ने अनुमान लगाते हुये कहा।

“आपका ख्याल एक बार फिर ठीक है, इसीलिये ये लोग इतने दिन तक चुप करके बैठे थे। शायद बंस और प्रधान जी के बीच होने वाली बातचीत से समझौते का रास्ता निकल आने की बहुत उम्मीद थी इन्हें। इस उम्मीद के टूटते ही लड़ाई का नगाड़ा बजा दिया है इन्होंने। ये खेल अब और भी मज़ेदार होने वाला है, तैयार हो जाईये आप लोग। कई दिनों की चुप्पी के कारण इस मामले में बोरियत का अहसास होने लगा था, अब मनोरंजन का समय आ गया है”। आज़ाद की आवाज़ ऐसे चहक रही थी जैसे ये उनका सबसे फेवरिट खेल हो।

“आप चिंता न करें भाई साहिब, हमारी ओर से पूरी तैयारी है”। राजकुमार ने हल्की हंसी के साथ कहा।

“चलिये फिर बाद में बात करते हैं”। अपनी आदत के अनुसार ही फोन डिस्कनैक्ट कर दिया था आज़ाद ने, बिना किसी विशेष औपचारिकता के।

“सुन लिया आपने सब, प्रधान जी? सोमेश पुरी को चुना है बलि का बकरा बनने के लिये”। राजकुमार ने हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा।

“उसका तो काम ही ये है, पैसे देकर किसी के भी हक में या खिलाफ कुछ भी बुलवा लो। कागज़ों में दिखाने के लिये एक सामाजिक संगठन बनाया हुआ है और खुद उसका मुखिया बना हुआ है। बस यही काम करता है उसका संगठन। पैसे लेकर या तो किसी के बारे में अच्छा बोल देता है या फिर बुरा। इस केस पर काम कर रहे कई अखबारों के पत्रकार बहुत चिढ़ते हैं इसके नाम से। अर्जुन कुमार और शिव वर्मा तो विशेष रूप से बहुत नापसंद करते हैं इसे। ब्लैकमेलर का नाम दिया है उन्होंने इसे”। प्रधान जी भी मुस्कुरा रहे थे।

“वैसे ये हमारे लिये बहुत अच्छा है प्रधान जी, कि ऐसी गंदी छवि वाला व्यक्ति दूरदर्शन के पक्ष में या हमारे खिलाफ बोलने जा रहा है। वो जितना मीडिया को समझाने की कोशिश करेगा, पत्रकार उतने ही भड़क जायेंगे। जो पत्रकार इस केस में खुलकर नहीं भी लिख रहे, इसके काले कारनामों से चिढ़ने के कारण वो भी लिखना शुरू कर देंगे”। राजकुमार ने मज़ा लेने वाले अंदाज़ में कहा।

“चलो देर से ही सही, इन लोगों ने कोई एक्शन तो लिया, मुझे तो बोरियत होने लग गयी थी दूरदर्शन अधिकारियों के चुपचाप बैठ जाने से। अब कुछ तेजी आयेगी माहौल में”। प्रधान जी के चेहरे पर रोमांच के भाव दिखाई दे रहे थे।

“जितनी जल्दी इन्होंने ये कदम उठा दिया है आपके बंस भाई को मना करने के बाद, उससे लगता है कि इनके तरकश में तीर बहुत हैं और इनके पास समय कम है। शायद इसीलिये समय गंवाना नहीं चाहते। मेरे ख्याल से इसके बाद भी बहुत कुछ करेंगे अभी ये लोग”। राजकुमार ने एक संभावना व्यक्त की।

“चला लेने दो इन लोगों को सारे तीर, हम अपने बड़े अस्त्र बचा कर रखेंगे। जब इनके सब तीर खत्म हो जायें, तो निकाल कर चला देंगे”। प्रधान जी ने भेद भरे स्वर में कहा और दोनो ही हंस दिये।

 

हिमांशु शंगारी

संकटमोचक 02 अध्याय 20

Sankat Mochak 02
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बंस राज बंस, पंजाबी गायकी के आसमान पर चमकते सितारों में से एक बहुत ही बुलंद सितारा। उनकी हालिया एलबम ‘मोरनी’ ने धूम मचा कर रखी हुयी थी सब जगह, और इसका हर एक गाना सुपरहिट हो चुका था। बंस की इस गायन प्रतिभा का कायल बॉलीवुड भी हो चुका था जिसके चलते कई हिंदी फिल्मों में भी गाने गा चुके थे वो, और ये सभी गाने भी सुपरहिट ही रहे थे। उनके हिंदी गाने ‘खोते खोते खो गया दिल……’ ने सारे देश में सफलता के झंडे गाड़ दिये थे। एक के बाद एक मिल रही इन सफलताओं के चलते बंस उस समय के सबसे सफल गायकों में से एक माने जाते थे।

जालंधर में राजेंद्र नगर स्थित अपने आलीशान घर में अभी अभी प्रधान जी का वैल्कम करके उन्हें ड्राईंग रूम में लेकर आये थे, बंस। हालांकि उनका पूरा नाम बंस राज बंस था, जानने वाले उन्हें बंस के नाम से ही बुलाते थे। प्रधान जी तो पहले भी कई बार आ चुके थे यहां, किन्तु पहली बार आने के कारण राजकुमार बाहर से सफेद रंग में रंगे इस घर की भव्यता का आनंद उठा रहा था। ड्राईंग रूम में बहुत सारी कलात्मतक कृतियां रखीं हुयीं थीं जिनकी ओर किसी का भी ध्यान सहज ही आकर्षित हो जाना स्वभाविक था।

“और सुनाईये प्रधान जी, क्या हाल है भाभी का और बाकी सब का?” कहते हुये प्रधान जी की आंखों में देखते हुये एक विशेष इशारा कर दिया था बंस ने, मानो वो राजकुमार के बारे में जानना चाहते हों। टेबल पर जूस और खाने का कुछ सामान आ चुका था।

“घर पर सब ठीक है बंस भाई और सब बहुत याद करते हैं आपको। आपके गाने सुनकर मन प्रसन्न हो जाता है सबका, और सब गर्व करते हैं आपकी इस सफलता पर। चलिये अब आपको राजकुमार से मिलवाता हूं”। बंस का इशारा समझते हुये कहा प्रधान जी ने और अपना जूस का गिलास उठा लिया।

“ये है अपना पुत्तर राजकुमार, न्याय सेना का नया महासचिव। गजब का दिमाग है इसका और हर किसी के दिल या दिमाग में अपनी जगह बनाने की कला आती है इसे। केवल चार महीने ही हुये हैं इसे न्याय सेना में आये हुये, पर न केवल संगठन में सबका चहेता बन गया है बल्कि आपकी भाभी और बच्चों पर भी जादू कर दिया है इसने। रानी बहुत पसंद करती है इसे और बच्चे तो इसे देखते ही खुश हो जाते हैं”। प्रधान जी ने राजकुमार का परिचय देते हुये कहा।

“जब प्रधान जी ने इतनी तारीफ की है तुम्हारी छोटे भाई, तो फिर जरूर तुम इस तारीफ के काबिल होगे। तुमसे मिलकर बहुत खुशी हुयी। इस नाचीज़ को बंस राज बंस कहते हैं, एक अदना सा गायक हूं”। बंस ने अपने ही अंदाज़ में राजकुमार को संबोधन करते हुये कहा।

“आपके जैसा अदना गायक तो इस समय सारे देश में कोई नहीं है, बंस भाई। मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूं, आपकी हालिया एलबम ‘मोरनी’ के सारे गाने बहुत अच्छे लगते हैं मुझे। विशेष रूप से उसका वो ‘प्यार भरे खत’ वाला गाना मेरा फेवरिट है”। राजकुमार ने बंस की प्रशंसा करते हुये कहा। उसके चेहरे पर बंस राज बंस जैसे बड़े गायक से रुबरु मिलने की खुशी साफ देखी जा सकती थी।

“वो गाना ही क्यों?” थोड़ी उत्सुकुता आ गयी थी बंस की आवाज़ में।

“वो इसलिये बंस भाई, कि मुझे लगता है वो गाना निजी रूप से उस एलबम में आपका सबसे चहेता गाना है। उस गाने को गाते समय आपकी आवाज़ जितनी गुम गयी लगती है उसमें, किसी और गाने में नहीं गुमी उस तरह से। ऐसा लगता है वो गाना आपने लोगों के लिये नहीं बल्कि अपने लिये गाया है, इसी कारण उसमें जो असर छोड़ा है आपने, वो बाकी सब गानों की तुलना में अधिक लगा मुझे”। राजकुमार ने बंस की बात का जवाब देते हुये कहा।

“बिल्कुल ठीक समझा है तुमने छोटे भाई, वो गाना वास्तव में मेरा सबसे पसंदीदा गाना है सारी एलबम में। उसे गाते समय बहुत भावुक हो गया था मैं, कुछ पुरानी यादों के साथ जुड़ता है वो गाना और इसलिये मेरे दिल के बहुत करीब है। कला की बहुत अच्छी समझ रखते हो, क्या काम करते हो तुम छोटे भाई?” राजकुमार की बात से प्रभावित नज़र आ रहे थे बंस।

“मैने कहा था न बंस भाई, लोगों के दिल या दिमाग में जगह बनाने की कला आती है इसे। पूरा गिरगिट है ये कंजर, सामने वाले के हिसाब से बदल जाता है। बच्चों के साथ बच्चा बन जाता है, औरतों के साथ औरत बन जाता है, मेरे साथ महासचिव और देखिये अब आपके सामने कलाकार बन गया है। दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं इसका कला से, पूरा बदमाश है ये”। प्रधान जी ने हंसते हुये हस्ताक्षेप किया बातचीत के बीच में।

“चाहे आपको या खुद इसे भी न पता हो प्रधान जी, पर राजकुमार का कला से कोई गहरा रिश्ता जरूर है। इतनी गहरी बात केवल कोई कलाकार ही नोट कर सकता है। गिने चुने कुछ लोगों ने ही कही है ये बात मुझे, और वो सारे ही सीधे रूप से कला के साथ जुड़े हुये हैं”। बंस ने प्रधान जी की बात का जवाब देते हुये कहा।

“लो पुत्तर जी, तुम्हारे भविष्य का फैसला तो कर दिया बंस भाई ने। आगे चलकर कलाकार बनोगे और खूब मौज करोगे”। प्रधान जी ने राजकुमार को छेड़ते हुये कहा।

“फिलहाल तो आपकी मौज लगी हुयी है, प्रधान जी”। राजकुमार ने शरारत के साथ प्रधान जी की ओर देखते हुये कहा, जिनके एक हाथ में जूस का गिलास और दूसरे हाथ में काजू पकडे हुये थे। उसकी इस बात का मतलब समझते ही सब हंस दिये थे। बातचीत का सिलसिला एक बार फिर शुरु हो गया था।

“ये तो सचमुच बड़े मजेदार किस्से सुनाये आपने अपने विदेश दौरे के बंस भाई, मज़ा आ गया सुनकर”। लगभग आधे घंटे के बाद हंसते हुये कह रहे थे प्रधान जी।

“इन किस्सों के अलावा एक और भी बात करनी थी आपसे, प्रधान जी?” बंस ने अपने स्वर में कुछ गंभीरता लाते हुये कहा।

“खुल के कहो जो भी कहना है, बंस भाई”। प्रधान जी ने बंस के स्वर में आयी गंभीरता को भांपते हुये कहा।

“दूरदर्शन के निदेशक सुरेश अडवानी के साथ मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं। लगभग एक सप्ताह पहले विदेश में ही उसका फोन आया था और उसने मुझे आपसे दूरदर्शन वाले मामले में बात करने के लिये कहा था। आप दोनों के साथ ही घनिष्ठ संबंध होने के कारण मैं मना नहीं कर पाया और उससे कह दिया कि मैं वापिस आकर बात करूंगा आपसे”। बंस ने बिना किसी प्रकार का झूठ बोलते हुये सीधे वही बात की जो प्रधान जी को पहले से ही पता थी।

“तो रोका किसने है बंस भाई, करो बात। क्या चाहता है अडवानी?” प्रधान जी ने हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा।

“पहले तो उसने ये प्रस्ताव रखा था कि मैं आपको ये सारा मामला छोड़ देने के लिये कहूं। इस पर मैने ये कहते हुये इंकार कर दिया कि एक बार अगर आप कोई मामला हाथ में ले लें तो फिर उसे नहीं छोड़ते। इस पर उसने एक दूसरा प्रस्ताव रख दिया”। बात को बीच में ही रोक दिया था बंस ने, प्रधान जी का मूड भांपने के लिये।

“और क्या है वो दूसरा प्रस्ताव?” प्रधान जी एक बार फिर मुस्कुरा रहे थे। ऐसी स्थिति में बंस ने प्रधान जी को अक्सर जोश में आ जाते हुये देखा था, इसलिये आज उनका इस प्रकार मुस्कुराते रहना उनकी समझ में नहीं आ रहा था।

“अडवानी ने निवेदन किया है कि आप दूरदर्शन में भ्रष्टाचार होने की अपनी शिकायत उसे सौंप दें और जांच की मांग करें। वो उस शिकायत पर कार्यवाही करते हुये बहुत से अधिकारियों को दोषी करार देते हुये दंडित कर देगा, जिससे आपकी शान बन जायेगी और उसकी इज़्ज़त भी बच जायेगी”। बंस ने एक बार फिर सीधे शब्दों में ही कहा।

“यानि कि चोरों के सरदार को ही कोतवाल बना दें और उसे बाकी के चोरों को सज़ा देने के लिये कहें। मानना पड़ेगा बंस भाई, बहुत दूर की सोची है अडवानी ने। बड़ा खिलाड़ी लगता है वो, ऐसी तरकीब ढ़ूंढ़ के लाया है जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे”। बंस की आशा के विपरीत प्रधान जी एक बार फिर मुस्कुरा रहे थे। उनकी मुस्कुराहट में इस बार हल्का किंतु स्पष्ट व्यंग्य भी था। राजकुमार बड़े ध्यान से इस सारे वार्तालाप को सुन रहा था।

“तो क्या विचार है आपका? मैने उसे सीधे तौर से कह दिया था कि छोटा भाई होने के नाते मैं उसका प्रस्ताव दे दूंगा आपको, बाकी उसे मानना या न मानना आप ही के हाथ में रहेगा”। बंस ने बड़े आदर भरे स्वर में कहा।

“मेरा जवाब जानने से पहले एक बात का उत्तर दो, बंस भाई। जस्सी ने जो इल्ज़ाम दूरदर्शन के अधिकारियों पर लगायें हैं, तुम्हारे ख्याल से वो सच हैं या झूठ?” प्रधान जी ने बड़ा नाज़ुक सवाल पूछ लिया था बंस से, जैसे उसको किसी दिशा में लेकर जाना चाहते हों।

“आप जानते हैं प्रधान जी कि मैं आपको बड़े भाई की तरह मानता हूं और आज तक आपसे झूठ नहीं बोला मैने। इसलिये आज भी नहीं बोलूंगा। जस्सी का लगाया हुआ एक एक इल्ज़ाम सच है प्रधान जी”। शब्दों का बहुत संभाल कर इस्तेमाल किया था बंस ने, सवाल की नाज़ुकता को समझते हुये। उन्हें पता था कि इस सवाल का गलत जवाब देने से सीधा उनके और प्रधान जी के बरसों पुराने रिश्ते में दरार आ सकती है।

“तो फिर क्या करना चाहिये तुम्हारे इस भाई को? अपने कलाकार भाईयों को लूटने वाले इन भ्रष्ट अधिकारियों से समझौता कर लूं या फिर इन्हें इनके अंजाम तक पहुंचाने का प्रयास करूं?” प्रधान जी ने फैसला जैसे बंस के जमीर पर ही छोड़ दिया था।

बंस का जवाब जानने के लिये राजकुमार उत्सुक हो रहा था। इस मामले मे सिफारिश डालने वाले किसी भी व्यक्ति को प्रधान जी ने इतना आदर और हक नहीं दिया था। स्पष्ट था कि बंस से प्रधान जी का रिश्ता किसी एक विशेष मामले की तुलना में बहुत बड़ा था और वो उन्हें सीधे मना करके इस रिश्ते को शर्मिंदा नहीं करना चाहते थे।

“ये कहकर तो आपने इस छोटे भाई का मान रख लिया, प्रधान जी। जब आपने इतना सम्मान देते हुये फैसले के लिये मेरी राय मांगी है तो मैं भी इस सम्मान का पूरा मान रखूंगा। मैं एक गायक हूं और मेरी तुलना में इस तरह के मामलों को हैंडल करने की कहीं अधिक प्रतिभा है आपके अंदर। इसलिये आपको जो सही लगे, वो कीजिये इस मामले में। मेरे प्यार का कोई दबाव नहीं है आप पर, और आपका फैसला चाहे जो भी हो, मेरे सिर माथे पर होगा”। कहते कहते भावुक हो गया थे बंस। राजकुमार उनके चेहरे के भावों से इस प्यार की गहरायी मापने की कोशिश कर रहा था।

“तो ठीक है फिर बंस भाई, कह देना अडवानी से कि न्याय सेना इस मामले में कोई समझौता नहीं करेगी। अंत तक लड़ेंगे हम इस भ्रष्टाचार के खिलाफ”। पहली बार बंस ने प्रधान जी के चेहरे पर वो जोश देखा था जिसे देखने के लिये वो कब से प्रतीक्षा कर रहे थे।

“बिल्कुल ऐसे ही बोल दूंगा प्रधान जी, बस आपसे एक बात और कहनी थी”। बंस ने इस तरह की मुद्रा बना ली जैसे कुछ तोल मोल चल रही हो उनके अंदर।

“खुल के कहो बंस भाई, जो भी बात है”। प्रधान जी ने तुरंत कहा।

“मेरे ख्याल से ये लड़ाई अब तेज़ होने वाली है, आप लोग संभल कर चलियेगा। बहुत उपर तक पहुंच है इन लोगों की और बहुत साधन भी हैं इनके पास, इसलिये किसी भी स्तर तक जा सकते हैं ये लोग। मुझे पता है आप किसी चीज़ से डरते नहीं, और मैने ये बात आपको केवल आने वाली स्थिति से आगाह करने के लिये कही है, जिससे आप संभल कर चलें”। बंस ने एक बार फिर शब्दों का चुनाव बहुत संभाल कर किया था।

“तुम्हारी इस प्यार भरी सलाह का बहुत शुक्रिया बंस भाई, और मैं इसका पूरा ध्यान रखूंगा”। प्रधान जी ने प्रेम भरे स्वर में कहा।

“तो आईये अब इन बातों का सिलसिला खत्म करते हैं और खाना खाते हैं। आपकी पसंद का सामान बनवाया है मैने, और खाने के समय आपको अपने विदेश दौर के और भी रोचक किस्से सुनाता हूं”। माहौल को हल्का करने के लिये कहा बंस ने और सब खाने की टेबल की ओर चल दिये, जहां खाना पहले से ही उनका इंतज़ार कर रहा था।

लगभग एक घंटे के बाद प्रधान जी और राजकुमार बंस से विदा ले रहे थे। खाने के दौरान देश विदेश के प्रसिद्ध लोगों के साथ हुये अनुभवों को बताते रहे थे बंस।

हिमांशु शंगारी

संकटमोचक 02 अध्याय 19

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इस घटना के एक सप्ताह बाद, सुबह के लगभग साढ़े दस बजे। प्रधान जी और राजकुमार न्याय सेना के कार्यालय में बैठे बातचीत कर रहे थे।

“लगभग आठ दिन बीत गये हैं पुत्तर जी, और पहले दिन के बाद कोई विशेष हरकत नहीं हुयी इस मामले में। बस शहर के आठ दस प्रभावशाली लोगों की सिफारिश ही आयी है, दूरदर्शन अधिकारियों का लिहाज करने के लिये”। बातचीत का मुद्दा एक बार फिर दूरदर्शन वाला मामला ही था।

“मेरे ख्याल से कुछ ऐसा है जिसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ये लोग, इसीलिये कोई विशेष गतिविधि नहीं हो रही इनकी ओर से। आज़ाद भाई से मेरी बात हुयी थी इस बारे में, उनका भी यही विचार है प्रधान जी”। राजकुमार ने कुछ सोचते हुये कहा।

“पर क्या है ऐसा विशेष, पुत्तर जी?” प्रधान जी भी कहते हुये कोई अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहे थे।

“वो तो अभी न मुझे पता है न आज़ाद भाई को। बस एक अंदाज़ा है कि किसी ने कोई बड़ा आश्वासन दिया है शायद इनको इस मामले में, जिसके कारण चुप करके बैठ गये हैं। क्योंकि सिफारिशें अब भी आ रहीं हैं, निश्चित रूप से ही उनको अपने सिर पर तलवार अभी भी लटकती नज़र आ रही है। शायद किसी से कोई बड़ी बातचीत चल रही है इनकी, जिसका परिणाम निकलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, और साथ ही साथ इस मामले को सिफारिशों के माध्यम से सुलझाने की कोशिश भी कर रहे हैं”। राजकुमार ने अनुमान लगाते हुये कहा।

कुछ कहने से पहले ही रुक जाना पड़ा था प्रधान जी को, कारण था उनके मोबाइल फोन की बज रही घंटी और उसपर फ्लैश कर रहा बंस राज बंस का नाम। प्रधान जी ने राजकुमार को फोन के पास आ जाने का संकेत दिया और फोन रिसीव कर लिया।

“नमस्कार प्रधान जी, क्या हाल हैं मेरे बड़े भाई के?” दूसरी ओर से बंस राज बंस की ही आवाज़ आयी थी।

“बिल्कुल ठीक है बंस भाई, कहां रहते हो आजकल? इतने दिनों से न कोई फोन और न ही कोई मुलाकात”। प्रधान जी ने प्रेम भरे स्वर में शिकायत करते हुये कहा। बंस राज बंस के साथ बहुत पुराने और विशेष संबंध थे प्रधान जी के।

“दो महीने के लिये विदेश दौरे पर था प्रधान जी, कल रात ही पहुंचा हूं और आज सुबह ही फोन कर दिया आपको”। बंस के इस जवाब ने अनिल खन्ना की बात की पुष्टि कर दी थी।

“और तुम्हारी आवाज़ सुनते ही दिल गार्डन गार्डन हो गया है मेरा, सचमुच जादू है तुम्हारी आवाज़ में बंस भाई। और सुनाओ, कैसा रहा विदेश दौरा?” प्रधान जी ने बात को जारी रखने के लिये कहा।

“बड़ी दिलचस्प बातें हुयीं इस विदेश दौरे में प्रधान जी, मिलकर बताऊंगा आपको। वैसे आज दोपहर क्या कर रहे हैं आप?” बंस ने प्रेम भरे स्वर में पूछा।

“कुछ विशेष नहीं, वही रोज़मर्रा के काम। कोई प्रोग्राम बनाना है क्या?” प्रधान जी ने उत्सुकुता के साथ पूछा।

“तो फिर आज दोपहर का खाना मेरे साथ मेरे घर पर ही खाईये, इसी बहाने मुलाकात भी हो जायेगी”। हंसते हुये कहा बंस राज बंस ने।

“तो ठीक है फिर, एक बजे के करीब मिलते हैं घर पर ही”। प्रधान जी ने कहा और औपचारिकता पूरी करने के बाद फोन डिस्कनैकट करते हुये राजकुमार की ओर देखा जो अपनी आदत के अनुसार एक बार फिर किसी जोड़ तोड़ में लग गया था।

“क्या सोच रहे हो, पुत्तर जी?” प्रधान जी ने राजकुमार की विचार श्रृंख्ला तोड़ते हुये कहा।

“यही कि बंस ने आपको फोन करके खाने पर क्यों बुलाया है?” राजकुमार के स्वर में रहस्य था।

“हर चीज़ पर शक मत किया कर कंजर, वो बुलाता ही रहता है मुझे खाने पर। बहुत अच्छे संबंध हैं मेरे उसके साथ”। प्रधान जी ने राजकुमार को छेड़ते हुये कहा।

“शक करने के लिये ही तो आपने मुझे साथ रखा है प्रधान जी, और मैं तो अपना काम ही कर रहा हूं। आपको याद है अनिल खन्ना ने कहा था कि उसने विजय बहल को ये बताया था कि बंस के संबंध हैं आपके साथ?” राजकुमार अभी भी किसी सोच में डूबा हुआ था।

“हां कहा तो था………तो क्या तू ये कहना चाहता है कि बंस ने मुझे दूरदर्शन वाले मामले में बातचीत करने के लिये बुलाया है?” प्रधान जी के चेहरे पर राजकुमार की बात का मतलब समझ कर कुछ हैरानी आ गयी थी।

“पक्का तो नहीं कह सकता प्रधान जी, पर ऐसा लगता जरूर है मुझे। शायद बंस का विदेश से वापिस आना ही वो कारण हो जिसके चलते दूरदर्शन के अधिकारी चुप बैठे हों। शायद बंस ने उन्हें आश्वासन दिया हो कि वो इस मामले में आपको मना लेगा, क्योंकि उसके बहुत अच्छे संबंध हैं आपके साथ?” राजकुमार की सोच के घोड़े अभी भी सरपट दौड़ रहे थे।

“तेरा ये शायद सच तो हो सकता है, पर बंस अच्छी तरह से जानता है मुझे। उसे पता है कि एक बार किसी भ्रष्टाचारी के खिलाफ खड़ा हो जाने पर मैं किसी भी हालत में पीछे नहीं हटता”। प्रधान जी के इस उत्तर ने राजकुमार की सोच और गहरी कर दी थी।

“अगर आप आज्ञा दें तो मैं आज़ाद भाई से बात करूं इस मामले में, शायद वो कोई नयी बात बता दें?” राजकुमार ने किसी नतीजे पर पहुंचते हुये कहा।

“मेरे ख्याल से इसकी आवश्यकता नहीं है, पर फिर भी अगर तू बात करना चाहता है तो कोई हर्ज भी नहीं है”। प्रधान जी इतना कहते कहते ही राजकुमार ने अपने मोबाइल से आज़ाद का नंबर मिला दिया था, जैसे उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा ही कर रहा हो।

“इतने दिन से न कोई फोन और न कोई मुलाकात, ऐसे थोड़े ही दोस्ती मज़बूत होती है”। फोन उठाते ही बिना किसी औपचारिकता के शिकायत कर दी थी आज़ाद ने।

“कुछ विशेष था ही नहीं भाई साहिब, इसलिये आपको तंग करना ठीक नहीं समझा”। राजकुमार ने सफाई देते हुये कहा।

“मतलब कि आज कुछ विशेष है, तो फिर जल्दी बताईये”। आज़ाद एक बार फिर राजकुमार की बात से उसके फोन करने के कारण का अंदाज़ा लगा चुके थे।

“बंस राज बंस को जानते हैं क्या आप?” राजकुमार ने आज़ाद की ओर पहेली फेंकते हुये कहा।

“उन्हें कौन नहीं जानता, पंजाबी के सबसे सफल गायकों में से एक हैं, बॉलीवुड तक धूम मचा दी है उन्होनें। पर आप ये क्यों पूछ रहे हैं, कहीं दूरदर्शन वाले मामले में तो नहीं…………?”। आज़ाद ने जैसे खुद ही अपनी बात का जवाब दिया और कुछ सोचने लग गये थे।

“बिल्कुल यही बात है भाई साहिब, अभी फोन करके प्रधान जी से मिलने का समय लिया है उन्होंने। बहुत अच्छे संबंध हैं उनके, प्रधान जी के साथ। मैं केवल ये जानना चाहता हूं कि कहीं इस मुलाकात के पीछे दूरदर्शन वाला मुद्दा तो नहीं?” राजकुमार ने अपनी शंका को सामने रखते हुये कहा।

“बिल्कुल हो सकता है, दूरदर्शन के निदेशक सुरेश अडवानी के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं बंस के। ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि प्रधान जी को बुलाया जाये और इस बारे में चर्चा न हो। इसीलिये बुलाया होगा, आप इसी हिसाब से तैयारी करके जाईयेगा। अच्छा, अब रखता हूं”। आज़ाद के इस खुलासे ने राजकुमार के साथ साथ प्रधान जी की उत्सुकुता भी बढ़ा दी थी।

“देखा प्रधान जी, आज़ाद भाई नें भी मेरी बात की पुष्टि की है। अब इस मुलाकात के दौरान ऐसी किसी स्थिति के लिये तैयार होकर जाईयेगा आप”। राजकुमार ने मुस्कुराते हुये कहा।

“तू भी मेरे साथ ही चलेगा बंस से मिलने और बातचीत के दौरान जहां तुझे बोलने लायक कुछ लगे, बिना मुझसे पूछे बोल देना”। प्रधान जी ने तुरंत ही प्रतिक्रिया दी, राजकुमार की बात पर।

“मेरा जाना क्या ठीक रहेगा प्रधान जी, बंस ने आपको दोस्ती वाले अंदाज़ में निजी तौर से खाने पर बुलाया है? ऐसे में मेरे जाने से आप लोगों को असुविधा हो सकती है, अपनी कोई निजी बातें करने में”। राजकुमार ने शंका प्रकट करते हुये कहा।

“अब तू भी मेरे निजी दायरे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है पुत्तर जी, इसलिये तेरे सामने किसी भी तरह की निजी बात करने में कोई समस्या नहीं है मुझे। तू भी साथ ही चलेगा मेरे”। प्रधान जी ने राजकुमार को जैसे आदेश दिया हो। प्रधान जी के इस प्यार और सम्मान ने कुछ पल के लिये राजकुमार को भावुक कर दिया था।

 

हिमांशु शंगारी