संकटमोचक 02 अध्याय 02

Sankat Mochak 02
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दूसरे दिन दोपहर का खाना खाने के बाद जब चंद्रिका ने एक दो घंटे विश्राम करने की इच्छा जतायी तो राजकुमार ने मुस्कुरा कर हनी की ओर देखा।

“जी पापा, मुझे अभी प्रधान अंकल की कहानी सुननी है”। राजकुमार का इशारा समझते हुये हनी ने एकदम खुश होते हुये कहा।

“तो चलो फिर बाहर गार्डन में बैठते हैं। चंद्रिका तुम आराम करो, तब तक मैं और हनी बाहर गार्डन में बैठे हैं”। कहते हुये राजकुमार ने हनी को साथ लिया और होटेल के कमरे से बाहर निकल गया।

होटेल ‘सेवोय द फॉरचून’ मसूरी के बहुत अच्छे होटलों में से एक था। पांच सितारा का दर्जा प्राप्त किये हुये ये होटेल वास्तव में एक हैरिटिज प्रॉपर्टी था जिसके पास कई एकड़ ज़मीन थी। होटेल के अंदर ही छोटे बड़े कई गार्डन बने हुये थे और पहाड़ों के आंचल में बने हुये ये गार्डन बहुत ही मनमोहक थे।

“तो आओ बेटा, आज तुम्हें प्रधान अंकल की एक और कहानी सुनाता हूं”। गार्डन में लगी कुर्सियों में से एक पर बैठते हुये राजकुमार ने हनी से कहा जो उसके सामने ही लगी एक कुर्सी पर बैठ गया था।

“हां पापा, सुनाईये मुझे प्रधान अंकल की कोई मज़ेदार कहानी, लेकिन उससे पहले मुझे कुछ और भी जानना है”। उत्साहित स्वर में हनी ने राजकुमार से कहा।

“वो क्या बेटा?” राजकुमार ने प्रश्नात्मक दृष्टि से हनी की ओर देखते हुये कहा।

“पापा आपने मुझे आज तक ये नहीं बताया कि आप प्रधान अंकल से पहली बार कब और कैसे मिले थे? मुझे सबसे पहले यही जानना है कि आपकी प्रधान अंकल से पहली मुलाकात कब हुई थी?” हनी ने अपना प्रश्न पूरा करते हुये कहा।

“अच्छा ये बात है, तो चलो आज तुम्हें वही कहानी सुनाता हूं जब मैं पहली बार तुम्हारे प्रधान अंकल से मिला था”। राजकुमार ने मुस्कुराते हुये कहा।

“आपके और प्रधान अंकल के पहली बार मिलने की भी कोई कहानी है, पापा?” हनी ने हैरान होते हुये पूछा।

“प्रधान अंकल और मैं जब भी साथ होते हैं, कोई न कोई कहानी बन ही जाती है, बेटा। फिर इस रिश्ते की शुरुआत भी एक कहानी से ही होना स्वभाविक ही है। बड़ी फिल्मी थी हमारी पहली मुलाकात। इस मुलाकात में प्रधान जी और मैं दो अलग अलग पक्षों की ओर से एक दूसरे के साथ ही लड़ रहे थे”। राजकुमार ने रहस्य भरे स्वर में कहते हुये हनी की ओर देखा।

“आपकी और प्रधान अंकल की पहली मुलाकात एक दूसरे के साथ लड़ाई में हुई थी, पापा? फिर तो जल्दी सुनाईये मुझे ये कहानी। मैने तो आज तक सोचा भी नहीं था कि आपने कभी प्रधान अंकल के साथ लड़ाई भी की होगी। आप दोनों में तो बहुत अधिक प्यार है?” हनी की उत्सुकुता के साथ उसकी हैरानी भी बढ़ती जा रही थी।

“लड़ाई से शुरू होने वाला प्यार का रिश्ता सामान्य रिश्ते की तुलना में बहुत गहरा होता है, बेटा। क्योंकि इस रिश्ते में आप पहले ही हर रिश्ते का दूसरा पहलू यानि कि झगड़ा देख चुके होते हैं और झगड़े के बाद ही आप प्यार शुरु करते हैं, इसलिये ये रिश्ता फिर बहुत गहरा हो जाता है”। राजकुमार ने हनी को समझाने वाले स्वर में कहा।

“ऐसा भी होता है, पापा? मैं कुछ समझा नहीं?” हनी ने हैरानी भरे स्वर में पूछा।

“ऐसा ही होता है, बेटा। जब आप किसी के साथ झगड़ा करने के बाद प्यार करते हैं तो वो प्यार और भी पक्का होता है। सोचो, जिस आदमी की ओर आप झगड़ा करने के बाद भी खिंचते चले जाते हैं, उसके प्यार का आकर्षण सामान्य की तुलना में कितना अधिक होगा?” राजकुमार के स्वर में फिलॉस्फी का पुट झलकना शुरु हो गया था।

“तब तो आप जल्दी सुनाईये मुझे ये कहानी”। बालक हनी ने उतावले स्वर में कहा। वो पूरी तरह से राजकुमार की इस गहरी बात को समझ नहीं पाया था।

“तो ठीक है फिर, आओ तुम्हें लगभग पंद्रह साल पीछे लेकर चलता हूं, जब मेरी और प्रधान जी की पहली मुलाकात हुयी थी। कहते कहते राजकुमार की आंखें शून्य में स्थिर होनी शुरू हो गयीं थीं, जैसे शारीरिक रूप से उस गार्डन में होने के बावजूद भी वहां नहीं था।

 

हिमांशु शंगारी