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भुगतान विकल्प

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यदि आप अपनी कुंडली के बारे में परामर्श प्राप्त करना चाहते हैं तथा क्रेडिट कार्ड के माध्यम से भुगतान नहीं करना चाहते तो आप अपने चुने हुए परामर्श के अनुसार निम्नलिखित राशियां नीचे दिए गए बैंक खातों में से किसी एक में जमा करवा सकते हैं :

क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने के लिए यहां किल्क करें

बैंक खातों का विवरण निम्नलिखित है :

बैंक का नाम :  HDFC Bank
खाता धारक का नाम : Himanshu Shangari / हिमांशु शंगारी
खाता संख्या : 04342000003019
खाता प्रकार : चालू खाता / Current Account
शाखा का नाम : सैक्टर 46, चंडीगढ़, भारत
IFSC / NEFT कोड : HDFC0000434

 

बैंक का नाम:  ICICI Bank
खाता धारक का नाम : Himanshu Shangari/ हिमांशु शंगारी
खाता संख्या : 108405500134
खाता प्रकार : चालू खाता / Current Account
शाखा का नाम : सैक्टर 46, चंडीगढ़, भारत
IFSC / NEFT कोड : ICIC0001084

आप अपने पास की HDFC या ICICI बैंक शाखा में जाकर अपनी पेय राशि का भुगतान उपर दिए गए बैंक खातों में से किसी एक में नकद जमा करवा कर या चैक के द्वारा कर सकते हैं अथवा अपने बैंक खाते से यह राशि उपर दिए गए बैंक खातों में से किसी एक में NEFT ट्रांसफर के माध्यम से कर सकते हैं। इस ट्रांसफर के लिए आवश्यक NEFT कोड दोनों खातों के विवरण में दिया हुआ है। अगर आप यह ट्रांसफर भारत से बाहर किसी देश से करना चाहते हैं तो इस कोड का नाम NEFT कोड की बजाए IFSC कोड होगा।

कृप्या पेय राशि जमा करवाने के बाद फोन या ई-मेल के माध्यम से हमें सूचित करें ताकि आपके परामर्श के लिए समय निर्धारित किया जा सके।

रेवती

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                                       रेवती के साथ ही नक्षत्रों की तीसरी श्रृंखला जो मूल से शुरु होकर रेवती तक जाती है, समाप्त हो जाती है। इसी के साथ रेवती 27 नक्षत्रों की इस यात्रा का अन्तिम पडाव भी है। भारतीय वैदिक ज्योतिष  की गणनाओं के लिये महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से रेवती को 27वां तथा अन्तिम नक्षत्र माना जाता है। रेवती का शाब्दिक अर्थ है धनवान अथवा धनी और इसी के अनुसार वैदिक ज्योतिष इस नक्षत्र को धन सम्पदा की प्राप्ति तथा सुखमय जीवन के साथ जोड़ कर देखता है । वैदिक ज्योतिष के अनुसार  पानी में तैरती हुई एक मछली को रेवती नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में माना जाता है । कुछ वैदिक ज्योतिषियों का यह मानना है की मछली का यह प्रतीक चिन्ह आत्मा की उस स्थिति को दर्शाता है जो दुनिया तथा माया के भवसागर से जूझते हुए मुक्ति का रास्ता ढूँढ रही है । इन वैदिक ज्योतिषियों की इस मान्यता को इस तथ्य से बल प्राप्त होता है कि रेवती नक्षत्र का मीन राशि के साथ गहरा संबंध है तथा मीन राशि को वैदिक ज्योतिष में मृत्यु के पश्चात आने वाले जीवन तथा आत्मा की मोक्ष यात्रा के साथ जोड़ा जाता है ।

                                        कुछ वैदिक ज्योतिषियों का यह मानना है कि मछली सामान्यतः पानी में रहने पर बहुत खुश होती है तथा इसी प्रकार रेवती नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बहुत खुश तथा समृद्ध रहतें हैं तथा इन्हें अपने जीवन में धन तथा समृद्धि उसी प्रकार प्राप्त रहती है जिस प्रकार मछली के आस पास जल रहता है । इसी प्रकार कुछ अन्य वैदिक ज्योतिष रेवती नक्षत्र के इस प्रतीक की कुछ अन्य व्याख्याएँ भी करते हैं । कुछ वैदिक ज्योतिषी नगाड़े को भी रेवती नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मानते हैं । यहाँ पर ध्यान देने योग्य है कि प्राचीन काल में नगाड़ों का प्रयोग जन समुदाय को एकत्रित करने के लिए किया जाता था जिसका मुख्य उदेश्य आम तौर पर किसी न किसी प्रकार की सूचना जारी करना ही होता था । इसी के अनुसार रेवती नक्षत्र को सूचना तथा संचार व्यवस्था के साथ जोड़ा जाता है । वैदिक ज्योतिष में पूषा को रेवती नक्षत्र का देवता माना जाता है । कुछ वैदिक ग्रंथों के अनुसार पूषा सूर्य का ही एक नाम है तथा इस देवता को प्रकाश का देवता माना जाता है । कुछ विद्वानों का यह मानना है आत्मा को प्रकाशमयी करके परमात्मा के साथ जोड़ना पूषा के कार्यक्षेत्र में आता है । अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि पूषा जीवन तथा जगत के उन सभी भागों में प्रकाश लातें हैं जहां इसकी आवश्यकता होती है । बहुत से वैदिक ज्योतिषी पूषा को धन समृद्धि का देवता भी मानते है तथा पूषा के चरित्र कि ये सभी विशेषताएं रेवती नक्षत्र के माध्यम से साकार होती हैं । जिसके चलते रेवती नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक धनवान तथा उदार होतें हैं । बहुत से वैदिक ज्योतिषी भगवान विष्णु को भी रेवती नक्षत्र के अधिष्ठ देवता मानते हैं। जैसा कि हम सब जानतें हैं भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी के पति हैं तथा देवी लक्ष्मी धन तथा समृद्धि की देवी हैं अतः विष्णु जी के सहयोग से इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक धनवान तथा समृद्ध होतें हैं । जैसा कि हम सब जानतें हैं कि भगवान विष्णु अपने वाक कौशल के चलते त्रिदेवों में से सबसे चतुर देव मानें जातें हैं उसी प्रकार इस नक्षत्र के प्रभाव वाले व्यक्ति भी बुद्धिमान तथा वाक कौशल के धनी होतें हैं ।

                                      वैदिक ज्योतिष के अनुसार बुध रेवती नक्षत्र का शासक ग्रह है तथा इसी लिए इस नक्षत्र में बुध ग्रह का भी प्रभाव देखा जा सकता है । बुध ग्रह वाक कौशल ,बुद्धिमानी, विश्लेषणात्मक प्रकृति एवम व्यापार कौशल का प्रतीक है तथा ये बुध ग्रह की ये सब विशेषताएं रेवती नक्षत्र में भी झलकती हैं । रेवती नक्षत्र के सभी चरण  मीन राशि में आते है जो पुनः बृहस्पति के प्रभाव में है अतः रेवती नक्षत्र मीन और बृहस्पति दोनों के प्रभाव में आता है । मीन राशि का प्रतीक चिन्ह मछली आत्मा की मुक्ति का सूचक है तथा बृहस्पति उदारता, आशा तथा बुद्धिमानी का तथा मीन तथा बृहस्पति की ये विशेषताएं रेवती नक्षत्र में होने के कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में बहुत सफल होते हैं। इसका एक कारण रेवती नक्षत्र मे बुध तथा बृहस्पति की सकारात्मक उर्जाओं का मिश्रण होना भी माना गया है । रेवती नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक अधिकतर सकारात्मकता से भरपूर होते हैं तथा विफलताओं के पश्चात भी वें अपने उदेश्य की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहते हैं । इस नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों की काल्पनिक शक्ति बहुत तीव्र होती है जिसे वें अपनी रचनात्मकता के लिए प्रयोग में लातें हैं। परन्तु ये तभी सम्भव होता है यदि जातक की कुंडली में स्थित बाकी ग्रह भी इसका समर्थन करें अन्यथा जातक की ये रचनात्मकता सीमित हो जाती है तथा इसके कुछ परिणाम नहीं मिल पाते । संभवतः यही कारण है कि कईं वैदिक ज्योतिषियों का मानना है कि इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातकों में अपनी स्वप्नों तथा कल्पनाओं की अलग दुनिया बनाने की प्रवृति होती है । कभी कभी तो इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक अपनी इस दुनिया में इतना खो जाते हैं कि व्यावहारिक दुनिया से अपने आप को जोड़ ही नहीं पाते ।

                                       कुछ वैदिक ज्योतिषियों का ये मानना है कि रेवती नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों का माया के साथ गहरा सम्बन्ध होता है । अपने निचले स्तर पर यह माया जातक को भटका कर व्यावहारिकता से दूर कर सकती है तथा ऐसा जातक कल्पना की दुनिया में ही खोया रहता है जबकि यही माया अपने उपरी स्तर पर जातक को दिव्य ज्ञान भी प्रदान कर सकती है जिससे जातक को सृष्टि के सभी रहस्यों का भेद पता चल सकता है तथा इसी माया के प्रभाव के चलते जातक को मुक्ति अथवा मोक्ष का मार्ग भी मिल सकता है । कुछ वैदिक ज्योतिषियों के अनुसार माया का यह प्रभाव भगवान विष्णु का इस नक्षत्र से संबंध होने के कारण है क्योंकि वैदिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु प्रत्येक प्रकार की माया के स्वामी हैं । वहीँ  कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि रेवती का माया से सम्बन्ध होने का कारण मीन राशि का इस नक्षत्र पर गहरा प्रभाव है क्योंकि वैदिक ज्योतिष में मीन राशि को माया के साथ जोड़ कर देखा जाता है ।

परन्तु दोनों ही स्थितियों में, यह बात स्पष्ट हो जाती है कि रेवती नक्षत्र का माया के साथ गहरा संबंध है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक माया का भेद समझने के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं जिनमें से कुछ जातक तो माया के इन भेदों को सुलझा लेते है जबकि कुछ इन्ही में गुम हो जाते हैं। इसीलिए रेवती को माया का नक्षत्र भी कहा जाता है । रेवती नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक सामान्यतः बहुत सभ्य तथा संस्कारी प्रवृत्ति के होते हैं, वे जानते हैं कि समाज में किस तरह का व्यवहार करना है बल्कि ये कहें कि वे  सुसंस्कृत समाज के स्तम्भ कहलाते है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों को लोगों से मिलना जुलना पसंद होता है तथा उनके अपने मित्रों तथा सम्बंधियों से अच्छे रिश्ते होते हैं तथा जातक के इन रिश्तों के प्रगाढ़ होने का एक कारण उनका वाक कौशल भी होता है जिससे वो लोगों को अपने से जोड़े रखने में सफल रहते हैं । इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक अपने मित्रों तथा सम्बंधियों की सहायता के लिए सदैव तैयार रहते हैं तथा समय आने पर उनसे सहायता पाते भी हैं ।

                           दया तथा सौभाग्य रेवती नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक के दो मुख्य लक्षण हैं तथा सामान्यतया इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक यह मानते हैं कि सुकर्मों से ही सौभाग्य की प्राप्ति संभव है । रेवती नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने मानवीय मूल्यों के लिए जाने जाते हैं, वें दूसरों का दर्द समझते हैं तथा उसको दूर करने के लिए हर संभव प्रयास भी करते हैं। यही वजह है कि इस नक्षत्र के प्रभाव  में आने वाले अधिकतर जातक किसी धर्मार्थ संस्था अथवा ऐसे किसी अभियान से जुड़े पाए जाते हैं जो गरीब तथा कमज़ोर लोगों की सहायता के लिए धन एकत्रित करते हैं । वैदिक ज्योतिष के अनुसार रेवती के जातक बहुत से व्यावसायिक क्षेत्रों में कार्यरत पाए जातें है जैसे कि आध्यात्मिक गुरु, योगाचार्य, धार्मिक उपदेशक तथा प्रवाचक, दार्शनिक, ज्योतिषी, हस्त रेखा विशेषज्ञ, गणितज्ञ, वास्तु विशेषज्ञ, फेंग शुई विशेषज्ञ,  कलाकार, हास्य अभिनेता, मूर्तिकार ,चित्रकार, संगीतकार, कवि, तथा अन्य क्षेत्र जिनमें काल्पनिक शक्ति का प्रयोग हो, चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक,अध्यापक, वैज्ञानिक,शोधकर्ता, विश्लेषक, अंतरिक्ष यात्री, गोताखोर तथा मछली उद्योग से जुड़े अन्य लोग तथा अन्य कई प्रकार के व्यवसायिक क्षेत्रों मे कार्यरत लोग।

                                 आइए अब चर्चा करते हैं रेवती नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की जो वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह हेतु प्रयोग में लाई जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । वैदिक ज्योतिष में रेवती को एक स्त्री नक्षत्र माना जाता है तथा कई वैदिक ज्योतिषी रेवती नक्षत्र के इस लिंग निर्धारण का कारण इस नक्षत्र का माया से गहरा संबंध बताते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि वैदिक मिथिहास में माया को भी स्त्रीलिंग माना गया है । वैदिक ज्योतिष के अनुसार रेवती एक नम्र तथा संतुलित तरीके से कार्य करने वाला नक्षत्र माना गया है । वैदिक ज्योतिष में रेवती नक्षत्र को शुद्र वर्ण के रूप में माना जाता है जो इस नक्षत्र की विशेषताओं को देखते हुए हैरान करने वाली बात है । कुछ वैदिक ज्योतिषी रेवती नक्षत्र के इस वर्ण निर्धारण की व्याख्या इस तथ्य से करते है कि रेवती नक्षत्र देने और सेवा भाव रखने वाला नक्षत्र माना गया है तथा सेवा भाव शुद्र जाति की विशेषता मानी जाती है । वैदिक ज्योतिष के अनुसार रेवती नक्षत्र गण में देव तथा गुण में सात्विक है तथा इस नक्षत्र के स्वभाव को देखते हुए रेवती नक्षत्र के इस गुण तथा गण निर्धारण को समझना आसान है। वैदिक ज्योतिष आकाश तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है ।

लेखक
हिमांशु शंगारी

उत्तरभाद्रपद

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                             भारतीय वैदिक ज्योतिष  की गणनाओं के लिये महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से उत्तरभाद्रपद को 26वां नक्षत्र माना जाता है। उत्तरभाद्रपद का शाब्दिक अर्थ है उत्तर अर्थात बाद में आने वाला भाग्यशाली पैरों वाला व्यक्ति। कुछ वैदिक ज्योतिषी का यह मानते हैं कि इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बहुत ही भाग्यशाली होते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार चारपाई के पिछले हिस्से को उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में माना जाता है तथा कुछ वैदिक ज्योतिषियों का यह मानना है कि यह चारपाई कोई साधारण चारपाई ना होकर शव को रखने के लिए प्रयोग की जाने वाली चारपाई है जिसका वर्णन पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में भी किया गया है तथा यह उसी चारपाई का पिछ्ला भाग है। यह प्रतीक चिन्ह यह दर्शाता है कि उत्तरभाद्रपद नक्षत्र का सम्बन्ध मृत्यु तथा मृत्यु के पश्चात के समय से है। पूर्वभाद्रपद उत्तरभाद्रपद के साथ उसी प्रकार जोड़ा बनाता है जिस प्रकार पूर्वफाल्गुनी-उत्तरफाल्गुनी तथा पूर्वाषाढ़-उत्तराषाढ़। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि उत्तरभाद्रपद नक्षत्र  की कार्यशैली पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र से बहुत भिन्न है तथा इन दोनों  नक्षत्रों में कई समानताएँ भी हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी एक कुंडली मारे हुए सर्प को भी इस नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में मानते है। इस कुंडली मारे हुए सर्प को मनुष्य की रीढ़ की हड्डी में पाए जाने वाली कुंडलिनी शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो कि मानसिक उर्जा का बहुत शक्तिशाली स्तोत्र माना जाता है तथा इस कुंडलिनी का जागृत होना मनुष्य के अलौकिक संसार से जुड़ने की प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। अतः उत्तरभाद्रपद नक्षत्र का अलौकिक संसार से विशेष संबंध माना जाता है  तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों का अलौकिक तथा असाधारण मान्यताओं के प्रति झुकाव न्युनतम स्तर से उच्चतम स्तर तक हो सकता है तथा ऐसे कुछ जातकों को तो वास्तव में  ऐसी शक्तियों के साथ जुड़े पाया भी गया है।

                         वैदिक ज्योतिष में अहिर बुधन्य को उत्तरभाद्रपद नक्षत्र का देवता माना जाता है तथा इस नक्षत्र में अहिर बुधन्य की कईं विशेषताएं पायी जाती हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अहिर बुधन्य एक नाग देवता हैं जो पृथ्वी के तल में रहते हैं जबकि कुछ  वैदिक ज्योतिषियों की यह भी मान्यता है कि अहिर बुधन्य का वास समुद्र तल में है। अहिर बुधन्य को पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के देवता अजा एकपद की तुलना में अधिक बुद्धिमान तथा करुणामय देवता माना जाता है तथा इन्हीं विभिन्नताओं के कारण इनके प्रभाव के अंतर्गत आने वाले नक्षत्र पूर्वभाद्रपद तथा उत्तरभाद्रपद आपस में कुछ समानता होने पर भी एक दूसरे से बहुत भिन्न नक्षत्र पाए गए हैं। उदहारण के लिए उत्तरभाद्रपद नक्षत्र भी जीवन के रहस्यों से सम्बन्धित है जैसे कि पूर्वभाद्रपद नक्षत्र तथा उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक के स्वभाव का अनुमान लगाना उसी प्रकार कठिन है जिस प्रकार पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक का। परन्तु यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक अपनी ऊर्जा का प्रयोग सकारात्मक तरीके अर्थात समाज की भलाई आदि के लिए करते है जबकि पूर्वभाद्रपद के प्रभाव में आने वाले जातक इस नक्षत्र से मिली ऊर्जा का प्रयोग नकारात्मक तरीके जैसे हिंसा तथा विनाश के लिए भी कर सकते हैं। अतः कुछ समानताओं के चलते भी इन दोनों नक्षत्रों की कार्यशैली में बहुत अंतर है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भगवान शिव को उत्तरभाद्रपद नक्षत्र का अंतिम अधिपति देवता माना जाता है। वैदिक ज्योतिषियों का यह मानना है कि इस नक्षत्र का सम्बन्ध मृत्यु तथा मृत्यु के पश्चात के समय से है तथा मृत्यु के देव भगवान शिव हैं इसी कारण भगवान शिव को इस नक्षत्र का इष्टदेव माना जाता है। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि पिछले नक्षत्र अर्थात पूर्वभाद्रपद नक्षत्र का संबंध भी भगवान शिव से दिखाया गया है तथा यह संबंध अजा एकपद के कारण है जो भगवान शिव के रूद्र रूप का ही एक हिस्सा है परन्तु उत्तरभाद्रपद नक्षत्र से भगवान शिव का संबंध उनके नम्र तथा दयालु रूप में है ना कि पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के तरह रूद्र रूप में। अतः दोनों नक्षत्रों से जुड़े होने पर भी भगवान शिव का दोनों नक्षत्रों पर अलग अलग प्रभुत्व होता है।

                    वैदिक ज्योतिष में उत्तर भाद्रपद नक्षत्र का शासक ग्रह शनि को माना जाता है तथा इस नक्षत्र पर शनि का प्रबल प्रभाव होने के कारण शनि की कुछ विशेषताएं जैसे बुद्धिमानी, सहनशीलता, दृढ़ता तथा लक्ष्य को पाना तथा उस सफलता का आनंद उठाना आदि इस नक्षत्र में भी पायी जाती हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषियों के अनुसार शनि इस नक्षत्र में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देते हैं जबकि पुष्य तथा अनुराधा जैसे शुभ नक्षत्र भी शनि देव के प्रभाव में ही आते हैं । कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि उत्तर भाद्रपद नक्षत्र पर शनि का नम्र तथा परोपकारी पक्ष प्रभाव डालता है जिसके कारण ही यह नक्षत्र तथा इसके प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बुद्धिमान, परोपकारी तथा निस्वार्थ सेवा भाव से भरपूर होते हैं। इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक दूसरों के कल्याण हेतु कार्यरत रहते हैं तथा ऐसे कल्याणकारी कार्यों से इन्हें भी लाभ प्राप्त होता रहता है। उत्तर भाद्रपद के चारों चरण बृहस्पति के अधीन आने वाली मीन राशि में आते हैं इसीलिए इस नक्षत्र पर मीन राशि तथा बृहस्पति का भी प्रभाव है। वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को एक बुद्धिमान तथा परोपकारी ग्रह माना जाता है तथा मीन राशि अच्छे कर्मों के प्रति निष्ठा भाव, मृत्यु, मृत्यु के बाद के जीवन तथा अंतिम आत्मज्ञान को चित्रित करती है तथा बृहस्पति और मीन राशि की ये विशेषताएं उत्तर भाद्रपद नक्षत्र में भी  झलकती हैं। अतः इस नक्षत्र के स्वभाव को समझने के लिए इस नक्षत्र के शासक ग्रहों तथा देवताओं के प्रभाव को समझना आवश्यक है क्योंकि हर कुंडली में यह नक्षत्र अलग तरीके से कार्य करता है जो कि उस कुंडली में इन ग्रहों तथा राशियों की स्थिति तथा क्षमता पर निर्भर होता है।

                       उत्तर भाद्रपद नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक साधारण बुद्धिमता से असाधारण बुद्धिमता तक के धनी हो सकते है। ये जातक पूर्वभाद्रपद के प्रभाव में आने वाले जातकों की तरह ही अपने आप को हर स्थिति के अनुकूल ढालने में सक्षम होते हैं। कईं वैदिक ज्योतिषियों का यह मानना है कि कभी कभी पूर्वभाद्रपद तथा उत्तर भाद्रपद नक्षत्रों के प्रभाव में आने वाले जातकों के स्वभाव  में अंतर करना कठिन हो जाता है। उत्तर भाद्रपद के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक स्थिति के अनुसार व्यवहार करने में भी निपुण होते हैं। इस नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक अपने लक्ष्य प्राप्ति हेतु दृढ़- निश्चयी होकर प्रयास करते हैं। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि अन्य नक्षत्रों के प्रभाव वाले जातकों कि भांति उत्तर भाद्रपद नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए उतावले नहीं होते बल्कि ये जातक संयम तथा बुद्धिमानी से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने तथा उनका परिणाम देखने में विश्वास रखते हैं। इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक बहुत ही शांत दिखने वाले माने जाते हैं जो अपने लक्ष्य को बहुत ही सुनियोजित तरीके से प्राप्त करने में विश्वास रखने वाले होते हैं। उत्तर भाद्रपद नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपनी बुद्धिमता तथा सहनशीलता के कारण समाज में बहुत सम्मान पाते हैं तथा अधिकतर लोग इनकी संगति में रहना इसीलिए पसंद करते है ताकि वें इन जातकों से सलाह तथा मदद प्राप्त कर सकें जो इस नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक सदैव ही करते हैं।

                       उत्तर भाद्रपद के प्रभाव में आने वाले जातक हर काम को सुनियोजित तथा व्यवस्थित ढंग से करना पसंद करते है फिर काम चाहे छोटा हो या बड़ा, ये जातक उसके हर छोटे बड़े पक्ष को ध्यान में रखते हुए उसको करते है। उत्तर भाद्रपद के प्रभाव वाले जातक दयालु तथा विचारशील होते हैं। वें सदैव ही समाज तथा कमज़ोर वर्ग के लिए कुछ रचनात्मक करने की कोशिश करते हैं इसीलिए इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले अधिकतर जातक किसी धर्मार्थ संस्था के साथ जुड़े पाए गए हैं। उत्तर भाद्रपद के प्रबल प्रभाव  में आने वाले जातकों में बदला लेने की तथा ईर्ष्या की भावना ना के बराबर होती है क्योंकि वें लोगों की त्रुटियों को तथा उनके द्वारा किये गए बुरे कामों को  बहुत जल्दी भूल कर उन्हें क्षमा कर देते हैं इसलिए इन्हें साधु-संतों जैसे लोग भी कहा जाता है। उत्तर भाद्रपद नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक अलौकिक तथा पराविज्ञान के क्षेत्र में भी बहुत रूचि रखते हैं तथा इन में से बहुत से जातक इन क्षेत्रों में  कार्यशील भी पाए जाते हैं। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि उत्तर भाद्रपद के प्रभाव के कारण अलौकिक तथा पराविज्ञान के क्षेत्रों में जाने वाले जातक सामान्यतः ऐसे ही कार्यक्षेत्रों में अभ्यास करते है जिन्हें सभ्य समाज में अच्छा तथा आदरणीय माना जाता है। उदाहरण के लिए इस नक्षत्र के प्रभाव के कारण अलौकिक तथा पराविज्ञान के क्षेत्रो में अभ्यास करने वाले जातक सामान्यतः ज्योतिष, अंक विज्ञान, हस्त रेखा विज्ञान, अध्यात्मिक साधना, योग तथा ऐसी ही अन्य विद्याओं में कार्यशील होते हैं तथा ये जातक सामान्यतः सभ्य समाज के द्वारा बुरे तथा निन्दित माने जाने वाले कार्यक्षेत्रों जैसे कि काला जादू, अघोर साधना तथा ऐसी तन्त्र साधनाओं  में रूचि नहीं रखते जिन में सिद्धि प्राप्त करने के लिए पशुओं तथा कईं बार मनुष्यों कि बलि भी दी जाती है। उत्तर भाद्रपद के जातक अपने संत स्वभाव के लिए जाने जाते हैं तथा अनैतिक, अवैध एवम समाज के लिए अहितकारी कार्यों में इनकी रूचि नहीं होती।

                     उत्तर भाद्रपद वाले जातक अधिकतर संतोषी स्वभाव के होते हैं। वें प्रतिदिन आने वाली छोटी छोटी घटनाओं पर चिंतित होकर जीवन दुखमय बनाने की जगह जीवन में आने वाली हर स्थिति में खुश रहने की कोशिश करते हैं। इस नक्षत्र वाले जातक अपनी बुद्धिमता तथा पारखी नज़र के कारण बहुत अच्छे मध्यस्थ सिद्ध होते हैं तथा इनके इर्द-गिर्द रहने वाले लोग अधिकतर अपने विवादों को सुलझाने में इनकी मदद लेते है तथा अधिकतर विवादों का निर्णय करने से पूर्व उत्तर भाद्रपद के प्रभाव वाले जातक सभी तथ्यों तथा तर्कों को ध्यान में रखते हुए ही निर्णय लेते हैं। उत्तर भाद्रपद नक्षत्र वाले जातकों की प्रवृति अधिकतर गलत काम करने वालों को माफ करने की होती है इसलिए किसी विवाद का निर्णय लेते समय वे दोषी को सुधरने का एक और मौका देने में विश्वास रखते हैं क्योंकि उनका मानना है कि गलती करने वाले को प्यार तथा दया से समझाया जा सकता है ना कि दंड देने से। कईं वैदिक ज्योतिषियों का यह मानना है कि उत्तर भाद्रपद एक सौभाग्यशाली नक्षत्र है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों को सामान्यतः उपहार, अचानक मिलने वाले लाभ, अनुकूल निर्णय तथा विरासत से होने वाले लाभ अक्सर ही बिना कोई कठिन कोशिश के ही मिल जाते हैं। जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि उत्तर भाद्रपद के प्रभाव वाले जातक परोपकारी स्वभाव के होते है तथा इन जातकों के इसी स्वभाव के चलते ही अधिकतर लोग इनसे मित्रता करना चाहते हैं क्योंकि इनकी संगति में लोग अपने आप को बहुत ही सहज तथा सुरक्षित महसूस करते हैं।

                    वैदिक ज्योतिष ने उत्तर भाद्रपद नक्षत्र को कईं व्यवसायिक क्षेत्रों के साथ जोड़ा है तथा इस के अनुसार उत्तर भाद्रपद के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक  अधिकतर  योग शिक्षक, ज्योतिष विज्ञान,अंक विज्ञान,हस्तरेखा विज्ञान,वास्तु विज्ञान जैसे क्षेत्रों में कार्यरत पाए जाते है। ये जातक शिक्षक,प्रचारक, सलाहकार, वित्तीय सलाहकार,न्यायधीश, प्रशासक तथा कुछ अन्य संस्थाओं जो जनता कि सेवा के लिए काम करती हो के संचालक के तौर पर काम करते पाए जाते हैं। उत्तर भाद्रपद के प्रभाव वाले जातक कईं व्यावसायिक क्षेत्रों में कार्यशील होते हैं इसलिए इन्हें कुछ ही व्यवसायों से विशेष रूप से जोड़ना मुश्किल है। उदाहरण के लिए कुछ जातक जो उत्तर भाद्रपद के प्रबल प्रभाव में आते है उनको पत्रकार के रूप में भी कार्य करते देखा जा सकता है परन्तु सामान्य तौर पर ऐसे जातक धार्मिक क्षेत्रों तथा ऐसे कुछ अन्य क्षेत्रों के बारे में हमें जानकारी देते हैं जो लोगों को किसी प्रकार का ज्ञान दे तथा जिस से लोग लाभ ले सकें।

                   आइये अब चर्चा करें उत्तर भाद्रपद नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की जिनको वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली गुण मिलान की प्रणाली में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार उत्तर भाद्रपद को पुरुष नक्षत्र माना जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी इस लिंग निर्धारण का कारण इस तथ्य को मानते हैं कि इस नक्षत्र के शासक देवता तथा शासक ग्रह दोनों ही पुरुष है तथा इन्ही ग्रहों तथा देवताओं का प्रभाव इस नक्षत्र को भी पुरुष नक्षत्र बनाता है। बहुत से वैदिक ज्योतिषी उत्तर भाद्रपद नक्षत्र के इस लिंग निर्धारण का आधार इस नक्षत्र की  विशेषताओं जैसे बुद्धिमता तथा अच्छी न्यायिक क्षमता को मानते है जो कि अधिकतर पुरुषों में ही पायी जाती हैं। वैदिक ज्योतिषियों का यह मानना है कि उत्तर भाद्रपद नक्षत्र स्थिर तथा संतुलित स्वभाव का है जो कि इस नक्षत्र की कार्यशैली से स्पष्ट भी है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस नक्षत्र का वर्ण क्षत्रिय माना जाता है जो कि हैरान करने वाली बात है क्योंकि वैदिक ज्योतिष तो इसे संत स्वभाव वाला नक्षत्र मानता है। परन्तु कुछ विद्वानो के अनुसार उत्तर भाद्रपद नक्षत्र भगवान शिव के परोपकारी रूप से प्रभावित है जो भगवान राम की तरह एक सच्चा योद्धा बनकर रहता है, जो बहुत ही दयालु स्वभाव का है तथा अपने शत्रुओं को माफ करने में सक्षम है परन्तु इसके साथ समय आने पर उग्र रूप भी धारण कर सकता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार उत्तर भाद्रपद नक्षत्र गुण से तामसिक है तथा ऐसा इसलिए है  क्योकि इस नक्षत्र का सम्बन्ध भगवान शिव से है जो अपने आप में ही तमो गुणों के देव हैं। वैदिक ज्योतिष में उत्तर भाद्रपद नक्षत्र को मानव गण प्रदान किया जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र की लोगों का कल्याण करने के प्रति सक्रियता तथा भौतिकवाद से सम्बन्ध है। वैदिक ज्योतिष आकाश तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

पूर्वाभाद्रपद

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                            पूर्वभाद्रपद निःसन्देह सभी नक्षत्रों में से सबसे साहसी, नाटकीय, रहस्यमयी तथा हिंसक नक्षत्रों में से एक है। भारतीय वैदिक ज्योतिष  की गणनाओं के लिये महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से पूर्वभाद्रपद  को 25वां नक्षत्र माना जाता है। पूर्वभाद्रपद का शाब्दिक अर्थ है पहले आने वाला भाग्यशाली पैरों वाला व्यक्ति। कई वैदिक ज्योतिषियों के अनुसार इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी सौभाग्य के पक्ष से भरपूर होते हैं| इस नक्षत्र का मुख्य प्रतीक चिन्ह चारपाई के अगले दो पैरों को माना गया है तथा वैदिक ज्योतिषियों के अनुसार यह चारपाई कोई साधारण चारपाई ना होकर शव को रखे जाने वाली चारपाई है। पूर्वभाद्रपद नक्षत्र का सम्बन्ध मृत्यु तथा निद्रा के क्षेत्र से भी है। वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि पूर्वभाद्रपद  का मृत्यु के बाद के जीवन से गहरा सम्बन्ध है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक कईं माध्यमों से मृतकों की दुनिया से जुड़ने तथा उन आत्माओं को किसी काम के लिए प्रयोग करने का प्रयास करते हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस विचार पर एकमत है कि पूर्वभाद्रपद के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ जातक एक समय में बहुत घातक, विनाशकारी तथा हिंसक प्रवृति के हो सकते हैं तथा यही जातक दूसरे ही पल बहुत सभ्य व्यवहार करने लगते हैं।

                            कुछ वैदिक ज्योतिषी दो मुंह वाले एक व्यक्ति को भी पूर्वभाद्रपद नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मानते हैं जिसका एक चेहरा  बहुत नम्र, सभ्य, तथा सुसंस्कारी है तथा दूसरा चेहरा बहुत हिंसक तथा विनाशकारी है तथा इसी के अनुसार पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक के व्यक्तित्व के भी दो पहलू होते हैं जिसका एक पहलू बहुत सौम्य तथा सभ्य है वहीँ दूसरा पहलू अत्यधिक विनाशकारी तथा हिंसक है। मैने इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वालीं बहुत सी कुंडलियों के व्यवहारिक अवलोकन तथा विश्लेषण में यह पाया गया है कि यह दोमुखी व्यक्ति वाला प्रतीक चिन्ह किसी भी अन्य प्रतीक चिन्ह से कहीं अधिक प्रभावशाली है तथा पूर्वभाद्रपद के प्रभाव वाले जातक दो व्यक्तित्व रखते है तथा ये दोनों ही व्यक्तित्व एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं तथा एक बात जो  ध्यान देने योग्य भी है तथा रुचिकर भी वो ये है कि पूर्वभाद्रपद के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक इन दोनों ही व्यक्तित्वों को बनाए रखने तथा स्थितिनुसार अपने एक व्यक्तित्व को दूसरे व्यक्तित्व  में बदलने के सक्षम होते हैं। इसी कारण पूर्वभाद्रपद के प्रभाव वाले जातक यदि किसी अपराधिक गतिविधि में संलग्न हो तो उनका सामना करना सबसे कठिन है। ऐसा इसलिए क्योंकि पूर्वभाद्रपद के प्रभाव में आने वाले अपराधी जातक अपना वेष बदलने में इतने चतुर होते हैं कि कभी कभी तो समझदार से समझदार व्यक्ति भी इनके व्यक्तित्व का ये रंग समझ नहीं पाता। उदहारण के लिए, एक कॉलेज प्रोफेसर जिसकी  कॉलेज तथा समाज में बहुत अच्छी मान-प्रतिष्ठा है तथा जो समाज में एक बहुत ही सभ्य तथा अच्छे इंसान माना जाता है, जो हमेशा क़ानून की मान- प्रतिष्ठा बनाए रखे तथा उसका कभी उलंघन ना करे तथा वास्तव में वह एक ऐसे माफ़िया संगठन या आंतंकवादी समूह का सदस्य पाया जाए जो बड़े पैमाने पर विनाश करने के लिए ज़िम्मेदार हो, यह पूर्वभाद्रपद के नकारात्मक प्रभाव वाले जातकों का एक सटीक उदहारण है।

                           दूसरी ओर यदि यह कॉलेज प्रोफेसर किसी उच्चतम स्तर की किसी सरकारी संस्था के लिए एक गुप्तचर की तरह काम करता है तो ये पूर्वभाद्रपद के सकारात्मक प्रभाव का एक विशिष्ट उदहारण है। अतः इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक अपने व्यक्तित्व का दूसरा पहलू छुपा कर रखने में सक्षम होते हैं जो कि उनके प्रत्यक्ष व्यक्तित्व के बिल्कुल विपरीत होता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी तलवार को भी पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में देखते हैं। इन में से कुछ ज्योतिषी ऐसा मानते हैं कि यह प्रतीक चिन्ह एक दोधारी तलवार का है न कि एक आम तलवार का जो कि इस नक्षत्र के दोहरे स्वभाव को चित्रित करती है तथा वहीँ यह प्रतीक चिन्ह इस नक्षत्र को सुरक्षा, विनाश तथा युद्ध के साथ भी जोड़ता है क्योंकि एक तलवार का प्रयोग इन सभी उद्देश्यों की  प्राप्ति के लिए होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अजा एकपद को इस नक्षत्र का शासक देवता माना जाता है। अजा एकपद का शाब्दिक अर्थ एक पाँव वाली बकरा होता है तथा वैदिक मिथिहास में इस देवता को एक असपष्ट रूप से दिखने वाले किसी राक्षसी प्राणी के रूप में चित्रित किया है जो कि एक बकरे की तरह दिखता है तथा जिसका एक ही पाँव या एक ही टांग है तथा जिसका व्यक्तित्व बहुत ही भयानक है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानतें है कि अजा एकपद भगवान शिव के रूद्र रूप में आने वाले कईं वेषों में से एक है। इसलिए अजा एकपद इस नक्षत्र को भगवान शिव के साथ जोड़ता है। परन्तु यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि अजा एकपद भगवान शिव के रूद्र तथा विनाशकारी रूप से सम्बन्धित है ना कि उनके नम्र तथा परोपकारी रूप से। अतः पूर्वभाद्रपद के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में अपने शासक देवता के स्वभाव के चलते हिंसा तथा विनाश से जुड़े क्षेत्रों तथा गतिविधियों से जुड़ने की प्रबल प्रवृति पायी जा सकती है।

                     वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को इस नक्षत्र का शासक ग्रह माना जाता है तथा बृहस्पति का पूर्वभाद्रपद जैसे एक हिंसक तथा विनाश्कारी नक्षत्र से सम्बन्ध कईं वैदिक ज्योतिषियों के लिए भ्रम का कारण है क्योंकि बृहस्पति अपने आप में एक परोपकारी तथा लाभकारी ग्रह माना जाता है जबकि पूर्वभाद्रपद इसके बिल्कुल विपरीत विशेषताओं का मालिक है। अतः कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ये माना जा सकता है कि पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के इस  विनाशक तथा हिंसक स्वभाव को रूद्र द्वारा ब्रह्मांड की अस्तित्व की रक्षा तथा जीवन के नवीनीकरण के लिए किये जाने वाले शुद्धिकरण की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के पहले तीन चरण शनि द्वारा शासित कुम्भ राशि में आते हैं जबकि इस का अंतिम चरण बृहस्पति के प्रभाव में आने वाली मीन राशि के अंतर्गत आता हैं जिसके कारण इस नक्षत्र में शनि के कुछ गुण जैसे कि गहन ध्यान, तप तथा यथार्थवाद आदि पाए जा सकते हैं। पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के मूल स्वभाव का अनुमान इस पर प्रभाव डालने वाले ग्रहों तथा शासक देवताओं की स्थिति व उस स्थान पर उनकी क्षमता पर निर्भर करता है जो हर कुंडली में भिन्न हो सकती है। पूर्वभाद्रपद के प्रभाव वाले जातकों में दोहरे स्वभाव की प्रकृति प्रगाढ़ रूप से पायी जाती है तथा कुछ वैदिक ज्योतिषियों द्वारा तो इनकी इस वेष तथा व्यक्तित्व बदलने की क्षमता के कारण इन्हें छद्मवेश धारण करने में निपुण की उपाधि भी दी गयी है। कईं वैदिक ज्योतिषियों का यह मानना है कि पूर्वभाद्रपद नक्षत्र की ऊर्जा को संभालना वैसे ही बहुत कठिन है और यदि यह ऊर्जा कहीं नकारात्मक प्रवृति की हो तो यह विश्व के लिए एक चिंता का विषय है क्योंकि यह आने वाले समय में हिंसा तथा विनाश का कारण बन सकती है। अतः पूर्वभाद्रपद को अधिकतर वैदिक ज्योतिषियों ने एक नकारात्मक नक्षत्र ही माना है हालाँकि यह नक्षत्र सकारात्मक तरीके से काम करने में भी सक्षम है।

                          पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक कानून द्वारा अवैध माने जाने वाली तथा हिंसक और विनाशक गतिविधियों से सम्बन्ध रख सकते हैं। उदहारण के लिए, अच्छे तथा आम लोगों के भेष में हत्यारे या सीरियल किलर और नशीले पदार्थों का व्यापार करने वाले लोग जो आम लोगो में ये दवाएं बेच कर उनका जीवन संकट में डालते हैं। ऐसे सभी लोगों पर सम्भवतः पूर्वभाद्रपद नक्षत्र का प्रबल नकारात्मक प्रभाव होता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते है कि पूर्वभाद्रपद नक्षत्र से जोड़े जाने वाला विनाश तथा हिंसा वास्तव में किसी ना किसी प्रकार की शुद्धिकरण के साथ जुड़े होते हैं तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ जातक अपने शुद्धिकरण की प्रक्रिया को अपने शरीर को प्रताड़ना दे कर तथा चरम स्थितियों से जूझ कर पूरा करते हैं। उदहारण के लिए, इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले बहुत से साधु अपनी तपस्या के लिए ऐसी ही चरम स्थितियों का चुनाव करते हैं जिनमें उनके शरीर को कष्ट तथा पीड़ा होती हो जैसे कि निरंतर कईं दिनों तक उपवास रखना, अत्यधिक ठंडे या गर्म वातावरण में तपस्या करना, वृक्षों की शाखाओं से उल्टा लटक कर तपस्या करना, एक पाँव पर खड़े हो कर तपस्या करना तथा ऐसी ही अन्य दुष्कर परिस्थितियों में तपस्या करना जिनसे उनके शरीर को अधिक से अधिक पीड़ा पहुँचती हो। इसलिए यह नक्षत्र किसी ना किसी प्रकार की हिंसा, विनाश, आत्मपीड़न अथवा गुप्त गतिविधियों के साथ जोड़ा कर देखा जाता है तथा इस नक्षत्र के जातकों में दोहरे व्यक्तित्व को सफलतापूर्वक निभाने की प्रबल क्षमता भी होती है। स्वयं मूर्ख होने का नाटक रच कर दूसरों को मूर्ख बनाने वाले अधिकतर जातक इसी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में होते है|

                        वैदिक ज्योतिष ने पूर्वभाद्रपद नक्षत्र को कईं व्यवसायों से जोड़ा है इसलिए इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक जासूस, गुप्तचर अथवा इस क्षेत्र से जुड़े कई और लोग, श्मशानभूमि का रखवाला, शव रखने की सामग्री तैयार करने से सम्बन्धित कोई कार्य अथवा अंतिम संस्कार से जुड़ी क्रियाओं, हथियार बनाने उन्हें बेचने अथवा प्रयोग करने जैसे व्यवसाय ,काला जादू अथवा तन्त्र मंत्र, अघोर क्रियाओं तथा इनसे सम्बन्धित व्यवसायों से जुड़े पाए जाते है। ये जातक टी.वी अथवा रंगमंच से जुड़े कलाकार भी हो सकते है तथा आतंकवादी या आतंकवादी संगठनों से किसी प्रकार जुड़े हो सकते हैं।जबकि वहीँ कुछ जातक अपराध क्षेत्र के दूसरे पहलू से जुड़े हो सकते है जैसे पुलिसकर्मी , सेनाकर्मी आदि भी हो सकते हैं। अतः वैदिक ज्योतिष ने इस नक्षत्र को व्यवसायों के पहलू से बहुत विशाल क्षेत्र प्रदान किया है इसलिए इस नक्षत्र को कुछ व्यवसायों तक सीमित करना उचित नहीं होगा। पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक रहस्यमयी लेख, भयभीत करने वाले लेख, पत्रकार विशेषतः अपराधिक गतिविधियों, युद्ध, हत्या अथवा ऐसे अन्य क्षेत्रों के बारे में जानकारी देने वाले पत्रकार के पद पर कार्यरत हो सकते हैं।

                      आईये अब चर्चा करते है इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथा वैदिक ज्योतिष में गुण मिलान तथा कुंडली मिलान की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माने जाने वाले तथ्यों के बारे में। वैदिक ज्योतिष में पूर्वभाद्रपद को एक पुरुष नक्षत्र माना जाता है तथा इस बात की पुष्टि इस तथ्य पर की जाती है कि इस नक्षत्र का सम्बन्ध बृहस्पति ग्रह है जो कि एक पुरुष ग्रह ही है तथा इस  नक्षत्र का शासक देव अजा एकपद भी पुरुष ही माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पूर्वभाद्रपद एक उग्र स्वभाव का नक्षत्र है तथा इस नक्षत्र के कार्यशैली निष्क्रिय पायी जाती है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते है कि इस नक्षत्र का निष्क्रियता की विशेषता ही इस नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों को छदम वेष में सुरक्षित रहने में सहायता करती है। वैदिक ज्योतिष ने इस नक्षत्र को ब्राह्मण वर्ण से जोड़ा है जो कि इस नक्षत्र के स्वभाव तथा कार्यशैली से बिल्कुल विपरीत है। कुछ वैदिक ज्योतिषियों के अनुसार इस नक्षत्र को यह वर्ण इस नक्षत्र के बृहस्पति ग्रह से सम्बन्ध होने के कारण दिया गया है जो कि भारतीय ज्योतिष में ब्राह्मण ग्रह माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस नक्षत्र का गुण सात्विक है तथा यह वर्गीकरण भी इस नक्षत्र को इसके बृहस्पति ग्रह से सम्बन्धित होने के कारण ही मिला प्रतीत होता है। वैदिक ज्योतिष में पूर्वभाद्रपद नक्षत्र का गण मानव माना जाता है तथा वैदिक ज्योतिष आकाश तत्व को भी इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है परन्तु एक बार फिर इस गण वर्गीकरण का कोई ठोस कारण दे पाना कठिन है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

शतभिषा

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                       वैदिक ज्योतिष की गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से  शतभिषा को  24वां नक्षत्र माना जाता है। शतभिषा का शाब्दिक अर्थ है सौ भीष्  अर्थात सौ चिकित्सक अथवा सौ चिकित्सा तथा इस अनुसार कईं वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि यह नक्षत्र किसी रोग अथवा उसकी चिकित्सा से सम्बन्धित है। वैदिक ज्योतिष में एक खाली वृत्त अर्थात गोलाकार को शतभिषा नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में माना जाता है तथा यह खाली वृत्त इस नक्षत्र की कईं विशेषताओं को चित्रित करता है। अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते है कि एक वृत्त जहाँ एक ओर वस्तुओं के अपने भीतर सम्मिलित होने को दर्शाता है वहीँ दूसरी ओर यह वृत्त कुछ सीमाओं का निर्धारण करके अपने भीतर सम्मिलित होने वाली वस्तुओं को सीमित भी करता है। इसी के चलते शतभिषा नक्षत्र में भी वस्तुओं अथवा व्यक्तियों को अपना बनाने तथा बाहरी वस्तुओं अथवा व्यक्तियों के लिए सीमा निर्धारण जैसी विशेषताएं पायी जाती हैं जो एक तरह से जातक के लिए रक्षा कवच का कार्य करती है। श्त्तारक इस नक्षत्र का एक वैकल्पिक नाम है जिसका शाब्दिक अर्थ है सौ सितारे तथा कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते है कि शतभिषा का प्रतीक चिन्ह वृत्त अपने आप में सौ सितारे समेटे है जो यह दर्शाता है कि शतभिषा नक्षत्र अपने आप में  बहुत सी ऐसी वस्तुएं समा सकता है जो कि बाहरी दुनिया से अनभिज्ञ हो या जिनसे बाहरी दुनिया अनभिज्ञ हो। अतः शतभिषा नक्षत्र में दूसरों से बातें अथवा चीज़ें छुपाने की प्रवृति पायी जा सकती है इसीलिए शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक अन्य नक्षत्र के जातकों की तुलना में अधिक रहस्यमयी प्रकार के जातक माने जाते हैं। इसलिए शतभिषा नक्षत्र का सुरक्षा, रोग तथा उस रोग की चिकित्सा, सीमा निर्धारित करने, रहस्य छुपाने आदि से गहरा सम्बन्ध है तथा ये विशेषताएं ही इस नक्षत्र को अपने आप में एक अलग प्रकार की विशिष्टता प्रदान कर देती हैं।

                  एक वृत समाप्ति अथवा पूर्णता की विचारधारा को भी दर्शाता है तथा इसलिए वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातकों में भी  यह पूर्णता की भावना प्रबल होती है। इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं। वें ये जानते है कि जो काम उन्होंने शुरू किया है वो उस काम को पूरा करने में भी सक्षम है तथा वें ऐसा कर भी देते हैं।  वहीँ कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मान्यता भी रखते हैं कि शतभिषा के प्रभाव वाले जातक अधिकतर लोगों से वैसे ही कटे रहते है जैसे कि एक वृत अपने आस पास की चीज़ों से कटा रहता है तथा अपनी सीमा निर्धारित रखता है। वैदिक ज्योतिष ने जल देवता वरुण को इस नक्षत्र का शासक देवता माना है तथा वरुण देव का प्रभाव शतभिषा नक्षत्र को इस संसार के हर जल प्राणी अथवा जल स्तोत्र से जोड़ता है विशेषतः बड़े बड़े सागरों तथा महासागरों से। कुछ वैदिक ज्योतिषी तो यह भी मानते हैं कि एक महासागर ही शतभिषा के गुणों को अच्छे से चित्रित करता है। उदहारण के लिए, यह माना जाता है कि एक महासागर अपने भीतर कईं रहस्य तथा खजाने छिपाए हुए होता है उसी तरह शतभिषा भी अपने भीतर कईं रहस्य तथा ज्ञान छुपाये रहता है। महासागर के अंदर कईं जड़ी बूटियों का समावेश माना जाता है जो कईं जटिल रोगों के निवारण के लिए प्रयोग की जा सकती हैं तथा इसीलिए वैदिक ज्योतिष यह मानते है कि एक महासागर सौ चिकित्सकों अथवा सौ दवाओं का पर्यायवाची माना जा सकता है जो कि शतभिषा नक्षत्र का मुख्य चिन्ह भी है। यहाँ पर यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यहाँ शब्द सौ का अर्थ उसकी गिनती से नहीं बल्कि सौ का अर्थ है हर सम्भव प्रकार की। जिस प्रकार एक वृत कि सीमाएं निर्धारित होती हैं उसी प्रकार एक महासागर कि भी सीमाएं निर्धारित होती है। इसी प्रकार कईं और विशेषताएं है जो एक महासागर को इस नक्षत्र से जोड़ती हैं तथा इस नक्षत्र का एक महासागर से सम्बन्ध दर्शाती हैं।

                                     वैदिक ज्योतिष ने राहु को शतभिषा नक्षत्र का शासक ग्रह माना है तथा क्योकि राहु भी मिथ्याओं, रहस्यों तथा गुप्त ज्ञान तथा जादुई घटनाओं का ग्रह माना जाता है इसलिए राहु ग्रह का प्रभाव भी इस नक्षत्र के इस रहस्यमयी पक्ष को बढ़ावा देता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि राहु ग्रह के महासागर समान गुण ही शतभिषा नक्षत्र को इस ग्रह से जोड़ते हैं। इस नक्षत्र के सभी चरण शनि के प्रभाव में आने वाली कुम्भ राशि के अंतर्गत आते हैं इसलिए शतभिषा नक्षत्र पर कुम्भ तथा शनि का प्रभाव प्रबल है तथा इस बात का प्रमाण शतभिषा नक्षत्र में शनि तथा कुम्भ राशि की विशेषताएं जैसे कि सहनशीलता, व्यवस्थापन तथा व्यवहारिकता का पाया जाना है। शतभिषा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बहुत रहस्यमयी स्वभाव के होते हैं तथा यही गोपनीयता अधिकतर इनके व्यक्तित्व तथा इनकी क्षमता का निर्माण करती है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले अधिकतर जातक अपने इसी गुप्त ज्ञान, रहस्यों या कुछ ऐसी ही गुप्त चीज़ों के कारण सफलता की चरम सीमा पर पहुँच जाते हैं।  शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक अपने साथ साथ दूसरों के रहस्य भी अच्छे से सम्भाल के रखने में सक्षम होते हैं उसी तरह जिस तरह एक महासागर हजारों वस्तुओं को सुरक्षित रख सकता है जो उसके गर्भ में छुपी हैं। सम्भवतः इसी कारण जब कुछ रहस्य बांटने या छुपाने की बात आती है तो शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक ही सबसे भरोसेमंद व्यक्ति माने जाते हैं तथा ये जातक इतने रहस्य जानने के बाद भी उन्हें रहस्य ही रखते हैं तथा इतने शांत तथा अनभिज्ञ दिखते हैं जैसे कि उन्हें कुछ पता ही ना हो।

                                  शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों के बारे में बात करते हुए यह बताना भी आवश्यक है कि इन जातकों की नयी चीज़ें सीखने की क्षमता बहुत ही प्रबल होती है। इनकी ज्ञान ग्रहण करने तथा उसका अभ्यास करने की क्षमता भी अतुलनीय है इसलिए शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक ऐसे क्षेत्रो में कार्यरत पाए जा सकते हैं जिनका रहस्य रखने जैसे कामों से सम्बन्ध हो। शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक अधिकतर शंकालु स्वभाव के होते हैं तथा नए लोगों पर आसानी से विश्वास ना करना या देर से विश्वास करना इनके स्वभाव में आता है। शतभिषा नक्षत्र वाले जातकों में वृत अथवा महासागर की तरह अपनी सीमाओं की रक्षा तथा सुरक्षा का एक प्राकृतिक रुझान होता है जिसके कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक किसी भी नयी वस्तु अथवा नए व्यक्ति से अपने आप को दूर तथा सुरक्षित रखते हैं। यही कारण है कि शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक किसी से भी घनिष्ठ सम्बन्ध बनाने में बहुत समय लगा सकते हैं। इन्ही कारणों के चलते, शतभिषा के प्रभाव वाले जातक बहुत जटिल सामाजिक व्यक्ति माने जाते हैं क्योंकि इन जातकों के विश्वास के सीमाक्षेत्र में आना बहुत कठिन है। यहाँ पर एक रोचक तथ्य यह है कि वैदिक ज्योतिष में राहु को एक सामजिक ग्रह माना जाता है जब कि शतभिषा तो इतना सामाजिक लगता नहीं इसलिए ये कहा जा सकता है कि शतभिषा नक्षत्र पर राहु का प्रभाव उसके प्रभाव में आने वाले अन्य दो नक्षत्रो स्वाति तथा आर्द्रा से बिल्कुल विभिन्न है। विशेषतः यदि हम राहु के प्रभाव में आने वाले एक और नक्षत्र स्वाति की बात करे तो हम जानेंगे कि शतभिषा स्वाति से बिल्कुल विपरीत रूप से कार्य करता है। जहाँ वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति को एक सामाजिक नक्षत्र माना जाता है तथा जो नक्षत्र रहस्य सम्भाल के रखने जैसे कार्यों से सम्बन्धित नहीं है वहीँ शतभिषा नक्षत्र में यही मुख्य गुण है जबकि दोनों ही ग्रह राहु के प्रभाव में आते हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि शतभिषा के माध्यम से  हमें राहु ग्रह का एक और पक्ष देखने को मिला है।

                              शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले अनेक जातक अधिकतर किसी समूह में बैठने के स्थान पर अकेले रहना ज्यादा पसंद करते हैं इसलिए इन जातकों में कईं बार रहस्यमयी दुनिया से जुड़ने की प्रवृति अधिक पायी जाती है परन्तु कभी कभी कुछ जातक इस अकेले रहने के कारण मानसिक अवसाद या ऐसे अकेलेपन से होने वाली बीमारियों के शिकार भी हो सकते हैं। शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक नयी भाषाएँ बहुत आसानी से सीख जाते हैं। वे रहस्यमयी विज्ञान अथवा ऐसी विद्याओं जो रहस्यमयी मानी जाती है को भी जल्दी ही समझ जाते हैं। वास्तव में शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों को ऐसे रहस्य सुलझाने, ऐसे रहस्यमयी घटनाओं से सम्बन्धित क्षेत्रों में कार्य करने तथा प्रवीणता पाने में अच्छी खासी रूचि होती है। वैदिक ज्योतिष ने शतभिषा नक्षत्र के साथ कईं व्यवसायों को जोड़ा है जिनमें से कुछ हैं भौतिक विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, काला जादू या जादू, तन्त्र मंत्र तथा ऐसा ही कोई अन्य क्षेत्र, खगोल शास्त्री, अंतरिक्ष शोधकर्ता, वैज्ञानिक, अंतरिक्ष यात्री अथवा ऐसे किसी पद पर कार्य करना, महासागर खोजकर्ता , स्कूबा गोताखोर अथवा अन्य ऐसे क्षेत्र जैसे कि चिकित्सक, शल्य चिकित्सक, आयुर्वैदिक चिकित्सक या ऐसे किसी व्यवसायिक क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हैं।  परन्तु वहीँ शतभिषा नक्षत्र के नकारात्मक प्रभाव वाले जातक नशीले पदार्थ अथवा नशीली दवाईयों को बेचना, शराब की तस्करी, वेश्यावृत्ति या ऐसे किसी व्यवसाय में कार्यरत पाए जाते हैं।

                          आइये अब चर्चा करें कुछ अन्य तथ्यों की जो वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह हेतु प्रयोग में लायी जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। वैदिक ज्योतिष में शतभिषा नक्षत्र को नपुंसक लिंगी अथवा उभय लिंगी माना जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषियों के अनुसार इस लिंग वर्गीकरण का कारण इस नक्षत्र का राहु ग्रह से सम्बन्ध है क्योंकि राहु ग्रह भी भारतीय ज्योतिष में नपुंसक ग्रह ही माना जाता है। वैदिक ज्योतिष ने इस नक्षत्र को चल स्वभाव वाला नक्षत्र माना है जो हर समय क्रियाशील रहता है तथा इस नक्षत्र की कार्यशैली को देख कर इस तथ्य को समझा जा सकता है। वैदिक ज्योतिष ने इस नक्षत्र को शुद्र वर्ण से  जोड़ा है तथा पुनः इस वर्गीकरण का कारण इस नक्षत्र का राहु ग्रह से सम्बन्ध  माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार शतभिषा नक्षत्र गुण में तामसिक तथा गण में राक्षस है तथा इस वर्गीकरण की पुष्टि वैदिक ज्योतिष दो कारणों के साथ करता है पहला इस नक्षत्र का राहु ग्रह से सम्बन्ध तथा दूसरा इस नक्षत्र कि कार्यशैली जो कि रहस्यमयी ज्ञान तथा क्रियाओं से सम्बन्धित है तथा ऐसी क्रियाओं और ऐसे ज्ञान में राक्षस जाति निपुण मानी जाती है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से आकाश तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

धनिष्ठा

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                                   वैदिक ज्योतिष की गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से धनिष्ठा को  23वां नक्षत्र माना जाता है। धनिष्ठा का शाब्दिक अर्थ है सबसे धनवान तथा वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस नक्षत्र का अर्थ है बहुत धनवान तथा लाभकारी नक्षत्र। कई वैदिक ज्योतिषियों का यह मानना है कि किसी कुंडली में इस नक्षत्र का प्रबल प्रभाव उस जातक को अत्यंत सुख समृद्धि तथा मान प्रतिष्ठा का अधिकारी बनाता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक एक सुखमय जीवन जीते हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी एक ढोल या मृदंग को इस नक्षत्र का मुख्य प्रतीक चिन्ह मानते हैं जो इस नक्षत्र को हर प्रकार के संगीत से जोड़ता है तथा इस के अनुसार इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों का संगीत के प्रति गहरा रुझान होता है। कुछ वैदिक ज्योतिष यह भी मानते हैं कि इस नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मृदंग वास्तव में भगवान शिव का डमरू है तथा इस चिन्ह के अंतर्गत ही भगवान शिव का इस नक्षत्र से सम्बन्ध जुड़ता है इस लिए इस नक्षत्र में भगवान शिव की तरह शून्य में से सृजन करने तथा उनके डमरू की तरह खोखली वस्तु से भी संगीत उत्पन्न करने जैसी क्षमता भी पाई जा सकती है। कुछ वैदिक ज्योतिषी बांसुरी को भी धनिष्ठा का दूसरा प्रतीक चिन्ह मानते हैं जो पुनः इस नक्षत्र को संगीत के साथ जोड़ता है तथा जो पुनः एक खोखली वस्तु से संगीत उत्पन्न करने को दर्शाता है।इस का अर्थ यह कि इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक धनवान, अच्छी रूचियाँ रखने वाले तथा संगीत प्रेमी होते हैं तथा उनमें किसी शून्यता में से भी कुछ उत्पन्न करके दिखाने की क्षमता होती है।

                     वैदिक ज्योतिष ने आठ वसुओं को इस नक्षत्र के अधिपति देवता माना है। वसुओं को भी रुद्रों तथा आदित्यों की भांति देव स्वरुप माना जाता है तथा वसु श्रेष्ठता, सुरक्षा,धन धान्य तथा ऐसी अन्य अच्छी वस्तुओं के ही दूसरे नाम हैं। ये आठ वसु है -: अपः, ध्रुव, धारा, अनिल, सोम , अनल, प्रत्युष तथा प्रभास। धनिष्ठा नक्षत्र में इन आठ वसुओं कि अपनी विशेषताएं पायी जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप धनिष्ठा नक्षत्र में व्यवहारिक कौशल, ऊर्जा से भरपूर , ध्रुव की भांति दृढ़ स्वभाव तथा इन आठ वसुओं की अन्य विशेषताएं पायी जाती हैं। धनिष्ठा नक्षत्र में भगवान शिव की नृत्यकला, संगीत कला तथा कई अन्य विशेषताएं प्रदर्शित होती हैं।वैदिक ज्योतिष ने मंगल को इस नक्षत्र का शासक ग्रह माना है जिसके चलते इस नक्षत्र में मंगल ग्रह के कुछ गुण जैसे कि साहस अथवा किसी योद्धा के गुण भी पाए जाते हैं। मंगल ग्रह की ऊर्जा इस नक्षत्र में अपने चरमोत्कर्ष को छूती है तथा कुछ वैदिक ज्योतिषियों के अनुसार इस नक्षत्र में मंगल अपने सर्वोच्च बल को प्राप्त करते हैं जिसके कारण वैदिक ज्योतिष में इन्हें उच्च का मंगल भी कहा जाता है। धनिष्ठा नक्षत्र के पहले दो चरण शनि के प्रभाव में आने वाली मकर राशि में स्थित होते हैं जबकि इस नक्षत्र के शेष दो चरण शनि की ही एक अन्य राशि कुम्भ में स्थित होते है। अतः धनिष्ठा नक्षत्र पर शनि का भी प्रभाव माना जाता है। शनि ग्रह में पायी जाने वाली विशेषताएं जैसे कि व्यवहारिक कौशल, दीर्घ प्रयत्नशीलता तथा अनुशासन धनिष्ठा नक्षत्र में भी प्रदर्शित होती हैं। यही विशेषताएं इस नक्षत्र को लक्ष्य केंद्रित बनाती हैं अर्थात इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने लक्ष्य को प्राप्ति हेतु निरंतर प्रयासरत रहते हैं |

            धनिष्ठा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक संगीत के प्रति गहरी रूचि रखते हैं तथा उनमें से कुछ संगीत क्षेत्र से व्यवसायिक रूप से जुड भी जाते हैं। धनिष्ठा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक आत्म विश्वास तथा साहस से भरपूर होते हैं जिसका कारण इस नक्षत्र पर मंगल ग्रह का प्रभाव माना जाता है इसीलिए इस नक्षत्र के प्रभाव वाले अधिकतर जातक सेना,पुलिस तथा ऐसे अन्य क्षेत्रों से जुड़े पाए गए हैं। धनिष्ठा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों में एक अन्य गुण है उनका दृढ़ स्वभाव तथा इसी दृढ़ स्वभाव के चलते ये जातक अपने लक्ष्य प्राप्ति हेतु निरंतर प्रयासरत रहते हैं जब तक कि सफल ना हो जायें। धनिष्ठा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों में व्यवसाय करने, कूटनीति करने की अच्छी समझ होती है तथा ये विशेषताएं इन जातकों को सफलता की सीढ़ी चढ़ने में सहायता करती हैं। धनिष्ठा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक जीवन में आने वाली हर परिस्थिति में खुश रहते हैं। ये जातक भौतिकवादी स्वभाव के होते हैं विशेषतः जब जातक की कुंडली में  यह नक्षत्र मकर राशि के प्रभाव में हो जबकि यही नक्षत्र यदि कुंडली में कुम्भ राशि के प्रभाव में आ जाए तो उस कुंडली के जातक पर भौतिकवाद के स्थान पर अध्यात्मिक प्रवृति का अधिक प्रभाव होता है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि धनिष्ठा नक्षत्र के कई जातक इस नक्षत्र पर मंगल के प्रभाव के कारण जिद्दी स्वभाव के होते हैं अतः इसी कारण उन्हें किसी प्रकार के दबाव में लाकर अपनी बात मनवा लेना बहुत कठिन होता है तथा ऐसे जातकों को तर्क के साथ समझा कर अपनी बात मनवा लेना अपेक्षाकृत आसान होता है। धनिष्ठा नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक अधिकतर अभिमानी, अड़ियल तथा जिद्दी स्वभाव के होते हैं तथा इसी स्वभाव के कारण इन जातकों को तर्क दे कर ही किसी बात पर आश्वस्त किया जा सकता है ताकि वे अपने निर्णय पर दोबारा विचार कर सके।

            धनिष्ठा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक समाजिक व्यवहार में कुशल होते हैं। वे जानते हैं कि समाजिक सम्बन्ध कैसे बनाए और निभाए जाते हैं यही कारण है कि इन जातकों का समाजिक क्षेत्र बहुत बड़ा होता है तथा इसका एक कारण धनिष्ठा नक्षत्र के जातकों का वाक कौशल का भी होता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में धनिष्ठा नक्षत्र का अत्यधिक प्रभाव उन जातक के विवाह तथा वैवाहिक जीवन के लिए अच्छा नहीं है। ऐसे जातकों को अपने वैवाहिक जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है जिसका एक कारण इन जातकों का जिद्दी स्वभाव भी है जो कि उनके वैवाहिक जीवन में वाद-विवाद से होने वाली समस्याओं को जन्म देता है। वैदिक ज्योतिष ने इस नक्षत्र को कई व्यवसायिक क्षेत्रों से जोड़ा है जिनमें धनिष्ठा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक कार्यरत पाए जा सकते हैं।ये हैं – संगीतकार, नर्तक, कलाकार, बांसुरीवादक, ढोलवादक अथवा ऐसे वाद्ययंत्र बजाना जो अंदर से खोखले होते हैं, पुलिसकर्मी, सेनाकर्मी, सुरक्षाकर्मी अथवा सुरक्षा एजेंसी के लिए काम करने वाले व्यक्ति, खिलाड़ी अथवा ऐसे किसी क्षेत्र जिनमें शारीरिक श्रम की आवश्यकता हो। कुछ वैदिक ज्योतिष यह मानते हैं कि किसी कुंडली पर इस नक्षत्र कर कोई विशेष प्रभाव उस कुंडली के जातक को ज्योतिष, आध्यत्मिक अथवा मनोविज्ञान, तांत्रिक, अघोरी अथवा ऐसे किसी क्षेत्र से भी सम्बन्धित कर सकता है।

                आइये अब देखें इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों को जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की प्रणाली में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार धनिष्ठा एक स्त्री नक्षत्र है जोकि एक आश्चर्यजनक बात है क्योंकि इस नक्षत्र के सभी शासक ग्रह तथा देव पुलिंग हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार धनिष्ठा एक चल स्वभाव का नक्षत्र है तथा यह नक्षत्र हर समय क्रियाशील रहता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार धनिष्ठा को वर्ण से शूद्र माना जाता है जो पुनः एक आश्चर्य में डालने वाला तथ्य है क्योंकि धनिष्ठा नक्षत्र का सम्बन्ध आठ वसुओं से बताया गया है जो कि अच्छी विशेषताओं को प्रदर्शित करते है ना कि बुरी। वैदिक ज्योतिष के अनुसार धनिष्ठा नक्षत्र को गुण से तामसिक तथा गण से राक्षस माना जाता है तथा इस श्रेणी निर्धारण का पुनः कोई ठोस कारण विदित नहीं है हालाँकि कुछ वैदिक ज्योतिषी इस का कारण धनिष्ठा का मंगल तथा शनि से सम्बन्ध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष धनिष्ठा नक्षत्र को पंच तत्वों में से आकाश तत्व के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

श्रवण

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                           वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणनाएं करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से श्रवण को 22वां नक्षत्र माना जाता है। श्रवण उन तीन नक्षत्रों में से एक है जो सीधे त्रिदेवों में से किसी एक के आधिपत्य में आते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र का अपना एक विशेष स्थान है। श्रवण का शाब्दिक अर्थ है सुनना तथा इसी के अनुसार यह नक्षत्र सुनने, सीखने तथा फिर सीखे हुए को बोलने जैसीं विशेषताओं का प्रदर्शन करता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पांव के तीन पदचिन्हों को श्रवण नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है तथा अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि ये तीन पदचिन्ह कोई साधारण पदचिन्ह न होकर भगवान श्री विष्णु दवारा वामन अवतार के रूप में लिए गए तीन पदचिन्ह हैं। इस अर्थ को विस्तार से समझने के लिए आइए इस अर्थ के साथ जुड़े प्रसंग को देखते हैं। प्राचीन काल में बलि नामक एक शक्तिशाली असुर था जिसने अपने पराक्रम तथा शक्ति के बल पर पृथ्वी, स्वर्ग तथा पाताल तीनों लोकों को जीत लिया था तथा स्वर्ग का सिंहासन छिन जाने के कारण स्वर्गाधिपति इन्द्र ने भगवान श्री विष्णु की शरण में जाकर बलि से स्वर्ग पुन: उन्हें वापिस दिलाने की विनती की। इन्द्र की विनती स्वीकार करते हुए भगवान श्री विष्णु ने एक छोटे कद के ब्राह्मण का रूप धारण कर लिया जिसके कारण उनके इस अवतार को वामन अवतार के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि वामन का अर्थ बौना होता है। बलि एक यज्ञ कर रहे थे तथा यज्ञ के पश्चात उन्हें याचकों को उनकी इच्छित दक्षिना देनी थी जिसका लाभ उठा कर श्री विष्णु भी याचकों में सम्मिलित हो गए। यज्ञ समाप्त हो जाने पर जब बलि ने वामन के रूप में श्री विष्णु से दक्षिणा मांगने को कहा तो श्री विष्णु ने दक्षिणा में बलि को उन्हें उतनी भूमि प्रदान करने के लिए कहा जिसे वे अपने तीन कदमों से माप सकें।

                          बलि ने वामन का छोटा सा कद देखकर शीघ्र ही यह वचन दे दिया क्योंकि उसके अनुसार वामन अपने तीन कदमों से अधिक भूमि नहीं माप सकता था। वचन मिलते ही वामन रूप में अवतरित भगवान श्री विष्णु ने अपना आकार इतना बड़ा कर लिया कि एक ही कदम में उन्होंने स्वर्ग तथा दूसरे कदम में उन्होनें पृथ्वी तथा पाताल को माप लिया और इसके पश्चात उन्होने बलि से पूछा कि तीनों लोक तो वे पहले ही माप चुके हैं सो अब तीसरा कदम कहां रखें। बलि ने विनम्रता से भगवान श्री विष्णु के समक्ष शीश झुका दिया और बोले कि तीसरा पग उनके शीश पर रख दिया जाए जिस पर भगवान श्री विष्णु ने बलि के सिर पर अपना पग रखकर उसे पाताल लोक में भेज दिया किन्तु साथ ही साथ बलि की दानवीरता तथा वचन का पालन करने की विशेषता से प्रसन्न होकर उस वरदान भी दिया। इस प्रसंग के माध्यम से हम तीन पदचिन्हों के साथ जुड़ी भगवान श्री विष्णु की चतुराई का सहज अनुमान लगा सकते हैं जिन्होंने विश्व हित के लिए बिना युद्ध किए बलि जैसे शक्तिशाली असुर को मात दे दी। भगवान श्री विष्णु द्वारा प्रदर्शित की गई यह चतुराई श्रवण नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होती है जिसके चलते श्रवण को सभी नक्षत्रों में सबसे चतुर नक्षत्र माना जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपनी इस विशेषता का प्रयोग अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए करते हैं।

                       वैदिक ज्योतिष के अनुसार कान को भी श्रवण नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है जिसके चलते कान के माध्यम से प्रदर्शित होने वाली विशेषताएं भी इस नक्षत्र में देखने को मिलती हैं। कान को सुनने की शक्ति के साथ जोड़ा जाता है तथा सुनने की शक्ति को पुन: ग्रहण करने की तथा सीखने की शक्ति के साथ जोड़ा जाता है। प्राचीन काल में प्रत्येक प्रकार की विद्या को केवल सुनकर और सुने हुए को सुरक्षित रखकर ही सीखा जाता था जिसके चलते श्रवण नक्षत्र को प्रत्येक प्रकार की विद्या को सीखने और उसे सुरक्षित रखने के साथ भी जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भगवान श्री विष्णु को श्रवण नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण भगवान श्री विष्णु का इस नक्षत्र पर प्रभाव पड़ता है तथा उनकी कुछ विशेषताएं जैसे चतुराई, संयम, कुशल प्रबंधन करने की क्षमता तथा समय के अनुसार उचित निर्णय लेने की क्षमता आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिनके कारण श्रवण को एक बहुत चतुर तथा व्यवस्थित नक्षत्र कहा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार देवी सरस्वती को भी श्रवण नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है जिसके कारण देवी सरस्वती का भी इस नक्षत्र पर प्रभाव पड़ता है तथा उनकी कुछ विशेषताएं जैसे ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता, सीखने की प्रवृति, संगीत में रूचि तथा वाणी कौशल आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिसके चलते श्रवण को सीखने के साथ साथ बोलने की कला में भी निपुण माना जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने वाक कौशल के चलते अपने जीवन के कई क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करते हैं।

                      नवग्रहों में से चन्द्रमा को वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्रवण नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर चन्द्रमा का भी प्रभाव पड़ता है तथा चन्द्रमा के चरित्र की कुछ विशेषताएं भी इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। चन्द्रमा की जन समुदाय के साथ जुड़ने की तथा उस प्रभावित करने की विशेषता इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्रवण नक्षत्र के चारों चरण मकर राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर मकर राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह शनि का भी प्रबाव पड़ता है। शनि तथा मकर राशि का इस नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को प्रबंधन क्षमता, व्यवहारिकता, जन समुदाय के साथ जुड़ने की क्षमता, संयम तथा लंबे समय तक किसी कार्य को सफल करने के लिए प्रयत्न करते रहने की विशेषता प्रदान करता है जिसके कारण श्रवण के जातक उन व्यवसायिक क्षेत्रों में सफल देखे जाते हैं जिनमे सफलता प्राप्त करने के लिए इन सभी विशेषताओं की आवश्यकता होती है। श्रवण नक्षत्र के जातक बुद्धिमान होते हैं तथा ये जातक अपनी बुद्धिमता का प्रयोग करके जीवन के अनेक क्षेत्रों में सफलता अर्जित करते हैं। श्रवण नक्षत्र के जातको में संयम भी होता है तथा ऐसे जातक किसी कार्य को करने के लिए बहुत लंबे समय तक प्रयत्न करते रहने में भी सक्षम होते हैं किन्तु इन जातकों के लक्ष्य पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातकों की भांति अव्यवहारिक न होकर व्यवहारिक होते हैं। श्रवण नक्षत्र के जातक अपनी विशेषताओं का प्रयोग समाज कल्याण के लिए न करके अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए भी कर सकते हैं तथा ऐसे जातक अपनी चतुराई तथा अन्य विशेषताओं के चलते समाज के लिए उस स्थिति में चिंता का विषय भी बन सकते हैं जब इनके लक्ष्य सकारात्मक न होकर नकारात्मक तथा स्वार्थ से प्रेरित हों। श्रवण नक्षत्र के जातकों के अपराधी अथवा अवैध कार्यों में लिप्त होने की स्थिति में ऐसे जातक समाज तथा कानून के लिए बहुत चिंता का विषय बन सकते हैं क्योंकि इस नक्षत्र के जातक छदम वेष धारण करने में तथा अपने आप को छिपा कर रखने में निपुण होते हैं जिसके फलस्वरूप इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले अधिकतर अपराधी सभ्य तथा अच्छे चरित्रों के पीछे अपने आप को इस सफलता से छिपा कर रखने वाले होते हैं कि कानून के लिए इन्हें पकड़ना तो दूर, बहुत लंबे समय तक यह तय कर पाना भी कठिन हो जाता है कि ये जातक कोई अवैध कार्य करते भी हैं या नहीं।

                       श्रवण नक्षत्र की सकारात्मक उर्जा के प्रभाव में आने वाले जातक अपनी विशेषताओं का प्रयोग समाज कल्याण के कार्यों के लिए करते हैं। श्रवण नक्षत्र के जातक सामाजिक व्यवहार में कुशल होते हैं तथा ऐसे जातक बहुत से मित्र बनाते हैं और बहुत सी समूह गतिविधियों में हिस्सा भी लेते हैं। श्रवण नक्षत्र के जातकों में लोगों को प्रभावित करने की क्षमता होती है जिसके कारण ऐसे जातक लोगों को प्रभावित करके अपने काम निकालने में कुशल होते हैं। अंत में चर्चा करते हैं श्रवण नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष श्रवण को एक पुरुष नक्षत्र मानता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का भगवान श्री विष्णु के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष में श्रवण नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है जो अपने आप में आश्चर्यजनक है। वैदिक ज्योतिष श्रवण नक्षत्र को गण से देव मानता है जिसका कारण पुन: अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का भगवान श्री विष्णु के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्रवण नक्षत्र को गुण से राजसिक माना जाता है तथा अधिकतर वैदिक ज्योतिष इस निर्धारण का कारण इस नक्षत्र की भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करते रहने की प्रवृति को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से वायु तत्व को श्रवण नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

उत्तराषाढ़

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                          वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से उत्तराषाढ़ को 21वां नक्षत्र माना जाता है। उत्तराषाढ़ का शाब्दिक अर्थ है बाद में आने वाला अपराजित अथवा बाद में आने वाले अजेय और इस प्रकार उत्तराषाढ़ नक्षत्र भी अपने से पूर्व आने वाले नक्षत्र पूर्वाषाढ़ की भांति ही अपराजित तथा अजेय होने जैसी विशेषताओं का प्रदर्शन करता है। पूर्वाषाढ़ तथा उत्तराषाढ़ नक्षत्र भी उसी प्रकार से जोड़ा बनाते हैं जिस प्रकार पूर्वाफाल्गुणी तथा उत्तरा फाल्गुनी जिसके चलते इन दोनों नक्षत्रों के चरित्र में कुछ समानताएं भी पायीं जातीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार हाथी के दांत को उत्तराषाढ़ नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है तथा हाथी दांत का यह प्रतीक चिन्ह हमें इस नक्षत्र की बहुत सी विशेषताओं के बारे में बताता है। हाथी को अपने दांत बहुत प्रिय होते हैं तथा हाथी के दांत उसकी शारीरिक संरचना का सबसे मूल्यवान अंग होते हैं जिसके कारण हाथी दांत प्राप्त करने के लिए हाथियों का शिकार भी किया जाता है। हाथी दांत का बहुत मूल्यवान होना उत्तराषाढ़ नक्षत्र को भी मूल्यवान होने की विशेषता से जोड़ता है जिसक अर्थ है कि इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों को समाज में प्रभुत्व तथा प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तथा इनके इर्द गिर्द के लोग इन्हें आदर से देखते हैं। हाथी अपने दांत का प्रयोग एक दूसरे के साथ लड़ाई करते समय भी करते हैं जिसके कारण उत्तराषाढ़ नक्षत्र को लड़ाई तथा युद्ध की कला के साथ भी जोड़ा जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी हाथी दांत को नेतृत्व तथा प्रभुत्व के साथ भी जोड़ते हैं क्योंकि हाथी के दांत इनके समुदाय में इनके प्रभुत्व का निर्णय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथा नेतृत्व और प्रभुत्व जैसी ये विशेषताएं उत्तराषाढ़ नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होतीं हैं।

                        प्राचीन काल में राजा युद्ध के समय हाथी पर बैठ कर जाते थे तथा हाथियों का प्रयोग युद्ध में प्रयोग की जाने वाली सेना की प्रथम पंक्ति में किया जाता था जिसके चलते उत्तराषाढ़ नक्षत्र को प्रभुत्व, शक्ति के प्रदर्शन तथा युद्ध और विजय के साथ भी जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार दस विश्वदेवों को उत्तराषाढ़ नक्षत्र के अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर इन विश्वदेवों का प्रभाव पड़ता है। विश्वदेवों को शुभता, इच्छाशक्ति, दक्षता, सत्यता, आकांक्षा तथा आभा जैसी विशेषताओं के साथ जोड़ा जाता है तथा विश्वदेवों की ये विशेषताएं उत्तराषाढ़ नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होतीं हैं तथा इन शुभ विशेषताओं का प्रदर्शन करने के कारण उत्तराषाढ़ नक्षत्र को अच्छाई का प्रतीक भी माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार विघ्न हर्ता के नाम से विख्यात भगवान श्री गणेश को उत्तराषाढ़ नक्षत्र का अंतिम अधिपति देवता माना जाता है जिसके चलते श्री गणेश की विघ्न दूर करने, युद्ध में अजेय रहने तथा समस्त जगत का कल्याण करने की विशेषताएं भी उत्तराषाढ़ नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जो उत्तराषाढ़ को और भी अधिक सकारात्मक नक्षत्र बना देतीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों के राजा सूर्य को उत्तराषाढ़ नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण सूर्य का भी इस नक्षत्र पर प्रभाव पड़ता है और सूर्य की सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता, प्रभुत्व, साहस तथा न्यायप्रियता जैसी विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। सूर्य की आक्रमकता तथा युद्ध करने की विशेषताएं भी इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं किन्तु उत्तराषाढ़ नक्षत्र के जातक युद्ध तथा आक्रमकता का प्रयोग तभी करते हैं जब ऐसा करना जन कल्याण के लिए आवश्यक हो जाए जिसके कारण वैदिक ज्योतिष में उत्तराषाढ़ नक्षत्र को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र की तुलना में कहीं अधिक संतुलित माना जाता है।

                              वैदिक ज्योतिष के अनुसार उत्तराषाढ़ नक्षत्र का पहला चरण धनु राशि में स्थित होता है तथा इस नक्षत्र के शेष तीन चरण मकर राशि में स्थित होते हैं जिसके चलते इस नक्षत्र पर धनु राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बृहस्पति तथा मकर राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह शनि का भी प्रभाव पड़ता है। शनि की व्यवहारिकता तथा अनुशासन जैसी विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जो उत्तराषाढ़ को पूर्वाषाढ़ की तुलना में कहीं अधिक संतुलित नक्षत्र बना देतीं हैं तथा इस नक्षत्र में आधारहीन तथा अव्यवहारिक लक्ष्यों के पीछे भागने की प्रवृति नहीं देखी जाती। उत्तराषाढ़ नक्षत्र के जातकों में संयम भी भरपूर मात्रा में होता है जिसके कारण ये जातक अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तथा अपने प्रयासों का परिणाम मिलने के लिए प्रतीक्षा करने में भी सक्षम होते हैं किन्तु पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातकों के विपरीत उत्तराषाढ़ नक्षत्र के जातक किसी कार्य अथवा लक्ष्य के आधारहीन अथवा अव्यवहारिक हो जाने पर उसे छोड़ कर किसी अन्य लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर देने की विशेषता भी प्रदर्शित करते हैं जिसके चलते इन जातको का स्वभाव पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातकों की तुलना में कहीं अधिक संतुलित हो जाता है। मकर राशि के प्रभाव के कारण उत्तराषाढ़ के जातक अनुशासन तथा नियमों की पालना को लेकर कई बार कठोर व्यवहार भी कर देते हैं क्योंकि वैदिक ज्योतिष के अनुसार मकर राशि को अनुशासन, नियम तथा व्यवहारिकता के साथ जोड़ा जाता है। उत्तराषाढ़ नक्षत्र के जातक परंपराओं का सम्मान करने वाले होते हैं तथा परंपराओं को तोड़ने वाले लोग इन जातकों को पसंद नहीं होते तथा कई बार इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक परंपराओं की अवमानना करने वाले लोगों से कठोर व्यवहार भी करते हैं।

                           कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि उत्तराषाढ़ नक्षत्र के जातकों में उचित और अनुचित में भेद कर सकने की प्रबल क्षमता होती है तथा इन जातकों को केवल अच्छी तथा व्यवहारिक परंपराओं की अवमानना पर ही क्रोध आता है जबकि इस नक्षत्र के जातक अव्यवहारिक तथा हानिकारक हो चुकी परंपराओं को जनहित के लिए स्वयं ही बदल देने की क्षमता भी प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रकार उत्तराषाढ़ नक्षत्र के जातक किसी प्रकार के युद्ध अथवा लड़ाई में भी तभी संलग्न होते हैं जब ऐसा करना समाज के एक बड़े वर्ग के हित में हो तथा इस नक्षत्र के जातक आम तौर पर अपने निजि लाभ के लिए युद्ध अथवा लड़ाई को बढ़ावा नहीं देते। अपनी इसी विशेषता के कारण उत्तराषाढ़ के जातक समाज में अपना एक विशेष स्थान बना पाने में सक्षम होते हैं तथा इन जातकों के इर्द गिर्द के लोग इन जातकों का बहुत आदर करते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि उत्तराषाढ़ नक्षत्र के जातक युद्ध का आरंभ केवल तभी करते हैं जब शांति बनाए रखने के लिए युद्ध आवश्यक हो जाए तथा इस नक्षत्र के जातक शत्रु को क्षमा कर देने की विशेषता का भी प्रदर्शन करते हैं। ये सारी विशेषताएं उत्तराषाढ़ को अन्य कई नक्षत्रों की तुलना में अधिक संतुलित नक्षत्र बना देतीं हैं तथा इस नक्षत्र के जातक समाज तथा सभ्यता के हित को ध्यान में रखते हुए ही व्यवहार तथा आचरण करते हैं।

                           आइए अब इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में चर्चा करते हैं जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष उत्तराषाढ़ को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जो इस नक्षत्र पर पड़ने वाले प्रभावों तथा इस नक्षत्र की विशेषताओं को देखते हुए आश्चर्यजनक लगता है। वैदिक ज्योतिष उत्तराषाढ़ नक्षत्र को क्षत्रिय वर्ण प्रदान करता है जिसका कारण इस नक्षत्र का युद्ध कला जैसी विशेषताओं के साथ जुड़ा होने को माना जाता है। वैदिक ज्योतिष में उत्तराषाढ़ नक्षत्र को गण से मानव माना जाता है जिसका कारण भी इस नक्षत्र के आचरण को ही माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार उत्तराषाढ़ को गुण से सात्विक माना जाता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र पर विश्वदेवों के प्रभाव को तथा इस तथ्य को मानते हैं कि उत्तराषाढ़ नक्षत्र के जातक इस उर्जा का प्रयोग जन हित तथा विश्व शांति के कार्यों के लिए ही करते हैं जो अपने आप में एक सात्विक गुण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से वायु तत्व को उत्तराषाढ़ नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

पूर्वाषाढ़

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                     वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणनाएं करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से पूर्वाषाढ़ को 20वां नक्षत्र माना जाता है। पूर्वाषाढ़ का शाब्दिक अर्थ है पहले आने वाला अपराजित अथवा पहले आने वाला अजेय तथा इसी के अनुसार वैदिक ज्योतिष में इस नक्षत्र को अजेय तथा अपराजित रहने के साथ जोड़ा जाता है तथा अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक अपने जीवन में कभी हार नहीं मानते तथा सफलता प्राप्त हो जाने तक संघर्ष करते रहते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार हाथ के पंखे को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है जो अपने विभिन्न उपयोगों के माध्यम से विभिन्न प्रकार की विशेषताएं प्रदर्शित करता है। हाथ के पंखे का प्रयोग गर्मी से राहत पाने के लिए किया जाता है तथा इसी के अनुसार पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातक भी कठिन से कठिन समय में भी अपने आप को शांत रखकर तथा किसी प्रकार की गर्मी न दिखा कर समय तथा परिस्थितियों के अपने पक्ष में होने की प्रतीक्षा करने में सक्षम होते हैं। जिस प्रकार हाथ के पंखे को चलाने के लिए लगातार परिश्रम की आवश्यकता होती है उसी प्रकार पूर्वाषाढ़ के जातक भी किसी कार्य को करने के लिए कठिन से कठिन परिश्रम करने में सक्षम होते हैं। प्राचीन काल में एक प्रकार के हाथ के पंखे का प्रयोग अग्नि को जलाए रखने के लिए तथा उसे तेज करने के लिए भी किया जाता था तथा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातकों में भी अपने भीतर इतनी आवश्यक अग्नि जलाए रखने की क्षमता होती है जो इन्हें लंबे समय तक अपने लक्ष्य के लिए कार्य करते रहने में सहायता करती है। अग्नि को हवा देना एक नकारात्मक विशेषता भी माना जाता है जिसके चलते पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के जातकों में आक्रमकता भी देखने को मिलती है।

                              हाथ के पंखे का प्रयोग कुछ प्राचीन सभ्यताओं में सजावट तथा सुंदरता के प्रदर्शन के लिए भी किया जाता था तथा आज भी जापान जैसे देशों में स्त्रियां इन पंखों का प्रयोग सुंदरता का प्रदर्शन करने के लिए करतीं हैं तथा इसी प्रकार पूर्वाषाढ़ नक्षत्र को भी सुंदरता तथा सुंदरता के प्रदर्शन तथा दिखावा करने की प्रवृति के साथ जोड़ा जाता है। सुंदरता तथा सुंदरता के प्रदर्शन की विशेषताओं को भौतिक जीवन जीने की कला के साथ जोड़ा जाता है तथा इसी के अनुसार पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक जीवन को जीने की कला जानने वाले होते हैं हाथ के पंखे का प्रयोग कहीं कहीं मुख को छिपाने के लिए भी किया जाता है तथा इसी प्रकार पूर्वाषाढ़ नक्षत्र को भी रहस्य छिपाने के साथ जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अप: नामक जल की एक देवी को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है जिसके कारण अप: के चरित्र की बहुत सी विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। अप: की रहस्यमयी तथा गुप्त रहने जैसी विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिनके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक रहस्यमयी, गुप्त तथा भेद को छिपाने वाले होते हैं। अप: को स्वभाव से दयालु देवी माना जाता है किन्तु समय की मांग के अनुसार अप: बहुत क्रूर देवी का रूप धारण करने में भी सक्षम है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी समय की मांग पर अथवा कई बार अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए क्रूरता से काम ले सकते हैं।

                            वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से शुक्र को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके चलते इस नक्षत्र पर शुक्र का प्रभाव भी पड़ता है तथा शुक्र की सुंदरता तथा सुंदरता का प्रदर्शन जैसीं विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। शुक्र का पूर्वाषाढ़ नक्षत्र पर प्रभाव इसे जीवन से प्रेम करने वाला तथा जीवन को जीने की कला जानने वाला नक्षत्र बना देता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के चारों चरण धनु राशि में स्थित होते हैं जिसके चलते इस नक्षत्र पर धनु राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बृहस्पति का प्रभाव भी पड़ता है तथा बृहस्पति की कुछ विशेषताएं जैसे कि महात्वाकांक्षी होना, आशावादी होना, प्रसन्न रहकर जीवन को जीना तथा विस्तार के लिए प्रयासरत रहना आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। इस प्रकार विभिन्न प्रकार की शक्तियों के प्रभाव में आने के कारण पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र विभिन्न कुंडलियों में एक दूसरे से भिन्न आचरण कर सकता है जिसका निर्धारण किसी कुंडली विशेष में इस नक्षत्र पर प्रभाव डालने वालीं शक्तियों के बल तथा स्वभाव को देख कर किया जाता है। आम तौर पर पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक प्रबल इच्छा शक्ति के स्वामी होते हैं जिसके कारण ये जातक अपने रास्ते में आने वाली रुकावटों तथा असफलताओं से विचलित नहीं होते तथा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं। पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातकों में अपार संयम होता है तथा ये जातक अपने द्वारा किये गए प्रयास का फल मिलने के लिए बहुत लंबे समय तक प्रतीक्षा करने में सक्षम होते हैं तथा अपनी इस विशेषता के चलते कई बार ये जातक किसी परिणाम की प्राप्ति के लिए आवश्यकता से भी बहुत अधिक समय तक प्रतीक्षा करते रहते हैं जिसके कारण इन जातकों का बहुत सा समय प्रतीक्षा में ही व्यर्थ हो जाता है। पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के अधिकतर जातकों के लिए पराजय स्वीकार कर लेना बहुत ही कठिन होता है जिसके चलते ये जातक अपने जीवन में कई बार ऐसे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भी बहुत लंबे समय तक प्रयास करते रहते हैं जिनकी प्राप्ति की सभी संभावनाएं बहुत समय पहले ही समाप्त हो गईं हों। इसलिए पूर्वषाढ़ नक्षत्र के जातकों को समय समय पर व्यवहारिकता से काम लेने की आदत डालनी चाहिए जिससे इन्हें अपने प्रयासों को उचित दिशा देने में सहायता मिले।

                      पूर्वाषाढ़ नक्षत्र सभी नक्षत्रों में से संभवत: सबसे अधिक आशावादी नक्षत्र है जिसका कारण आशावाद से जुड़े बृहस्पति तथा धनु राशि का इस नक्षत्र पर पड़ने वाला प्रभाव है जिसके कारण पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातकों को अपने द्वारा किये जाने वाले प्रत्येक प्रयास का सकारात्मक परिणाम मिलने का पूरा विश्वास होता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातकों का यही प्रबल आशावाद तथा आत्मविश्वास कई बार इन्हें संकट में भी डाल देता है क्योंकि पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातक कई बार इसी आशावाद तथा आत्मविश्वास के चलते लगभग असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को करने का प्रयास भी करते हैं क्योंकि इन जातकों का मानना होता है कि संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं है जो इनके लिए असंभव हो। पूर्वाषाढ़ के जातकों के लिए किसी काम को बीच में ही छोड़ देना बहुत कठिन होता है जिसके चलते कई बार ये जातक ऐसे किसी कार्य को पूरा करने में बहुत समय तथा साधन व्यर्थ कर देते हैं जिसके होने की कोई संभावना ही शेष न रह गयी हो। पूर्वाषाढ़ के जातकों में अव्यवहारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रबल रूचि भी पायी जाती है जिसके चलते ये जातक अपना बहुत सा समय ऐसे ही अव्यवहारिक लक्ष्यों की प्राप्ति में व्यर्थ गंवा देते हैं। पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातक पराजय के विचार को भी सहन नहीं कर सकते तथा पराजय के बिल्कुल सपष्ट दिखने पर ये जातक चरम प्रतिक्रियाएं भी कर देते हैं जिनमे आत्महत्या तथा किसी अन्य व्यक्ति की हत्या भी सम्मिलित है। अपने लक्ष्य को अपने से छिनता देखकर पूर्वाषाढ़ के जातक बहुत उग्र, निष्ठुर तथा हिंसक भी हो सकते हैं तथा किसी प्रकार की विनाशकारी लीला को भी अंजाम दे सकते हैं। पूर्वाषाढ़ के जातक अपनी भौतिक स्थितियों को सुधारने के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं तथा शुक्र के प्रभाव के कारण इन जातकों में सुंदरता अथवा किसी उपलब्धि का बाहरी प्रदर्शन करने की प्रवृति भी प्रबल होती है।

                          आइए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों में प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष पूर्वाषाढ़ को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जिसका कारण इस नक्षत्र का अप: तथा शुक्र के साथ संबंध माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पूर्वाषाढ़ नक्षत्र को वर्ण से ब्राह्मण माना जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र का बृहस्पति तथा शुक्र जैसे ग्रहों के साथ जुड़ा होना माना जाता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष के अनुसार इन दोनों ग्रहों को ही ब्राहमण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष पूर्वाषाढ़ नक्षत्र को गुण से राजसिक तथा गण से मानव मानता है जिसका कारण इस नक्षत्र का भौतिक सुखों की प्रबल लालसा रखना माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पंच तत्वों में से पूर्वाषाढ़ नक्षत्र को वायु तत्व के साथ जोड़ा जाता है तथा अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि वायु तत्व का इस नक्षत्र पर प्रभाव होने के कारण भी इस नक्षत्र के जातक अव्यवहारिक तथा आधारहीन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करते हैं।

लेखक
हिमांशु शंगारी

मूल

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                     वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणनाएं करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से मूल को 19वां नक्षत्र माना जाता है। मूल का शाब्दिक अर्थ है केन्द्रीय बिन्दु, सबसे भीतरी बिन्दु अथवा किसी पेड़ पौधे की जड़ और इस के अनुसार मूल नक्षत्र को सीधा-सपष्ट होने के साथ, प्रत्येक मामले की जड़ तक पहुंचने की क्षमता रखने के साथ तथा ऐसी ही अन्य विशेषताओं के साथ जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक साथ बंधी हुई कुछ पौधों की जड़ों को मूल नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है तथा इस प्रतीक चिन्ह से भी विभिन्न वैदिक ज्योतिषी विभिन्न प्रकार के अर्थ निकालते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि पौधे की जड़ भूमि के अंदर छिपी रहती है जिसके चलते मूल नक्षत्र भी बहुत से रहस्यों, गुप्त विद्याओं तथा अदृश्य शक्तियों के साथ जुड़ा रहता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि मूल नक्षत्र के जातक प्रत्येक मामले की जड़ तक पहुंचने की प्रवृति रखने वाले होते हैं तथा वे प्रत्येक मामले के सबसे भीतरी पक्षों अथवा जड़ को पकड़ने में विश्वास रखने वाले होते हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि मूल नक्षत्र के जातक सीधे तथा सपष्ट स्वभाव के होते हैं तथा ऐसे जातक अपनी बात प्राय: बिना किसी भूमिका के ही कह देते हैं जिसके कारण कई बार इन्हें अशिष्ट भी माना जाता है किन्तु मूल नक्षत्र के जातकों को अपने बारे में की जाने वाली बातों से आम तौर पर कोई सरोकार नहीं होता। जिस प्रकार किसी पेड़ को काट देने के पश्चात भी वह अपनी जड़ों के माध्यम से अपने शरीर और शक्ति को पुन: प्राप्त कर लेने में सक्षम होता है उसी प्रकार मूल नक्षत्र में भी अपनी खोई हुई शक्ति तथा आधिपत्य पुन: प्राप्त कर लेने की क्षमता होती है।

                       कुछ वैदिक ज्योतिषी मानते हैं कि मूल नक्षत्र के जातक बहुत गहरे होते हैं तथा इनके मन की बात को जान लेना आम तौर पर बहुत कठिन होता है क्योंकि मूल नक्षत्र के जातक किसी रहस्य को सफलतापूर्व छिपा लेने में उसी प्रकार सक्षम होते हैं जिस प्रकार किसी पौधे की जड़ अपने आप को भूमि के भीतर छिपा कर रखने में सक्षम होती है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि जिस प्रकार जड़ किसी भी पौधे अथवा वस्तु का सबसे महत्वपूर्ण तथा शक्तिशाली भाग होती है तथा भूमि एवम अन्य माध्यमों के द्वारा शक्ति अर्जित करने में सक्षम होती है, उसी प्रकार मूल नक्षत्र के जातक भी शक्ति तथा प्रभुत्व अर्जित करने में अन्य कई नक्षत्रों के जातकों की तुलना में कहीं अधिक सक्षम होते हैं। वहीं पर कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि जिस प्रकार पौधे की जड़ भूमि के भीतर छिपी तथा रहस्यों के साथ जुड़ी होती है उसी प्रकार मूल नक्षत्र के जातक बहुत सी पारलौकिक तथा गुप्त विद्याओं के साथ जुड़ने की प्रबल क्षमता रखते हैं जिसके चलते मूल नक्षत्र के जातकों की गुप्त विद्याओं के प्रति बहुत रूचि होती है तथा मूल नक्षत्र के प्रबल प्रभाव वाले कुछ विशिष्ट जातक ऐसी ही किसी विद्या का अभ्यास व्यवसायिक रूप से भी करते हैं।

                          कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि मूल नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह में प्रयोग की गईं जड़ों का बंधा होना इस बात का संकेत देता है कि मूल नक्षत्र के द्वारा अर्जित की जाने वाली शक्ति तथा प्रभुत्व किसी न किसी प्रकार से सीमित भी अवश्य होती है क्योंकि जड़ों का बंध जाना शक्ति अथवा प्रभुत्व के सीमित हो जाने को दर्शाता है। वहीं पर कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि मूल नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह में प्रयोग की जाने वाली जड़ों का बंध जाना यह दर्शाता है कि मूल नक्षत्र के जातक अपने परिवार तथा समाज के साथ जुड़े तथा बंधे हुए होते हैं तथा अपने परिवार और समाज के साथ जुड़ने से इन जातकों की शक्ति उसी प्रकार से बढ़ जाती है जिस प्रकार एक साथ बंधी हुई जड़ों की शक्ति एक अकेली जड़ की तुलना में कहीं अधिक होती है। इसी कारण से मूल नक्षत्र के जातक अपने जीवन काल में अपने परिवार और संबंधियों की सहायता से सफलता प्राप्त करते देखे जा सकते हैं। इस प्रकार मूल नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के साथ विभिन्न वैदिक ज्योतिषी विभिन्न प्रकार के अर्थों को जोड़ते हैं जिनके चलते यह कहा जा सकता है कि मूल नक्षत्र के जातक सपष्ट स्वभाव वाले, प्रत्येक विषय की जड़ तक पहुंचने की चेष्टा करने वाले तथा अपने परिवार एवम संबंधियों की सहायता से शक्ति एवम प्रभुत्व अर्जित करने वाले होते हैं तथा मूल नक्षत्र के जातकों को गुप्त तथा अदृष्य विदयाओं से भी समय समय पर सहायता प्राप्त होती है।

                        वैदिक ज्योतिष के अनुसार नृति को मूल नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है जिसके कारण नृति देवी का इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव रहता है। नृति शब्द का अर्थ विनाश है तथा वैदिक ज्योतिष के अनुसार नृति को विनाश तथा प्रलय की देवी ही माना जाता है और नृति का मूल नक्षत्र पर प्रभाव होने के कारण नृति देवी की विनाश से संबंधित बहुत सी विशेषताएं मूल नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिसके कारण मूल नक्षत्र के स्वभाव में भी विनाशकारी कार्यों को करने के प्रति रूचि पायी जाती है। इसी कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी मूल को एक अशुभ तथा अहितकारी नक्षत्र मानते हैं जिसके प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने जीवन काल में किसी न किसी प्रकार की शक्ति अर्जित करने में सफल होते हैं तथा शक्ति और प्रभुत्व प्राप्त हो जाने के पश्चात यही जातक अपने अभिमान के चलते इस शक्ति तथा प्रभुत्व का दुरुपयोग भी करते हैं जिसके कारण इन्हें पतन का सामना भी करना पड़ता है। कहा जाता है कि लंकापति रावण की जन्म कुंडली में मूल नक्षत्र का प्रबल प्रभाव था जिसके चलते उसने अपने संबंधियों तथा गुप्त विद्याओं की सहायता से अपार शक्ति तथा प्रभुत्व प्राप्त कर लिया था किन्तु अपने अभिमान के चलते उसने इन शक्तियों का दुरुपयोग करना शुरु कर दिया था जिसके कारण अंत में उसका पतन हो गया। इस प्रकार नृति देवी का इस नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को शक्ति अर्जित करने से तथा उस शक्ति का दुरुपयोग करने से जोड़ता है। किन्तु यह तथ्य मूल नक्षत्र का अंतिम सत्य नहीं है तथा इस नक्षत्र के बारे में अंतिम निर्णय लेने से पहले इस नक्षत्र पर पड़ने वाले अन्य शक्तियों के प्रभाव को समझ लेना भी अति आवश्यक है।

                              नवग्रहों में से केतु को वैदिक ज्योतिष के अनुसार मूल नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण केतु का इस नक्षत्र पर प्रभाव रहता है। केतु को वैदिक ज्योतिष में भूत काल, मुसीबतों, समस्याओं तथा रहस्यों के साथ जोड़ा जाता है तथा केतु के चरित्र की ये विशेषताएं मूल नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिनके चलते मूल नक्षत्र की उर्जा को संचालित करना और भी कठिन हो जाता है। केतु को एक उग्र तथा विनाशकारी ग्रह के रूप में भी जाना जाता है तथा केतु की ये विशेषताएं भी मूल नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिनके चलते मूल नक्षत्र और भी उग्र तथा विनाशकारी प्रवृति का हो जाता है और इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों की किसी न किसी प्रकार का विनाशकारी कार्य करने में रुचि अवश्य रहती है जिसे नियंत्रित कर पाना इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले अधिकतर जातकों के लिए बहुत कठिन होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मूल नक्षत्र के चारों चरण धनु राशि में आते हैं जिसके चलते इस नक्षत्र पर धनु राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बृहस्पति का भी प्रभाव पड़ता है। बृहस्पति को वैदिक ज्योतिष में सबसे शुभ ग्रह के रूप में जाना जाता है तथा बृहस्पति की परोपकार, सृजनात्मक कार्य करने और विनाशकारी कार्यों से दूर रहने तथा उचित अनुचित में अंतर करने के पश्चात ही आचरण करने जैसीं विशेषताएं मूल नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। इस प्रकार बृहस्पति तथा धनु राशि का मूल नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को आशा तथा संतुलन प्रदान करता है जिसके कारण मूल नक्षत्र के जातक इस नक्षत्र की उर्जा को सकारात्मक तथा सृजनात्मक कार्यों में लगा पाने में भी सक्षम हो जाते हैं तथा किसी कुंडली में इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव का सकारात्मक अथवा नकारात्मक प्रभाव उस कुंडली में इस नक्षत्र को प्रभावित करने वाले केतु, गुरू तथा धनु राशि के बल और स्वभाव पर निर्भर करता है जिसके चलते मूल नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले विभिन्न जातक विभिन्न प्रकार का आचरण कर सकते हैं।

                       उदाहरण के लिए किसी कुंडली में मूल नक्षत्र के अपने आप में प्रबल होने पर तथा केतु के बलवान और नकारात्मक होने पर इस नक्षत्र के नकारात्मक आचरण की संभावना बढ़ जाती है जबकि किसी कुंडली में केतु के अधिक शक्तिशाली न होने पर तथा गुरु के प्रबल तथा सकारात्मक होने पर इस नक्षत्र के सकारात्मक आचरण की संभावना बढ़ जाती है। इस प्रकार मूल नक्षत्र का किसी कुंडली में सकारात्मक अथवा नकारात्मक आचरण करना बहुत सीमा तक उस कुंडली में इस नक्षत्र को प्रभावित करने वालीं शक्तियों के बल तथा स्वभाव पर निर्भर करता है किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि बहुत सकारात्मक प्रभाव में होने पर भी मूल नक्षत्र की नकारात्मक तथा विनाशकारी प्रवृति पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हो पाती तथा इस नक्षत्र के सकारात्मक प्रभाव में आने वाले भी जातक भी कभी न कभी इस नक्षत्र की उर्जा का नकारात्मक प्रयोग अवश्य कर देते हैं जिसके कारण इन जातकों को हानि भी उठानी पड़ती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मूल नक्षत्र अपने प्रभाव में आने वाले जातक को शक्ति तथा प्रभुत्व प्रदान करता है और साथ ही साथ उस शक्ति का दुरुपयोग करने की प्रवृति भी प्रदान करता है जिसके कारण इन जातकों का पतन अथवा हानि हो जाती है। इसलिए मूल नक्षत्र की उर्जा को एक कठिन उर्जा माना जाता है जिसे नियंत्रित करना तथा सही दिशा में संचालित करना अधिकतर जातकों के लिए बहुत कठिन कार्य है।

                         मूल नक्षत्र के जातक आम तौर पर लक्ष्य केंद्रित होते हैं तथा ये जातक कठिन से कठिन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भी तब तक प्रयास करते रहते हैं जब तक या तो ये जातक अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर लें या फिर इन जातकों की सारी उर्जा समाप्त न हो जाए। मूल नक्षत्र के जातक अपने लक्ष्य की प्राप्ति के रास्ते में आने वाली कठिनाईयों से बिल्कुल भी विचलित नहीं होते तथा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं। मूल एक उग्र तथा तीव्र स्वभाव का नक्षत्र है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक प्राय: किसी काम को करने से पूर्व अधिक सोच विचार नहीं करते जिसके कारण इन जातकों को बाद में कई बार पछताना भी पड़ता है किन्तु मूल नक्षत्र के अधिकतर जातक अपनी भूलों से शिक्षा नहीं लेते तथा उसी प्रकार की भूलें बार बार करके हानि उठाते रहते हैं। मूल नक्षत्र के जातक योजनाएं बनाने में तथा गठजोड़ करने की कला में निपुण होते हैं तथा ये जातक अपनी इन विशेषताओं का प्रयोग शक्ति और प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए करते हैं। मूल नक्षत्र के बहुत से जातक अपने स्वार्थ के लिए अपने निकट संबंधियों तथा मित्रों का शोषण भी कर सकते हैं तथा इस नक्षत्र के जातक ऐसे रिश्तों को शीघ्र से शीघ्र समाप्त कर देने में विश्वास रखते हैं जिनसे इन्हें कोई लाभ न दिखता हो तथा इसी कारण मूल नक्षत्र के जातकों को स्वार्थी भी कहा जाता है। मूल नक्षत्र के बहुत से जातक हठी, अभिमानी तथा अहंकारी भी होते हैं तथा कुछ वैदिक ज्योतिषी तो यह मानते हैं कि मूल नक्षत्र के अधिकतर जातकों के पतन का कारण इनका अभिमान तथा अहंकार ही होता है। इस लिए मूल नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों के लिए अपने अहंकार तथा अभिमान को नियंत्रण में रखना अति आवश्यक हो जाता है जबकि इस नक्षत्र की उर्जा को नियंत्रित रख पाना अपने आप में एक कठिन कार्य है जिसके कारण बहुत से ज्योतिषी किसी कुंडली में इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव को चिंता का विषय मानते हैं।

                       लेख के अंत में आइए अब चर्चा करते हैं मूल नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष मूल को एक नपुसंक लिंगी अथवा उभय लिंगी नक्षत्र मानता है जिसका कारण बहुत से ज्योतिषी इस नक्षत्र का केतु के साथ प्रगाढ़ संबंध मानते हैं क्योंकि केतु को वैदिक ज्योतिष के अनुसार नपुंसक ग्रह माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मूल नक्षत्र को वर्ण से शूद्र, गण से राक्षस तथा गुण से तामसिक माना जाता है तथा इन सभी निर्धारणों का कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का नृति तथा केतु के साथ संबंध तथा इस नक्षत्र की कार्यशैली को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से वायु तत्व को मूल नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी