शतभिषा

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                       वैदिक ज्योतिष की गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से  शतभिषा को  24वां नक्षत्र माना जाता है। शतभिषा का शाब्दिक अर्थ है सौ भीष्  अर्थात सौ चिकित्सक अथवा सौ चिकित्सा तथा इस अनुसार कईं वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि यह नक्षत्र किसी रोग अथवा उसकी चिकित्सा से सम्बन्धित है। वैदिक ज्योतिष में एक खाली वृत्त अर्थात गोलाकार को शतभिषा नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में माना जाता है तथा यह खाली वृत्त इस नक्षत्र की कईं विशेषताओं को चित्रित करता है। अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते है कि एक वृत्त जहाँ एक ओर वस्तुओं के अपने भीतर सम्मिलित होने को दर्शाता है वहीँ दूसरी ओर यह वृत्त कुछ सीमाओं का निर्धारण करके अपने भीतर सम्मिलित होने वाली वस्तुओं को सीमित भी करता है। इसी के चलते शतभिषा नक्षत्र में भी वस्तुओं अथवा व्यक्तियों को अपना बनाने तथा बाहरी वस्तुओं अथवा व्यक्तियों के लिए सीमा निर्धारण जैसी विशेषताएं पायी जाती हैं जो एक तरह से जातक के लिए रक्षा कवच का कार्य करती है। श्त्तारक इस नक्षत्र का एक वैकल्पिक नाम है जिसका शाब्दिक अर्थ है सौ सितारे तथा कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते है कि शतभिषा का प्रतीक चिन्ह वृत्त अपने आप में सौ सितारे समेटे है जो यह दर्शाता है कि शतभिषा नक्षत्र अपने आप में  बहुत सी ऐसी वस्तुएं समा सकता है जो कि बाहरी दुनिया से अनभिज्ञ हो या जिनसे बाहरी दुनिया अनभिज्ञ हो। अतः शतभिषा नक्षत्र में दूसरों से बातें अथवा चीज़ें छुपाने की प्रवृति पायी जा सकती है इसीलिए शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक अन्य नक्षत्र के जातकों की तुलना में अधिक रहस्यमयी प्रकार के जातक माने जाते हैं। इसलिए शतभिषा नक्षत्र का सुरक्षा, रोग तथा उस रोग की चिकित्सा, सीमा निर्धारित करने, रहस्य छुपाने आदि से गहरा सम्बन्ध है तथा ये विशेषताएं ही इस नक्षत्र को अपने आप में एक अलग प्रकार की विशिष्टता प्रदान कर देती हैं।

                  एक वृत समाप्ति अथवा पूर्णता की विचारधारा को भी दर्शाता है तथा इसलिए वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातकों में भी  यह पूर्णता की भावना प्रबल होती है। इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं। वें ये जानते है कि जो काम उन्होंने शुरू किया है वो उस काम को पूरा करने में भी सक्षम है तथा वें ऐसा कर भी देते हैं।  वहीँ कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मान्यता भी रखते हैं कि शतभिषा के प्रभाव वाले जातक अधिकतर लोगों से वैसे ही कटे रहते है जैसे कि एक वृत अपने आस पास की चीज़ों से कटा रहता है तथा अपनी सीमा निर्धारित रखता है। वैदिक ज्योतिष ने जल देवता वरुण को इस नक्षत्र का शासक देवता माना है तथा वरुण देव का प्रभाव शतभिषा नक्षत्र को इस संसार के हर जल प्राणी अथवा जल स्तोत्र से जोड़ता है विशेषतः बड़े बड़े सागरों तथा महासागरों से। कुछ वैदिक ज्योतिषी तो यह भी मानते हैं कि एक महासागर ही शतभिषा के गुणों को अच्छे से चित्रित करता है। उदहारण के लिए, यह माना जाता है कि एक महासागर अपने भीतर कईं रहस्य तथा खजाने छिपाए हुए होता है उसी तरह शतभिषा भी अपने भीतर कईं रहस्य तथा ज्ञान छुपाये रहता है। महासागर के अंदर कईं जड़ी बूटियों का समावेश माना जाता है जो कईं जटिल रोगों के निवारण के लिए प्रयोग की जा सकती हैं तथा इसीलिए वैदिक ज्योतिष यह मानते है कि एक महासागर सौ चिकित्सकों अथवा सौ दवाओं का पर्यायवाची माना जा सकता है जो कि शतभिषा नक्षत्र का मुख्य चिन्ह भी है। यहाँ पर यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यहाँ शब्द सौ का अर्थ उसकी गिनती से नहीं बल्कि सौ का अर्थ है हर सम्भव प्रकार की। जिस प्रकार एक वृत कि सीमाएं निर्धारित होती हैं उसी प्रकार एक महासागर कि भी सीमाएं निर्धारित होती है। इसी प्रकार कईं और विशेषताएं है जो एक महासागर को इस नक्षत्र से जोड़ती हैं तथा इस नक्षत्र का एक महासागर से सम्बन्ध दर्शाती हैं।

                                     वैदिक ज्योतिष ने राहु को शतभिषा नक्षत्र का शासक ग्रह माना है तथा क्योकि राहु भी मिथ्याओं, रहस्यों तथा गुप्त ज्ञान तथा जादुई घटनाओं का ग्रह माना जाता है इसलिए राहु ग्रह का प्रभाव भी इस नक्षत्र के इस रहस्यमयी पक्ष को बढ़ावा देता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि राहु ग्रह के महासागर समान गुण ही शतभिषा नक्षत्र को इस ग्रह से जोड़ते हैं। इस नक्षत्र के सभी चरण शनि के प्रभाव में आने वाली कुम्भ राशि के अंतर्गत आते हैं इसलिए शतभिषा नक्षत्र पर कुम्भ तथा शनि का प्रभाव प्रबल है तथा इस बात का प्रमाण शतभिषा नक्षत्र में शनि तथा कुम्भ राशि की विशेषताएं जैसे कि सहनशीलता, व्यवस्थापन तथा व्यवहारिकता का पाया जाना है। शतभिषा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बहुत रहस्यमयी स्वभाव के होते हैं तथा यही गोपनीयता अधिकतर इनके व्यक्तित्व तथा इनकी क्षमता का निर्माण करती है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले अधिकतर जातक अपने इसी गुप्त ज्ञान, रहस्यों या कुछ ऐसी ही गुप्त चीज़ों के कारण सफलता की चरम सीमा पर पहुँच जाते हैं।  शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक अपने साथ साथ दूसरों के रहस्य भी अच्छे से सम्भाल के रखने में सक्षम होते हैं उसी तरह जिस तरह एक महासागर हजारों वस्तुओं को सुरक्षित रख सकता है जो उसके गर्भ में छुपी हैं। सम्भवतः इसी कारण जब कुछ रहस्य बांटने या छुपाने की बात आती है तो शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक ही सबसे भरोसेमंद व्यक्ति माने जाते हैं तथा ये जातक इतने रहस्य जानने के बाद भी उन्हें रहस्य ही रखते हैं तथा इतने शांत तथा अनभिज्ञ दिखते हैं जैसे कि उन्हें कुछ पता ही ना हो।

                                  शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों के बारे में बात करते हुए यह बताना भी आवश्यक है कि इन जातकों की नयी चीज़ें सीखने की क्षमता बहुत ही प्रबल होती है। इनकी ज्ञान ग्रहण करने तथा उसका अभ्यास करने की क्षमता भी अतुलनीय है इसलिए शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक ऐसे क्षेत्रो में कार्यरत पाए जा सकते हैं जिनका रहस्य रखने जैसे कामों से सम्बन्ध हो। शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक अधिकतर शंकालु स्वभाव के होते हैं तथा नए लोगों पर आसानी से विश्वास ना करना या देर से विश्वास करना इनके स्वभाव में आता है। शतभिषा नक्षत्र वाले जातकों में वृत अथवा महासागर की तरह अपनी सीमाओं की रक्षा तथा सुरक्षा का एक प्राकृतिक रुझान होता है जिसके कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक किसी भी नयी वस्तु अथवा नए व्यक्ति से अपने आप को दूर तथा सुरक्षित रखते हैं। यही कारण है कि शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक किसी से भी घनिष्ठ सम्बन्ध बनाने में बहुत समय लगा सकते हैं। इन्ही कारणों के चलते, शतभिषा के प्रभाव वाले जातक बहुत जटिल सामाजिक व्यक्ति माने जाते हैं क्योंकि इन जातकों के विश्वास के सीमाक्षेत्र में आना बहुत कठिन है। यहाँ पर एक रोचक तथ्य यह है कि वैदिक ज्योतिष में राहु को एक सामजिक ग्रह माना जाता है जब कि शतभिषा तो इतना सामाजिक लगता नहीं इसलिए ये कहा जा सकता है कि शतभिषा नक्षत्र पर राहु का प्रभाव उसके प्रभाव में आने वाले अन्य दो नक्षत्रो स्वाति तथा आर्द्रा से बिल्कुल विभिन्न है। विशेषतः यदि हम राहु के प्रभाव में आने वाले एक और नक्षत्र स्वाति की बात करे तो हम जानेंगे कि शतभिषा स्वाति से बिल्कुल विपरीत रूप से कार्य करता है। जहाँ वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति को एक सामाजिक नक्षत्र माना जाता है तथा जो नक्षत्र रहस्य सम्भाल के रखने जैसे कार्यों से सम्बन्धित नहीं है वहीँ शतभिषा नक्षत्र में यही मुख्य गुण है जबकि दोनों ही ग्रह राहु के प्रभाव में आते हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि शतभिषा के माध्यम से  हमें राहु ग्रह का एक और पक्ष देखने को मिला है।

                              शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले अनेक जातक अधिकतर किसी समूह में बैठने के स्थान पर अकेले रहना ज्यादा पसंद करते हैं इसलिए इन जातकों में कईं बार रहस्यमयी दुनिया से जुड़ने की प्रवृति अधिक पायी जाती है परन्तु कभी कभी कुछ जातक इस अकेले रहने के कारण मानसिक अवसाद या ऐसे अकेलेपन से होने वाली बीमारियों के शिकार भी हो सकते हैं। शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक नयी भाषाएँ बहुत आसानी से सीख जाते हैं। वे रहस्यमयी विज्ञान अथवा ऐसी विद्याओं जो रहस्यमयी मानी जाती है को भी जल्दी ही समझ जाते हैं। वास्तव में शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव वाले जातकों को ऐसे रहस्य सुलझाने, ऐसे रहस्यमयी घटनाओं से सम्बन्धित क्षेत्रों में कार्य करने तथा प्रवीणता पाने में अच्छी खासी रूचि होती है। वैदिक ज्योतिष ने शतभिषा नक्षत्र के साथ कईं व्यवसायों को जोड़ा है जिनमें से कुछ हैं भौतिक विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, काला जादू या जादू, तन्त्र मंत्र तथा ऐसा ही कोई अन्य क्षेत्र, खगोल शास्त्री, अंतरिक्ष शोधकर्ता, वैज्ञानिक, अंतरिक्ष यात्री अथवा ऐसे किसी पद पर कार्य करना, महासागर खोजकर्ता , स्कूबा गोताखोर अथवा अन्य ऐसे क्षेत्र जैसे कि चिकित्सक, शल्य चिकित्सक, आयुर्वैदिक चिकित्सक या ऐसे किसी व्यवसायिक क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हैं।  परन्तु वहीँ शतभिषा नक्षत्र के नकारात्मक प्रभाव वाले जातक नशीले पदार्थ अथवा नशीली दवाईयों को बेचना, शराब की तस्करी, वेश्यावृत्ति या ऐसे किसी व्यवसाय में कार्यरत पाए जाते हैं।

                          आइये अब चर्चा करें कुछ अन्य तथ्यों की जो वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह हेतु प्रयोग में लायी जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। वैदिक ज्योतिष में शतभिषा नक्षत्र को नपुंसक लिंगी अथवा उभय लिंगी माना जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषियों के अनुसार इस लिंग वर्गीकरण का कारण इस नक्षत्र का राहु ग्रह से सम्बन्ध है क्योंकि राहु ग्रह भी भारतीय ज्योतिष में नपुंसक ग्रह ही माना जाता है। वैदिक ज्योतिष ने इस नक्षत्र को चल स्वभाव वाला नक्षत्र माना है जो हर समय क्रियाशील रहता है तथा इस नक्षत्र की कार्यशैली को देख कर इस तथ्य को समझा जा सकता है। वैदिक ज्योतिष ने इस नक्षत्र को शुद्र वर्ण से  जोड़ा है तथा पुनः इस वर्गीकरण का कारण इस नक्षत्र का राहु ग्रह से सम्बन्ध  माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार शतभिषा नक्षत्र गुण में तामसिक तथा गण में राक्षस है तथा इस वर्गीकरण की पुष्टि वैदिक ज्योतिष दो कारणों के साथ करता है पहला इस नक्षत्र का राहु ग्रह से सम्बन्ध तथा दूसरा इस नक्षत्र कि कार्यशैली जो कि रहस्यमयी ज्ञान तथा क्रियाओं से सम्बन्धित है तथा ऐसी क्रियाओं और ऐसे ज्ञान में राक्षस जाति निपुण मानी जाती है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से आकाश तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी