श्रवण

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                           वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणनाएं करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से श्रवण को 22वां नक्षत्र माना जाता है। श्रवण उन तीन नक्षत्रों में से एक है जो सीधे त्रिदेवों में से किसी एक के आधिपत्य में आते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र का अपना एक विशेष स्थान है। श्रवण का शाब्दिक अर्थ है सुनना तथा इसी के अनुसार यह नक्षत्र सुनने, सीखने तथा फिर सीखे हुए को बोलने जैसीं विशेषताओं का प्रदर्शन करता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पांव के तीन पदचिन्हों को श्रवण नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है तथा अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि ये तीन पदचिन्ह कोई साधारण पदचिन्ह न होकर भगवान श्री विष्णु दवारा वामन अवतार के रूप में लिए गए तीन पदचिन्ह हैं। इस अर्थ को विस्तार से समझने के लिए आइए इस अर्थ के साथ जुड़े प्रसंग को देखते हैं। प्राचीन काल में बलि नामक एक शक्तिशाली असुर था जिसने अपने पराक्रम तथा शक्ति के बल पर पृथ्वी, स्वर्ग तथा पाताल तीनों लोकों को जीत लिया था तथा स्वर्ग का सिंहासन छिन जाने के कारण स्वर्गाधिपति इन्द्र ने भगवान श्री विष्णु की शरण में जाकर बलि से स्वर्ग पुन: उन्हें वापिस दिलाने की विनती की। इन्द्र की विनती स्वीकार करते हुए भगवान श्री विष्णु ने एक छोटे कद के ब्राह्मण का रूप धारण कर लिया जिसके कारण उनके इस अवतार को वामन अवतार के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि वामन का अर्थ बौना होता है। बलि एक यज्ञ कर रहे थे तथा यज्ञ के पश्चात उन्हें याचकों को उनकी इच्छित दक्षिना देनी थी जिसका लाभ उठा कर श्री विष्णु भी याचकों में सम्मिलित हो गए। यज्ञ समाप्त हो जाने पर जब बलि ने वामन के रूप में श्री विष्णु से दक्षिणा मांगने को कहा तो श्री विष्णु ने दक्षिणा में बलि को उन्हें उतनी भूमि प्रदान करने के लिए कहा जिसे वे अपने तीन कदमों से माप सकें।

                          बलि ने वामन का छोटा सा कद देखकर शीघ्र ही यह वचन दे दिया क्योंकि उसके अनुसार वामन अपने तीन कदमों से अधिक भूमि नहीं माप सकता था। वचन मिलते ही वामन रूप में अवतरित भगवान श्री विष्णु ने अपना आकार इतना बड़ा कर लिया कि एक ही कदम में उन्होंने स्वर्ग तथा दूसरे कदम में उन्होनें पृथ्वी तथा पाताल को माप लिया और इसके पश्चात उन्होने बलि से पूछा कि तीनों लोक तो वे पहले ही माप चुके हैं सो अब तीसरा कदम कहां रखें। बलि ने विनम्रता से भगवान श्री विष्णु के समक्ष शीश झुका दिया और बोले कि तीसरा पग उनके शीश पर रख दिया जाए जिस पर भगवान श्री विष्णु ने बलि के सिर पर अपना पग रखकर उसे पाताल लोक में भेज दिया किन्तु साथ ही साथ बलि की दानवीरता तथा वचन का पालन करने की विशेषता से प्रसन्न होकर उस वरदान भी दिया। इस प्रसंग के माध्यम से हम तीन पदचिन्हों के साथ जुड़ी भगवान श्री विष्णु की चतुराई का सहज अनुमान लगा सकते हैं जिन्होंने विश्व हित के लिए बिना युद्ध किए बलि जैसे शक्तिशाली असुर को मात दे दी। भगवान श्री विष्णु द्वारा प्रदर्शित की गई यह चतुराई श्रवण नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होती है जिसके चलते श्रवण को सभी नक्षत्रों में सबसे चतुर नक्षत्र माना जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपनी इस विशेषता का प्रयोग अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए करते हैं।

                       वैदिक ज्योतिष के अनुसार कान को भी श्रवण नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है जिसके चलते कान के माध्यम से प्रदर्शित होने वाली विशेषताएं भी इस नक्षत्र में देखने को मिलती हैं। कान को सुनने की शक्ति के साथ जोड़ा जाता है तथा सुनने की शक्ति को पुन: ग्रहण करने की तथा सीखने की शक्ति के साथ जोड़ा जाता है। प्राचीन काल में प्रत्येक प्रकार की विद्या को केवल सुनकर और सुने हुए को सुरक्षित रखकर ही सीखा जाता था जिसके चलते श्रवण नक्षत्र को प्रत्येक प्रकार की विद्या को सीखने और उसे सुरक्षित रखने के साथ भी जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भगवान श्री विष्णु को श्रवण नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण भगवान श्री विष्णु का इस नक्षत्र पर प्रभाव पड़ता है तथा उनकी कुछ विशेषताएं जैसे चतुराई, संयम, कुशल प्रबंधन करने की क्षमता तथा समय के अनुसार उचित निर्णय लेने की क्षमता आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिनके कारण श्रवण को एक बहुत चतुर तथा व्यवस्थित नक्षत्र कहा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार देवी सरस्वती को भी श्रवण नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है जिसके कारण देवी सरस्वती का भी इस नक्षत्र पर प्रभाव पड़ता है तथा उनकी कुछ विशेषताएं जैसे ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता, सीखने की प्रवृति, संगीत में रूचि तथा वाणी कौशल आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिसके चलते श्रवण को सीखने के साथ साथ बोलने की कला में भी निपुण माना जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने वाक कौशल के चलते अपने जीवन के कई क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करते हैं।

                      नवग्रहों में से चन्द्रमा को वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्रवण नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर चन्द्रमा का भी प्रभाव पड़ता है तथा चन्द्रमा के चरित्र की कुछ विशेषताएं भी इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। चन्द्रमा की जन समुदाय के साथ जुड़ने की तथा उस प्रभावित करने की विशेषता इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्रवण नक्षत्र के चारों चरण मकर राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर मकर राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह शनि का भी प्रबाव पड़ता है। शनि तथा मकर राशि का इस नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को प्रबंधन क्षमता, व्यवहारिकता, जन समुदाय के साथ जुड़ने की क्षमता, संयम तथा लंबे समय तक किसी कार्य को सफल करने के लिए प्रयत्न करते रहने की विशेषता प्रदान करता है जिसके कारण श्रवण के जातक उन व्यवसायिक क्षेत्रों में सफल देखे जाते हैं जिनमे सफलता प्राप्त करने के लिए इन सभी विशेषताओं की आवश्यकता होती है। श्रवण नक्षत्र के जातक बुद्धिमान होते हैं तथा ये जातक अपनी बुद्धिमता का प्रयोग करके जीवन के अनेक क्षेत्रों में सफलता अर्जित करते हैं। श्रवण नक्षत्र के जातको में संयम भी होता है तथा ऐसे जातक किसी कार्य को करने के लिए बहुत लंबे समय तक प्रयत्न करते रहने में भी सक्षम होते हैं किन्तु इन जातकों के लक्ष्य पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातकों की भांति अव्यवहारिक न होकर व्यवहारिक होते हैं। श्रवण नक्षत्र के जातक अपनी विशेषताओं का प्रयोग समाज कल्याण के लिए न करके अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए भी कर सकते हैं तथा ऐसे जातक अपनी चतुराई तथा अन्य विशेषताओं के चलते समाज के लिए उस स्थिति में चिंता का विषय भी बन सकते हैं जब इनके लक्ष्य सकारात्मक न होकर नकारात्मक तथा स्वार्थ से प्रेरित हों। श्रवण नक्षत्र के जातकों के अपराधी अथवा अवैध कार्यों में लिप्त होने की स्थिति में ऐसे जातक समाज तथा कानून के लिए बहुत चिंता का विषय बन सकते हैं क्योंकि इस नक्षत्र के जातक छदम वेष धारण करने में तथा अपने आप को छिपा कर रखने में निपुण होते हैं जिसके फलस्वरूप इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले अधिकतर अपराधी सभ्य तथा अच्छे चरित्रों के पीछे अपने आप को इस सफलता से छिपा कर रखने वाले होते हैं कि कानून के लिए इन्हें पकड़ना तो दूर, बहुत लंबे समय तक यह तय कर पाना भी कठिन हो जाता है कि ये जातक कोई अवैध कार्य करते भी हैं या नहीं।

                       श्रवण नक्षत्र की सकारात्मक उर्जा के प्रभाव में आने वाले जातक अपनी विशेषताओं का प्रयोग समाज कल्याण के कार्यों के लिए करते हैं। श्रवण नक्षत्र के जातक सामाजिक व्यवहार में कुशल होते हैं तथा ऐसे जातक बहुत से मित्र बनाते हैं और बहुत सी समूह गतिविधियों में हिस्सा भी लेते हैं। श्रवण नक्षत्र के जातकों में लोगों को प्रभावित करने की क्षमता होती है जिसके कारण ऐसे जातक लोगों को प्रभावित करके अपने काम निकालने में कुशल होते हैं। अंत में चर्चा करते हैं श्रवण नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष श्रवण को एक पुरुष नक्षत्र मानता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का भगवान श्री विष्णु के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष में श्रवण नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है जो अपने आप में आश्चर्यजनक है। वैदिक ज्योतिष श्रवण नक्षत्र को गण से देव मानता है जिसका कारण पुन: अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का भगवान श्री विष्णु के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्रवण नक्षत्र को गुण से राजसिक माना जाता है तथा अधिकतर वैदिक ज्योतिष इस निर्धारण का कारण इस नक्षत्र की भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करते रहने की प्रवृति को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से वायु तत्व को श्रवण नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी