ज्येष्ठा

Important Yogas in Vedic Astrology
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                        वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से ज्येष्ठा को 18वां नक्षत्र माना जाता है। ज्येष्ठा के आगमन के साथ ही नौ नक्षत्रों की मघा नक्षत्र से आरंभ हुई श्रृंखला का अंत हो जाता है। ज्येष्ठा का अर्थ है सबसे बड़ा तथा इसी के अनुसार इस नक्षत्र को बड़ा, परिपक्व, सुनियोजित आदि अर्थों के साथ जोड़ा जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने आयु से पूर्व ही शारीरिक तथा मानसिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक तावीज को ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। इस प्रकार के तावीज को प्राचीन काल के लोग बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए पहनते थे तथा प्राचीन काल में प्रभुत्व वाले विशेष व्यक्ति भी तावीज पहनते थे। इस प्रकार तावीज का यह प्रतीक चिन्ह ज्येष्ठा नक्षत्र को रक्षा, सुरक्षा तथा प्रभुत्व के साथ जोड़ देता है। तावीज का प्रयोग पारलौकिक तथा परा विज्ञान से जुड़े लोग भी करते हैं जिसके चलते ज्येष्ठा नक्षत्र का संबंध पारलौकिक तथा परा विज्ञान के साथ भी जुड़ जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक छाते को भी ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। छाते का प्रयोग धूप तथा वर्षा से रक्षा के लिए किया जाता है तथा प्राचीन काल में राजा महाराजा छत्र के नाम से जाने जाने वाले एक विशाल छाते का प्रयोग करते थे जो रक्षा के साथ साथ प्रभुत्व का प्रदर्शन भी करता था। इस प्रकार ज्येष्ठा को रक्षा, सुरक्षा, परिपक्वता, पारलौकिक तथा प्रभुत्व के साथ जुड़े एक नक्षत्र के रूप में देखा जा सकता है।

                         देवताओं के राजा माने जाने वाले इन्द्र देव को वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है जिसके चलते इन्द्र का इस नक्षत्र पर प्रभाव पड़ता है तथा इन्द्र के चरित्र की कुछ विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। इन्द्र को अन्य विशेषताओं के साथ साथ एक स्वार्थी, अभिमानी तथा छलिया देवता के रूप में भी जाना जाता है तथा इन्द्र के चरित्र की इन विशेषताओं से जुड़े बहुत से प्रसंग वैदिक साहित्य में उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए भारतीय मिथिहास के एक प्रसंग के अनुसार, प्राचीन भारत में गौतम नाम के एक सिद्ध ॠषि हुए हैं जिनकी पत्नि अहिल्या बहुत सुंदर थी। एक बार देवराज इन्द्र ने अहिल्या को देखा तथा उसकी सुंदरता से मोहित हो कर इन्द्र ने अहिल्या के साथ शारीरिक संबंध बनाने का निर्णय कर लिया हालांकि अहिल्या एक विवाहता स्त्री थी तथा अपने पति गौतम के प्रति पूर्ण रूप से निष्ठावान थी। एक दिन ॠषि गौतम जब स्नान करने के लिए अपनी कुटिया से निकले तो इन्द्र ने छल से गौतम ॠषि का वेष धारण कर लिया और उनकी कुटिया में प्रवेश करके अहिल्या के साथ शारीरिक संबंध बना लिया तथा अहिल्या ने भी इस संसर्ग के प्रति कोई आपत्ति नहीं उठाई क्योंकि इन्द्र उस समय अहिल्या के पति के भेष में थे।  अपनी कामना की पूर्ति के पश्चात जब इन्द्र गौतम ॠषि की कुटिया से निकल रहे थे तो गौतम ॠषि आ गये तथा इन्द्र को अपने भेष में अपनी कुटिया से निकलते देख कर सारा मामला समझ गए। क्रोध में आकर ॠषि गौतम ने अपनी पत्नि अहिल्या को इन्द्र के साथ संसर्ग करने के लिए शाप देकर पत्थर की शिला बना दिया तथा अहिल्या को बहुत लंबे समय तक पत्थर की शिला बने रहने के पश्चात भगवान श्री राम की कृपा से ही पुन: अपना वास्तविक रूप प्राप्त हुआ था।

                       भारतीय मिथिहास के अनुसार इन्द्र एक ऐसे देवता के रूप में जाने जाते हैं जिनके चरित्र में सकारात्मक विशेषताओं की तुलना में नकारात्मक विशेषताएं कहीं अधिक हैं तथा इन्द्र के चरित्र की इन नकारात्मक विशेषताओं में से कुछ विशेषताएं ज्येष्ठा नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होतीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य हैं कि ज्येष्ठा की भांति ही इन्द्र विशाखा नक्षत्र के भी अधिपति देवता हैं तथा विशाखा नक्षत्र के माध्यम से भी इन्द्र के चरित्र की अनेक नकारात्मक विशेषताएं हीं प्रदर्शित होतीं हैं। इस प्रकार विशाखा तथा ज्येष्ठा दोनों ही नक्षत्र इन्द्र की नकारात्मक विशेषताओं के प्रभाव में आकर कई बार एक सा आचरण भी करते हैं किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि ज्येष्ठा नक्षत्र विशाखा नक्षत्र की तुलना में कहीं अधिक संतुलित नक्षत्र है तथा इस नक्षत्र की उर्जा बहुत सी कुंडलियों में सकारात्मक रूप से भी कार्य करती है। इसका मुख्य कारण यह माना जाता है कि ज्येष्ठा नक्षत्र का अधिपति ग्रह वैदिक ज्योतिष के अनुसार बुध को माना जाता है तथा बुध अपनी कुछ विशेषताएं जैसे बुद्धिमता, व्यवहारिकता तथा विवेक आदि ज्येष्ठा नक्षत्र को प्रदान करते हैं जिनके कारण ज्येष्ठा नक्षत्र विशाखा नक्षत्र की तुलना में कहीं अधिक संतुलित हो जाता है। यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र के सभी चार चरण वृश्चिक राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर वृश्चिक राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह मंगल का भी प्रभाव पड़ता है। मंगल को वैदिक ज्योतिष में तर्क से जुड़ा हुआ ग्रह मानते हैं तथा मंगल अपनी तर्क करने की क्षमता इस नक्षत्र को प्रदान करता है जिसके चलते मंगल तथा बुध के संयुक्त प्रभाव में आने के कारण तथा तर्क, बुद्धि तथा विवेक जैसी विशेषताओं का स्वामी होने के कारण ज्येष्ठा नक्षत्र विशाखा नक्षत्र की तुलना में कहीं अधिक संतुलित हो जाता है।

                    ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक अन्य कई नक्षत्रों के जातकों की तुलना में शारीरिक तथा मानसिक रूप से अधिक परिपक्व हो जाते हैं। ज्येष्ठा के जातक अपने अधिकतर निर्णय लेते समय अपनी बुद्धि तथा विवेक का प्रयोग करते हैं तथा इन जातकों में उचित और अनुचित में भेद करने की क्षमता भी होती है। ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक अपनी सामाजिक छवि को लेकर बहुत सावधान रहते हैं तथा ऐसे अधिकतर जातक समाज में अपनी छवि एक अच्छे व्यक्ति के रूप में ही बनाना पसंद करते हैं फिर भले ही इनका वास्तविक रूप अपनी सामाजिक छवि के एकदम विपरीत ही क्यों न हो। ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक अपनी भावनाओं तथा अपने प्रयोजन को छिपाने में दक्ष होते हैं तथा इसी के साथ ये जातक अभिनय करने की कला में भी निपुण होते हैं जिसके चलते ऐसे जातक अपनी एक ऐसी छवि बनाने में भी सफल हो जाते हैं जो इनके वास्तविक चरित्र से बिल्कुल ही विपरीत हो। आज के युग के बहुत से ऐसे नेता इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में माने जा सकते हैं जिनकी सामाजिक छवि तो बहुत अच्छी है किन्तु जिनका वास्तविक चरित्र अच्छा नहीं है। ऐसे नेता अपनी इस झूठी किन्तु अच्छी दिखने वाली छवि के चलते जनता को उल्लू बनाते रहते हैं तथा लाभ उठाते रहते हैं। इन राजनेताओं के साथ जुड़ी शक्ति तथा प्रभुत्व जैसी विशेषताएं पुन: इस तथ्य को प्रमाणित करतीं हैं कि ज्येष्ठा नक्षत्र का शक्ति तथा प्रभुत्व के साथ गहरा संबंध है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि बहुत से ज्येष्ठा जातकों की सामाजिक छवि अच्छी होने के साथ साथ ये जातक वास्तविकता में भी इस छवि के अनुसार ही अच्छे चरित्र के स्वामी होते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी मानते हैं कि सभी सताइस नक्षत्रों में से ज्येष्ठा नक्षत्र सबसे चतुर तथा जोड़ तोड़ करने में सबसे निपुण नक्षत्र है।

                 ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक सामान्यतया अपने कर्तव्यों को पूरा करने में विश्वास रखने वाले होते हैं तथा ये जातक अपने प्रत्येक कार्य को करने के समय अनुशासन का ध्यान रखने वाले होते हैं। ज्येष्ठा के जातक दूसरों की सहायता करने के लिए भी तत्पर रहते हैं तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ जातक तो किसी निर्बल की सहायता करने के लिए अपनी सामर्थ्य से भी बहुत बड़ी किसी संस्था अथवा व्यक्ति के साथ भी लड़ाई कर लेते हैं। ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक सामान्यतया न्यायप्रिय होते हैं तथा इन अधिकतर विवादों को न्यायपूर्ण ढंग से सुलझाने में ही रूचि होती है हालांकि ये जातक उस स्थिति में न्यायिक प्रणाली के साथ छेड़-छाड़ भी कर सकते हैं जब मामले का निर्णय सीधा इनके लाभ या हानि के साथ जुड़ा हुआ हो। ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक ज्योतिष तथा ऐसी ही अन्य विद्याओं में विश्वास रखने वाले होते हैं तथा अपने जीवनकाल में समय समय पर ये जातक सफलता प्राप्त करने की लिए ऐसी विद्याओं की सहायता भी लेते रहते हैं। ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ विशिष्ट जातक ज्योतिष अथवा ऐसे ही अन्य किसी पारलौकिक क्षेत्र के साथ जुड़ी विद्या में अभ्यास करने को अपना व्यवसाय भी बना सकते हैं। अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि ज्येष्ठा नक्षत्र का पारलौकिक तथा रहस्यवाद के साथ सदैव ही गहरा संबंध रहता है।

                       आइए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष ज्येष्ठा को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जिसका कारण कुछ वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र के अधिपति ग्रह बुध को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है तथा इस नक्षत्र को गण से राक्षस माना जाता है और इसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र के द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली नकारात्मक विशेषताओं को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र को गुण से सात्विक माना जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र के अधिपति देवता इन्द्र को माना जाता है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से वायु तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी