स्वाति

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                        वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से स्वाति को 15वां नक्षत्र माना जाता है। स्वाति का शाब्दिक अर्थ है स्वत: आचरण करने वाला अथवा स्वतंत्र तथा वैदिक ज्योतिष स्वाति शब्द को स्वतंत्रता, कोमलता तथा तलवार के साथ जोड़ता है तथा स्वाति के ये विभिन्न अर्थ इस नक्षत्र को विभिन्न विशेषताओं के साथ जोड़ते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार हवा में झूल रहे एक छोटे पौधे को स्वाति नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। छोटा पौधा कोमल होता है जिसके चलते स्वाति नक्षत्र का कोमलता के साथ संबंध जुड़ जाता है। तीव्र हवा में अपना अस्तित्व बचाने का प्रयास करता हुआ यह छोटा पौधा स्वतंत्रता, अस्तित्व बनाए रखने की प्रवृति तथा संघर्ष करने की क्षमता का संकेत देता है तथा इस पौधे के द्वारा प्रदर्शित ये विशेषताएं भी स्वाति नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी मूंगे को भी स्वाति नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मानते हैं। मूंगे को एक ऐसे पौधे के रूप में जाना जाता है जो अपना विकास तथा प्रजनन करने में स्वयं ही सक्षम होता है तथा इसे अपना विकास और प्रजनन करने के लिए किसी बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं होती। स्वाति नक्षत्र का यह प्रतीक चिन्ह भी स्वतंत्रता तथा आत्म-निर्भरता को दर्शाता है तथा इस प्रकार स्वाति नक्षत्र का संबंध स्वतंत्रता, कोमलता, आत्म-निर्भरता, कोमलता तथा संघर्ष करने की क्षमता के साथ जुड़ जाता है।

                     वायु के देवता माने जाने वाले वायु देव अथवा पवन देव को वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है तथा जैसा कि हम पहले ही देख चुके हैं कि वायु का स्वाति नक्षत्र के साथ प्रगाढ़ संबंध है। वायु देव को स्वर्ग लोक में निवास करने वाले पांच मुख्य देवताओं में से एक माना जाता है तथा वायु देव को पंच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश तत्व में से वायु तत्व के अधिपति देव माना जाता है। वायु देव के स्वाति नक्षत्र के अधिपति देवता होने के कारण इस नक्षत्र पर वायु देव का प्रबल प्रभाव रहता है तथा वायु देव के चरित्र की बहुत सीं विश्षताएं स्वाति नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी देवी सरस्वती को भी स्वाति नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी मानते हैं जिसके कारण देवी सरस्वती का भी इस नक्षत्र पर प्रभाव रहता है तथा देवी सरस्वती की कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। देवी सरस्वती को विद्या, ज्ञान, संगीत तथा वाणी की देवी माना जाता है तथा देवी सरस्वती की ये विशेषताएं स्वाति नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से राहू को स्वाति नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है तथा राहू वैदिक ज्योतिष में हालांकि माया के ग्रह से जाने जाते हैं किन्तु राहू के चरित्र की कुछ अन्य विशेषताएं जैसे कि कूटनीति, समाजिक गठबंधन बनाने की क्षमता, सामाजिक व्यवहार में कुशलता, सीखने की प्रबल प्रवृति तथा क्षमता आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि वैदिक ज्योतिष में देवी सरस्वती को राहू ग्रह की अधिष्ठात्री देवी भी माना जाता है इसलिए स्वाति नक्षत्र के माध्यम से राहू की उन्हीं विशेषताओं का प्रदर्शन होना स्वभाविक है जो देवी सरस्वती की विशेषताओं से मेल खातीं हैं क्योंकि देवी सरस्वती को स्वाति नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

                      वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति नक्षत्र के सभी चार चरण तुला राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर तुला राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह शुक्र का भी प्रभाव पड़ता है। नवग्रहों में से शुक्र को सुंदरता, सामाजिकता, भौतिकवाद, कूटनीति तथा आसक्ति आदि के साथ जोड़ा जाता है तथा शुक्र की ये विशेषताएं स्वाति नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि स्वाति नक्षत्र के अधिपति देवता पवन देव वायु तत्व के देवता हैं, स्वाति नक्षत्र का अधिपति ग्रह राहू भी वैदिक ज्योतिष में वायु तत्व से जुड़े हुए ग्रह के रूप में जाना जाता है तथा तुला राशि को भी वैदिक ज्योतिष के अनुसार वायु तत्व के साथ ही जोड़ा जाता है। इसलिए स्वाति नक्षत्र पर वायु तत्व का प्रभाव बहुत प्रबल रहता है जिसके कारण वायु की अनेक विशेषताएं जैसे कि लचकीला स्वभाव, अस्थिरता, ठोसता का अभाव होना, दिखावा करने की प्रवृति, स्थिति अनुसार अपने आप को ढाल लेने की क्षमता आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। इसी प्रभाव के कारण स्वाति नक्षत्र के जातक अपने जीवन में अनेक स्थितियों में निर्णय लेने बहुत देर कर देते हैं तथा कई बार तो ये जातक ठोसता का अभाव होने के कारण निर्णय ले ही नहीं पाते। इसका कारण प्राय: इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में वायु तत्व की बहुतयात तथा पृथ्वी तत्व की कमी होता है क्योंकि वायु अपने आप में खोखली अथवा खाली होती है जबकि पृथ्वी ठोस तथा किसी प्रकार के ठोस निर्णय पर पहुंचने के लिए पृथ्वी तत्व की आवश्यकता होती है। स्वाति नक्षत्र के जातकों में दिखावा करने की प्रवृति भी पायी जाती है जिसका कारण इस नक्षत्र पर शुक्र तथा राहू का प्रभाव है क्योंकि वैदिक ज्योतिष इन दोनों ही ग्रहों को चरम भौतिकवाद के साथ जोड़ता है तथा दिखावा करने की प्रवृति चरम भौतिकवादी होने का संकेत ही देती है।

                         स्वाति नक्षत्र स्वभाव से बहुत भौतिकवादी नक्षत्र है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए तथा शारीरिक सुख की लालसा के लिए प्रयासरत देखे जा सकते हैं। स्वाति नक्षत्र के जातकों में बहुत सहनशीलता तथा संयम होता है जिसके चलते ये जातक किसी कार्य का फल प्राप्त करने की शीघ्रता में नहीं होते अपितु स्वाति नक्षत्र के जातक बहुत संयम से परिणाम के अपने पक्ष में आने की प्रतीक्षा करने में सक्षम होते हैं। किन्तु कुछ मामलों में स्वाति नक्षत्र के जातकों की यह विशेषता नकारात्मक रूप से भी काम करती है जिसके कारण इस नक्षत्र के जातक किसी कार्य के परिणाम के लिए बहुत लंबे समय तक प्रतीक्षा करते रहते हैं विशेषतया तब जब उस कार्य का सकारात्मक परिणाम निकलने की कोई भी संभावना न शेष हो। स्वाति नक्षत्र पर वायु तत्व का अधिक प्रभाव रहने के कारण इस नक्षत्र के जातक निर्णय लेने में प्राय: बहुत समय लगाते हैं तथा ऐसे बहुत से जातक अपने विचारों को व्यवहारिक रूप देने में बहुत समय लगाते हैं हालांकि इनके विचार बहुत अच्छे तथा व्यवहारिक रूप से सफल होने वाले भी हो सकते हैं। किन्तु इन जातकों का मन पृथ्वी तत्व की ठोसता का अभाव होने के कारण तथा वायु तत्व का प्रभाव अधिक होने के कारण अस्थिर रहता है जिसके कारण इन्हें अपने द्वारा लिए हुए निर्णयों के सफल होने के बारे में भी शंका लगी रहती है। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि स्वाति नक्षत्र के जो जातक अपने विचारों को व्यवहारिक रूप देने की कला सीख लेते हैं तथा ठोस निर्णय लेने में सक्षम हो जाते हैं, वे जातक स्वाति के अन्य जातकों की अपेक्षा कहीं अधिक सफल देखे जाते हैं। किसी कुंडली में स्वाति नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को कई प्रकार के रचनात्मक तथा नवीन विचार प्रदान कर सकता है जिन्हें व्यवाहारिकता में उतार कर ये जातक बहुत सफल हो सकते हैं। इस प्रकार स्वाति नक्षत्र के बहुत से जातकों की सफलता तथा असफलता के मध्य अंतर केवल ठोस निर्णय लेने की क्षमता का ही रह जाता है तथा स्वाति के जो जातक ठोस निर्णय लेने की कला सीख लेते हैं, वे स्वाति नक्षत्र के शेष जातकों की तुलना में कहीं अधिक सफल देखे जाते हैं।

                             वैदिक ज्योतिष स्वाति नक्षत्र को बहुत सीं अच्छी विशेषताओं के साथ भी जोड़ता है जिसका मुख्य कारण इस नक्षत्र पर वायु देव तथा देवी सरस्वती का प्रभाव माना जाता है। स्वाति नक्षत्र के जातक प्राय: सुंदर तथा आकर्षक होते हैं जिसका कारण इस नक्षत्र पर शुक्र तथा राहू का संयुक्त प्रभाव माना जाता है। स्वाति नक्षत्र के जातक कूटनीति तथा सामाजिक व्यवहार में निपुण होते हैं क्योंकि इन दोनों क्षेत्रों में निपुणता प्राप्त करने के लिए लचकीले स्वभाव का होना आवश्यक है जो कि वायु तत्व की विशेषता होने के कारण इन जातकों में भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त शुक्र तथा राहू दोनो ही ग्रहों को वैदिक ज्योतिष में सामाजिक व्यवहार कुशलता के लिए जाना जाता है तथा राहू और शुक्र की ये विशेषताएं स्वाति नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होतीं हैं जिसके चलते ये जातक बहुत व्यवहार कुशल होते हैं तथा इन्हें प्राय: सामाजिक पार्टियों में दूसरे लोगों के साथ संबंध बनाते तथा संबंध बढ़ाते हुए देखा जा सकता है। स्वाति नक्षत्र के जातकों में सामाजिक गठजोड़ अथवा नेटवर्किंग की प्रबल रूचि होती है जिसके चलते इन जातकों का सामाजिक दायरा अन्य कई नक्षत्रों के जातकों की अपेक्षा बहुत बड़ा होता है। आज के युग में सामाजिक नेटवर्किंग को चरम सीमा तक पहुंचाने वालीं फेसबुक जैसीं वैबसाइट्स निश्चित रूप से स्वाति नक्षत्र के प्रभाव का ही परिणाम है। आज की दुनिया को अधिक से अधिक सामाजिक बनाने में स्वाति की उर्जा का निश्चित रूप से बहुत बड़ा योगदान है। स्वाति नक्षत्र के जातक अपने लचकीले स्वभाव के कारण स्थिति के अनुसार व्यवहार करने में कुशल होते हैं जिसके कारण इनका सामाजिक आधार बढ़ता ही जाता है तथा आज के युग में बहुत बड़े सामाजिक दायरे वाले अधिकतर जातक इसी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में देखे जाते हैं।

                       स्वाति नक्षत्र के जातकों में सहनशीलता भी बहुत होती है जिसके चलते ये जातक अपने द्वारा किये गए कार्यों के परिणाम की बिना विचलित हुए प्रतिक्षा करने में सक्षम होते हैं। स्वाति नक्षत्र की सहनशीलता तथा संयम जैसी विशेषताओं के चलते ही शनि इस नक्षत्र में स्थित होकर अपने सर्वोच्च बल को प्राप्त करते हैं जिसके कारण इन्हें वैदिक ज्योतिष में उच्च का शनि भी कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर सूर्य स्वाति नक्षत्र में स्थित होकर एकदम क्षीण हो जाते हैं जिसके चलते इन्हें नीच का सूर्य कहकर भी संबोधित किया जाता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि शनि को वैदिक ज्योतिष में संयम तथा सहनशीलता से जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है जिसके कारण शनि स्वाति नक्षत्र में स्थित होकर अपने आप को अधिक बली पाते हैं जबकि सूर्य को वैदिक ज्योतिष में तत्काल निर्णय लेने की प्रवृति वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है तथा स्वाति नक्षत्र के अस्थिर एवम वायुवत वातावरण में आने पर सूर्य स्वयं को असहज पाते हैं और इसी कारण सूर्य इस नक्षत्र में स्थित होने पर बहुत क्षीण हो जाते हैं। स्वाति नक्षत्र में स्थित होने पर राहू तथा शुक्र भी बली हो जाते हैं क्योंकि राहू तथा शुक्र दोनों का स्वभाव ही स्वाति नक्षत्र के स्वभाव से मेल खाता है।

                        आइए अब देखें इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की ओर जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष स्वाति को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का देवी सरस्वती तथा शुक्र के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का राहू के साथ संबंध होना मानते हैं। वैदिक ज्योतिष स्वाति नक्षत्र को देव गण प्रदान करता है जिसका कारण इस नक्षत्र का देवी सरस्वती तथा वायु देव के साथ गहरा संबंध माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति नक्षत्र को गुण से राजसिक माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस वर्गीकरन का कारण स्वाति नक्षत्र का शुक्र के साथ जुड़ा होना तथा इस नक्षत्र का व्यवहार और आचरण मानते हैं क्योंकि स्वाति के जातक भौतिक सुखों की प्रबल इच्छा रखने वाले होते हैं। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से अग्नि तत्व को स्वाति नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी