चित्रा

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                        अश्विनी से लेकर रेवती तक चलने वाली नक्षत्रों की यात्रा में चित्रा मध्यांतर अथवा मध्य के पड़ाव को दर्शाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणना करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से चित्रा को 14वां नक्षत्र माना जाता है तथा इस नक्षत्र के पूर्व और पश्चात दोनों ओर तेरह नक्षत्र होने के कारण इसे नक्षत्रों की यात्रा का मध्यांतर भी कहा जाता है। चित्रा का शाब्दिक अर्थ है चित्र की भांति सुंदर, अदभुत अथवा आश्चर्यजनक और इस अर्थ को समझने के लिए कुछ तथ्यों पर विचार करना आवश्यक होगा। वैदिक काल में जब इन नक्षत्रों का नामकरण किया गया था तो आज की भांति टैलिविजन अथवा कैमेरे नहीं होते थे जिसके कारण चित्रकारों के हाथ से बनाए गए चित्रों को ही समृति के रूप में आगे चलाया जाता था। अच्छे तथा निपुण चित्रकार उस काल में अधिकतर या तो उन लोगों के चित्र बनाते थे जो बहुत सुंदर अथवा महत्वपूर्ण होते थे या फिर किसी अन्य वस्तु अथवा परिस्थिति का जो अपने आप में अदभुत अथवा आश्चर्यजनक हो। इस प्रकार प्राचीन काल में बहुत सुंदर व्यक्ति या स्त्री को चित्र की भांति सुंदर भी कहा जाता था क्योंकि तब चित्र अधिकतर सुंदर पुरुषों के अथवा सुंदर स्त्रियों के ही बनते थे। इस प्रकार चित्रा शब्द का सुंदर, आश्चर्यजनक अथवा अदभुत के साथ संबंध माना जाता है तथा अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि चित्रा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक इन विशेषताओं का प्रदर्शन करते हैं।

                            वैदिक ज्योतिष के अनुसार बड़े आकार के एक चमकीले रत्न को चित्रा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि जिस प्रकार रत्न भूमि के भीतर एक लंबी अवधि के पश्चात तथा कई प्रकार की जैविक तथा रसायनिक क्रियाओं जैसे कि चरम तापमान, चरम दबाव तथा सूक्ष्म जीवों के प्रभाव के पश्चात बनता है उसी प्रकार चित्रा नक्षत्र के माध्यम से भी उस कला का प्रदर्शन होता है जो कलाकार के जीवन की चरम भावनात्मक अथवा रचनात्मक परिस्थितियों में जन्म लेती है। रत्नों को कला तथा शिल्प का नमूना भी माना जाता है तथा इसी प्रकार चित्रा नक्षत्र भी कला तथा शिल्प जैसीं विशेषताएं प्रदर्शित करता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी मोती को भी चित्रा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मानते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि अपने आप में कला का एक नमूना माने जाने वाले मोती का जन्म भी चरम तथा उत्तेजित करने वाली परिस्थितियों में ही होता है। कोई बाहरी पदार्थ जैसे ही सीप के बाहरी खोल के भीतर प्रवेश पाने में सफल हो जाता है तो सीप के अंदर एक उत्तेजना तथा रक्षा की भावना पैदा हो जाती है जिसके चलते सीप अपने भीतर से नैक्र नाम का एक पदार्थ छोड़ती है जो उस बाहरी पदार्थ से लिपट कर उसके उपर बहुत सी सतहें बना लेता है तथा सीप की इस रक्षात्मक तथा उत्तेजित प्रतिक्रिया के स्वरुप मोती का जन्म होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अपने आप में बहुत सुंदर माने जाने वाले मोती का जन्म वास्तव में चरम परिस्थितियों में होता है। इसी प्रकार चित्रा नक्षत्र भी कला के उस नमूने को प्रदर्शित करता है जिसका जन्म कलाकार के उत्तेजना, उग्रता, उदासी अथाव ऐसी ही किसी स्थिति में होने से होता है।

                        शिल्प कला में सबसे निपुण माने जाने वाले विश्व कर्मा को वैदिक ज्योतिष के अनुसार चित्रा नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर विश्वकर्मा का प्रबल प्रभाव रहता है। विश्वकर्मा शिल्प कला के सुंदर तथा अदभुत नमूने बनाने के लिए जाने जाते हैं तथा विश्वकर्मा के चरित्र की ये विशेषता चित्रा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होती है। विश्व कर्मा को रचना से जुड़े प्रत्येक प्रकार के रहस्य तथा माया का ज्ञाता माना जाता है तथा विश्वकर्मा के इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव के कारण इस नक्षत्र के जातक भी लगभग शून्य से ही कला के उत्कृष्ट नमूने बनाने में दक्ष होते हैं। इस प्रकार चित्रा नक्षत्र माया के बहुत से भेद जानने वाले नक्षत्र के रूप में जाना जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक ऐसी सुंदर से सुंदर कृतियों की रचना करने में सक्षम होते हैं जिसकी कल्पना करना भी अन्य बहुत से नक्षत्र के जातकों के लिए बहुत कठिन होता है। इसी कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी चित्रा नक्षत्र को अपार प्रतिभा का धनी मानते हैं जो माया तथा रहस्यवाद को भेदकर बहुत सी सुंदर कृतियों को जन्म दे सकता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से मंगल ग्रह को चित्रा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर मंगल ग्रह का भी प्रभाव रहता है। वैदिक ज्योतिष में मंगल को अग्नि, उर्जा तथा शक्ति से जुड़े हुए एक ग्रह के रूप में जाना जाता है तथा मंगल का चित्रा नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को वह आवश्यक उर्जा तथा प्रोत्साहन प्रदान करता है जो इसे अपनी कला को सजीव रूप देने के लिए आवश्यक रूप से चाहिए होती है। इस प्रकार मंगल का इस नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र की रचनात्मकता तथा कलात्मकता को और भी बढ़ा देता है।

                           वैदिक ज्योतिष के अनुसार चित्रा नक्षत्र के पहले दो चरण कन्या राशि में स्थित होते हैं जबकि इस नक्षत्र के शेष दो चरण तुला राशि में स्थित होते हैं जिसके चलते इस नक्षत्र पर कन्या राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बुध और तुला राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह शुक्र का भी प्रभाव रहता है। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि बुध तथा शुक्र का चित्रा नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र की कलात्मकता तथा रचनात्मकता को और भी बढ़ा देता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष के अनुसार बुध तथा शुक्र को रचनात्मकता तथा कलात्मकता के साथ जोड़ा जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी चित्रा नक्षत्र का संबंध राहू से भी जोड़ते हैं क्योंकि इन ज्योतिषियों के अनुसार राहू कन्या राशि के सह-अधिपति हैं। इस प्रकार राहू का इस नक्षत्र पर प्रभाव होने के कारण राहू की विशेताओं का भी इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शन होता है जिनमें रहस्यवाद तथा माया भी शामिल है। चित्रा नक्षत्र में विश्वकर्मा, बुध, शुक्र तथा राहू की विभिन्न विशेषताओं का समावेश इस नक्षत्र को एक जटिल प्रकार का नक्षत्र बना देता है जिसके कारण इस नक्षत्र की उर्जा कई बार असुंतुलित हो जाती है जबकि कई बार इन विशेषताओं का संयुक्त प्रभाव इस नक्षत्र को कला के उत्कृष्ट नमूने रचने में सहायता भी करता है।

                             चित्रा नक्षत्र के जातक किसी न किसी स्तर पर रचनात्मकता के साथ जुड़े होते हैं क्योंकि चित्रा नक्षत्र अपने आप में रचनात्मकता का ही दूसरा रूप है। चित्रा नक्षत्र के जातकों को प्रकृति की सुंदर से सुंदर कृतियों के रहस्य को समझने में बहुत रूचि होती है तथा बहुत बार ये जातक इन रहस्यों को समझने में सफल भी हो जाते हैं क्योंकि चित्रा नक्षत्र के जातकों में जटिल से जटिल रहस्य को भी भेद देने की क्षमता अन्य कई नक्षत्रों के जातकों से बहुत अधिक होती है। आज के युग में चित्रा नक्षत्र के जातक वास्तु कला के क्षेत्र में, फैशन जगत के क्षेत्र में तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में कार्यरत पाये जा सकते हैं जिनमें सफलता प्राप्त करने के लिए रचनात्मक कल्पना शक्ति का होना आवश्यक है। चित्रा नक्षत्र के जातक अपने उच्च स्तर पर माया के रहस्य समझने में तथा दूसरे लोकों के साथ जुड़ने में भी सक्षम होते हैं। चित्रा नक्षत्र के जातकों के चरित्र तथा इनकी कृतियों को एक प्रकार का रहस्यवाद घेर कर रखता है तथा रहस्य के इस घेरे को भेद कर इन जातकों की वास्तविकता को समझ लेना अधिकतर व्यक्तियों के लिए कठिन कार्य हो सकता है। उदाहरण के लिए अपनी भविष्य की किसी कृति पर कार्य कर रहा चित्रा का कोई जातक अपने इर्द गिर्द वाले लोगों को किसी रहस्यमयी चरित्र की भांति लग सकता है क्योंकि इस जातक के द्वारा किया जाने वाला कार्य इन लोगों की समझ से परे होता है तथा इन लोगों को ऐसा लगता है कि चित्रा का यह जातक अपनी इस कृति पर केवल अपना समय ही व्यर्थ कर रहा है तथा जब यही चित्रा का जातक अपनी इस कृति को एक सुंदर रूप में पूर्ण करने में सफल हो जाता है तो ये लोग अचम्भित रह जाते हैं। चित्रा नक्षत्र के जातकों में अपने चरित्र तथा रचनात्मकता के चलते अन्य लोगों को अचम्भित करने की प्रबल क्षमता होती है।

                            आइए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग किए जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष चित्रा को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का बुध तथा शुक्र के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष चित्रा नक्षत्र को वैश्य वर्ण प्रदान करता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस तथ्य को मानते हैं कि अधिकतर कृतियों का निर्माण काम करने की श्रेणी में आने वाले लोग करते हैं तथा वैश्य जाति का संबंध इसी श्रेणी से माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार चित्रा नक्षत्र को गुण से तामसिक तथा गण से राक्षस माना जाता है। अधिकतर वैदिक ज्योतिष इस वर्गीकरण का कारण इस तथ्य को मानते हैं कि चित्रा नक्षत्र का माया के साथ प्रबल संबंध है तथा माया के भेद समझने में राक्षस जाति अन्य सभी जातियों की तुलना में कहीं आगे है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से अग्नि तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है तथा यह अग्नि चित्रा की रचनात्मकता को उर्जा प्रदान करने वाली अग्नि मानी जाती है।

लेखक
हिमांशु शंगारी