अश्लेषा

Important Yogas in Vedic Astrology
Book Your Consultation at AstrologerPanditji.com
Buy This Book in India!
Buy This Book in USA!
Buy This Book in UK and Europe!

हमारा टी वी कार्यक्रम कर्म कुण्डली और ज्योतिष YouTube पर देखने के लिए यहां क्लिक कीजिए

Click Here for English Version 

                       अधिकतर वैदिक ज्योतिषी अश्लेषा को सताइस नक्षत्रों में सबसे भयावह माने जाने वाले कुछ नक्षत्रों में से एक मानते हैं तथा किसी कुंडली पर इस नक्षत्र का प्रबल प्रभाव आशंका की दृष्टि से ही देखा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी कुंडली विशेष में अश्लेषा नक्षत्र में चन्द्रमा की उपस्थिति उस कुंडली में गंड मूल दोष बना देती है जो जातक के मानसिक सुख तथा अन्य कई प्रकार के सुखों को विपरीत रूप से प्रभावित करता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणनाएं करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से अश्लेषा नक्षत्र को नौवां नक्षत्र माना जाता है तथा अश्लेषा नक्षत्र के आगमन के साथ ही सताइस नक्षत्रों में से नौ नक्षत्रों की तीन श्रृखलाओं में से पहली श्रृंखला पूर्ण हो जाती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सभी नवग्रहों को तीन तीन नक्षत्रों का अधिपति बनाया गया है तथा इस प्रकार सभी सताइस नक्षत्र एक क्रमबद्ध ढंग से एक के बाद एक आते हैं तथा नौ नक्षत्रों के पूरा होने के पश्चात ग्रहों के नक्षत्रों पर आधिपत्य का वही क्रम पुन: शुरु हो जाता है। उदाहरण के लिए केतु पहले नक्षत्र अश्विनी के स्वामी ग्रह हैं तथा नौ नक्षत्रों का पहला क्रम पूरा हो जाने पर दूसरी श्रृंखला के आरंभ में दसवें स्थान पर पुन: केतु के आधिपत्य वाले मघा नक्षत्र को ही स्थान दिया जाता है। इस प्रकार केतु पहले नक्षत्र अश्विनी, दसवें नक्षत्र मघा तथा उन्नीसवें नक्षत्र मूल के स्वामी माने जाते हैं तथा शेष ग्रहों को भी अपने क्रम से तीन तीन नक्षत्रों का आधिपत्य प्राप्त होता है।

                        अश्लेषा शब्द का अर्थ किसी प्रकार की कुंडली मारने से लिया जाता है तथा इस शब्द के अर्थ को पूर्ण रूप से समझने के लिए हमें इस नक्षत्र से जुड़े प्रतीक चिन्ह का भी अध्ययन करना होगा। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली मार कर बैठे हुए एक सर्प को अश्लेषा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है जिसके चलते अश्लेषा नक्षत्र को सर्पों तथा उनके गुणों के प्रभाव में आने वाले एक नक्षत्र के रूप में देखा जाता है। वैदिक काल से ही सर्पों को भयावह जीव माना जाता है तथा आज के युग में भी अधिकतर लोग सर्पों के नाम से ही भयभीत हो जाते हैं तथा इसी प्रकार अश्लेषा नक्षत्र का यह प्रतीक चिन्ह भी बहुत से ज्योतिषियों के मन में कई प्रकार की आशंकाएं पैदा कर देता है। सर्पों के साथ इस नक्षत्र का संबंध केवल अपने नाम से तथा प्रतीक चिन्ह के माध्यम से ही नहीं है अपितु अपने अधिपति देवता के माध्यम से भी है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नाग देवताओं को अश्लेषा नक्षत्र के अधिपति देवता माना जाता है तथा कुछ वैदिक ज्योतिषी शेषनाग को इस नक्षत्र का अधिपति देवता मानते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्लेषा नक्षत्र के अधिपति माने जाने वाले ये नाग देवता वास्तव में आधे सर्प के तथा आधे मनुष्य के शरीर वाले देवता हैं। इस प्रकार सर्पों से अश्लेषा नक्षत्र का गहरा संबंध है जिसके कारण सर्पों के चरित्र में पायीं जाने वालीं बहुत सी विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होती हैं जिसके फलस्वरूप इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी इन विशेषताओं का प्रदर्शन करते हैं।

                         रहस्यमयता वह सबसे पहली विशेषता है जिसे सर्पों के साथ जोड़ा जाता है। सर्पों को बहुत ही रहस्यमयी जीव माना जाता है तथा यही सबसे प्रमुख कारण है जिसके चलते अधिकतर लोग सर्पों से भयभीत रहते हैं। सर्पों को भ्रम पैदा करने की कला में निपुण, सम्मोहन पैदा करने की कला का ज्ञान रखने वाले तथा विषैले जीवों के रूप में जाना जाता है तथा सर्पों के चरित्र की ये विशेषताएं अश्लेषा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि जिस प्रकार सर्प साधारण स्थितियों में बिल्कुल निष्क्रिय तथा निष्प्राण से होकर पड़े रहते हैं किन्तु अवसर आने पर विलक्षण सक्रियता का प्रदर्शन करते हैं उसी प्रकार अश्लेषा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी गोपनीय, जोड़ तोड़ करने की कला में निपुण तथा षड़यंत्रकारी होते हैं। अश्लेषा के जातकों के चरित्र की ये विशेषताएं इन्हें उस स्थिति में बहुत खतरनाक बना देतीं है जब इन जातकों की प्रवृति रचनात्मक न होकर विनाशकारी हो। सर्पों की भांति अश्लेषा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी रहस्य की पर्तों में लिपटे रहते हैं जिससे इनके सामने बैठे बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को भी कई बार इनके असली चरित्र का पता नहीं चल पाता तथा यह अनुमान लगाना बहुत कठिन हो जाता है कि अश्लेषा के जातक किसी विशेष अवसर पर किस प्रकार का आचरण करेंगे। अश्लेषा के जातक रहस्यों को गुप्त रखने में दक्ष होते हैं तथा अपने मन के विचारों को ऐसे जातक अपने सगे संबंधियों के साथ भी नहीं बांटते। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्लेषा नक्षत्र के जातक जन्म से ही किसी प्रकार की असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होते हैं जिसके कारण ये जातक किसी के भी साथ अपने मन के भावों को बांटने में असुरक्षा अनुभव करते हैं।

                          वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्लेषा नक्षत्र का अधिपति ग्रह बुध को माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि बुध ग्रह के चरित्र के सबसे बुरे गुण इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होते हैं। बुध की धोखा देने की विशेषता, अपना लाभ लेने के लिए चालाकी से दूसरे की हानि करने की विशेषता, वाक पटुता से सामने वाले व्यक्ति को अपने जाल में फंसाने की विशेषता तथा अन्य ऐसी ही कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। अश्लेषा नक्षत्र के सभी चार चरण कर्क राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर कर्क राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह चन्द्रमा का भी प्रभाव पड़ता है किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि अधिकतर वैदिक ज्योतिषियों का यह मत है कि अश्लेषा नक्षत्र पर सबसे प्रबल प्रभाव इसके अधिपति नाग देवताओं का ही रहता है तथा किसी भी कुंडली में अश्लेषा नक्षत्र का आचरण अन्य किसी ग्रह के प्रबल होने से विशेष प्रभावित नहीं होता। इसी कारण यह माना जाता है कि चन्द्रमा जैसे मातृत्व से भरपूर ग्रह का प्रभाव भी इस नक्षत्र के स्वभाव के विष को दूर करने में अधिक सफलता प्राप्त नहीं करता बल्कि कुछ वैदिक ज्योतिषी तो यह भी मानते हैं कि चन्द्रमा के चरित्र की बहुत सीं नकारात्मक विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। उदाहरण के लिए चन्द्रमा की जन समुदाय के साथ जुड़ने की तथा जन समुदाय को प्रभावित कर लेने की क्षमता का इस नक्षत्र के प्रभाव में आने पर दुरुपयोग होता है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कई जातक जन समुदाय को विश्वास में लेकर अपना कार्य सिद्ध कर लेते हैं तथा कार्य सिद्ध हो जाने के बाद ऐसे जातक जन समुदाय की ओर मुड़ कर भी नहीं देखते। ऐसे जातक जनता के बीच में अपनी एक झूठी किन्तु अच्छी छवि बनाने में सफल हो जाते हैं तथा वास्तिवक जीवन में बहुत बुरे होने के बावजूद भी जनता इन्हें बहुत अच्छा इंसान समझती रहती है जिससे इन्हें जनता के इस विश्वास के चलते बड़े लाभ प्राप्त होते हैं।

                         और हालांकि वैदिक ज्योतिष से संबंधित अधिकतर ग्रंथों में इस नक्षत्र के बारे में बुरी बातें ही देखने को मिलती हैं किन्तु मेरे अनुभव में ऐसा सदा नहीं होता तथा मैने कुछ ऐसे जातकों की कुंडलियां भी देखीं है जो इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में होने के पश्चात भी इस नक्षत्र की उर्जा का उपयोग सकारात्मक ढंग से करने में सफल हुए हैं। अपने सकारात्मक स्तर पर अश्लेषा नक्षत्र का किसी कुंडली में प्रबल प्रभाव जातक को कई विशेषताएं प्रदान करता है जिनमें व्यापार कौशल, संकट को समय से पूर्व ही भांप लेने की क्षमता, गहन विशलेषणात्मक प्रवृति तथा किसी भी स्थिति के मूल तक पहुंच जाने की क्षमता भी शामिल है। अश्लेषा नक्षत्र का किसी कुंडली में विशेष सकारात्मक प्रभाव जातक को आलौकिक तथा पारलौकिक शक्तियों से भी जोड़ सकता है। अश्लेषा नक्षत्र का यह विशेष प्रभाव जातक की कुंडलिनी शक्ति को प्रभावित कर सकता है जिसके चलते जातक को आलौकिक तथा पारलौकिक जगत के अनुभव भी हो सकते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्लेषा नक्षत्र का मनुष्य के शरीर में वास करने वाली कुंडलिनी शक्ति से बहुत गहरा संबंध है तथा कुछ ज्योतिषी तो यह भी मानते हैं कि अश्लेषा नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में दर्शाया जाने वाला कुंडलीधारी सर्प वास्तव में और कुछ न होकर कुंड़लनी शक्ति का ही प्रतीक है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि कुंडलिनी शक्ति का चित्रण भी बिल्कुल इसी प्रकार से कुंडली धारण किए हुए सर्प के रूप में ही किया जाता है। इस विषय का ज्ञान रखने वाले विद्वान जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में कुंडलिनी शक्ति सुप्त अवस्था में विद्यमान रहती है तथा किसी प्रकार के प्रभाव के कारण इस शक्ति के सक्रिय हो जाने पर ऐसे व्यक्ति को आलौकिक तथा पारलौकिक जगत से जुड़े अनुभव होने शुरु हो जाते हैं। यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि कुंडलिनी शक्ति प्रत्येक मनुष्य के शरीर में प्राय: उसी प्रकार से सुप्त अवस्था में रहती है जिस प्रकार एक सर्प अधिकतर समय सुप्त अवस्था में ही पड़ा रहता है।

                             आइए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हे वैदिक ज्योतिष में विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनसार अश्लेषा को एक स्त्री नक्षत्र माना जाता है तथा हालांकि इसका कोई सपष्ट कारण उपलब्ध नहीं है किन्तु अश्लेषा का यह लिंग निर्धारण संभवत: इस नक्षत्र का कुंडलिनी शक्ति से गहरा संबंध हो सकता है। वैदिक ज्योतिष अश्लेषा नक्षत्र को वर्ण से शूद्र मानता है तथा वैदिक ज्योतिष द्वारा इस नक्षत्र के साथ जोड़े गए नकारात्मक पक्षों पर विचार करने के पश्चात इस वर्ण निर्धारण को समझना कठिन नहीं है। वैदिक ज्योतिष अश्लेषा नक्षत्र को राक्षस गण प्रदान करता है तथा अश्लेषा नक्षत्र के आचरण पर विचार करके इस निर्धारण को भी आसानी से समझा जा सकता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्लेषा नक्षत्र को गुण से सात्विक माना जाता है तथा अश्लेषा नक्षत्र का यह गुण निर्धारण इस नक्षत्र के व्यवहार, आचरण तथा इस नक्षत्र से जुड़े देवताओं और ग्रहों को देखने के बाद सर्वथा चकित कर देने वाला है। यहां पर भी ध्यान देने योग्य एक रोचक तथ्य यह है कि मानव शरीर में वास करने वाली कुंडलिनी भी और कुछ न होकर शुद्ध रूप से केवल शक्ति ही है तथा शक्ति अपने वास्तविक तथा शुद्ध रूप में सात्विक मानी जाती है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से जल तत्व को अश्लेषा नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी