पुष्य

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                           पुष्य नक्षत्र को भारतीय ज्योतिष के अनुसार सबसे अधिक शुभ माने जाने वाले नक्षत्रों में से एक माना जाता है तथा इस नक्षत्र के उदय होने पर अधिकतर वैदिक ज्योतिषी शुभ कार्य करने का परामर्श देते हैं। भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाले गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से पुष्य को आठवां नक्षत्र माना जाता है। सताइस नक्षत्रों की इस श्रंखला में से पुष्य नक्षत्र शनि ग्रह के आधिपत्य में आने वाला पहला नक्षत्र है तथा हालांकि शनि को वैदिक ज्योतिष के अनुसार अधिकतर मुसीबतों के आगमन, समस्याओं तथा दुर्भाग्य के साथ जोड़ा जाता है किन्तु इसके बिल्कुल विपरीत शनि के आधिपत्य में आने वाले इस नक्षत्र को सौभाग्य, समृद्धि तथा अन्य बहुत से शुभ पक्षों के साथ जोड़ा जाता है। पुष्य शब्द का शाब्दिक अर्थ है पोषण करना अथवा पोषण करने वाला तथा इस शब्द का शाब्दिक अर्थ ही अपने आप में इस नक्षत्र के व्यवहार तथा आचरण में बहुत कुछ बता देता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी पुष्य नक्षत्र को तिष्य नक्षत्र के नाम से भी संबोधित करते हैं। तिष्य शब्द का अर्थ है शुभ होना तथा यह अर्थ भी पुष्य नक्षत्र को शुभता ही प्रदान करता है। कुछ वैदिक ज्योतिष पुष्य शब्द को पुष्प शब्द से निकला हुआ मानते हैं। पुष्प शब्द अपने आप में सौंदर्य, शुभता तथा प्रसन्नता के साथ जोड़ा जाता है तथा इस शब्द से भी पुष्य नक्षत्र के शुभ तथा सुंदर होने के ही संकेत मिलते हैं।

                             वैदिक ज्योतिष के अनुसार गाय के थन को पुष्य नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है तथा पुष्य नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह गाय का यह थन भी हमें पुष्य नक्षत्र के स्वभाव के बारे में बहुत कुछ बताता है। गाय को भारतवर्ष में प्राचीन तथा वैदिक काल से ही पूज्या माना जाता है तथा गाय के दूध की तुलना वैदिक संस्कृति में अमृत के साथ की जाती थी। गाय के दूध को सब प्राणियों का पोषण करने वाला, स्वास्थयवर्धक तथा गुण से सात्विक माना जाता है तथा इसी प्रकार के गुण पुष्य नक्षत्र के स्वभाव में भी देखने को मिलते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने आस पास के लोगों तथा समाज का पोषण करने की भावना रखने वाले होते हैं तथा इनमें सात्विक गुण की प्रधानता रहती है। पुष्य के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक उसी प्रकार अपने पास आने वाले सभी लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा करना पसंद करते हैं जिस प्रकार एक गाय निस्वार्थ भाव से अपना पोषक दूध सभी प्राणियों के लिए उपलब्ध करवाती है। कुछ वैदिक ज्योतिषी पहिये को भी पुष्य नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मानते हैं। पहिए को वैदिक ज्योतिष में समय के चलने के साथ अर्थात समय की गति के साथ, विकास तथा उन्नति के साथ तथा सभ्यता के विकास के साथ जोड़ कर देखा जाता है तथा पहिए के इन गुणों का प्रदर्शन भी पुष्य नक्षत्र के माध्यम से होता है जिसके चलते इस नक्षत्र को सभ्यता के विकास के साथ तथा समय की गति के साथ भी जोड़ कर देखा जाता है।

                          वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को पुष्य नक्षत्र के स्वामी देवता के रूप में माना जाता है। यहां पर यह जान लेना आवश्यक है कि भारतीय वैदिक ग्रंथों के अनुसार बृहस्पति को देवताओं के गुरु माना जाता है जिन्हें देवगुरु भी कहा जाता है तथा इसी कारण से बृहस्पति का एक नाम गुरु भी वैदिक ज्योतिष में प्रचलित है। गुरु का इस नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को गुरु के कई गुण जैसे कि दया, सदभावना, समृद्धि, धर्मपरायणता, उदारता, सदभावना तथा आशावाद प्रदान करता है जिसके कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में बृहस्पति के उपर बताए गए गुण पाए जाते हैं। पुष्य नक्षत्र का स्वभाव बृहस्पति के स्वभाव से इतना अधिक मेल खाता है कि बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि बृहस्पति का पुष्य के साथ संबंध उन तीनों नक्षत्रों से कहीं अधिक प्रगाढ़ है जिनके स्वामी ग्रह बृहस्पति हैं। पुष्य नक्षत्र के सभी चार चरण कर्क राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण यह नक्षत्र कर्क राशि तथा इसके स्वामी ग्रह चन्द्रमा के प्रभाव में भी आता है तथा इन प्रभावों के चलते पुष्य नक्षत्र के स्वभाव में मातृत्व के गुण तथा पोषण के गुण और भी अधिक सुदृढ़ हो जाते हैं क्योंकि चन्द्रमा को वैदिक ज्योतिष में मातृत्व तथा पोषण से जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है। चन्द्रमा का पुष्य नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को कुछ स्त्री प्रमुख गुण जैसे कि माता की भांति देखभाल करने का गुण, पोषण करने का गुण, संवेदनशीलता, भावुकता तथा ऐसे ही कुछ अन्य गुण भी प्रदान करता है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में यह गुण भी पाए जाते हैं।

                        जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, वैदिक ज्योतिष के अनुसार शनि ग्रह पुष्य नक्षत्र के अधिपति ग्रह माने जाते हैं तथा शनि का इस नक्षत्र पर प्रभाव शनि ग्रह के कुछ विशेष गुण इस नक्षत्र को प्रदान करता है। वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह को सहनशीलता, दृढ़ता तथा सेवा भावना के साथ जोड़ा जाता है तथा शनि के चरित्र की यह विशेषताएं पुष्य नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। शनि, बृहस्पति तथा चन्द्रमा का इस नक्षत्र पर मिश्रित प्रभाव इस नक्षत्र को पोषक, सेवा भाव से काम करने वाला, सहनशील, मातृत्व के गुणों से भरपूर तथा दयालु बना देता है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातकों में भी यह गुण देखे जाते हैं। पुष्य नक्षत्र के जातक अपने स्वभाव की इन विशेषताओं के कारण अपने आस पास के समाज में अपना एक विशेष स्थान बना लेते हैं तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ जातक तो धर्मार्थ सेवा करनी वाली संस्थाओं के साथ जुड़ कर जीवन भर समाज के पिछड़े वर्ग की सेवा करते रहते हैं। अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस बात पर एकमत हैं कि पुष्य नक्षत्र में किसी भी अन्य नक्षत्र की तुलना में सेवा भाव कहीं अधिक रहता है तथा पुष्य के जातकों का यह सेवा भाव ही इन्हें अन्य नक्षत्रों के जातकों से अलग करता है।

पुष्य नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक आम तौर पर उदार, दयालु, समृद्ध तथा समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। ऐसे जातकों के पारिवारिक मूल्य बहुत प्रबल होते हैं तथा ये जातक अपने परिवार के सदस्यों तथा अपने संपर्क में आने वाले अन्य लोगों की सुख सुविधा का बहुत ध्यान रखते हैं। पुष्य नक्षत्र के जातक समाज सुधार के कार्यों में भी विशेष रुचि रखते हैं तथा इनमें से बहुत से जातक किसी न किसी सामाजिक अथवा धर्मार्थ संस्था के साथ जुड़े देखे जाते हैं। पुष्य के जातक दृढ़ संकल्प वाले होते हैं तथा इनमें सहनशीलता तथा प्रयास करते रहने का गुण भी होता है जिसके चलते ये जातक आम तौर पर अपने तय किए हुए लक्ष्यों की प्राप्ति करने में सफल रहते हैं। ये जातक अपने प्रयासों के चलते अपने जीवन में बहुत सी सुख सुविधाओं को अर्जित कर लेते हैं जिससे इन्हें एक आरामदायक जीवन व्यतीत करने में सहायता मिलती है। पुष्य नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक धार्मिक प्रवृति के होते हैं तथा इनकी रुचि आध्यात्मिक विकास की ओर भी होती है। पुष्य नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले बहुत से जातकों को अपने जीवन काल में आवश्यक धन तथा साधन प्राप्त होते रहते हैं जिसके चलते वे अपनीं, अपने परिवार वालों कीं तथा अपने आस पास वालों की आवश्यकताएं पूरी करने में भी सक्षम होते हैं तथा इन सारी आवश्यकताओं को पूरा करने के पश्चात भी इन जातकों के पास सम्पति बनाने के लिए तथा सामाजिक कार्यों में योगदान देने के लिए धन बच जाता है। बृहस्पति तथा चन्द्रमा का मिश्रित प्रभाव पुष्य नक्षत्र के जातकों को लगातार धन तथा समृद्धि प्रदान करता रहता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष में ये दोनों ही ग्रह धन तथा समृद्दि के साथ जोड़े जाते हैं।

                            चलिए अब देखते हैं पुष्य नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों को जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पुष्य को एक पुरुष नक्षत्र माना जाता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र पर बृहस्पति का प्रबल प्रभाव मानते हैं हालांकि पुष्य नक्षत्र के माध्यम से पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के स्वभाव में पायीं जाने वालीं अधिक विशेषताएं प्रदर्शित होतीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पुष्य नक्षत्र को क्षत्रिय वर्ण प्रदान किया जाता है जिसका कारण कुछ वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का सेवा से संबंधित गुण मानते हैं। वैदिक ज्योतिष में पुष्य नक्षत्र को तामसिक गुण प्रदान किया जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र का शनि ग्रह के साथ संबंध माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पुष्य नक्षत्र को गण से देव माना जाता है तथा पुष्य नक्षत्र के इस गण निर्धारण को इस नक्षत्र की कार्यप्रणाली को देखते हुए आसानी से समझा जा सकता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पुष्य नक्षत्र को पंच तत्वों में से जल तत्व के साथ जोड़ा जाता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी