पुनर्वसु

Important Yogas in Vedic Astrology
Book Your Consultation at AstrologerPanditji.com
Buy This Book in India!
Buy This Book in USA!
Buy This Book in UK and Europe!

हमारा टी वी कार्यक्रम कर्म कुण्डली और ज्योतिष YouTube पर देखने के लिए यहां क्लिक कीजिए

Click Here for English Version 

                             वैदिक ज्योतिष में शुभ माने जाने वाले नक्षत्रों में पुनर्वसु नक्षत्र को भी स्थान दिया जाता है तथा वैदिक ज्योतिष की गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से पुनर्वसु को सातवां नक्षत्र माना जाता है। पुनर्वसु शब्द का अर्थ जानने के लिए सबसे पहले हमें वसु शब्द के अर्थ को समझना होगा। वसुओं को उप देवताओं के समान माना जाता है तथा वसु अपने आप में शुभता, उदारता, धन तथा सौभाग्य जैसी विशेषताओं के स्वामी होते है। पुनर्वसु का शाब्दिक अर्थ है पुन: वसु हो जाना अर्थात फिर से वसु हो जाना जिसका मतलब है फिर से धनी, सौभाग्यशाली तथा सुरक्षित हो जाना। पुनर्वसु के इस अर्थ को समझने के लिए इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि पुनर्वसु आर्द्रा नक्षत्र के बाद आता है तथा आर्द्रा नक्षत्र अपने आप में धन के प्रति अनिच्छा अथवा धन की कमी, उग्र स्वभाव अर्थात उदारता की कमी आदि विशेषताओं को प्रदर्शित करता है जिसके चलते आर्द्रा नक्षत्र के प्रभाव से धन की कमी, उदारता की कमी, सौभाग्य की कमी तथा सुरक्षा की कमी भी हो जाती है तथा इसी कमी को पूरा करने के लिए पुनर्वसु नक्षत्र का आगमन होता है जो इसके नाम के अर्थ को सार्थक करता है। पुनर्वसु नक्षत्र का आगमन सौभाग्य का सूचक माना जाता है तथा इस प्रकार पुनर्वसु शब्द का अर्थ पुन: सौभाग्यशाली हो जाना सार्थक हो जाता है।

                                वैदिक ज्योतिष के अनुसार बाण को अथवा बाणों से भरे हुए एक तरकश को पुनर्वसु नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। बाण के इस प्रतीक के साथ भी विभिन्न वैदिक ज्योतिषी भिन्न भिन्न प्रकार के अर्थ जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि जिस प्रकार बाण का काम अपने लक्ष्य को भेदना होता है उसी प्रकार पुनर्वसु नक्षत्र अपने प्रभाव में आने वाले जातक के सौभाग्य को सुनिश्चित करता है। कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी मानते हैं कि बाण का चलना धनुषधारी की किसी प्रकार के लक्ष्य को प्राप्त करने की इच्छा को भी दर्शाता है जबकि कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी बाण के चलने को समय के चलने की गति तथा किसी न किसी प्रकार की यात्रा के साथ भी जोड़ते हैं तथा इसी के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र इन सभी विशेताओं का भी चित्रण करता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि पुनर्वसु नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रुप में प्रयोग होने वाला बाणों का तरकश कोई साधारण तरकश न होकर दिव्य बाणों का एक तरकश है तथा इस तरकश का प्रत्येक बाण लक्ष्य भेद कर सदा अपने तरकश में ही वापिस आ जाता हैं। इस प्रकार के दिव्य बाणों के तरकश को सुरक्षा के साथ भी जोड़ा जाता है तथा यह माना जाता है कि जिस प्रकार दिव्य बाणों से भरे तरकश को धारण करने वाला धनुषधारी सुरक्षित रहता है उसी प्रकार पुनर्वसु नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाला जातक भी जीवन भर किसी बड़ी विपत्ति से सुरक्षित ही रहता है तथा किसी विपत्ति में फंस जाने पर इस नक्षत्र के दिव्य प्रभाव से जातक शीघ्र ही उस विपत्ति से छुटकारा प्राप्त करने में सफल हो जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी घर को भी पुनर्वसु नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में प्रयोग करते हैं तथा घर का यह प्रतीक चिन्ह फिर से इस नक्षत्र के साथ जुड़े हुए सुरक्षा के पक्ष को दर्शाता है क्योंकि घर को सामान्य तौर पर सुरक्षा तथा आराम से जोड़ा जाता है।

                          वैदिक ज्योतिष के अनुसार अदिति को पुनर्वसु नक्षत्र की स्वामिनी देवी माना जाता है। अदिति बारह आदित्यों की माता के रूप में जानी जातीं हैं तथा अदिति को एक उदार तथा साधन संपन्न देवी के रूप में चित्रित किया जाता है तथा देवी अदिति का पुनर्वसु नक्षत्र पर पड़ने वाला प्रभाव इस नक्षत्र में भी साधन संपन्नता तथा उदारता लेकर आता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार बृहस्पति को पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी ग्रह माना जाता है। बृहस्पति को वैदिक ज्योतिष में समृद्धि, शिष्टाचार, सद भावना तथा जन कल्याण की भावना रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है तथा बृहस्पति के चरित्र की ये विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होती हैं जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक समृद्ध, शिष्ट तथा परोपकारी प्रवृति के ही देखे जाते हैं। पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम तीन चरण मिथुन राशि में स्थित होते हैं तथा इस नक्षत्र का चौथा एवम अंतिम चरण कर्क राशि में स्थित होता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर मिथुन राशि तथा इसके स्वामी ग्रह बुध और कर्क राशि तथा इसके स्वामी ग्रह चन्द्रमा का भी प्रभाव पड़ता है। बुध के प्रभाव से इस नक्षत्र को गतिशीलता, व्यापार की समझ तथा वाक कुशलता जैसे गुण प्राप्त होते हैं जबकि चन्द्रमा का इस नक्षत्र पर प्रभाव मातृत्व तथा सदभावना जैसे गुणों को इस नक्षत्र में सम्मिलित करता है।

                        किसी कुंडली में पुनर्वसु नक्षत्र का प्रबल तथा सकारात्मक प्रभाव होने पर जातक प्रसन्न रहने वाला, समाज के नियमों को मानने वाले तथा समाज के विकास में योगदान देने वाला, दूसरों के कल्याण की कामना करने वाला तथा उनके कल्याण के लिए प्रयास करने वाला, नैतिक तथा आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने वाला होता है। पुनर्वसु के जातकों में नैतिकता की भावना बहुत प्रबल होती है तथा ऐसे जातक अच्छे-बुरे में भेद करने की कला में भी निपुण होते हैं तथा अपने चरित्र की इन विशेषताओं के कारण आम तौर पर इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक कोई अवैध, असामाजिक अथवा अनैतिक कार्य करना पसंद नहीं करते तथा नीति एवम धर्म के मार्ग पर चलना ही पसंद करते हैं। पुनर्वसु के जातक आशावादी होते हैं तथा इनकी तर्क करने की क्षमता भी प्रबल होती है तथा अपने चरित्र की इन विशेषताओं के चलते ये जातक अपने जीवन में निराशा को कोई स्थान नहीं देते एवम सदा आशावादी होकर और भले बुरे में अंतर समझ कर नैतिकता से ही व्यवहार करते हैं। पुनर्वसु के जातकों की कल्पना शक्ति विकसित होती है तथा ऐसे जातकों की रचनात्मक शक्ति भी प्रबल होती है जिसके कारण ऐसे जातक उन क्षेत्रों में अच्छी उन्नति करते हैं जिनमें रचनात्मकता तथा कल्पना शक्ति की आवश्यकता होती है। पुनर्वसु नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक सहनशील तथा मित्रवत होते हैं तथा अपने संपर्क में आने वाले लोगों के प्रति इनका व्यवहार शिष्ट, नैतिक तथा मित्रवत होता है जिसके कारण पुनर्वसु जातकों को अन्य सभी नक्षत्रों के प्रभाव में आने वाले जातकों की तुलना में संगति करने के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है तथा इनके पास बैठते ही अनजान लोग भी शीघ्र ही अपने आप को सहज तथा सुरक्षित पाना शुरु कर देते हैं।

                        भारतीय ज्योतिष के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र को सच्चाई, क्षमापरायणता तथा सादगी के साथ जोड़ा जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातकों के चरित्र में भी ये विशेषताएं देखने को मिलतीं हैं। पुनर्वसु के जातक संतोषी स्वभाव के होते हैं तथा ऐसे जातक जीवन में उन वस्तुओं के पीछे भागने में रुचि नहीं दिखाते जो इनके सहज प्रयास के बाद भी इन्हें प्राप्त नहीं होतीं अपितु ये जातक उन वस्तुओं तथा भोगों से ही संतुष्ट रहते हैं जो इन्हें प्राप्त होते हैं। यहां पर इस रोचक तथ्य को जान लेना भी आवश्यक है कि सादा, सरल तथा संतोषी जीवन जीने की इच्छा रखने के बावजूद भी बहुत से पुनर्वसु जातक बहुत समृद्ध तथा साधन संपन्न होते हैं जो कि इस नक्षत्र पर विभिन्न कल्याणकारी शक्तियों के प्रभाव के कारण होता है। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि पुनर्वसु नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने जीवन काल में किसी भी बड़ी विपत्ति में या तो फंसते ही नहीं हैं या फिर शीघ्र ही उससे निकल कर पुन: सुरक्षित, प्रसन्न तथा समृद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इस नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक की समृद्धि, प्रसन्नता तथा सुरक्षा के लिए बहुत अच्छे परिणाम देता है। पुनर्वसु नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों को आम तौर पर अपनी आजीविका कमाने के लिए बहुत कठिन परिश्रम वाले कार्य नहीं करने पड़ते तथा इसके विपरीत ऐसे जातक उन व्यवासिक क्षेत्रों में ही जाते हैं जिनमें शारीरिक श्रम अधिक न करना पड़ता हो जैसे कि दफ्तरों में बैठ कर करने वाले काम।

                        आइए अब लेख के अंत में पुनर्वसु नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में विचार करते हैं जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पुनर्वसु को पुरुष नक्षत्र माना जाता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र के उपर वसुओं के प्रबल प्रभाव को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष पुनर्वसु नक्षत्र को वैश्य वर्ण प्रदान करता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र पर मिथुन राशि तथा बुध ग्रह का प्रभाव मानते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र के जातकों में कुशल व्यापारी होने के गुण आ जाते हैं तथा व्यापार को प्राचीन काल से ही वैश्य जाति की विशेषता माना जाता है। वैदिक ज्योतिष में पुनर्वसु को देव गण प्रदान किया जाता है तथा इस नक्षत्र के स्वभाव और आचरण को देखने के बाद इस गण निर्धारण को समझना आसान कार्य है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र को गुण से सात्विक माना जाता है तथा इस नक्षत्र के गण निर्धारण की तरह ही गुण निर्धारण को भी इस नक्षत्र के आचरण के चलते आसानी से समझा जा सकता है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से इस नक्षत्र के साथ जल तत्व को जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी