मृगशिरा

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                              वैदिक ज्योतिष के आधार पर कुंडली से की जाने वाले गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से मृगशिरा नक्षत्र को पांचवां नक्षत्र माना जाता है। मृगशिरा का शाब्दिक अर्थ है मृग का शिर अर्थात हिरण का सिर तथा इस अर्थ के चलते मृगशिरा नक्षत्र हिरण के चरित्र की कई विशेषताओं को दर्शाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मृगशिरा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह भी हिरण को अथवा हिरण के सिर को ही माना जाता है तथा अपने नाम और प्रतीक चिन्ह के चलते मृगशिरा नक्षत्र अपने माध्यम से हिरण के चरित्र तथा स्वभाव की बहुत सी विशेषताएं प्रदर्शित करता है। हिरण स्वभाव से चंचल, कोमल, मृदु, सौम्य, कल्पनाशील तथा भ्रमण प्रिय जीव है तथा हिरण के स्वभाव की ये विशेषताएं मृगशिरा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। प्राचीन समय से ही हिरण को एक सुंदर जीव माना जाता है तथा हिरण के साथ जुड़े बहुत से प्रसंग वैदिक ग्रंथों में मिलते हैं। राजमहल की सुंदरता को बढ़ाने से लेकर ॠषियों के आश्रम तक, प्रत्येक स्थान पर हिरण की उपस्थिति मिल जाती है। हिरण स्वभाव से रमणीय जीव है तथा इसी के अनुसार मृगशिरा नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक भी रमण करने की कला में कुशल पाये जाते हैं। हिरण को एक खोजी प्रवृति का जीव भी माना जाता है जो अपनी इस प्रवृति के चलते यहां से वहां भ्रमण करता रहता है तथा इसी के अनुसार मृगशिरा नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक भी खोजी स्वभाव के पाये जाते हैं तथा ये जातक अपनी कुंडली के बाकी तथ्यों के अनुसार भौतिक सुखों अथवा आत्मिक शांति की खोज में लगे रहते हैं।

                               वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा को मृगशिरा नक्षत्र का अधिपति माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर चन्द्रमा का भी प्रबल प्रभाव रहता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि चन्द्रमा का मृगशिरा से पूर्व आने वाले नक्षत्र रोहिणी के साथ भी गहरा संबंध है क्योंकि चन्द्रमा रोहिणी के अधिपति ग्रह हैं जबकि मृगशिरा के अधिपति देवता। इस प्रकार ये दोनों ही नक्षत्र चन्द्रमा के प्रभाव में आते हैं किन्तु यह एक रोचक तथा महत्वपूर्ण तथ्य है कि चन्द्रमा इन दोनों नक्षत्रों के माध्यम से अपने चरित्र की भिन्न-भिन्न विशेषताएं प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए रोहिणी नक्षत्र के माध्यम से चन्द्रमा अपने मातृत्व, उदारता, मनोहरता तथा समृद्धि प्रदान करने की शक्ति जैसे गुणों का प्रदर्शन करते हैं जबकि मृगशिरा नक्षत्र के माध्यम से चन्द्रमा अपने चंचल स्वभाव, भ्रमण करते रहने की प्रवृति, तथा अपनी रमण करने की प्रवृति को प्रदर्शित करते हैं जिसके कारण इन दोनों नक्षत्रों के स्वभाव तथा आचरण में बहुत अंतर हो जाता है।

                             वैदिक ज्योतिष में मृगशिरा नक्षत्र का अधिपति ग्रह मंगल को माना जाता है। मंगल ग्रह वैदिक ज्योतिष में अपने आग्नेय स्वभाव के लिए जाने जाते हैं तथा मंगल ग्रह की यही अग्नि मृगशिरा की खोजी प्रवृति को जारी रखने की उर्जा प्रदान करती है। मंगल का इस नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को तर्क, विवाद तथा मतभेद पैदा करने जैसी विशेषताएं भी प्रदान करता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष में मंगल ग्रह को तर्क, विवाद तथा मतभेदों के साथ जोड़ा जाता है। मृगशिरा नक्षत्र के पहले दो चरण वृषभ राशि में स्थित होते हैं जबकि इस नक्षत्र के शेष दो चरण मिथुन राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर वृषि राशि तथा इसके स्वामी ग्रह शुक्र एवम मिथुन राशि तथा इसके स्वामी ग्रह बुध का प्रभाव भी रहता है। मृगशिरा नक्षत्र के वृषभ राशि तथा शुक्र ग्रह के प्रभाव में आने वाले पहले दो चरणों के माध्यम से यह नक्षत्र सुंदरता, व्यवहार कुशलता, सामाजिकता, रमणीयता तथा रचनात्मकता जैसे गुणों को प्रदर्शित करता है जबकि मिथुन राशि तथा बुध ग्रह के प्रभाव में आने वाले अपने दो चरणों के माध्यम से यह नक्षत्र व्यवहारिकता, बुद्धिमता, हास्य विनोद तथा गणनात्मक स्वभाव जैसे गुणों को प्रदर्शित करता है।

                       मृगशिरा नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक सामान्य तौर पर सुंदर तथा विनोदी स्वभाव के होते हैं। इस नक्षत्र के शुक्र के प्रभाव में जन्मे जातक सामाजिक व्यवाहार में कुशल होते हैं तथा इनका सामाजिक दायरा बड़ा होता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष के अनुसार शुक्र ग्रह को सामाजिक व्यवहार कुशलता से जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है। मृगशिरा जातकों का वाक कौशल भी अच्छा होता है तथा ये जातक अपनी बात को सामने वाले तक पहुंचाने में सक्षम होते हैं क्योंकि इस नक्षत्र पर प्रभाव डालने वाले दो ग्रह बुध और शुक्र वैदिक ज्योतिष के अनुसार बातचीत करने की कला में निपुण माने जाते हैं। किन्तु मंगल ग्रह के इस नक्षत्र पर प्रभाव के कारण मृगशिरा के जातकों में कई बार विवाद तथा अनावश्यक तर्क करने की प्रवृति भी पायी जाती है तथा यह प्रवृति विशेषतया उन जातकों में अधिक पायी जाती है जिनकी कुंडली में मंगल ग्रह का प्रभाव शुक्र तथा बुध ग्रह के प्रभाव की अपेक्षा बहुत अधिक हो। मृगशिरा के प्रभाव में आने वाले जातक आम तौर पर शर्मीले तथा संकोची स्वभाव के होते हैं जिसके कारण ऐसे जातक अपने संपर्क में आने वाले लोगों के साथ खुलने में समय लेते हैं तथा किसी रिश्ते के आरंभ में ऐसे जातक एक निश्चित दूरी बनाए रखना ही पसंद करते हैं। किन्तु इनका यह संकोच सामान्य तौर पर समय के साथ साथ कम होता जाता है तथा इसके पश्चात मृगशिरा के जातक खुल कर अपने संबंधों में योगदान देते हैं। मृगशिरा के जातक जीवन के हर क्षेत्र तथा रुप से जुड़ी सुंदरता को पसंद करते हैं तथा इन जातकों की संगीत, गायन, कविता लेखना तथा ऐसे ही अन्य कार्यों में विशेष रुचि होती है।

                     मृगशिरा के प्रबल प्रभाव के जातकों में खोज करने की तथा भ्रमण करने की प्रवृति बहुत अधिक होती है जिसके चलते ये जातक अपने जीवनकाल में बहुत यात्राएं करते हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं मृगशिरा नक्षत्र पर मंगल ग्रह के प्रभाव के कारण इस ग्रह के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक शंकालु स्वभाव के होते हैं तथा ऐसे जातक अपने आस पास के लोगों तथा कई बार तो अपनी सबसे निकट संबंधों वाले लोगों को भी शंका की दृष्टि से देखते हैं। अपने चरित्र की इस विशेषता के कारण इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले बहुत से जातकों का वैवाहिक जीवन भी विपरीत रूप से प्रभावित होता है क्योंकि मृगशिरा के जातक बहुत बार अपने जीवन साथी से ऐसे प्रश्न पूछ्ते हैं जिनके पीछे छिपा हुआ उनका शक सपष्ट रूप से झलकता है। सामान्यतया ऐसे जातक अपने जीवन साथी पर विश्वास नहीं करते तथा इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले बहुत से जातकों को यह शंका लगी रहती है कि उनका जीवन साथी उन्हें किसी न किसी प्रकार से धोखा दे रहा है जिसके चलते ऐसे जातक अपने जीवन साथी से समय समय पर वाद विवाद भी करते रहते हैं। मृगशिरा के जातकों का यह शंकालु स्वभाव कई बार इनकी जीवन साथी को बहुत विचलित कर देता है जिसके कारण कई बार ऐसे जातकों के जीवन साथी इनसे सदा के लिए संबंध विच्छेद भी कर लेते हैं अथवा कई बार तो मृगशिरा के जातक स्वयम ही किसी निर्मूल शंका के चलते अपने जीवन साथी पर कोई लांछन लगा कर उससे संबंध विच्छेद कर लेते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि मृगशिरा जातकों के मन में अपने जीवन साथी अथवा प्रेमी को लेकर पैदा होनी वाली शंकाएं अधिकतर मामलों में निर्मूल ही साबित होती हैं तथा इनका कोई ठोस आधार नहीं होता।

                     मृगशिरा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों के बारे में एक रोचक तथ्य यह भी है कि एक ओर तो ऐसे जातक अपनी प्रेमी अथवा जीवन साथी की निष्ठा को लेकर अधिकतर शंका से ही घिरे रहते हैं, वहीं पर दूसरी ओर इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कई जातक अपने साथी के प्रति निष्ठावान नहीं होते तथा इनके अपने स्थायी साथियों के अतिरिक्त अन्य लोगों के साथ भी समय समय पर प्रेम संबंध बनते रहते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी मृगशिरा जातकों के चरित्र की इस विशेषता का कारण इस नक्षत्र पर चन्द्रमा का प्रभाव मानते हैं क्योंकि वैदिक ग्रंथों के अनुसार चन्द्रमा को चंचल मन वाला एक ग्रह तथा देवता माना जाता है जिनके अपनी इस चंचल प्रवृति तथा रोमानी स्वभाव के चलते कई स्त्रियों के साथ प्रेम संबंध बने थे। व्यवहारिकता में यह अनुभव किया गया है कि मृगशिरा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले वे जातक अधिक प्रेम संबंध बनाने में विश्वास रखते हैं जिनकी जन्म कुंडली में चन्द्रमा का बल तथा प्रभाव बहुत अधिक हो। किसी कुंडली में चन्द्रमा के नकारात्मक तथा बलवान होने की स्थिति में इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक आसानी से अपने स्थायी साथी को किसी और साथी के लिए धोखा दे सकते हैं तथा ऐसे जातकों में एक से अधिक स्त्रियों अथवा पुरुषों के साथ रमण करने की प्रवृति प्रबल देखी जाती है। अपने स्थायी साथी के प्रति निष्ठावान न होने की स्थिति में भी ऐसे जातक अपने साथी की निष्ठा पर शंका ही करते रहते हैं जो कि इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातकों के लिए एक विडम्बना ही कही जा सकती है।

                             आइए अब देखें इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों को जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की प्रणाली में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मृगशिरा नक्षत्र को उभयलिंग अथवा नपुंसक लिग प्रदान किया जाता है जिसका कारण कई वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र के द्वारा प्रदर्शित दोहरे स्वभाव को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष मृगशिरा नक्षत्र को एक मृदु नक्षत्र मानता है जिसका कारण इस नक्षत्र पर हिरण के प्रबल प्रभाव को माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मृगशिरा को वर्ण से शूद्र तथा गुण से तामसिक माना जाता है तथा मृगशिरा नक्षत्र के इस वर्ण तथा गुण निर्धारण का कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र के स्वभाव को ही मानते हैं। वैदिक ज्योतिष में मृगशिरा नक्षत्र को देव गण प्रदान किया जाता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र पर चन्द्रमा का प्रबल प्रभाव मानते हैं। वैदिक ज्योतिष मृगशिरा नक्षत्र को पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी