रोहिणी

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                              भारतीय वैदिक ज्योतिष में रोहिणी को एक उदार, मधुर, मनमोहक तथा शुभ नक्षत्र माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में रोहिणी को चौथा स्थान दिया जाता है। रोहिणी का शाब्दिक अर्थ जानने के लिए हमें इस शब्द के मूल से इसका अर्थ समझना होगा। रोह शब्द का अर्थ है विकास अथवा उन्नति करना तथा रोहण शब्द का अर्थ है किसी प्रकार की सवारी करना अथवा सवारी करने वाला और इसी के अनुसार रोहिणी शब्द का अर्थ बनता है सवारी करने वाली। रोहिणी के मूल शब्द रोह के अर्थ को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह सवारी करने वाली स्त्री उन्नति तथा विकास की सूचक है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार दो बैलों के द्वारा खींची जाने वाली बैलगाड़ी को रोहिणी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। प्राचीन समयों में बैल को कृषि तथा व्यापार से संबंधित बहुत से क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता था तथा बैलगाड़ियों का प्रयोग पक चुकी खेती को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए तथा व्यापार से जुड़ी अन्य वस्तुओं को भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए किया जाता था जिसके कारण बैल तथा बैलगाड़ी प्राचीन काल की कृषि व्यवस्था तथा व्यापार व्यवस्था के स्तंभ माने जाते थे। रोहिणी नक्षत्र के सभी चार चरण वृषभ राशि में स्थित होते हैं तथा वैदिक ज्योतिष में वृषभ राशि को कृषि उत्पादन, पशु पालन तथा व्यापार से जुड़ी एक राशि माना जाता है। वृषभ शब्द का अर्थ ही बैल होता है तथा इसी के अनुसार वृषभ राशि का प्रतीक चिन्ह भी वैदिक ज्योतिष के अनुसार बैल को ही माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार वृषभ राशि का स्वामी शुक्र को माना जाता है तथा शुक्र ग्रह को भी वैदिक ज्योतिष के अनुसार कृषि, सुंदरता, रचनात्मकता तथा व्यापार के साथ जुड़ा हुआ एक ग्रह माना जाता है।

                        इन सभी तथ्यों के कारण रोहिणी नक्षत्र पर बैल के गुणों का बहुत प्रभाव रहता है जिसके चलते इस नक्षत्र में बैल के सहज गुण जैसे कि परिश्रम करना, सहज स्वभाव का होना, दृढ़ इच्छा शक्ति का स्वामी होना तथा अन्य कई गुण भी पाए जाते हैं। बैलगाड़ी का प्रभाव होने के कारण रोहिणी नक्षत्र को व्यापार, कृषि उत्पादन, पशु पालन तथा अन्य ऐसी विशेषताओं के साथ भी जोड़ा जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि बैलगाड़ी का चलना समय के पहिये का चलना भी माना जा सकता है तथा यहां इस पहिये के चलने का अर्थ विकास, उन्नति तथा सृजन से भी लिया जाता है जिसके कारण वैदिक ज्योतिष में रोहिणी को सृजन, विकास तथा उन्नति के साथ भी जोड़ा जाता है। शुक्र ग्रह का प्रभाव इस नक्षत्र में रचनात्मकता, सुंदरता तथा सृजन करने की शक्ति पैदा कर देता है जिसके कारण इस नक्षत्र में इन विशेषताओं की प्रबलता बढ़ जाती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार त्रिदेवों में सृष्टि के जनक तथा रचियता भगवान ब्रह्मा जी को रोहिणी नक्षत्र के अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर ब्रह्मा जी का भी प्रबल प्रभाव रहता है। ब्रहमा जी के प्रभाव में आने के कारण रोहिणी नक्षत्र में सृजन करने की प्रबल शक्ति आ जाती है तथा यह नक्षत्र वैदिक ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक प्रकार के सृजन, उत्पादन, निर्माण तथ विकास को प्रोत्साहित करता है। रोहिणी नक्षत्र से जुड़ी अपार सुंदरता के विषय में जानने के लिए यहां पर भारतीय मिथिहास के एक प्रसंग की चर्चा करते हैं।

                                  रोहिणी को भारतीय मिथिहास के अनुसार एक नक्षत्र कन्या माना जाता है तथा इसे ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी माना जाता है। कहा जाता है कि रोहिणी इतनी सुंदर थी कि इसे जन्म देने के पश्चात एक बार तो इसके जनक ब्रह्मा जी भी इसके उपर आसक्त होकर इसे पाने की कामना कर बैठे थे तथा बाद में भगवान शिव के हस्ताक्षेप के बाद ब्रहमा जी को रोहिणी के जन्म का मूल प्रयोजन याद आया था। रोहिणी आदि सताइस नक्षत्र कन्याओं को ब्रह्मा जी के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष की कन्याएं माना जाता है जिनका विवाह चन्द्र देव के साथ हुआ था तथा निश्चित नियम के अनुसार चन्द्रमा को अपनी प्रत्येक पत्नि के साथ बारी बारी से एक एक दिन बिताना था किन्तु रोहिणी के रुप का सौंद्रय इतना मोहक था कि एक बार रोहिणी के पास जाने के पश्चात चन्द्रमा ने शेष किसी भी नक्षत्र कन्या के साथ समय बिताने से मना कर दिया था। इसके कारण विकट स्थिति पैदा हो गई थी क्योंकि सृष्टि के नियम के अनुसार चन्द्रमा को प्रत्येक नक्षत्र के साथ एक निश्चित समय के लिए रहना था। बाद में त्रिदेवों के हस्ताक्षेप से चन्द्रमा को शेष सभी नक्षत्र कन्याओं के साथ भी समय व्यतीत करने के लिये मनाया गया किन्तु यह सर्वविदित है कि चन्द्रमा की सभी पत्नियों में से रोहिणी ही उन्हें सबसे अधिक प्रिय है। इस प्रकार रोहिणी नक्षत्र को वैदिक ज्योतिष में सुंदरता, वैवाहिक सुख तथा सुखी दाम्पत्य जीवन के साथ भी जोड़ा जाता है।

                         वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा को रोहिणी का स्वामी ग्रह माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि रोहिणी चन्द्रमा की सबसे प्रिय पत्नि होने के कारण चन्द्रमा अपने चरित्र के सर्वश्रेष्ठ गुणों की अभिवयक्ति इस नक्षत्र के माध्यम से करते हैं जिसके कारण रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा के सहज गुण जैसे कि मातृत्व का गुण, सब प्राणियों को शीतलता प्रदान करने का गुण, सभी का कल्याण चाहने का गुण तथा ऐसे ही कई अन्य गुण भी पाए जाते हैं। रोहिणी नक्षत्र के प्रति चन्द्रमा का अगाढ़ प्रेम इस तथ्य से भी विदित होता है कि कुंडली में पायी जाने वाली सभी राशियों तथा सभी नक्षत्रों में से चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र में स्थित होकर ही अपने सर्वोच्च बल को प्राप्त करते हैं जिसके चलते रोहिणी में स्थित चन्द्रमा को वैदिक ज्योतिष में उच्च का चन्द्रमा भी कहा जाता है। कुंडली में रोहिणी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को अति सुंदर, आकर्षक तथा मनमोहक बना देता है तथा इनकी सुंदरता की मोहिनी के प्रभाव से बच पाना सामान्यतया किसी के लिए भी बहुत कठिन होता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण की जन्म कुंडली में लग्न तथा चन्द्रमा पर रोहिणी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव था जिसके कारण भगवान श्री कृष्ण की मोहिनी विश्व विख्यात है तथा उनकी मोहिनी के आकर्षण में मनुष्य तो क्या, पशु पक्षी भी बंध जाते थे। रोहिणी के जातकों में विपरीत लिंग को आकर्षित करने की प्रबल क्षमता होती है तथा सामान्य तौर पर रोहिणी के अधिकतर जातक अपनी इस क्षमता को भली भांति समझते भी हैं तथा इनमे से बहुत से जातक अपनी इस क्षमता का प्रयोग अपने कई प्रकार के कार्य सिद्ध करने के लिए भी करते हैं।

                                 रोहिणी के जातक सामान्यतया व्यवहार तथा वाणी से भी बहुत कुशल होते हैं तथा इन्हें लगभग किसी भी स्थिति को अपने अनुकूल बना लेने की कला आती है। अपनी व्यवहार कुशलता के चलते रोहिणी के जातक समाज में आदरणीय स्थान भी प्राप्त करते हैं तथा विकास एवम उन्नति की ओर अग्रसर रहते हैं। रोहिणी के जातकों में कृषि उत्पादन, रचनात्मक कार्यों तथा व्यापार की समझ भी बहुत अच्छी होती है जिसके चलते बहुत से रोहिणी जातक इन क्षेत्रों में सफल देखे जाते हैं। रोहिणी के जातक ऐसे बहुत से कार्यक्षेत्रों में भी सफल देखे जाते हैं जिनमें सफलता प्राप्त करने के लिए शारीरिक सुंदरता, आकर्षक व्यक्तित्व तथा मोहक अंदाज़ का होना आवश्यक होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक कई प्रकार के व्यवसायिक क्षेत्रों में कार्यशील देखे जाते हैं जैसे कि कृषि उद्योग से जुड़े लोग, पशु पालन से जुड़े लोग, फैशन जगत से जुड़े लोग, सिनेमा जगत से जुड़े लोग तथा विशेषतया अपनी सुंदरता के बल पर दर्शकों को आकर्षित करने वाले अभिनेता तथा अभिनेत्रियां, मनोरंजन जगत से जुड़े लोग, सौंदर्य प्रसाधनों के उद्योग में कार्यशील लोग, फल तथा सब्जियों के व्यापार में कार्यशील लोग तथा बहुत से अन्य व्यवासायिक क्षेत्रों में कार्यशील लोग।

                       आइए अब अंत मे देखते हैं रोहिणी नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों को जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी नक्षत्र को एक स्त्री नक्षत्र माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी रोहिणी नक्षत्र के इस लिंग निर्धारण को इस नक्षत्र पर चन्द्रमा तथा शुक्र जैसे स्त्री ग्रहों के प्रभाव के साथ जोड़कर देखते हैं । यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि रोहिणी नक्षत्र द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली बहुत सी विशेषताएं जैसे कि रचनात्मकता, मातृत्व, सृजन करने की शक्ति तथा सुंदरता को भी वैदिक ज्योतिष के अनुसार पुरुषों से कहीं अधिक स्त्रियों के साथ ही जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी को एक संतुलित नक्षत्र माना जाता है तथा इस नक्षत्र की कार्यशैली को देखते हुए इस निर्धारण को समझना आसान है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी को एक स्थिर अथवा ध्रुव नक्षत्र माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी इसका कारण रोहिणी नक्षत्र पर बैल का प्रबल प्रभाव मानते हैं क्योंकि बैल स्वभाव से बहुत स्थिर होता है तथा अपने कार्य को निरंतर करता रहता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है तथा इतने शुभ तथा कल्याणकारी माने जाने वाले इस नक्षत्र के इस वर्ण निर्धारण के पीछे छिपा कोई ठोस कारण अभी तक वैदिक ज्योतिषी ढ़ूंढ़ नहीं पाए हैं। वैदिक ज्योतिष मे रोहिणी को गण से मानव माना जाता है तथा गुण से इस नक्षत्र को राजसिक माना जाता है तथा अधिकतर वैदिक ज्योतिषी रोहिणी नक्षत्र के इस गुण तथा गण निर्धारण का कारण इस नक्षत्र का पदार्थवाद तथा सृजन से जुड़ा होने को मानते हैं क्योंकि ये दोनों ही विशेषताएं मानवीय तथा राजसिक हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी नक्षत्र को पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व के साथ जोड़ा जाता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी