कुंडली मिलान तथा अशुभ ग्रह

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हालांकि भारतवर्ष में अभी भी बहुत से ज्योतिषि कुंडली मिलान के लिए केवल गुण मिलान की विधि ही प्रयोग करते हैं तथा नाड़ी दोष और भकूट दोष को ही वैवाहिक जीवन के लिए सबसे बड़े दोष मानते हैं, किन्तु समय के साथ-साथ अब कई ज्योतिषि कुंडली मिलान के लिए गुण मिलान अथवा मांगलिक दोष के अतिरिक्त और भी तथ्यों का अध्ययन करने लगे हैं क्योंकि अब कई ज्योतिषि इस बात को मानने लगे हैं कि वैवाहिक जीवन के बारे में बताने के लिए कुंडली मिलान करते समय केवल गुण मिलान तथा मांगलिक दोष का विचार करने से ही वैवाहिक जीवन की सही स्थिति का पता नहीं चल पाता तथा कुंडली मिलान के लिए प्रस्तुत दोनों कुंडलियों में सभी के सभी नवग्रहों की स्थिति का अध्ययन करना भी आवश्यक है। इसी कारण अब कई वैदिक ज्योतिषि कुंडली मिलान के समय दोनों कुंडलियों में सभी शुभ-अशुभ ग्रहों की स्थिति देखते हैं तथा उसके पश्चात ही कुंडलियों का मिलान तय करते हैं। हालांकि कुंडली मिलान के लिए सभी नवग्रहों के दोनों कुंडलियों में शुभ-अशुभ प्रभाव देखने का यह मत केवल गुण मिलान करने की तुलना में कहीं अधिक व्यवहारिक है किन्तु इस मत के चलते भी विभिन्न प्रकार की ज्योतिष धारणाओं में विश्वास रखने वाले ज्योतिषि नवग्रहों के किसी कुंडली विशेष में शुभ-अशुभ प्रभाव का निश्चय अलग-अलग तरीकों से करते हैं जिसके कारण कुंडली मिलान में नवग्रहों के शुभ-अशुभ प्रभाव को लेकर भी कुछ भ्रांतियों ने जन्म ले लिया है तथा इस लेख में हम इन्हीं में से कुछ भ्रांतियों के बारे में चर्चा करेंगे।

                                   वैदिक ज्योतिष में कार्यशील बहुत से ज्योतिषियों का यह मानना है कि वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वभाविक रूप से बुरे अथवा क्रूर माने जाने वाले ग्रहों के किसी कुंडली के विवाह तथा वैवाहिक जीवन को दर्शाने वाले घरों में स्थित होने पर जातक का वैवाहिक जीवन विभिन्न प्रकार की समस्याओं से घिर जाता है। उदाहरण के लिए वैदिक ज्योतिष में स्वभाविक रुप से बुरे तथा क्रूर माने जाने वाले शनि, मंगल, राहु तथा केतु का किसी कुंडली के विवाह सुख से संबंधित घरों में स्थित हो जाना बहुत से ज्योतिषियों के मत के अनुसार जातक के वैवाहिक सुख को खराब कर देता है तथा ऐसा जातक अपने विवाह तथा वैवाहिक जीवन से संबंधित कई प्रकार की विपत्तियों का सामना करता है। ज्योतिषियों के इस वर्ग के मतानुसार शनि, मंगल, राहु तथा केतु में से किसी एक अथवा दो का किसी कुंडली के सातवें या आठवें घर में स्थित हो जाना जातक के वैवाहिक सुख के लिए बहुत बुरा होता है जिसके कारण जातक का विवाह बहुत देर से हो सकता है अथवा नहीं भी हो सकता अथवा जातक के वैवाहिक जीवन में बहुत परेशानियां आ सकतीं हैं तथा तलाक, अलगाव अथवा वैध्वय जैसीं समस्याओं का भी जातक को सामना करना पड़ सकता है। 

                                 मेरे ज्योतिष के अनुभव के अनुसार ज्योतिषियों के इस वर्ग का उपर वर्णित मत एक भ्रांति या गलत धारणा ही है तथा इसमें कोई विशेष सार नहीं है। शनि, मंगल, राहु अथवा केतु का कुंडली के वैवाहिक सुखों को दर्शाने वाले घरों में बैठ जाना हर किसी के लिए अशुभ नहीं होता तथा इन ग्रहों का जातक के वैवाहिक जीवन पर अच्छा या बुरा प्रभाव प्रत्येक कुंडली में अलग होगा जो कि इन ग्रहों के उस कुंडली में काम करने के तरीके पर निर्भर करेगा। उदाहरण के तौर पर शनि अगर किसी कुंडली के वैवाहिक सुख दर्शाने वाले घरों में से किसी एक में बैठ जाते हैं तो इसका यह अर्थ नही होगा कि ऐसे जातक का वैवाहिक जीवन खराब ही हो जाएगा क्योंकि ऐसा केवल शनि महाराज के उस कुंडली में नकारात्मक होने तथा कुंडली में जातक के वैवाहिक जीवन से संबंधित सुख को खराब करने वाला कोई दोष बनाने की स्थिति में ही होगा जबकि इसी कुंडली में यदि शनि सकारात्मक तरीके से काम कर रहे हैं तथा जातक के वैवाहिक जीवन में सुख लाने वाला कोई योग बना रहे हैं तो ऐसे जातक का वैवाहिक जीवन खराब न होकर बहुत अच्छा होगा तथा उसे अपने विवाह के पश्चात कई प्रकार के सुखों का भोग प्राप्त होगा। इसी प्रकार मंगल, राहु तथा केतु का भी किसी कुंडली के वैवाहिक सुख दर्शाने वाले घरों में स्थित होना भी जातक के वैवाहिक जीवन के लिए उसी स्थिति में कष्टकारी होगा यदि ये ग्रह जातक की कुंडली में नकारात्मक तरीके से काम कर रहे हैं तथा जातक के वैवाहिक सुख को खराब करने वाला कोई दोष बना रहे हैं जबकि कुंडली के इन्हीं घरों में स्थित इन ग्रहों के सकारात्मक होने की स्थिति में ये जातक के वैवाहिक जीवन को किसी भी प्रकार से खराब नहीं करेंगे तथा इसके विपरीत जातक को वैवाहिक जीवन में विभिन्न प्रकार के सुख भी दे सकते हैं।

                              आइए अब इन तथ्यों का वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर विशलेषण करते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि प्रत्येक कुंडली में बारह घर होते हैं तथा नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह को इन्हीं बारह घरों में से किसी एक में स्थित होना पड़ता है, तो ऐसी स्थिति में उपर बताए गए चार ग्रहों में से किसी एक अथवा एक से अधिक ग्रहों की कुंडली के सातवें अथवा आठवें भाव में स्थित होने की संभावना 50% से भी अधिक रहती है क्योंकि लगभग प्रत्येक तीसरी कुंडली में तो केवल राहु या केतु में से ही कोई एक सातवें या आठवें घर में स्थित होता है। यहां पर पाठकों का यह जान लेना आवश्यक है कि राहु और केतु प्रत्येक कुंडली में हमेशा एक दूसरे से सातवें घर में स्थित होते हैं जिसके कारण राहु तथा केतु में से किसी भी एक के किसी कुंडली के पहले अथवा दूसरे घर में स्थित होने पर दूसरे ग्रह का कुंडली के क्रमश: सातवें तथा आठवें घर मे स्थित होना निश्चित होता है। इस प्रकार राहु या केतु के किसी कुंडली के 1,2,7 या 8वें घर में स्थित होने पर इनमें से कोई एक ग्रह कुंडली के सातवें अथवा आठवें घर में स्थित हो जाता है और कुंडली के बारह घरों में से किन्ही चार विशेष घरों में इन ग्रहों के स्थित होने की संभावना लगभग 33% रहती है जिसके कारण लगभग हर तीसरी कुंडली में यह स्थिति देखने में आती है।

                            इसी प्रकार की संभावनाएं यदि शनि तथा मंगल के लिए भी देखीं जाएं तो इन चार ग्रहों में से किसी एक ग्रह के कुंडली के सातवें या आठवें घर में स्थित होने की संभावना 50% से भी अधिक बनती है जिसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि दुनिया के हर दूसरे व्यक्ति की कुंडली में ऐसा योग बनता है तथा जिसके चलते दुनिया के हर दूसरे व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में इस धारणा के अनुसार बताईं जाने वालीं गंभीर समस्याएं आती हैं। और क्योंकि यह व्यवहारिक रुप से सत्य नहीं है बल्कि सत्य के कहीं आस-पास भी नहीं है तो इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि ज्योतिषियों के एक वर्ग विशेष की यह धारणा पूर्ण रूप से सत्य नहीं है तथा इस कारण यह एक भ्रांति ही है। नवग्रहों में से कोई भी ग्रह सबके लिए शुभ या सबके लिए अशुभ नहीं होता तथा प्रत्येक ग्रह अलग-अलग कुंडलियों में अलग-अलग तरीके से अच्छा या बुरा प्रभाव डालता है तथा उसी के अनुसार जातक को फल देता है। इसलिए कुंडली के किसी भी घर में बैठा कोई भी ग्रह उस कुंडली विशेष में अपने स्वभाव तथा बल के अनुसास शुभ या अशुभ किसी भी प्रकार का फल दे सकता है फिर चाहे वह ज्योतिषियों के किसी वर्ग के अनुसार स्वभाविक रुप से शुभ ग्रह हो या क्रूर ग्रह। 

लेखक
हिमांशु शंगारी