पित्र दोष

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पित्र दोष भारतीय ज्योतिष की एक अति महत्त्वपूर्ण धारणा है तथा इस पर चर्चा किए बिना भारतीय ज्योतिष को अच्छी तरह से समझ पाना संभव नहीं है। वैसे तो भारतीय ज्योतिष में पाए जाने वाले अधिकतर योगों, दोषों एवम धारणाओं केपित्र दोषबारे में तरह-तरह की भ्रांतियां फैली हुईं हैं किन्तु पित्र दोष इन सब से आगे है क्यों कि पित्र दोष के बारे में तो पहली भ्रांति इसके नाम और परिभाषा से ही शुरू हो जाती है। पित्र दोष के बारे में अधिकतर ज्योतिषियों और पंडितों का यह मत है कि पित्र दोष पूर्वजों का श्राप होता है जिसके कारण इससे पीड़ित व्यक्ति जीवन भर तरह-तरह की समस्याओं और परेशानियों से जूझता रहता है तथा बहुत प्रयास करने पर भी उसे जीवन में सफलता नहीं मिलती। इसके निवारण के लिए पीड़ित व्यक्ति को पूर्वजों की पूजा करवाने के लिए कहा जाता है जिससे उसके पित्र उस पर प्रसन्न हो जाएं तथा उसकी परेशानियों को कम कर दें।

                                                     यह सारी की सारी धारणा सिरे से ही गलत है क्योंकि पित्र दोष से पीड़ित व्यक्ति के पित्र उसे श्राप नहीं देते बल्कि ऐसे व्यक्ति के पित्र स्वयम ही शापित होते हैं जिसका कारण उनके द्वारा किए गए बुरे कर्म होते हैं जिनका भुगतान उनके वंश में पैदा होने वाले वंशजों को करना पड़ता है। जिस तरह संतान अपने पूर्वजों के गुण-दोष धारण करती है, अपने वंश के खून में चलने वाली अच्छाईयां और बीमारियां धारण करती है, अपने बाप-दादा से मिली संपत्ति तथा कर्ज धारण करती है, उसी तरह से उसे अपने पूर्वजों के द्वारा किए गए अच्छे एवम बुरे कर्मों के फलों को भी धारण करना पड़ता है।

                                                   कुछ ज्योतिषि तथा पंडित इस दोष का कारण बताते हैं कि आपने अपने पूर्वजों का श्राद्ध-कर्म ठीक से नहीं किया जिसके कारण आपके पित्र आपसे नाराज़ हैं तथा इसी कारण आपकी कुंडली में पित्र दोष बन रहा है। यह मत सर्वथा गलत है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली उसके जन्म के समय ही निर्धारित हो जाती है तथा इसके साथ ही उसकी कुंडली में बनने वाले योग-दोष भी निर्धारित हो जाते हैं। इसके बाद कोई भी व्यक्ति अपने जीवन काल में अच्छे-बुरे जो भी काम करता है, उनके फलस्वरूप पैदा होने वाले योग-दोष उसकी इस जन्म की कुंडली में नहीं आते बल्कि उसके अगले जन्मों की कुंडलियों में आते हैं। तो चाहे कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों का श्राद्ध-कर्म ठीक तरह से करे न करे, उनसे पैदा होने वाले दोष उस व्यक्ति की इस जन्म की कुंडली में नहीं आ सकते। इसलिए जो पित्र दोष किसी व्यक्ति की इस जन्म की कुंडली में उपस्थित है उसका उस व्यक्ति के इस जन्म के कर्मों से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि वह पित्र दोष तो उस व्यक्ति को इस जन्म में अच्छे-बुरे कर्मों करने की स्वतंत्रता मिलने से पहले ही निर्धारित हो गया था। आईए अब पित्र दोष के मूल सिद्धांत को भारतीय मिथिहास की एक उदाहरण की सहायता से समझने का प्रयास करें।

                                               यह उदाहरण भारतवर्ष में सबसे पवित्र मानी जाने वाली तथा माता के समान पूजनीय नदी गंगा के पृथ्वी पर अवतरण के साथ जुड़ी है। प्राचीन भारत में रघुकुल में सगर नाम के राजा हुए हैं जिन्होने पृथ्वी पर सबसे पहला सागर खुदवाया था तथा जो भगवान राम चन्द्र जी के पूर्वज थे। इन्ही राजा सगर के पुत्रों ने एक गलतफहमी के कारण तपस्या कर रहे कपिल मुनि पर आक्रमण कर दिया तथा कपिल मुनि के नेत्रों से निकली क्रोधाग्नि ने इन सब को भस्म कर दिया। राजा सगर को जब इस बात का पता चला तो वह समझ गए कि कपिल मुनि जैसे महात्मा पर आक्रमण करने के पाप कर्म का फल उनके वंश की आने वाली कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। इसलिए उन्होंने तुरंत अपने पौत्र अंशुमन को मुनि के पास जाकर इस पाप कर्म का प्रायश्चित पूछने के लिए कहा जिससे उनके वंश से इस पाप कर्म का बोझ दूर हो जाए तथा उनके मृतक पुत्रों को भी सदगति प्राप्त हो। अंशुमन के प्रार्थना करने पर मुनि ने बताया कि इस पाप कर्म का प्रायश्चित करने के लिए उनके वंश के लोगों को भगवान ब्रह्मा जी की तपस्या करके स्वर्ग लोक की सबसे पवित्र नदी गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान मांगना होगा तथा गंगा के पृथ्वी लोक आने पर मृतक राजपुत्रों की अस्थियों को गंगा की पवित्र धारा में प्रवाह करना होगा। तभी जाकर उनके वंश से इस पाप कर्म का बोझ उतरेगा। 

                                              मुनि के परामर्श अनुसार अंशुमन ने ब्रह्मा जी की तपस्या करनी आरंभ कर दी किन्तु उनकी जीवन भर की तपस्या से भी ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट नहीं हुए तो उन्होने मरने से पहले यह दायित्व अपने पुत्र दिलीप को सौंप दिया। राजा दिलीप भी जीवन भर ब्रह्मा जी की तपस्या करते रहे पर उन्हे भी ब्रह्मा जी के दर्शन प्राप्त नहीं हुए तो उन्होने यह दायित्व अपने पुत्र भागीरथ को सौंप दिया। राजा भागीरथ के तपस्या करने पर ब्रह्मा जी प्रस्न्न होकर प्रकट हुए तथा उन्होने भागीरथ को गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया। वरदान देकर जब भगवान ब्रह्मा जी जाने लगे तो राजा भागीरथ ने उनसे