आपके रत्न : लहसुनिया

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संबंधित लेख : रत्न ज्योतिष

वर्तमान समय में वैदिक ज्योतिष का अभ्यास करने वाले अधिकतर ज्योतिषी अधिक से अधिक जातकों को कोई न कोई रत्न धारण करने का सुझाव दे रहे हैं जिसका मुख्य कारण यह है कि पिछले कुछ वर्षों में नवग्रहों के रत्नों ने अपने आप को ज्योतिष के एक बहुत कारगार तथा अचूक उपाय और प्रयोग के रूप में सिद्ध किया है। बहुत से जातकों ने अपने ज्योतिषियों के परामर्श अनुसार नवग्रहों से संबंधित विभिन्न प्रकार के रत्न धारण करके अपने जीवन के अनेक क्षेत्रों में लाभ प्राप्त किये हैं तथा इनमें से अधिकतर जातकों को ये लाभ स्थायी रूप से प्राप्त हुए हैं जिसके चलते आज वैदिक ज्योतिष को मानने वाला लगभग प्रत्येक जातक अपने लिए उपयुक्त रत्न धारण करना चाहता है। नवग्रहों से संबंधित किसी ग्रह विशेष के रत्न धारण करने से कुछ जातकों को ऐसे लाभ भी प्राप्त हुए हैं जो अन्यथा संभव नहीं थे, जिसके चलते विभिन्न प्रकार की समस्याओं के निवारण के लिये अधिकतर जातक अपने अपने ज्योतिषी के पास जाकर अपने लिये उपयुक्त रत्न का सुझाव मांग रहे हैं। वैदिक ज्योतिष केवल नवग्रहों से संबंधित रत्न धारण करने का सुझाव देता है जिसके चलते वैदिक ज्योतिष केवल 9 प्रकार के रत्न धारण करने का सुझाव ही देता है। इन 9 रत्नों में से प्रत्येक रत्न नवग्रहों में से किसी ग्रह विशेष के साथ संबंध रखता है तथा इन रत्नों के नाम हैं माणिक्य, मोती, पीला पुखराज, श्वेत पुखराज या हीरा, लाल मूंगा, पन्ना, नीला पुखराज या नीलम, गोमेद तथा लहसुनिया और ये 9 रत्न नवग्रहों में से क्रमश: सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, शुक्र, मंगल, बुध, शनि, राहु और केतु के साथ संबंध रखते हैं। लेखों की इस श्रंखला के माध्यम से हम नवग्रहों के लिए धारण किये जाने वाले इन रत्नों की कुछ विशेषताओं तथा इनसे जुड़े कुछ तथ्यों के बारे में चर्चा करेंगे तथा आज के इस लेख में हम केतु के लिए धारण किये जाने वाले रत्न लहसुनिया के बारे में चर्चा करेंगे।

         वैदिक ज्योतिष के अनुसार केतु का प्रत्येक कुंडली में विशेष महत्व है तथा किसी कुंडली में केतु का बल, स्वभाव और स्थिति कुंडली से मिलने वाले शुभ या अशुभ परिणामों पर बहुत प्रभाव डाल सकती है। केतु के बल के बारे में चर्चा करें तो विभिन्न कुंडली में केतु का बल भिन्न भिन्न होता है जैसे किसी कुंडली में केतु बलवान होते हैं तो किसी में निर्बल जबकि किसी अन्य कुंडली में केतु का बल सामान्य हो सकता है। किसी कुंडली में केतु के बल को निर्धारित करने के लिय बहुत से तथ्यों का पूर्ण निरीक्षण आवश्यक है हालांकि कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में केतु की किसी राशि विशेष में स्थिति ही केतु के कुंडली में बल को निर्धारित करती है जबकि वास्तविकता में किसी भी ग्रह का किसी कुंडली में बल निर्धारित करने के लिए अनेक प्रकार के तथ्यों का अध्ययन करना आवश्यक है। विभिन्न कारणों के चलते यदि केतु किसी कुंडली में निर्बल रह जाते हैं तो ऐसी स्थिति में केतु उस कुंडली तथा जातक के लिए अपनी सामान्य और विशिष्ट विशेषताओं के साथ जुड़े फल देने में पूर्णतया सक्षम नहीं रह पाते जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कुंडली में निर्बल केतु को ज्योतिष के कुछ उपायों के माध्यम से अतिरिक्त उर्जा प्रदान की जाती है जिससे केतु कुंडली में बलवान हो जायें तथा जातक को लाभ प्राप्त हो सकें। केतु को किसी कुंडली में अतिरिक्त उर्जा प्रदान करने के उपायों में से उत्तम उपाय है केतु का रत्न लहसुनिया धारण करना जिसे धारण करने के पश्चात धारक को केतु के बलवान होने के कारण लाभ प्राप्त होने आरंभ हो जाते हैं।

              लहसुनिया रत्न केतु की उर्जा तरंगों को अपनी उपरी सतह से आकर्षित करके अपनी निचली सतह से धारक के शरीर में स्थानांतरित कर देता है जिसके चलते जातक के आभामंडल में केतु का प्रभाव पहले की तुलना में बलवान हो जाता है तथा इस प्रकार केतु अपना कार्य अधिक बलवान रूप से करना आरंभ कर देते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि केतु का रत्न लहसुनिया किसी कुंडली में केतु को केवल अतिरिक्त बल प्रदान कर सकता है तथा लहसुनिया किसी कुंडली में केतु के शुभ या अशुभ स्वभाव पर कोई प्रभाव नहीं डालता। इस प्रकार यदि किसी कुंडली में केतु शुभ हैं तो लहसुनिया धारण करने से ऐसे शुभ केतु को अतिरिक्त बल प्राप्त हो जायेगा जिसके कारण जातक को केतु से प्राप्त होने वाले लाभ अधिक हो जायेंगें जबकि यही केतु यदि किसी जातक की कुंडली में अशुभ है तो केतु का रत्न धारण करने से ऐसे अशुभ केतु को और अधिक बल प्राप्त हो जायेगा जिसके चलते ऐसा अशुभ केतु जातक को और भी अधिक हानि पहुंचा सकता है। इस लिए केतु का रत्न लहसुनिया केवल उन जातकों को पहनना चाहिये जिनकी कुंडली में केतु शुभ रूप से कार्य कर रहे हैं तथा ऐसे जातकों को केतु का रत्न कदापि नहीं धारण करना चाहिये जिनकी कुंडली में केतु अशुभ रूप से कार्य कर रहें हैं।

        लहसुनिया के कुछ गुणों के बारे में चर्चा करें तो लहसुनिया का रंग हल्के हरे रंग से लेकर, हल्के पीले रंग, हल्के भूरे तथा गहरे भूरे रंग जैसा दिखने वाला रंग भी हो सकता है तथा संसार के विभिन्न भागों से आने वाले लहसुनिया विभिन्न रंगों के हो सकते हैं। यहां पर इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न जातकों के लिए लहसुनिया के भिन्न भिन्न रंग उपयुक्त हो सकते हैं जैसे किसी को हल्के रंग का लहसुनिया अच्छे फल देता है जबकि किसी अन्य को गहरे रंग का लहसुनिया अच्छे फल देता है। इसलिए लहसुनिया के रंग का चुनाव केवल अपने ज्योतिषी के परामर्श अनुसार ही करना चाहिए तथा अपनी इच्छा से ही किसी भी रंग का लहसुनिया धारण नहीं कर लेना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से ऐसा लहसुनिया लाभ की अपेक्षा हानि भी दे सकता है। रंग के साथ साथ अपने ज्योतिषी द्वारा सुझाये गये लहसुनिया के भार पर भी विशेष ध्यान दें तथा इस रत्न का उतना ही भार धारण करें जितना आपके ज्योतिषी के द्वारा बताया गया हो क्योंकि अपनी इच्छा से लहसुनिया का भार बदलने से कई बार यह रत्न आपको उचित लाभ नहीं दे पाता जबकि कई बार ऐसी स्थिति में आपका लहसुनिया आपको हानि भी पहुंचा सकता है।

             उदाहरण के लिए अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये लहसुनिया के भार से बहुत कम भार का लहसुनिया धारण करने से ऐसा लहसुनिया आपको बहुत कम लाभ दे सकता है अथवा किसी भी प्रकार का लाभ देने में अक्षम हो सकता है जबकि अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये लहसुनिया के धारण करने योग्य भार से बहुत अधिक भार का लहसुनिया धारण करने से यह रत्न आपको हानि भी पहुंचा सकता है जिसका कारण यह है कि बहुत अधिक भार का लहसुनिया आपके शरीर तथा आभामंडल में केतु की इतनी उर्जा स्थानांतरित कर देता है जिसे झेलने तथा उपयोग करने में आपका शरीर और आभामंडल दोनों ही सक्षम नहीं होते जिसके कारण ऐसी अतिरिक्त उर्जा अनियंत्रित होकर आपको हानि पहुंचा सकती है। इसलिए सदा अपने ज्योतिषी के द्वारा बताये गये भार के बराबर भार का लहसुनिया ही धारण करें क्योंकि एक अनुभवी वैदिक ज्योतिषी तथा रत्न विशेषज्ञ को यह पता होता है कि आपकी कुंडली के अनुसार आपको लहसुनिया रत्न का कितना भार धारण करना चाहिये। अपने लहसुनिया के माध्यम से उत्तम फलों की प्राप्ति के लिए धारण करने से पूर्व अपने लहसुनिया रत्न का शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा करवा लें। शुद्धिकरण की प्रक्रिया के माध्यम से आपके रत्न के उपर संग्रहित किसी भी प्रकार की संभावित नकारात्मक उर्जा को दूर किया जाता है जबकि प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया के माध्यम से आपके लहसुनिया को केतु के मंत्रों के माध्यम से तथा विशेष वैदिक विधियों के माध्यम से आपके लिए उत्त्म फल देने के लिए अभिंमत्रित तथा प्रेरित किया जाता है। शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा की विधियां तकनीकी हैं तथा अपने रत्न का शुद्धिकरण और प्राण प्रतिष्ठा केवल इन क्रियाओं के जानकार वैदिक पंडितों से ही करवायें।

          लहसुनिया रत्न का शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा करवाने के पश्चात आपको अगले चरण में अपने रत्न को धारण करना होता है। वैदिक ज्योतिष लहसुनिया रत्न को शनिवार सुबह धारण करने का परामर्श देता है। शुक्रवार की रात को अपने लहसुनिया को गंगाजल अथवा कच्चे दूध से भरी कटोरी में रख दें तथा शनिवार की प्रात: स्नान करने के पश्चात अपनी दैनिक प्रार्थना करें और उसके पश्चात अपने लहसुनिया की अंगूठी को सामने रखकर केतु महाराज का ध्यान करें और केतु के मूल मंत्र या बीज मंत्र का 108 बार या 27 बार जाप करें, केतु महाराज से इस रत्न के माध्यम से शुभातिशुभ फल प्रदान करने की प्रार्थना करें तथा तत्पश्चात लहसुनिया की अंगूठी को साफ वस्त्र से पोंछ कर धारण कर लें। यदि आपने अपनी अंगूठी को कच्चे दूध में रखा हो तो इस पहले साफ पानी से धो लें तथा तत्पश्चात इसे साफ वस्त्र से पोंछ कर धारण कर लें। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि लहसुनिया रत्न को पहली बार धारण करते समय इसे शनिवार प्रात: धारण किया जाता है जबकि एक बार धारण करने के पश्चात अधिकतर स्थितियों में फिर इसे जीवन भर धारण किया जाता है। पाठकों की सुविधा के लिए केतु महाराज का मूल मंत्र और बीज मंत्र प्रस्तुत है :

केतु मूल मंत्र : ॐ केतवे नम: ।

केतु बीज मंत्र मंत्र : ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम: ।

              लहसुनिया को वैदिक ज्योतिष द्वारा सुझाई गईं विधियों के माध्यम से ही धारण करने पर यह रत्न आपको अपने अधिक से अधिक शुभ लाभ प्रदान करने में सक्षम हो जाता है इसलिए यथासंभव प्रत्येक जातक को पूर्ण विधि के साथ ही अपना लहसुनिया रत्न धारण करना चाहिये। लहसुनिया को धारण करने वाले प्रत्येक जातक को अपने रत्न से निरंतर लाभ प्राप्त करते रहने के लिए इसकी नियमित रूप से सफाई भी करते रहना चाहिए जिससे आपका रत्न सदा आपको शुभ लाभ प्रदान करता रहे। लहसुनिया को सामान्यतया 3 से 6 मास की अवधि में एक बार अच्छी प्रकार से साफ कर लेना चाहिए क्योंकि ऐसा न करने पर आपके रत्न पर जमी धूल इसे केतु की उर्जा तरंगों को आपके शरीर में स्थानांतरित करने में बाधा उपस्थित कर सकती है जिससे आपका रत्न पूर्ण रूप से आपको लाभ प्रदान नहीं कर पाता।

लेखक
हिमांशु शंगारी