श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा

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नवग्रहों की पूजा के अतिरिक्त वैदिक ज्योतिष विभिन्न प्रकार के देवी देवताओं की वैदिक विधि के अनुसार इन देवी देवताओं के मंत्रों माध्यम से पूजा करने का परामर्श भी देता है तथा समय समय पर वैदिक ज्योतिष को मानने वाले जातक अपने ज्योतिषियों के सुझाव पर विभिन्न प्रकार के देवी देवताओं की वैदिक पूजाएं करवाते हैं जिनसे उनकी कुंडली के कुछ विशेष दोषों का निवारण हो सके तथा उन्हें कुछ विशिष्ट प्रकार के लाभ प्राप्त हो सकें। इन्हीं पूजाओं में से एक है श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा जिसे भगवान ब्रहमा तथा मां सरस्वती के श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र के जाप से किया जाता है जो भगवान ब्रहमा तथा मां सरस्वती का संयुक्त मंत्र है। अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा जातक को श्री ब्रहमा पूजा तथा श्री सरस्वती पूजा से प्राप्त होने वाले समस्त लाभ प्रदान कर सकती है जिसके चलते वैदिक ज्योतिष हजारों सालों से श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र का प्रयोग भगवान ब्रहमा तथा मां सरस्वती का आशिर्वाद प्राप्त करने के लिए तथा अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए करता रहा है तथा आज भी अनेक जातक श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र से विधिवत भगवान ब्रहमा तथा मां सरस्वती की पूजा करके अनेक प्रकार की मनोकामनाएं सिद्ध करते हैं।

        आज के इस लेख में हम श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा की विधि के बारे में चर्चा करेंगे तथा इस पूजा में प्रयोग होने वाली महत्वपूर्ण क्रियाओं के बारे में भी विचार करेंगे। वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा का प्रयोग लंबी आयु, स्वास्थ्य, ज्ञान, विद्या, कला, संगीत, गायन, वाणी कौशल कलात्मकता, रचनात्मकता, सृजनात्मकता, सुख, समृद्धि, आध्यात्मिक विकास, भगवान ब्रहमा तथा मां सरस्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए तथा अन्य कई प्रकार की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है तथा इस पूजा को विधिवत करने वाले अनेक जातक अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त कर पाने में सफल होते हैं। श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा का आरंभ सामान्यतया बुधवार अथवा गुरुवार वाले दिन किया जाता है तथा उससे अगले बुधवार अथवा गुरुवार को इस पूजा का समापन कर दिया जाता है जिसके चलते इस पूजा को पूरा करने के लिए सामान्यता 7 दिन लगते हैं किन्तु कुछ स्थितियों में यह पूजा 7 से 10 दिन तक भी ले सकती है जिसके चलते सामान्यतया इस पूजा के आरंभ के दिन को बदल दिया जाता है तथा इसके समापन का दिन सामान्यतया बुधवार अथवा गुरुवार ही रखा जाता है। 

           किसी भी प्रकार की पूजा को विधिवत करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस पूजा के लिए निश्चित किये गए मंत्र का एक निश्चित संख्या में जाप करना तथा यह संख्या अधिकतर पूजाओं के लिए 125,000 मंत्र होती है तथा श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा में भी श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र का 125,000 बार जाप करना अनिवार्य होता है। पूजा के आरंभ वाले दिन पांच या सात पंडित पूजा करवाने वाले यजमान अर्थात जातक के साथ भगवान ब्रह्मा, मां सरस्वती, शिव परिवार तथा मां शक्ति के समक्ष बैठते हैं तथा इन समस्त देवी देवताओं की विधिवत पूजा करने के पश्चात मुख्य पंडित यह संकल्प लेता है कि वह और उसके सहायक पंडित उपस्थित यजमान के लिए श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र का 125,000 बार जाप एक निश्चित अवधि में करेंगे तथा इस जाप के पूरा हो जाने पर पूजन, हवन तथा कुछ विशेष प्रकार के दान आदि करेंगे। जाप के लिए निश्चित की गई अवधि सामान्यतया 7 से 10 दिन होती है। संकल्प के समय मंत्र का जाप करने वाली सभी पंडितों का नाम तथा उनका गोत्र बोला जाता है तथा इसी के साथ पूजा करवाने वाले यजमान का नाम, उसके पिता का नाम तथा उसका गोत्र भी बोला जाता है तथा इसके अतिरिक्त जातक द्वारा करवाये जाने वाले श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र के इस जाप के फलस्वरूप मांगा जाने वाले फल का संकल्प भी बोला जाता है जो साधारणतया लंबी आयु, स्वास्थ्य, ज्ञान, विद्या, कला, संगीत, गायन, वाणी कौशल कलात्मकता, रचनात्मकता, सृजनात्मकता, सुख, समृद्धि, आध्यात्मिक विकास, भगवान ब्रहमा तथा मां सरस्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए तथा अन्य कई प्रकार की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए होता है।

             इस संकल्प के पश्चात सभी पंडित अपने यजमान अर्थात जातक के लिए श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र का जाप करना शुरू कर देते हैं तथा प्रत्येक पंडित इस मंत्र के जाप को प्रतिदिन लगभग 8 से 10 घंटे तक करता है जिससे वे इस मंत्र की 125,000 संख्या के जाप को संकल्प के दिन निश्चित की गई अवधि में पूर्ण कर सकें। निश्चित किए गए दिन पर जाप पूरा हो जाने पर इस जाप तथा पूजा के समापन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है जो लगभग 2 से 3 घंटे तक चलता है। सबसे पूर्व भगवान ब्रहमा, मां सरस्वती, भगवान गणेश तथा कुछ अन्य देवी देवताओं की पूजा फल, फूल, दूध, दहीं, घी, शहद, शक्कर, धूप, दीप, मिठाई, हलवे के प्रसाद तथा अन्य कई वस्तुओं के साथ की जाती है तथा इसके पश्चात मुख्य पंडित के द्वारा श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र का जाप पूरा हो जाने का संकल्प किया जाता है जिसमे यह कहा जाता है कि मुख्य पंडित ने अपने सहायक अमुक अमुक पंडितों की सहायता से इस मंत्र की 125,000 संख्या का जाप निर्धारित विधि तथा निर्धारित समय सीमा में सभी नियमों का पालन करते हुए किया है तथा यह सब उन्होंने अपने यजमान अर्थात जातक के लिए किया है जिसने जाप के शुरू होने से लेकर अब तक पूर्ण निष्ठा से पूजा के प्रत्येक नियम की पालना की है तथा इसलिए अब इस पूजा से विधिवत प्राप्त होने वाला सारा शुभ फल उनके यजमान को प्राप्त होना चाहिए।

           इस समापन पूजा के चलते नवग्रहों से संबंधित अथवा नवग्रहों में से कुछ विशेष ग्रहों से संबंधित कुछ विशेष वस्तुओं का दान किया जाता है जो विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकता है तथा इन वस्तुओं में सामान्यतया चावल, गुड़, चीनी, नमक, गेहूं, दाल, खाद्य तेल, सफेद तिल, काले तिल, जौं तथा कंबल इत्यादि का दान किया जाता है। इस पूजा के समापन के पश्चात उपस्थित सभी देवी देवताओं का आशिर्वाद लिया जाता है तथा तत्पश्चात हवन की प्रक्रिया शुरू की जाती है जो जातक तथा पूजा का फल प्रदान करने वाले देवी देवताओं अथवा ग्रहों के मध्य एक सीधा तथा शक्तिशाली संबंध स्थापित करती है। औपचारिक विधियों के साथ हवन अग्नि प्रज्जवल्लित करने के पश्चात तथा हवन शुरू करने के पश्चात श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र का जाप पुन: प्रारंभ किया जाता है तथा प्रत्येक बार इस मंत्र का जाप पूरा होने पर स्वाहा: का स्वर उच्चारण किया जाता है जिसके साथ ही हवन कुंड की अग्नि में एक विशेष विधि से हवन सामग्री डाली जाती है तथा यह हवन सामग्री विभिन्न पूजाओं तथा विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकती है। श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र की हवन के लिए निश्चित की गई जाप संख्या के पूरे होने पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण मंत्रों का उच्चारण किया जाता है तथा प्रत्येक बार मंत्र का उच्चारण पूरा होने पर स्वाहा की ध्वनि के साथ पुन: हवन कुंड की अग्नि में हवन सामग्री डाली जाती है।

             अंत में एक सूखे नारियल को उपर से काटकर उसके अंदर कुछ विशेष सामग्री भरी जाती है तथा इस नारियल को विशेष मंत्रों के उच्चारण के साथ हवन कुंड की अग्नि में पूर्ण आहुति के रूप में अर्पित किया जाता है तथा इसके साथ ही इस पूजा के इच्छित फल एक बार फिर मांगे जाते हैं। तत्पश्चात यजमान अर्थात जातक को हवन कुंड की 3, 5 या 7 परिक्रमाएं करने के लिए कहा जाता है तथा यजमान के इन परिक्रमाओं को पूरा करने के पश्चात तथा पूजा करने वाले पंडितों का आशिर्वाद प्राप्त करने के पश्चात यह पूजा संपूर्ण मानी जाती है। हालांकि किसी भी अन्य पूजा की भांति श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा में भी उपरोक्त विधियों तथा औपचारिकताओं के अतिरिक्त अन्य बहुत सी विधियां तथा औपचारिकताएं पूरी की जातीं हैं किन्तु उपर बताईं गईं विधियां तथा औपचारिकताएं इस पूजा के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं तथा इसीलिए इन विधियों का पालन उचित प्रकार से तथा अपने कार्य में निपुण पंडितों के द्वारा ही किया जाना चाहिए। इन विधियों तथा औपचारिकताओं में से किसी विधि अथवा औपचारिकता को पूरा न करने पर अथवा इन्हें ठीक प्रकार से न करने पर जातक को इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल में कमी आ सकती है तथा जितनी कम विधियों का पूर्णतया पालन किया गया होगा, उतना ही इस पूजा का फल कम होता जाएगा।

             श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा के आरंभ होने से लेकर समाप्त होने तक पूजा करवाने वाले जातक को भी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। इस अवधि के भीतर जातक के लिए प्रत्येक प्रकार के मांस, अंडे, मदिरा, धूम्रपान तथा अन्य किसी भी प्रकार के नशे का सेवन निषेध होता है अर्थात जातक को इन सभी वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जातक को इस अवधि में अपनी पत्नि अथवा किसी भी अन्य स्त्री के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिएं तथा अविवाहित जातकों को किसी भी कन्या अथवा स्त्री के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिएं। इसके अतिरिक्त जातक को इस अवधि में किसी भी प्रकार का अनैतिक, अवैध, हिंसात्मक तथा घृणात्मक कार्य आदि भी नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जातक को प्रतिदिन मानसिक संकल्प के माध्यम से श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा के साथ अपने आप को जोड़ना चाहिए तथा प्रतिदिन स्नान करने के पश्चात जातक को इस पूजा का समरण करके यह संकल्प करना चाहिए कि श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा उसके लिए अमुक स्थान पर अमुक संख्या के पंडितों द्वारा श्री ब्रहमा सरस्वती मंत्र के 125,000 संख्या के जाप से की जा रही है तथा इस पूजा का विधिवत और अधिकाधिक शुभ फल उसे प्राप्त होना चाहिए। ऐसा करने से जातक मानसिक रूप से श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा के साथ जुड़ जाता है तथा जिससे इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल और भी अधिक शुभ हो जाते हैं।

               यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा जातक की अनुपस्थिति में भी की जा सकती है तथा जातक के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की स्थिति में इस पूजा में जातक की तस्वीर अर्थात फोटो का प्रयोग किया जाता है जिसके साथ साथ जातक के नाम, उसके पिता के नाम तथा उसके गोत्र आदि का प्रयोग करके जातक के लिए इस पूजा का संकल्प किया जाता है। इस संकल्प में यह कहा जाता है कि जातक किसी कारणवश इस पूजा के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में सक्षम नहीं है जिसके चलते पूजा करने वाले पंडितों में से ही एक पंड़ित जातक के लिए जातक के द्वारा की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं पूरा करने का संकल्प लेता है तथा उसके पश्चात पूजा के समाप्त होने तक वह पंडित ही जातक की ओर से की जाने वाली सारी क्रियाएं करता है जिसका पूरा फल संकल्प के माध्यम से जातक को प्रदान किया जाता है। प्रत्येक प्रकार की क्रिया को करते समय जातक की तस्वीर अर्थात फोटो को उपस्थित रखा जाता है तथा उसे सांकेतिक रूप से जातक ही मान कर क्रियाएं की जातीं हैं। उदाहरण के लिए यदि जातक के स्थान पर पूजा करने वाले पंडित को भगवान ब्रहमा तथा मां सरस्वती को पुष्प अर्थात फूल अर्पित करने हैं तो वह पंडित पहले पुष्प धारण करने वाले अपने हाथ को जातक के चित्र से स्पर्श करता है तथा तत्पश्चात उस हाथ से पुष्पों को भगवान ब्रहमा तथा मां सरस्वती को अर्पित करता है तथा इसी प्रकार सभी क्रियाएं पूरी की जातीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि व्यक्तिगत रूप से अनुपस्थित रहने की स्थिति में भी जातक को श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा के आरंभ से लेकर समाप्त होने की अवधि तक पूजा के लिए निश्चित किये गए नियमों का पालन करना होता है भले ही जातक संसार के किसी भी भाग में उपस्थित हो। इसके अतिरिक्त जातक को उपर बताई गई विधि के अनुसार अपने आप को इस पूजा के साथ मानसिक रूप से संकल्प के माध्यम से जोड़ना भी होता है जिससे इस श्री ब्रहमा सरस्वती पूजा के अधिक से अधिक शुभ फल जातक को प्राप्त हो सकें।    

ध्यानार्थ : भारतवर्ष के विभिन्न प्रांतों एवम क्षेत्रों में स्थानीय मान्यताओं में अंतर होने के कारण विभिन्न्न क्षेत्रों के पंडित ऊपर बताई गई पूजा विधि में कुछ बदलाव कर सकते हैं ।  पाठकों को सुझाव दिया जाता है कि यदि आपके पंडित अपनी स्थानीय मान्यताओं के चलते इस पूजा को शुरू करने के दिन में, पूजा करने वाले पंडितों की संख्या में अथवा प्रतिदिन कितने घंटे मंत्र का जाप किया जाएगा, इन नियमों में कोई संशोधान करते हैं तो ऐसी स्थिति में पूजा करने वाले पंडितों के सुझाव को मान्यता दे देनी चाहिए तथा उनके साथ विवाद नहीं करना चाहिए ।   

लेखक
हिमांशु शंगारी