गंड मूल दोष निवारण पूजा

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किसी कुंडली में उपस्थित भिन्न भिन्न प्रकार के दोषों के निवारण के लिए की जाने वाली पूजाओं को लेकर बहुत सी भ्रांतियां तथा अनिश्चितताएं बनीं हुईं हैं तथा एक आम जातक के लिए यह निर्णय लेना बहुत कठिन हो जाता है कि किसी दोष विशेष के लिए की जाने वाली पूजा की विधि क्या होनी चाहिए। गंड मूल दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा को लेकर भी विभिन्न ज्योतिषियों के मत भिन्न भिन्न होने के कारण बहुत अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है जिसके कारण आम जातक को बहुत दुविधा का सामना करना पड़ता है। कुछ ज्योतिषियों का यह मानना है कि गंड मूल दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा केवल नासिक स्थित भगवान शिव के त्रंयबकेश्वर नामक मंदिर, उज्जैन, हरिद्वार, गया जी, श्री बद्रीनाथ धाम तथा अन्य इसी प्रकार के धार्मिक स्थानों पर ही की जानी चाहिए जो उचित नहीं है तथा गंड मूल दोष निवारण पूजा किसी भी मंदिर में की जा सकती है हालांकि धार्मिक स्थानों पर इस पूजा को करने से इसके फल अधिक अवश्य हो जाते हैं। आज के इस लेख में हम गंड मूल दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा की विधि के बारे में चर्चा करेंगे तथा इस पूजा में प्रयोग होने वाली महत्वपूर्ण क्रियाओं के बारे में भी विचार करेंगे।

        वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में चन्द्रमा, रेवती, अश्विनी, श्लेषा, मघा, ज्येष्ठा तथा मूल नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र के किसी विशेष चरण में स्थित हो तो कुंडली धारक का जन्म गंडमूल में हुआ माना जाता है अर्थात उसकी कुंडली में गंडमूल दोष की उपस्थिति मानी जाती है। गंडमूल दोष निवारण के लिए की जाने वाली पूजा अन्य वैदिक पूजाओं की तुलना में कई प्रकार से भिन्न होती है तथा यह पूजा प्रत्येक जातक के लिए एक ही मंत्र से नहीं की जाती और विभिन्न जातकों के लिए गंडमूल दोष निवारण मंत्र भिन्न भिन्न हो सकते हैं जिसका निर्णय जातक के जन्म नक्षत्र अर्थात जातक के जन्म के समय चन्द्रमा की स्थिति वाले नक्षत्र को देख कर ही किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी जातक का जन्म नक्षत्र रेवती हो अर्थात जातक के जन्म के समय चन्द्रमा रेवती नक्षत्र के चौथे चरण में हों जिसके कारण जातक की कुंडली में गंडमूल दोष बनता हो तो इस प्रकार के गंडमूल दोष के निवारण के लिए रेवती नक्षत्र के वेद मंत्र के माध्यम से गंडमूल दोष निवारण पूजा की जाती है। इसी प्रकार किसी जातक के जन्म के समय चन्द्रमा के अश्विनी नामक गंडमूल नक्षत्र में अथवा अन्य किसी गंडमूल नक्षत्र में उपस्थित होने पर उस गंडमूल नक्षत्र के वेद मंत्र के माध्यम से यह पूजा की जाती है। इस लेख के उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि जातक की कुंडली में गंडमूल दोष का निर्माण चन्द्रमा के रेवती नक्षत्र के चौथे चरण में उपस्थित होने के कारण हो रहा है जिसके चलते इस जातक के लिए गंड मूल दोष निवारण पूजा रेवती नक्षत्र के वेद मंत्र के माध्यम से की जाएगी अर्थात रेवती नक्षत्र का वेद मंत्र इस स्थिति में गंडमूल दोष निवारण मंत्र बन जाएगा।

       गंडमूल दोष निवारण मंत्र जान लेने के पश्चात हमें इस पूजा के लिए आरंभ तथा समापन के लिए उपयुक्त दिन निश्चित करना होता है जो इस प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण है तथा जो इस पूजा को अन्य बहुत सी वैदिक पूजाओं से पृथक कर देता है। गंडमूल दोष निवारण पूजा का आरंभ दिवस इस प्रकार से निश्चित किया जाता है जिससे इस पूजा का समापन दिवस तभी आए जब चन्द्रमा पुन: जातक के जन्म नक्षत्र में गोचर कर रहे हों जो इस उदाहरण के लिए रेवती नक्षत्र है तथा अन्य जातकों के लिए अन्य गंड मूल नक्षत्रों में से कोई एक हो सकता है। चन्द्रमा प्रत्येक नक्षत्र में लगभग महीने में एक बार गोचर करते हैं जिसके चलते गंडमूल दोष निवारण पूजा का समापन महीने में एक बार ही किया जा सकता है तथा इस प्रकार यह पूजा किसी जातक विशेष के लिए प्रत्येक मास में केवल एक बार ही की जा सकती है। इस दिवस का निर्णय जातक की कुंडली में चन्द्रमा की गंडमूल नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र विशेष में स्थिति देखने के पश्चात किया जाता है। इसके अतिरिक्त गंड मूल दोष निवारण पूजा को आयोजित करने के लिए विभिन्न 108 स्थानों का जल, विभिन्न 108 स्थानों की मिट्टी तथा विभिन्न 108 पेड़ों के पत्ते भी आवश्यक होते हैं। कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि यह संख्या 108 से कम भी हो तो मान्य होती है किन्तु कम से कम 27 विभिन्न प्रकार के जल, पत्ते तथा मिट्टी आवश्यक होती है क्योंकि 27 नक्षत्रों में से प्रत्येक नक्षत्र के लिए भिन्न प्रकार का जल, पत्ता तथा मिट्टी अवश्य ही होनी चाहिए। गंडमूल दोष निवारण मंत्र, पूजा के लिए उपयुक्त दिवस तथा आवश्यक सामग्री जान लेने के पश्चात आइए अब देखें कि इस पूजा को करने से जुड़ी कुछ अन्य क्रियाओं के बारे में चर्चा करते हैं।

        किसी भी प्रकार के दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा को विधिवत करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस दोष के निवारण के लिए निश्चित किये गए मंत्र का एक निश्चित संख्या में जाप करना तथा यह संख्या अधिकतर दोषों के लिए की जाने वाली पूजाओं के लिए 125,000 मंत्र होती है। उदाहरण के लिए गंड मूल दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा में भी गंड मूल दोष निवारण मंत्र अर्थात रेवती नक्षत्र वेद मंत्र का 125,000 बार जाप करना अनिवार्य होता है। पूजा के आरंभ वाले दिन पांच या सात पंडित पूजा करवाने वाले यजमान अर्थात जातक के साथ भगवान शिव के शिवलिंग के समक्ष बैठते हैं तथा शिव परिवार की विधिवत पूजा करने के पश्चात मुख्य पंडित यह संकल्प लेता है कि वह और उसके सहायक पंडित उपस्थित यजमान के लिए गंड मूल दोष के निवारण मंत्र का 125,000 बार जाप एक निश्चित अवधि में करेंगे तथा इस जाप के पूरा हो जाने पर पूजन, हवन तथा कुछ विशेष प्रकार के दान आदि करेंगे। जाप के लिए निश्चित की गई अवधि सामान्यतया 7 से 10 दिन होती है। संकल्प के समय मंत्र का जाप करने वाली सभी पंडितों का नाम तथा उनका गोत्र बोला जाता है तथा इसी के साथ पूजा करवाने वाले यजमान का नाम, उसके पिता का नाम तथा उसका गोत्र भी बोला जाता है तथा इसके अतिरिक्त जातक द्वारा करवाये जाने वाले गंड मूल दोष के निवारण मंत्र के इस जाप के फलस्वरूप मांगा जाने वाला फल भी बोला जाता है जो साधारणतया जातक की कुंडली में गंड मूल दोष का निवारण होता है।

       इस संकल्प के पश्चात सभी पंडित अपने यजमान अर्थात जातक के लिए गंड मूल दोष निवारण मंत्र अर्थात रेवती नक्षत्र के वेद मंत्र का जाप करना शुरू कर देते हैं तथा प्रत्येक पंडित इस मंत्र के जाप को प्रतिदिन लगभग 8 से 10 घंटे तक करता है जिससे वे इस मंत्र की 125,000 संख्या के जाप को संकल्प के दिन निश्चित की गई अवधि में पूर्ण कर सकें। निश्चित किए गए दिन पर जाप पूरा हो जाने पर इस जाप तथा पूजा के समापन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है जो लगभग 2 से 3 घंटे तक चलता है। सबसे पूर्व भगवान शिव, मां पार्वती, भगवान गणेश तथा शिव परिवार के अन्य सदस्यों की पूजा फल, फूल, दूध, दहीं, घी, शहद, शक्कर, धूप, दीप, मिठाई, हलवे के प्रसाद तथा अन्य कई वस्तुओं के साथ की जाती है तथा इसके पश्चात मुख्य पंडित के द्वारा गंड मूल दोष के निवारण मंत्र का जाप पूरा हो जाने का संकल्प किया जाता है जिसमे यह कहा जाता है कि मुख्य पंडित ने अपने सहायक अमुक अमुक पंडितों की सहायता से इस मंत्र की 125,000 संख्या का जाप निर्धारित विधि तथा निर्धारित समय सीमा में सभी नियमों का पालन करते हुए किया है तथा यह सब उन्होंने अपने यजमान अर्थात जातक के लिए किया है जिसने जाप के शुरू होने से लेकर अब तक पूर्ण निष्ठा से पूजा के प्रत्येक नियम की पालना की है तथा इसलिए अब इस पूजा से विधिवत प्राप्त होने वाला सारा शुभ फल उनके यजमान को प्राप्त होना चाहिए।

       इस समापन पूजा के चलते नवग्रहों से संबंधित अथवा नवग्रहों में से कुछ विशेष ग्रहों से संबंधित कुछ विशेष वस्तुओं का दान किया जाता है जो विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकता है तथा इन वस्तुओं में सामान्यतया चावल, गुड़, चीनी, नमक, गेहूं, दाल, खाद्य तेल, सफेद तिल, काले तिल, जौं तथा कंबल इत्यादि का दाने किया जाता है। इसके पश्चात विभिन्न 27 अथवा 108 स्तोत्रों से लाए गए जल, मिट्टी तथा पत्तों को मिश्रित करके कुछ विशेष मंत्रों तथा विधियों के माध्यम से इस मिश्रण का शुद्धिकरण किया जाता है तथा इस मिश्रण को अभिमंत्रित किया जाता है। इस पूजा के समापन के पश्चात उपस्थित सभी देवी देवताओं का आशिर्वाद लिया जाता है तथा तत्पश्चात हवन की प्रक्रिया शुरू की जाती है जो जातक तथा पूजा का फल प्रदान करने वाले देवी देवताओं अथवा ग्रहों के मध्य एक सीधा तथा शक्तिशाली संबंध स्थापित करती है। औपचारिक विधियों के साथ हवन अग्नि प्रज्जवल्लित करने के पश्चात तथा हवन शुरू करने के पश्चात गंड मूल दोष के निवारण मंत्र का जाप पुन: प्रारंभ किया जाता है तथा प्रत्येक बार इस मंत्र का जाप पूरा होने पर स्वाहा: का स्वर उच्चारण किया जाता है जिसके साथ ही हवन कुंड की अग्नि में एक विशेष विधि से हवन सामग्री डाली जाती है तथा यह हवन सामग्री विभिन्न पूजाओं तथा विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकती है। गंड मूल दोष निवारण मंत्र की हवन के लिए निश्चित की गई जाप संख्या के पूरे होने पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण मंत्रों का उच्चारण किया जाता है तथा प्रत्येक बार मंत्र का उच्चारण पूरा होने पर स्वाहा की ध्वनि के साथ पुन: हवन कुंड की अग्नि में हवन सामग्री डाली जाती है।

       अंत में एक सूखे नारियल को उपर से काटकर उसके अंदर कुछ विशेष सामग्री भरी जाती है तथा इस नारियल को विशेष मंत्रों के उच्चारण के साथ हवन कुंड की अग्नि में पूर्ण आहुति के रूप में अर्पित किया जाता है तथा इसके साथ ही इस पूजा के इच्छित फल एक बार फिर मांगे जाते हैं। तत्पश्चात यजमान अर्थात जातक को हवन कुंड की 3, 5 या 7 परिक्रमाएं करने के लिए कहा जाता है तथा यजमान के इन परिक्रमाओं को पूरा करने के पश्चात तथा पूजा करने वाले पंडितों का आशिर्वाद प्राप्त करने के पश्चात जातक अपने घर जाकर अथवा मंदिर में ही 27 अथवा 108 विभिन्न स्तोत्रों से लाए गये जल, मिट्टी तथा पत्तों के अभिमंत्रित किये गये मिश्रण से स्नान करता है जिसके पश्चात यह पूजा संपूर्ण मानी जाती है। हालांकि किसी भी अन्य पूजा की भांति गंड मूल दोष निवारण पूजा में भी उपरोक्त विधियों तथा औपचारिकताओं के अतिरिक्त अन्य बहुत सी विधियां तथा औपचारिकताएं पूरी की जातीं हैं किन्तु उपर बताईं गईं विधियां तथा औपचारिकताएं इस पूजा के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं तथा इसीलिए इन विधियों का पालन उचित प्रकार से तथा अपने कार्य में निपुण पंडितों के द्वारा ही किया जाना चाहिए। इन विधियों तथा औपचारिकताओं में से किसी विधि अथवा औपचारिकता को पूरा न करने पर अथवा इन्हें ठीक प्रकार से न करने पर जातक को इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल में कमी आ सकती है तथा जितनी कम विधियों का पूर्णतया पालन किया गया होगा, उतना ही इस पूजा का फल कम होता जाएगा।

         गंड मूल दोष निवारण के लिए की जाने वाली पूजा के आरंभ होने से लेकर समाप्त होने तक पूजा करवाने वाले जातक को भी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। इस अवधि के भीतर जातक के लिए प्रत्येक प्रकार के मांस, अंडे, मदिरा, धूम्रपान तथा अन्य किसी भी प्रकार के नशे का सेवन निषेध होता है अर्थात जातक को इन सभी वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जातक को इस अवधि में अपनी पत्नि अथवा किसी भी अन्य स्त्री के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिएं तथा अविवाहित जातकों को किसी भी कन्या अथवा स्त्री के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिएं। इसके अतिरिक्त जातक को इस अवधि में किसी भी प्रकार का अनैतिक, अवैध, हिंसात्मक तथा घृणात्मक कार्य आदि भी नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जातक को प्रतिदिन मानसिक संकल्प के माध्यम से गंड मूल दोष निवारण पूजा के साथ अपने आप को जोड़ना चाहिए तथा प्रतिदिन स्नान करने के पश्चात जातक को इस पूजा का समरण करके यह संकल्प करना चाहिए कि गंड मूल दोष निवारण पूजा उसके लिए अमुक स्थान पर अमुक संख्या के पंडितों द्वारा गंड मूल दोष निवारण मंत्र के 125,000 संख्या के जाप से की जा रही है तथा इस पूजा का विधिवत और अधिकाधिक शुभ फल उसे प्राप्त होना चाहिए। ऐसा करने से जातक मानसिक रूप से गंड मूल दोष निवारण पूजा के साथ जुड़ जाता है तथा जिससे इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल और भी अधिक शुभ हो जाते हैं।

        यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि गंड मूल दोष निवारण के लिए की जाने वाली पूजा जातक की अनुपस्थिति में भी की जा सकती है तथा जातक के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की स्थिति में इस पूजा में जातक की तस्वीर अर्थात फोटो का प्रयोग किया जाता है जिसके साथ साथ जातक के नाम, उसके पिता के नाम तथा उसके गोत्र आदि का प्रयोग करके जातक के लिए इस पूजा का संकल्प किया जाता है। इस संकल्प में यह कहा जाता है कि जातक किसी कारणवश इस पूजा के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में सक्षम नहीं है जिसके चलते पूजा करने वाले पंडितों में से ही एक पंड़ित जातक के लिए जातक के द्वारा की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं पूरा करने का संकल्प लेता है तथा उसके पश्चात पूजा के समाप्त होने तक वह पंडित ही जातक की ओर से की जाने वाली सारी क्रियाएं करता है जिसका पूरा फल संकल्प के माध्यम से जातक को प्रदान किया जाता है। प्रत्येक प्रकार की क्रिया को करते समय जातक की तस्वीर अर्थात फोटो को उपस्थित रखा जाता है तथा उसे सांकेतिक रूप से जातक ही मान कर क्रियाएं की जातीं हैं। उदाहरण के लिए यदि जातक के स्थान पर पूजा करने वाले पंडित को भगवान शिव को पुष्प अर्थात फूल अर्पित करने हैं तो वह पंडित पहले पुष्प धारण करने वाले अपने हाथ को जातक के चित्र से स्पर्श करता है तथा तत्पश्चात उस हाथ से पुष्पों को भगवान शिव को अर्पित करता है तथा इसी प्रकार सभी क्रियाएं पूरी की जातीं हैं। जातक के व्यक्तिगत रूप से अनुपस्थित रहने की स्थिति में 27 अथवा 108 विभिन्न स्तोत्रों से लाये गये जल, मिट्टी तथा पत्तों का अभिमंत्रित मिश्रण या तो जातक को उसके स्थान पर भेज दिया जाता है अथवा इस मिश्रण के साथ जातक के चित्र अथवा उसकी प्रतिमा बनाकर उसे स्नान करवाया जाता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि व्यक्तिगत रूप से अनुपस्थित रहने की स्थिति में भी जातक को पूजा के आरंभ से लेकर समाप्त होने की अवधि तक पूजा के लिए निश्चित किये गए नियमों का पालन करना होता है भले ही जातक संसार के किसी भी भाग में उपस्थित हो। इसके अतिरिक्त जातक को उपर बताई गई विधि के अनुसार अपने आप को इस पूजा के साथ मानसिक रूप से संकल्प के माध्यम से जोड़ना भी होता है जिससे इस पूजा के अधिक से अधिक शुभ फल जातक को प्राप्त हो सकें।    

लेखक

हिमांशु शंगारी