पित्र दोष निवारण पूजा

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किसी कुंडली में उपस्थित भिन्न भिन्न प्रकार के दोषों के निवारण के लिए की जाने वाली पूजाओं को लेकर बहुत सी भ्रांतियां तथा अनिश्चितताएं बनीं हुईं हैं तथा एक आम जातक के लिए यह निर्णय लेना बहुत कठिन हो जाता है कि किसी दोष विशेष के लिए की जाने वाली पूजा की विधि क्या होनी चाहिए। पित्र दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा को लेकर भी विभिन्न ज्योतिषियों के मत भिन्न भिन्न होने के कारण बहुत अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है जिसके कारण आम जातक को बहुत दुविधा का सामना करना पड़ता है। कुछ ज्योतिषियों का यह मानना है कि पित्र दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा के लिए नासिक स्थित भगवान शिव का त्रंयबकेश्वर नामक मंदिर उत्तम स्थान है, जबकि कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि पितृ दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा के लिए उज्जैन सबसे उत्तम स्थान है तथा इसी प्रकार विभिन्न ज्योतिषी हरिद्वार, गया जी, श्री बद्रीनाथ धाम तथा अन्य भिन्न भिन्न प्रकार के स्थानों को इस पूजा के लिए उत्तम मानते हैं। आज के इस लेख में हम पित्र दोष के निवारण के लिए इन धार्मिक स्थानों पर की जाने वाली पूजा के महत्व के बारे में चर्चा करेंगे परन्तु इससे पूर्व आइए यह देख लें कि पितृ दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा वास्तव में है क्या।

       अनेक वैदिक ज्योतिषी तथा ज्योतिष प्रेमी पित्र दोष के किसी कुंडली में निर्माण को भली प्रकार समझ नहीं पाते जिसके चलते ऐसे ज्योतिषी तथा ज्योतिष प्रेमी पित्र दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा को लेकर भी भ्रम की स्थिति में रहते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि पित्र दोष का कारण यह होता है कि जातक ने अपने पूर्वजों के मृत्योपरांत किये जाने वाले संस्कार तथा श्राद्ध आदि उचित प्रकार से नहीं किये होते जिसके चलते जातक के पूर्वज अर्थात पित्र उसे शाप देते हैं जो पित्र दोष बनकर जातक की कुंडली में उपस्थित हो जाता है तथा जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं उत्पन्न करता है। इसी धारणा के चलते ऐसे वैदिक ज्योतिषी पित्र दोष के निवारण के लिए पित्रों के श्राद्ध कर्म आदि करने, पिंड दान करने तथा नारायण पूजा आदि का सुझाव देते हैं जबकि वास्तविकता में इन उपायों को करने वाले जातकों को पित्र दोष से कोई विशेष राहत नहीं मिलती क्योंकि पित्र दोष वास्तविकता में पित्रों के शाप से नहीं बनता अपितु पित्रों के द्वारा किये गए बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप बनता है जिसका फल जातक को भुगतना पड़ता है तथा जिसके निवारण के लिए जातक को नवग्रहों में से किसी ग्रह विशेष के कार्य क्षेत्र में आने वाले शुभ कर्मों को करना पड़ता है जिनमें से उस ग्रह के वेद मंत्र के साथ की जाने वाली पूजा भी एक उपाय है जिसे पित्र दोष निवारण पूजा भी कहा जाता है। पित्र दोष किसी कुंडली में सूर्य अथवा कुंडली के नौवें घर पर एक अथवा एक से अधिक अशुभ ग्रहों के प्रभाव से बनता है तथा पित्र दोष के निवारण के लिए ऐसे ग्रह के बारे में जानकारी प्राप्त करके इसी ग्रह के वेद मंत्र से इस ग्रह की शांति का प्रयास किया जाता है जिसे पित्र दोष निवारण पूजा के नाम से जाना जाता है इसलिए पित्र दोष निवारण पूजा करवाने के लिए सबसे पहले यह पता होना आवश्यक है कि कुंडली में पित्र दोष बनाने वाला ग्रह कौन सा है। इस लेख के उदाहरण के लिए हम यह मान लेते हैं कि किसी कुंडली विशेष में राहु के सूर्य पर अशुभ प्रभाव होने के कारण कुंडली में पित्र दोष बनता है तथा इस प्रकार हमें इस पित्र दोष के निवारण के लिए राहु के वेद मंत्र के जाप से पित्र दोष निवारण पूजा करनी होगी। इसी प्रकार नवग्रहों में से भिन्न भिन्न प्रकार के ग्रहों के द्वारा विभिन्न कुंडलियों में बनाए जाने वाले पित्र दोष के निवारण के लिए उसी ग्रह के वेद मंत्र के माध्यम से पित्र दोष निवारण पूजा की जाती है।

      किसी भी प्रकार के दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा को विधिवत करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस दोष के निवारण के लिए निश्चित किये गए मंत्र का एक निश्चित संख्या में जाप करना तथा यह संख्या अधिकतर दोषों के लिए की जाने वाली पूजाओं के लिए 125,000 मंत्र होती है। उदाहरण के लिए पित्र दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा में भी पित्र दोष के निवारण मंत्र अर्थात राहु वेद मंत्र का 125,000 बार जाप करना अनिवार्य होता है। पूजा के आरंभ वाले दिन पांच या सात पंडित पूजा करवाने वाले यजमान अर्थात जातक के साथ भगवान शिव के शिवलिंग के समक्ष बैठते हैं तथा शिव परिवार की विधिवत पूजा करने के पश्चात मुख्य पंडित यह संकल्प लेता है कि वह और उसके सहायक पंडित उपस्थित यजमान के लिए पित्र दोष के निवारण मंत्र का 125,000 बार जाप एक निश्चित अवधि में करेंगे तथा इस जाप के पूरा हो जाने पर पूजन, हवन तथा कुछ विशेष प्रकार के दान आदि करेंगे। जाप के लिए निश्चित की गई अवधि सामान्यतया 7 से 10 दिन होती है। संकल्प के समय मंत्र का जाप करने वाली सभी पंडितों का नाम तथा उनका गोत्र बोला जाता है तथा इसी के साथ पूजा करवाने वाले यजमान का नाम, उसके पिता का नाम तथा उसका गोत्र भी बोला जाता है तथा इसके अतिरिक्त जातक द्वारा करवाये जाने वाले पितृ दोष के निवारण मंत्र के इस जाप के फलस्वरूप मांगा जाने वाला फल भी बोला जाता है जो साधारणतया जातक की कुंडली में पित्र दोष का निवारण होता है।

       इस संकल्प के पश्चात सभी पंडित अपने यजमान अर्थात जातक के लिए पितृ दोष निवारण मंत्र अर्थात राहु वेद मंत्र का जाप करना शुरू कर देते हैं तथा प्रत्येक पंडित इस मंत्र के जाप को प्रतिदिन लगभग 8 से 10 घंटे तक करता है जिससे वे इस मंत्र की 125,000 संख्या के जाप को संकल्प के दिन निश्चित की गई अवधि में पूर्ण कर सकें। निश्चित किए गए दिन पर जाप पूरा हो जाने पर इस जाप तथा पूजा के समापन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है जो लगभग 2 से 3 घंटे तक चलता है। सबसे पूर्व भगवान शिव, मां पार्वती, भगवान गणेश तथा शिव परिवार के अन्य सदस्यों की पूजा फल, फूल, दूध, दहीं, घी, शहद, शक्कर, धूप, दीप, मिठाई, हलवे के प्रसाद तथा अन्य कई वस्तुओं के साथ की जाती है तथा इसके पश्चात मुख्य पंडित के द्वारा पितृ दोष के निवारण मंत्र का जाप पूरा हो जाने का संकल्प किया जाता है जिसमे यह कहा जाता है कि मुख्य पंडित ने अपने सहायक अमुक अमुक पंडितों की सहायता से इस मंत्र की 125,000 संख्या का जाप निर्धारित विधि तथा निर्धारित समय सीमा में सभी नियमों का पालन करते हुए किया है तथा यह सब उन्होंने अपने यजमान अर्थात जातक के लिए किया है जिसने जाप के शुरू होने से लेकर अब तक पूर्ण निष्ठा से पूजा के प्रत्येक नियम की पालना की है तथा इसलिए अब इस पूजा से विधिवत प्राप्त होने वाला सारा शुभ फल उनके यजमान को प्राप्त होना चाहिए।

       इस समापन पूजा के चलते नवग्रहों से संबंधित अथवा नवग्रहों में से कुछ विशेष ग्रहों से संबंधित कुछ विशेष वस्तुओं का दान किया जाता है जो विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकता है तथा इन वस्तुओं में सामान्यतया चावल, गुड़, चीनी, नमक, गेहूं, दाल, खाद्य तेल, सफेद तिल, काले तिल, जौं तथा कंबल इत्यादि का दाने किया जाता है। इस पूजा के समापन के पश्चात उपस्थित सभी देवी देवताओं का आशिर्वाद लिया जाता है तथा तत्पश्चात हवन की प्रक्रिया शुरू की जाती है जो जातक तथा पूजा का फल प्रदान करने वाले देवी देवताओं अथवा ग्रहों के मध्य एक सीधा तथा शक्तिशाली संबंध स्थापित करती है। औपचारिक विधियों के साथ हवन अग्नि प्रज्जवल्लित करने के पश्चात तथा हवन शुरू करने के पश्चात पित्र दोष के निवारण मंत्र का जाप पुन: प्रारंभ किया जाता है तथा प्रत्येक बार इस मंत्र का जाप पूरा होने पर स्वाहा: का स्वर उच्चारण किया जाता है जिसके साथ ही हवन कुंड की अग्नि में एक विशेष विधि से हवन सामग्री डाली जाती है तथा यह हवन सामग्री विभिन्न पूजाओं तथा विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकती है। पितृ दोष निवारण मंत्र की हवन के लिए निश्चित की गई जाप संख्या के पूरे होने पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण मंत्रों का उच्चारण किया जाता है तथा प्रत्येक बार मंत्र का उच्चारण पूरा होने पर स्वाहा की ध्वनि के साथ पुन: हवन कुंड की अग्नि में हवन सामग्री डाली जाती है।

       अंत में एक सूखे नारियल को उपर से काटकर उसके अंदर कुछ विशेष सामग्री भरी जाती है तथा इस नारियल को विशेष मंत्रों के उच्चारण के साथ हवन कुंड की अग्नि में पूर्ण आहुति के रूप में अर्पित किया जाता है तथा इसके साथ ही इस पूजा के इच्छित फल एक बार फिर मांगे जाते हैं। तत्पश्चात यजमान अर्थात जातक को हवन कुंड की 3, 5 या 7 परिक्रमाएं करने के लिए कहा जाता है तथा यजमान के इन परिक्रमाओं को पूरा करने के पश्चात तथा पूजा करने वाले पंडितों का आशिर्वाद प्राप्त करने के पश्चात यह पूजा संपूर्ण मानी जाती है। हालांकि किसी भी अन्य पूजा की भांति पितृ दोष निवारण पूजा में भी उपरोक्त विधियों तथा औपचारिकताओं के अतिरिक्त अन्य बहुत सी विधियां तथा औपचारिकताएं पूरी की जातीं हैं किन्तु उपर बताईं गईं विधियां तथा औपचारिकताएं इस पूजा के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं तथा इसीलिए इन विधियों का पालन उचित प्रकार से तथा अपने कार्य में निपुण पंडितों के द्वारा ही किया जाना चाहिए। इन विधियों तथा औपचारिकताओं में से किसी विधि अथवा औपचारिकता को पूरा न करने पर अथवा इन्हें ठीक प्रकार से न करने पर जातक को इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल में कमी आ सकती है तथा जितनी कम विधियों का पूर्णतया पालन किया गया होगा, उतना ही इस पूजा का फल कम होता जाएगा।

         पित्र दोष निवारण के लिए की जाने वाली पूजा के आरंभ होने से लेकर समाप्त होने तक पूजा करवाने वाले जातक को भी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। इस अवधि के भीतर जातक के लिए प्रत्येक प्रकार के मांस, अंडे, मदिरा, धूम्रपान तथा अन्य किसी भी प्रकार के नशे का सेवन निषेध होता है अर्थात जातक को इन सभी वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जातक को इस अवधि में अपनी पत्नि अथवा किसी भी अन्य के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिएं तथा अविवाहित जातकों को किसी भी कन्या अथवा स्त्री के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिएं। इसके अतिरिक्त जातक को इस अवधि में किसी भी प्रकार का अनैतिक, अवैध, हिंसात्मक तथा घृणात्मक कार्य आदि भी नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जातक को प्रतिदिन मानसिक संकल्प के माध्यम से पित्र दोष निवारण पूजा के साथ अपने आप को जोड़ना चाहिए तथा प्रतिदिन स्नान करने के पश्चात जातक को इस पूजा का समरण करके यह संकल्प करना चाहिए कि पित्र दोष निवारण पूजा उसके लिए अमुक स्थान पर अमुक संख्या के पंडितों द्वारा पित्र दोष निवारण मंत्र ( इस उदाहरण के लिए राहु वेद मंत्र ) के 125,000 संख्या के जाप से की जा रही है तथा इस पूजा का विधिवत और अधिकाधिक शुभ फल उसे प्राप्त होना चाहिए। ऐसा करने से जातक मानसिक रूप से पित्र दोष निवारण पूजा के साथ जुड़ जाता है तथा जिससे इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल और भी अधिक शुभ हो जाते हैं।

        यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि पित्र दोष निवारण के लिए की जाने वाली पूजा जातक की अनुपस्थिति में भी की जा सकती है तथा जातक के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की स्थिति में इस पूजा में जातक की तस्वीर अर्थात फोटो का प्रयोग किया जाता है जिसके साथ साथ जातक के नाम, उसके पिता के नाम तथा उसके गोत्र आदि का प्रयोग करके जातक के लिए इस पूजा का संकल्प किया जाता है। इस संकल्प में यह कहा जाता है कि जातक किसी कारणवश इस पूजा के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में सक्षम नहीं है जिसके चलते पूजा करने वाले पंडितों में से ही एक पंड़ित जातक के लिए जातक के द्वारा की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं पूरा करने का संकल्प लेता है तथा उसके पश्चात पूजा के समाप्त होने तक वह पंडित ही जातक की ओर से की जाने वाली सारी क्रियाएं करता है जिसका पूरा फल संकल्प के माध्यम से जातक को प्रदान किया जाता है। प्रत्येक प्रकार की क्रिया को करते समय जातक की तस्वीर अर्थात फोटो को उपस्थित रखा जाता है तथा उसे सांकेतिक रूप से जातक ही मान कर क्रियाएं की जातीं हैं। उदाहरण के लिए यदि जातक के स्थान पर पूजा करने वाले पंडित को भगवान शिव को पुष्प अर्थात फूल अर्पित करने हैं तो वह पंडित पहले पुष्प धारण करने वाले अपने हाथ को जातक के चित्र से स्पर्श करता है तथा तत्पश्चात उस हाथ से पुष्पों को भगवान शिव को अर्पित करता है तथा इसी प्रकार सभी क्रियाएं पूरी की जातीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि व्यक्तिगत रूप से अनुपस्थित रहने की स्थिति में भी जातक को पूजा के आरंभ से लेकर समाप्त होने की अवधि तक पूजा के लिए निश्चित किये गए नियमों का पालन करना होता है भले ही जातक संसार के किसी भी भाग में उपस्थित हो। इसके अतिरिक्त जातक को उपर बताई गई विधि के अनुसार अपने आप को इस पूजा के साथ मानसिक रूप से संकल्प के माध्यम से जोड़ना भी होता है जिससे इस पूजा के अधिक से अधिक शुभ फल जातक को प्राप्त हो सकें।

         पित्र दोष के निवारण के लिए की जानी वाली पूजा की विधि को जान लेने के पश्चात आइए अब यह देखते हैं कि इस पूजा के लिए चुने जाने वाले स्थान की इस सारी विधि में क्या महत्ता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हरिद्वार, बद्रीनाथ धाम, गया जी अथवा भगवान शिव के त्रयंबकेश्वर मंदिर में की जाने वाली पितृ दोष निवारण पूजा का फल किसी साधारण मंदिर में की गई पूजा के फल से अधिक होगा तथा किसी साधारण मंदिर में की गई पूजा का फल मंदिर के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर की गई पूजा के फल से अधिक होगा किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य तथा स्मरण रखने योग्य है कि किसी भी अन्य पूजा की भांति ही पितृ दोष निवारण पूजा के लिए चुना गया स्थान भी इस पूजा की फल प्राप्ति में केवल अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है तथा इस पूजा का वास्तविक फल मुख्य तथा मूल रूप से इस पूजा के लिए किये जाने वाले पित्र दोष निवारण मंत्र के 125,000 जाप में होता है तथा यह जाप ही इस पूजा के फलदायी होने के लिए सबसे महत्वपूर्ण औपचारिकता है तथा बाकी की सभी विधियां तथा औपचारिकताएं केवल इस मंत्र के जाप से प्राप्त होने वाले पुण्य को सही दिशा में निर्देशित करने में तथा कुछ सीमा तक बढा देने में सहायक होतीं हैं तथा इनमें से किसी भी विधि अथवा औपचारिकता में इस पूजा का मुख्य फल नहीं होता। इस लिए पित्र दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा में मंत्र की जाप संख्या को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहिए तथा त्रयंबकेश्वर अथवा उज्जैन जैसे स्थानों पर इस पूजा का आयोजन केवल तभी करवाना चाहिए यदि इन स्थानों पर इस पूजा के लिए उपस्थित रहने वाले पंडित इस जाप की संख्या को पूरा करने में सक्षम तथा संकल्पित हों जिससे इस पूजा के शुरू होने से लेकर समाप्त होने तक लगभग 7 दिन का समय लग जाता है। किन्तु यदि इन स्थानों पर उपस्थित पंडित आपको पितृ दोष निवारण की यह पूजा 2 से 3 घंटों में पूर्ण करवा देने का आश्वासन देते हैं तो ध्यान रखें कि इन पंडितों के द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया पित्र दोष की निवारण पूजा नहीं है अपितु इस पूजा के अंतिम दिन की जाने वाली समापन प्रक्रिया जैसी प्रक्रिया है जिसमे पितृ दोष निवारण मंत्र का जाप सम्मिलित न होने के कारण इसका फल पित्र दोष निवारण के लिए की जाने वाली संपूर्ण पूजा के फल की तुलना में 5% से 10% तक ही होगा तथा इस प्रक्रिया को पूर्ण करवाने से पित्र दोष निवारण पूजा का मुख्य फल जो पित्र दोष के निवारण मंत्र के जाप में है, आपको प्राप्त नहीं होगा।

         इस बात का सदैव ध्यान रखें कि किसी भी अन्य पूजा की भांति ही पित्र दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा में भी पूरी विधि से संपूर्ण प्रक्रिया का पूर्ण होना पूजा के लिए चुने जाने वाले स्थान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है तथा पूजा के लिए चयनित स्थान केवल विधिवत की जाने वाली पूजा के फल को बढ़ाने के लिए होता है। यदि त्रयंबकेश्वर जैसे धार्मिक स्थानों पर बैठे पंडित इस पूजा को पूरी विधि के साथ तथा पित्र दोष निवारण मंत्र की पूरी जाप संख्या के साथ करने में सक्षम हों तो निश्चिय ही इस पूजा को अपने शहर के किसी मंदिर की तुलना में त्रयंबकेश्वर जैसे धार्मिक स्थानों पर करवाना अधिक लाभकारी है। किन्तु यदि इन स्थानों पर उपस्थित पंडित इस पूजा को विधिवत नहीं करते तथा पितृ दोष के निवारण मंत्र का निश्चित संख्या में जाप भी नहीं करते तो फिर इस पूजा को अपने शहर के अथवा किसी अन्य स्थान के ऐसे मंदिर में करवा लेना ही उचित है जहां पर इस पूजा को पूरी विधि तथा मंत्रों के पूरे जाप के साथ किया जा सके। ध्यान रखें कि यदि आप त्रयंबकेश्वर, बद्रीनाथ धाम, गया जी, हरिद्वार तथा उज्जैन जैसे स्थानों पर परम शक्तियों का आशिर्वाद लेने के लक्ष्य से जाना चाहते हैं तो वह आशिर्वाद आप इन स्थानों पर पूर्ण श्रद्धा के साथ जाकर तथा यहां उपस्थित परम शक्तियों को पूर्ण श्रद्धा के साथ नमन करके भी प्राप्त कर सकते हैं। वहीं पर दूसरी ओर यदि आप इन स्थानों पर पित्र दोष के निवारण के लिए की जाने वाली कोई पूजा करवाने जा रहे हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि आपकी पूजा पूरी विधि तथा मंत्रों के जाप के साथ हो रही है। त्रयंबकेश्वर तथा बद्रीनाथ धाम जैसे धार्मिक स्थानों पर जाना तथा इन स्थानों पर उपस्थित परम शक्तियों का आशिर्वाद लेना बहुत शुभ कार्य है तथा प्रत्येक व्यक्ति को यह कार्य यथासंभव करते रहना चाहिए, किन्तु इन धार्मिक स्थानों पर उपस्थित पंडितों के द्वारा दिशाभ्रमित हो जाना अथवा ठगे जाना एक बिल्कुल ही भिन्न विषय है तथा इसलिए धार्मिक स्थानों पर किसी भी प्रकार की पूजा का आयोजन करवाते समय बहुत सतर्क तथा सचेत रहने की आवश्यकता है जिससे आपके दवारा करवाई जाने वाली पूजा का शुभ फल आपको पूर्णरूप से प्राप्त हो सके।

लेखक
हिमांशु शंगारी