अशुभ बुध से पित्र दोष

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ज्योतिष के अनुसार सूर्य को नवग्रहों में से राजा माना जाता है तथा सूर्य हमारी कुंडली में हमारी आत्मा, हमारे पिता, हमारे पूर्वजों, हमारी नर संतान पैदा करने की क्षमता आदि का प्रदर्शन करते हैं जिसके चलते प्रत्येक कुंडली में सूर्य बहुत महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है तथा इसी के कारण सूर्य पर कुंडली में किसी एक या एक से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ने पर जातक के लिए बहुत सीं समस्याएं पैदा हो सकती हैं। कुंडली का नौवां घर हमारे पिता, हमारे दादा, हमारे पूर्वजों आदि को दर्शाता है तथा साथ ही साथ कुंडली का नौवां घर हमारे उस भाग्य को भी दर्शाता है जिसका निर्माण हमारे पूर्व जन्म के अच्छे अथवे बुरे कर्मों के फलस्वरूप हुआ है। इसलिए कुंडली का नौवां घर भी कुंडली के बहुत महत्वपूर्ण घरों में से एक माना जाता है क्योंकि भाग्य के बिना तो कोई भी व्यक्ति कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए किसी कुंडली में सूर्य अथवा कुंडली के नौवें घर के एक अथवा एक से अधिक अशुभ ग्रहों के प्रभाव में आ जाने पर कुंडली में पित्र दोष बन जाता है जो जातक को उसके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के कष्टों से पीड़ित कर सकता है । पित्र दोष पर प्रकाशित पिछले कुछ लेखों में हम विचार कर चुके हैं कि कुंडली के विभिन्न घरों में बनने वाला पित्र दोष जातक को किस प्रकार के कष्ट पहुंचा सकता है। लेखों की इस नई श्रंखला में हम देखेंगे कि कुंडली में विभिन्न नवग्रहों से बनने वाले पित्र दोष जातक के पूर्व जन्म के किन संभावित बुरे कर्मों को दर्शाते हैं तथा आज के इस लेख में हम देखेंगे कि किसी कुंडली में बुध के द्वारा बनाया जाने वाला पित्र दोष जातक अथवा उसके पित्रों के किन संभावित बुरे कर्मों को दर्शाता है।

          ज्योतिष के अनुसार बुध बहन, बेटी, साली, बुआ, छोटी आयु की कन्या, बुद्धि, वाणी, संचार कौशल, व्यापारिक क्षमता, विशलेषणात्मक क्षमता आदि के कारक हैं तथा किसी कुंडली में अशुभ बुध द्वारा पित्र दोष बनाये जाने का अर्थ यह होता है कि ऐसे जातक तथा उसके पूर्वजों ने पिछ्ले जन्मों में बुध की विशेषताओं से संबंधित अपराध किये होते हैं अथवा इन विशेषताओं का दुरुपयोग किया होता है जिसके चलते बुध अशुभ होकर ऐसे जातक की जन्म कुंडली में पित्र दोष बनाते हैं। जिन जातकों ने अथवा जिन जातकों के पूर्वजों ने अपने पिछले जन्म में अपनी बहन अथवा बहनों को सताया होता है उनकी कुंडली में अशुभ बुध पित्र दोष बना सकता है। उदाहरण के लिए किसी कुंडली के सातवें घर में अशुभ बुध से बनने वाले पित्र दोष का अर्थ यह हो सकता है कि जातक अथवा उसके पूर्वजों ने पिछले जन्म में अपनी पत्नि को प्रसन्न करने के लिए अथवा अपनी पत्नि की बातों में आकर अपनी बहन को बहुत कष्ट दिया होता है जिसके कारण जातक की कुंडली में इस प्रकार का पित्र दोष बनता है जिसके अशुभ प्रभाव के कारण जातक के वैवाहिक जीवन में अनेक समस्याएं आ सकतीं है तथा जातक के एक या एक से अधिक विवाह टूट भी सकते हैं तथा सामान्यतया इन विवाहों के टूटने के पीछे जातक के इस जन्म की बहन का ही हाथ होता है जो जातक से अपना पिछला हिसाब पूरा करने आई होती है।

            इसी प्रकार कुंडली के बारहवें घर में अशुभ बुध से बनने वाले पित्र दोष का यह अर्थ हो सकता है कि जातक ने पिछ्ले जन्म में अपनी बहन को बहुत यातना अथवा कष्ट दिये हो तथा जातक ने अपनी बहन के साथ छल किया हो जिसके कारण इस प्रकार का पित्र दोष जातक की कुंडली में बन जाता है जिसके चलते जातक को अपनी बहन के कारण बहुत पीड़ा अथवा बदनामी सहन करनी पड़ सकती है। इस प्रकार के पित्र दोष से पीड़ित जातक की बहन को शराब तथा नशा करने जैसीं आदतें हो सकतीं हैं या ऐसे जातक की बहन चरित्रहीन हो सकती है अथवा किसी व्यक्ति के प्रेम संबंध में पड़कर ऐसी बहन घर से भाग सकती है तथा इन सभी कारणों के चलते जातक को बहुत कष्ट उठाना पड़ सकता है तथा उसकी बहुत बदनामी भी हो सकती है। ऐसे कुछ जातकों को जीवन भर अपनी बहन का दायित्व भी उठाना पड़ सकता है जिसका कारण इनकी बहन का विवाह न होना, विवाह के पश्चात शीघ्र ही तलाक हो जाना अथवा विधवा हो जाना अथवा किसी गंभीर रोग से पीड़ित होना हो सकता है। वास्तव में बहन के माध्यम से आने वाले इस प्रकार के सभी कष्ट जातक के पिछले जन्मों के बुरे कर्मों का फल ही होते हैं।

           कुंडली में इस प्रकार का पित्र दोष यह संकेत भी कर सकता है कि जातक ने अथवा जातक के पूर्वजों ने अपने पिछले जन्म में अपनी बेटी अथवा बहन को गंभीर यातना दी हो सकती है अथवा अपनी बेटी या बहन की हत्या की हो सकती है जिसके चलते इस प्रकार का पित्र दोष जातक की कुंडली में बन सकता है जिसके कारण जातक को अपनी बहन या बेटी के कारण विभिन्न प्रकार की समस्याओं तथा कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। इस प्रकार के पित्र दोष से पीड़ित कुछ जातकों को सामान्यतया पुत्र की प्राप्ति नहीं होती तथा इन जातकों के घर विकलांग पुत्री जन्म ले सकती है जिसके कारण इन जातकों को लगभग सारा जीवन ही ऐसी कन्या की सेवा तथा देखभाल में लगाना पड़ता है। ऐसे ही कुछ अन्य जातकों को अपने बेटी के प्रेम संबंध के कारण बहुत पीड़ा तथा बदनामी उठानी पड़ सकती है क्योंकि इस प्रकार के पित्र दोष से पीड़ित कुछ जातकों की बेटी किसी व्यक्ति के प्रेम संबंध में पड़कर घर से भाग सकती है जिससे जातक की समाज में बहुत बदनामी हो सकती है जबकि इस प्रकार के पित्र दोष से पीड़ित किसी अन्य जातक के हाथों अपनी बेटी के प्रेमी की क्रोध के आवेश में हत्या हो सकती है तथा इस हत्या के अपराध के लिए ऐसे जातक को बहुत लंबे समय तक कारावास में रहना पड़ सकता है। इस प्रकार के पित्र दोष से पीड़ित कुछ जातकों को सारा जीवन कोई संतान नहीं होती जिसका अर्थ यह हो सकता है कि ऐसे जातक ने अथवा उसके पूर्वजों ने पिछले जन्मों में कन्याओं की जन्म लेने से पहले ही पत्नियों के पेट में हत्या की होती है जिसके चलते इन जातकों को इस जन्म में संतान सुख प्राप्त ही नहीं हो पाता।

         जिन जातकों ने अथवा जिन जातकों के पूर्वजों ने पूर्व जन्मों में 12 वर्ष की आयु से छोटी कन्याओं को कष्ट अथवा यातनाएं दीं होतीं हैं अथवा किसी छोटी आयु की कन्या के साथ बलात्कार किया हो या उसकी हत्या की हो, उन जातकों की कुंडली में भी इस प्रकार का पित्र दोष बन सकता है जिसके अशुभ प्रभाव के कारण ऐसे जातकों को कोई प्राण घातक रोग जैसे कि कैंसर, एडस आदि हो सकता है जो इन जातकों को एक लंबे समय तक बहुत कष्ट और पीड़ा देने के बाद इनकी मृत्यु का कारण बनता है। जिन जातकों ने अथवा उनके पूर्वजों ने पिछ्ले जन्मों में अपनी बुद्ध, वाणी कौशल, संचार कौशल तथा बुद्ध द्वारा प्रदान की गईं अन्य विशेषताओं का प्रयोग लोगों के साथ छल करके धन आदि एकत्र करने के लिए किया होता है उनकी कुंडली में भी बुध अशुभ होकर इस प्रकार का पित्र दोष बनाते हैं। उदाहरण के लिए किसी कुंडली के पहले, दूसरे, तीसरे, पांचवें, नौवें, दसवें अथवा ग्यारहवें घर में इस प्रकार का पित्र दोष बनने का अर्थ यह हो सकता है कि जातक ने अपने पूर्व जन्मों में अपनी बुद्धि का प्रयोग अनैतिक कार्यों से धन कमाने के लिए अथवा दूसरों को धोखा देकर धन कमाने के लिए किया था जिसके कारण उसकी कुंडली में इस प्रकार का पित्र दोष बन जाता है जिसके अशुभ प्रभाव के कारण ऐसे जातक के व्यवसायिक क्षेत्र में बहुत समस्याएं तथा रुकावटें आतीं हैं। इस प्रकार के पित्र दोष से पीड़ित बहुत से जातक बहुत शिक्षित तथा योग्य होने के पश्चात भी किसी व्यवसायिक क्षेत्र में विशेष सफल नहीं हो पाते तथा ऐसे कुछ जातकों को तो बहुत शिक्षित तथा योग्य होने के पश्चात भी जीवन भर असफलता का मुंह ही देखना पड़ता है। वास्तव में यह भी जातक के पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का फल ही होता है जिसके माध्यम से प्रकृति जातक को यह संदेश देना चाहती है कि यदि तुम अपनी बुद्धि तथा शिक्षा का दुरुपयोग करोगे तो ऐसी बुद्धि और शिक्षा तुम्हारे लिए बेकार अर्थात निष्फल होकर रह जाएगी।

            यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि किसी कुंडली में अशुभ बुध से बनने वाले पित्र दोष में तथा बुध आदित्य योग में एक बहुत पतली रेखा है क्योंकि इस प्रकार का पित्र दोष तथा बुध आदित्य योग, दोनों ही किसी कुंडली में बुध तथा सूर्य के संयोग से बनते हैं जिसके चलते बहुत से ज्योतिषी ये निर्धारित नहीं कर सकते कि किसी कुंडली में बुध तथा सूर्य का संयोग वास्तव में बुधादित्य योग बना रहा है अथवा पित्र दोष। बुधादित्य योग किसी कुंडली में शुभ बुध तथा शुभ सूर्य के संयोग से बनता है तथा यह योग जातक को उसके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में शुभ फल प्रदान कर सकता है जबकि इस प्रकार का पित्र दोष कुंडली में अशुभ बुध तथा शुभ या अशुभ सूर्य के संयोग से बनता है जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है तथा ऐसे जातक की बुद्धि और अन्य विशेषताएं उसके कुछ विशेष काम नहीं आ पातीं। इसलिए किसी कुंडली में बुधादित्य योग के निर्माण का निर्णय करने से पहले यह देख लेना चाहिए कि कुंडली में बुध तथा सूर्य दोनों ही शुभ रूप से काम कर रहें हैं या नहीं क्योंकि कुंडली में बुध के अशुभ होने पर बुध तथा सूर्य का ऐसा संयोग बुधादित्य योग न बना कर पित्र दोष बना देगा। इसी प्रकार किसी कुंडली मे दिखने वाला इस प्रकार का पित्र दोष वास्तव में बुधादित्य योग भी हो सकता है, अत: इन दोनों योगों के बीच का भेद समझने के लिए कुंडली में बुध तथा सूर्य के शुभ अशुभ स्वभाव का ज्ञान होना परम आवश्यक है।

             इस प्रकार कुंडली में अशुभ बुध से बनने वाला पित्र दोष जातक के पूर्व जन्म के अनेक प्रकार के ऐसे बुरे कर्मों के कारण बन सकता है जो जातक ने अपने पिछ्ले जीवन में किये हों, जो बुध की विशेषताओं को विपरीत रूप से प्रभावित करते हों तथा जिनके लिए जातक को पिछ्ले जन्म में उचित दण्ड न मिला हो। ऐसे कर्म जातक के इस जीवन में उसकी कुंडली में अशुभ बुध के कारण बनने वाले पित्र दोष के माध्यम से चित्रित होते हैं तथा ऐसा पित्र दोष जातक को उसके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसके पूर्व जन्मों के बुरे कर्मों के आधार पर अनेक प्रकार के कष्ट पहुंचाता है। कुंडली में बनने वाले इस प्रकार के पित्र दोष का अशुभ प्रभाव ज्योतिष के उपायों के माध्यम से बहुत सीमा तक कम किया जा सकता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी