योनि दोष

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भारतवर्ष में विवाह कार्यों के लिए की प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में प्रयोग होने वाले अष्टकूटों में से योनि नामक कूट को 4 अंक प्रदान किए जाते हैं जिसके चलते इस कूट का गुण मिलान की विधि में विशेष महत्व है। नए पाठकों की सुविधा के लिए मैं यहां पर गुण मिलान की इस विधि का संक्षेप में वर्णन कर रहा हूं। गुण मिलान की प्रक्रिया में आठ कूटों का मिलान किया जाता है जिसके कारण इसे अष्टकूट मिलान भी कहा जाता है तथा ये आठ कूट हैं, वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी तथा इन सभी कूटों को वर तथा वधू की कुंडलियों से मिलाने के पश्चात अंक दिये जाते हैं तथा इन कूटों को दिये जाने वाले अधिकतम अंक क्रमश: 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 तथा आठ हैं जिसका अर्थ है कि वर्ण मिलान के लिए अधिकतम अंक 1 है तथा नाड़ी मिलान के लिए अधिकतम अंक 8 हैं। इन सभी कूटों में से अधिकतम अंक मिलने की स्थिति में कुल अंक 36 हो जाते हैं जिन्हें कुल गुण भी कहा जाता है तथा जो गुण मिलान की विधि के द्वारा प्रदान किये जाने वाले अधिकतम गुण अथवा अंक हैं। इनमें से प्रत्येक कूट के मिलान को न्यूनतम 0 अंक प्रदान किया जा सकता है जिस स्थिति में इस कूट से संबंधित दोष माना जाता है जैसे कि नाड़ी मिलान को 0 अंक मिलने की स्थिति में नाड़ी दोष, भकूट मिलान को 0 अंक मिलने की स्थिति में भकूट दोष तथा योनि मिलान को 0 अंक मिलने की स्थिति में योनि दोष आदि। 4 अंक धारण करने के कारण योनि को गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है जिसके चलते इसके मिलान को भी आवश्यक समझा जाता है। आज के इस लेख में हम योनि मिलान, योनि दोष तथा योनि दोष से संबंधित अशुभ फलों तथा उनकी वास्तविकता और व्यवहारिकता के बारे में चर्चा करेंगे।

                    सबसे पहले आइए यह देखते हैं कि योनि नाम का यह कूट वास्तव में होता क्या है। प्रत्येक जन्म कुंडली में चन्द्रमा सताइस नक्षत्रों में से किसी न किसी नक्षत्र में उपस्थित होते हैं जिसे जातक का जन्म नक्षत्र कहा जाता है। वैदिक ज्योतिष प्रत्येक नक्षत्र का संबंध किसी न किसी पशु आदि के साथ जोड़ता है तथा इसी जीव को इस नक्षत्र की योनि कहा जाता है। वर वधू की जन्म कुंडलियों में चन्द्र नक्षत्र की योनि को ही क्रमश: वर तथा वधू की योनि कहा जाता है। वैदिक ज्योतिष विभिन्न 27 नक्षत्रों को निम्नलिखित योनियां प्रदान करता है :

अश्विनी तथा शतभिषा : घोड़ा अथवा अश्व

भरणी तथा रेवती : हाथी अथवा गज

कृतिका तथा पुष्य : बकरी अथवा भेड़

मृगशिरा तथा रोहिणी : सर्प

आर्द्र तथा मूल : कुत्ता अथवा कुकुर

पुनर्वसु तथा अश्लेषा : बिल्ली

मघ तथा पूर्वाफाल्गुनी : मूषक अथवा चूहा

उत्तराफाल्गुनी तथा उत्तरभाद्रपद : गाय

हस्त अथा स्वाति : भैंस

चित्रा तथा विशाखा : बाघ

अनुराधा तथा ज्येष्ठा : मृग

पूर्वाषाढ़ा तथा श्रवण : बंदर अथवा वानर

उत्तराषाढ़ा : नेवला

धनिष्ठा तथा पूर्वभाद्रपद : सिंह

                        वैदिक ज्योतिषी इन सभी जीवों के आपसे में संबंध के आधार पर ही योनि कूट के मिलान के लिए दिये जाने वाले अंक निश्चित करता है जिसके चलते वर वधू की योनि से संबधित जीवों के एक ही होने की स्थिति में योनि मिलान के लिए 4 में से 4, मित्र होने की स्थिति में 4 में से 3, सम होने की स्थिति में 4 में से 2, शत्रु होने की स्थिति में 4 में से 1 तथा प्रबल शत्रु होने की स्थिति में 4 में से 0 अंक प्रदान किय जाता है। योनि मिलान में 0 अथवा 1 अंक मिलने की स्थिति को योनि दोष कहा जाता है जिसके कारण वर तथा वधू में शारीरिक समानता की कमी के कारण तालमेल अच्छा नहीं रहता जिसके चलते झगड़ा, अलगाव तथा तलाक भी हो सकता है।

                       उपरोक्त विवरण से यह सपष्ट हो जाता है कि योनि मिलान के लिए कुल 5 संयोग होते हैं तथा इनमें से 2 संयोग योनि दोष बनाते हैं जिससे कुंडली मिलान के लगभग 40% मामलों में योनि दोष बन जाता है जिसके चलते लगभग 40% विवाह तो योनि दोष के कारण ही संभव नहीं हो पायेंगे। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि योनि दोष कुंडली मिलान के समय बनने वाले अनेक दोषों में से केवल एक दोष है तथा कुंडली मिलान में बनने वाले अन्य कई दोषों जैसे कि नाड़ी दोष, भकूट दोष, काल सर्प दोष, मांगलिक दोष आदि में से प्रत्येक दोष भी अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार लगभग 30% से 50% कुंडली मिलान के मामलों में तलाक तथा वैध्वय जैसीं समस्याएं पैदा करने में पूरी तरह से सक्षम है। इन सभी दोषों को भी ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि संसार में होने वाला लगभग प्रत्येक विवाह ही तलाक अथवा वैध्वय जैसी समस्याओं का सामना करेगा क्योंकि अपनी प्रचलित परिभाषाओं के अनुसार इनमें से कोई एक अथवा एक से अधिक दोष लगभग प्रत्येक कुंडलीं मिलान के मामले में बन जाएगा। क्योंकि यह तथ्य वास्तविकता से बहुत परे है इसलिए यह मान लेना चाहिए कि योनि दोष तथा ऐसे अन्य दोष अपनी प्रचलित परिभाषाओं के अनुसार क्षति पहुंचाने में सक्षम नहीं हैं।

                इसलिए कुंडली मिलान के किसी मामले में केवल योनि दोष का उपस्थित होना अपने आप में ऐसे विवाह को तोड़ने में सक्षम नहीं है तथा ऐसा होने के लिए कुंडली में किसी ग्रह द्वारा बनाया गया कोई अन्य गंभीर दोष अवश्य होना चाहिए। मैने अपने ज्योतिष के कार्यकाल में हजारों कुंडलियों का मिलान किया है तथा यह देखा है कि केवल योनि दोष के उपस्थित होने से ही विवाह में कोई गंभीर समस्याएं पैदा नहीं होतीं तथा ऐसे बहुत से विवाहित जोड़ों की कुंडलियां मेरे पास हैं जहां पर कुंडली मिलान के समय योनि दोष बनता है किन्तु फिर भी ऐसे विवाह वर्षों से लगभग हर क्षेत्र में सफल हैं जिसका कारण यह है कि लगभग इन सभी मामलों में ही वर वधू की कुंडलियों में विवाह के शुभ फल बताने वाले कोई योग हैं जिनके कारण योनि दोष का प्रभाव इन कुंडलियों से लगभग समाप्त हो गया है। इसलिए विवाह के लिए उपस्थित संभावित वर वधू को केवल योनि दोष के बन जाने के कारण ही आशा नहीं छोड़ देनी चाहिए तथा अपनी कुंडलियों का गुण मिलान के अलावा अन्य विधियों से पूर्णतया मिलान करवाना चाहिए क्योंकि इन कुंडलियों के आपस में मिल जाने से योनि दोष अथवा गुण मिलान से बनने वाला ऐसा ही कोई अन्य दोष ऐसे विवाह को कोई विशेष हानि नहीं पहुंचा सकता। इसके पश्चात एक अन्य शुभ समाचार यह भी है कि कुंडली मिलान में बनने वाले योनि दोष का निवारण अधिकतर मामलों में ज्योतिष के उपायों से सफलतापूर्वक किया जा सकता है जो हमे इस दोष से न डरने का एक और कारण देता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी