ग्रह मैत्री

ThreeMonstersCover
Book Your Consultation at AstrologerPanditji.com
Buy This Book in India!
Buy This Book in USA!
Buy This Book in UK and Europe!

Read this Page in English  

संबंधित लेख : कुंडली मिलान

इस विषय को YouTube पर देखने के लिए यहां क्लिक कीजिए

भारतवर्ष में विवाह कार्यों के लिए की प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में प्रयोग होने वाले अष्टकूटों में से ग्रह मैत्री नामक कूट को 5 अंक प्रदान किए जाते हैं जिसके चलते इस कूट का गुण मिलान की विधि में बहुत महत्व है। नए पाठकों की सुविधा के लिए मैं यहां पर गुण मिलान की इस विधि का संक्षेप में वर्णन कर रहा हूं। गुण मिलान की प्रक्रिया में आठ कूटों का मिलान किया जाता है जिसके कारण इसे अष्टकूट मिलान भी कहा जाता है तथा ये आठ कूट हैं, वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी तथा इन सभी कूटों को वर तथा वधू की कुंडलियों से मिलाने के पश्चात अंक दिये जाते हैं तथा इन कूटों को दिये जाने वाले अधिकतम अंक क्रमश: 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 तथा आठ हैं जिसका अर्थ है कि वर्ण मिलान के लिए अधिकतम अंक 1 है तथा नाड़ी मिलान के लिए अधिकतम अंक 8 हैं। इन सभी कूटों में से अधिकतम अंक मिलने की स्थिति में कुल अंक 36 हो जाते हैं जिन्हें कुल गुण भी कहा जाता है तथा जो गुण मिलान की विधि के द्वारा प्रदान किये जाने वाले अधिकतम गुण अथवा अंक हैं। इनमें से प्रत्येक कूट के मिलान को न्यूनतम 0 अंक प्रदान किया जा सकता है जिस स्थिति में इस कूट से संबंधित दोष माना जाता है जैसे कि नाड़ी मिलान को 0 अंक मिलने की स्थिति में नाड़ी दोष, भकूट मिलान को 0 अंक मिलने की स्थिति में भकूट दोष तथा गण मिलान को 0 अंक मिलने की स्थिति में गण दोष आदि। 5 अंक धारण करने के कारण ग्रह मैत्री को गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है जिसके चलते इसके मिलान को भी आवश्यक समझा जाता है। आज के इस लेख में हम ग्रह मैत्री मिलान ग्रह मैत्री दोष तथा ग्रह मैत्री दोष से संबंधित अशुभ फलों तथा उनकी वास्तविकता और व्यवहारिकता के बारे में चर्चा करेंगे।

             सबसे पहले आइए यह देखते हैं कि ग्रह मैत्री नाम का यह कूट वास्तव में होता क्या है। प्रत्येक जन्म कुंडली में चन्द्रमा बारह राशियों में से किसी न किसी राशि में उपस्थित होते हैं जिसे जातक की जन्म राशि कहा जाता है तथा इस तथा इस राशि का स्वामी ग्रह ही ग्रह मैत्री के लिए देखा जाता है। मेष तथा वृश्चिक राशियों के स्वामी मंगल को, वृष तथा तुला राशियों के स्वामी शुक्र को, मिथुन तथा कन्या राशियों के स्वामी बुध को, कर्क राशि के स्वामी चन्द्रमा को, सिंह राशि के स्वामी सूर्य को, धनु तथा मीन राशियों के स्वामी बृहस्पति को तथा मकर और कुंभ राशियों के स्वामी शनि महाराज को माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार इन सभी ग्रहों के मध्य स्वभाविक मित्रता, समता तथा शत्रुता को निश्चित किया गया है तथा वर वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रहों के इन्हीं परस्पर संबंध के आधार पर ग्रह मैत्री के कूट का मिलान किया जाता है। ग्रह मैत्री के इस कूट के मिलान के लिए इस प्रकार से गुण अथवा अंक प्रदान किये जाते हैं :

यदि वर वधू की चन्द्र राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो तो इसे उत्तम ग्रह मैत्री मिलान माना जाता है तथा ऐसे ग्रह मैत्री मिलान के लिए 5 में से 5 अंक प्रदान किये जाते हैं।

यदि वर वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रह आपस में क्रमश: मित्र-मित्र हों तो इसे उत्तम ग्रह मैत्री मिलान माना जाता है तथा ऐसे ग्रह मैत्री मिलान के लिए 5 में से 5 अंक प्रदान किये जाते हैं। यहां पर मित्र-मित्र संबंध का अर्थ है कि वर की चन्द्र राशि का स्वामी ग्रह वधू की चन्द्र राशि के स्वामी ग्रह से मित्रता का भाव रखता है तथा वधू की चन्द्र राशि का स्वामी ग्रह वर की चन्द्र राशि के स्वामी ग्रह से मित्रता का भाव रखता है।

यदि वर वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रह आपस में क्रमश: सम-मित्र हों तो ऐसे ग्रह मैत्री मिलान के लिए 5 में से 4 अंक प्रदान किये जाते हैं। यहां पर सम-मित्र संबंध का अर्थ है कि वर तथा वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रहों में से एक ग्रह दूसरे के साथ मित्रता का भाव रखता है जबकि दूसरा ग्रह पहले के साथ समता का भाव रखता है।

यदि वर वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रह आपस में क्रमश: सम-सम हों तो ऐसे ग्रह मैत्री मिलान के लिए 5 में से 3 अंक प्रदान किये जाते हैं। यहां पर सम-सम संबंध का अर्थ है कि वर तथा वधू दोनों की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रह एक दूसरे के साथ समता का भाव रखते हैं।

यदि वर वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रह आपस में क्रमश: मित्र-शत्रु हों तो ऐसे ग्रह मैत्री मिलान के लिए 5 में से 1 अंक प्रदान किया जाता है। यहां पर मित्र-शत्रु संबंध का अर्थ है कि वर तथा वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रहों में से एक ग्रह दूसरे के साथ मित्रता का भाव रखता है जबकि दूसरा ग्रह पहले के साथ शत्रुता का भाव रखता है।

यदि वर वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रह आपस में क्रमश: सम-शत्रु हों तो ऐसे ग्रह मैत्री मिलान के लिए 5 में से ½ अथवा आधा अंक प्रदान किया जाता है। यहां पर सम-शत्रु संबंध का अर्थ है कि वर तथा वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रहों में से एक ग्रह दूसरे के साथ समता का भाव रखता है जबकि दूसरा ग्रह पहले के साथ शत्रुता का भाव रखता है।

यदि वर वधू की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रह आपस में क्रमश: शत्रु-शत्रु हों तो ऐसे ग्रह मैत्री मिलान के लिए 5 में से 3 अंक प्रदान किये जाते हैं। यहां पर शत्रु-शत्रु संबंध का अर्थ है कि वर तथा वधू दोनों की चन्द्र राशियों के स्वामी ग्रह एक दूसरे के साथ शत्रुता का भाव रखते हैं।

           ग्रह मैत्री मिलान के जिन मामलों में 1, ½ अथवा 0 अंक होते हैं, ऐसे मिलानों में ग्रह मैत्री दोष माना जाता है जो वर वधू में मानसिक समानता की कमी को दर्शाता है जिसके चलते विवाह में तनाव, झगड़े, तर्क वितर्क तथा तलाक जैसे परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं। उपरोक्त विवरण से यह सपष्ट हो जाता है कि ग्रह मैत्री मिलान के लिए कुल 7 संयोग होते हैं तथा इनमें से 3 संयोग ग्रह मैत्री दोष बनाते हैं जिससे कुंडली मिलान के लगभग 45% मामलों में ग्रह मैत्री दोष बन जाता है जिसके चलते प्रत्येक पुरुष तथा स्त्री के लिए हर दूसरा पुरुष या स्त्री केवल ग्रह मैत्री दोष के बनने के कारण ही प्रतिकूल हो जाएगा जिसके चलते लगभग 45% विवाह तो ग्रह मैत्री दोष के कारण ही संभव नहीं हो पायेंगे। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि ग्रह मैत्री दोष कुंडली मिलान के समय बनने वाले अनेक दोषों में से केवल एक दोष है तथा कुंडली मिलान में बनने वाले अन्य कई दोषों जैसे कि नाड़ी दोष, भकूट दोष, काल सर्प दोष, मांगलिक दोष आदि में से प्रत्येक दोष भी अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार लगभग 30% से 50% कुंडली मिलान के मामलों में तलाक तथा वैध्वय जैसीं समस्याएं पैदा करने में पूरी तरह से सक्षम है। इन सभी दोषों को भी ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि संसार में होने वाला लगभग प्रत्येक विवाह ही तलाक अथवा वैध्वय जैसी समस्याओं का सामना करेगा क्योंकि अपनी प्रचलित परिभाषाओं के अनुसार इनमें से कोई एक अथवा एक से अधिक दोष लगभग प्रत्येक कुंडलीं मिलान के मामले में बन जाएगा। क्योंकि यह तथ्य वास्तविकता से बहुत परे है इसलिए यह मान लेना चाहिए कि ग्रह मैत्री दोष तथा ऐसे अन्य दोष अपनी प्रचलित परिभाषाओं के अनुसार क्षति पहुंचाने में सक्षम नहीं हैं।

             इसलिए कुंडली मिलान के किसी मामले में केवल ग्रह मैत्री दोष का उपस्थित होना अपने आप में ऐसे विवाह को तोड़ने में सक्षम नहीं है तथा ऐसा होने के लिए कुंडली में किसी ग्रह द्वारा बनाया गया कोई अन्य गंभीर दोष अवश्य होना चाहिए। मैने अपने ज्योतिष के कार्यकाल में हजारों कुंडलियों का मिलान किया है तथा यह देखा है कि केवल ग्रह मैत्री दोष के उपस्थित होने से ही विवाह में कोई गंभीर समस्याएं पैदा नहीं होतीं तथा ऐसे बहुत से विवाहित जोड़ों की कुंडलियां मेरे पास हैं जहां पर कुंडली मिलान के समय ग्रह मैत्री दोष बनता है किन्तु फिर भी ऐसे विवाह वर्षों से लगभग हर क्षेत्र में सफल हैं जिसका कारण यह है कि लगभग इन सभी मामलों में ही वर वधू की कुंडलियों में विवाह के शुभ फल बताने वाले कोई योग हैं जिनके कारण ग्रह मैत्री दोष का प्रभाव इन कुंडलियों से लगभग समाप्त हो गया है। इसलिए विवाह के लिए उपस्थित संभावित वर वधू को केवल ग्रह मैत्री दोष के बन जाने के कारण ही आशा नहीं छोड़ देनी चाहिए तथा अपनी कुंडलियों का गुण मिलान के अलावा अन्य विधियों से पूर्णतया मिलान करवाना चाहिए क्योंकि इन कुंडलियों के आपस में मिल जाने से ग्रह मैत्री दोष अथवा गुण मिलान से बनने वाला ऐसा ही कोई अन्य दोष ऐसे विवाह को कोई विशेष हानि नहीं पहुंचा सकता। इसके पश्चात एक अन्य शुभ समाचार यह भी है कि कुंडली मिलान में बनने वाले ग्रह मैत्री दोष का निवारण अधिकतर मामलों में ज्योतिष के उपायों से सफलतापूर्वक किया जा सकता है जो हमे इस दोष से न डरने का एक और कारण देता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी