भकूट दोष

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नाड़ी दोष की भांति ही भकूट दोष को भी गुण मिलान से बनने वाले दोषों में से बहुत गंभीर दोष माना जाता है तथा अधिकतर ज्योतिषी कुंडली मिलान में भकूट दोष के बनने पर विवाह न करने का परामर्श देते हैं। विवाह आदि के लिए गुण मिलान की विधि का प्रयोग वैदिक समयों से ही होता आ रहा है तथा अधिकतर आधुनिक ज्योतिषी भी गुण मिलान की विधि को बहुत महत्व देते हैं। किन्तु इसी के साथ साथ अनेक ज्योतिषी यह भी मानते हैं कि विवाह आदि के लिए जाने वाली कुंडली मिलान की प्रक्रिया में केवल गुण मिलान कर लेना ही पर्याप्त है जो कि अपने आप में एक अव्यवहारिक तथा अधूरी धारणा है क्योंकि कुंडली मिलान के लिए गुण मिलान के अतिरिक्त भी अन्य कई तथ्यों जैसे कि दोनों कुंडलियों में शुभ अशुभ ग्रहों द्वारा बनाए जाने वाले योगो अथवा दोषों आदि का विचार करना भी आवश्यक तथा अधिकतर मामलों में गुण मिलान की अपेक्षा कहीं अधिक आवश्यक है। गुण मिलान के लिए मिलाए जाने वाले अष्ट कूटों में से भकूट भी एक कूट है जिसके न मिलने पर भकूट दोष बन जाता है जो तलाक तथा वैध्वय जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। आज के इस लेख में हम किसी कुंडली में भकूट दोष के निर्माण, इसके वास्तविक फल तथा इसके महत्व के बारे में चर्चा करेंगे तथा यह विचार भी करेंगे कि क्या भकूट दोष वास्तव में ही इतनी गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकता है या फिर इस दोष के बारे में बढ़ा चढ़ा कर लिखा गया है।

            आइए सबसे पहले यह जान लें कि भकूट दोष वास्तव में होता क्या है तथा ये दोष बनता कैसे है। गुण मिलान की प्रक्रिया में आठ कूटों का मिलान किया जाता है जिसके कारण इसे अष्टकूट मिलान भी कहा जाता है तथा ये आठ कूट हैं, वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी तथा आइए अब देखें कि भकूट नाम का यह कूट वास्तव में होता क्या है। किसी कुंडली में जिस राशि में चन्द्रमा स्थित होते हैं वही राशि कुंडली का भकूट कहलाती है। भकूट दोष का निर्णय वर वधू की जन्म कुंडलियों में चन्द्रमा की किसी राशि में उपस्थिति के कारण बन रहे संबंध के चलते किया जाता है।  यदि वर-वधू की कुंडलियों में चन्द्रमा परस्पर 6-8, 9-5 या 12-2 राशियों में स्थित हों तो भकूट मिलान के 0 अंक माने जाते हैं तथा इसे भकूट दोष माना जाता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि वर की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मेष राशि में स्थित हैं, अब :

यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा कन्या राशि में स्थित हैं तो इसे षड़-अष्टक भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर कन्या राशि छठे तथा कन्या राशि से गिनती करने पर मेष राशि आठवें स्थान पर आती है।

यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा धनु राशि में स्थित हैं तो इसे नवम-पंचम भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर धनु राशि नवम तथा धनु राशि से गिनती करने पर मेष राशि पांचवे स्थान पर आती है।

यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मीन राशि में स्थित हैं तो इसे द्वादश-दो भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर मीन राशि बारहवें तथा मीन राशि से गिनती करने पर मेष राशि दूसरे स्थान पर आती है।

             भकूट दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार षड़-अष्टक भकूट दोष होने से वर-वधू में से एक की मृत्यु हो जाती है, नवम-पंचम भकूट दोष होने से दोनों को संतान पैदा करने में मुश्किल होती है या फिर सतान होती ही नहीं तथा द्वादश-दो भकूट दोष होने से वर-वधू को दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। भकूट दोष को निम्नलिखित स्थितियों में निरस्त अथवा कम प्रभावी माना जाता है :

यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो तो भकूट दोष खत्म हो जाता है। जैसे कि मेष-वृश्चिक तथा वृष-तुला राशियों के एक दूसरे से छठे-आठवें स्थान पर होने के पश्चात भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि मेष-वृश्चिक दोनों राशियों के स्वामी मंगल हैं तथा वृष-तुला दोनों राशियों के स्वामी शुक्र हैं। इसी प्रकार मकर-कुंभ राशियों के एक दूसरे से 12-2 स्थानों पर होने के पश्चात भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों राशियों के स्वामी शनि हैं।

यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों के स्वामी आपस में मित्र हैं तो भी भकूट दोष का प्रभाव कम हो जाता है जैसे कि मीन-मेष तथा मेष-धनु में भकूट दोष निर्बल रहता है क्योंकि इन दोनों ही उदाहरणों में राशियों के स्वामी गुरू तथा मंगल हैं जो कि आपसे में मित्र माने जाते हैं।

इसके अतिरिक्त अगर दोनो कुंडलियों में नाड़ी दोष न बनता हो, तो भकूट दोष के बनने के पश्चात भी इसका प्रभाव कम माना जाता है।

             आइए अब किसी कुंडली में भकूट दोष के निर्माण का वैज्ञानिक ढंग से तथा किसी इस दोष के साथ जुड़े अशुभ फलों का व्यवहारिक दृष्टि से विशलेषण करें तथा इस दोष के निर्माण तथा फलादेश की सत्यता की जांच करें। भकूट दोष की परिभाषा के अनुसार लगभग 30% कुंडलियों में भकूट दोष बन जाता है जिससे प्रत्येक पुरुष तथा स्त्री के लिए हर तीसरा पुरुष या स्त्री केवल भकूट दोष के बनने के कारण ही प्रतिकूल हो जाएगा जिसके चलते लगभग 30% विवाह तो भकूट दोष के कारण ही संभव नहीं हो पायेंगे। जैसा कि हम जानते हैं कि भारतवर्ष के अतिरिक्त अन्य लगभग किसी भी देश में कुंडली मिलान अथवा गुण मिलान जैसी प्रक्रियाओं का प्रयोग नहीं किया जाता इसलिए इन देशों में होने वाला प्रत्येक तीसरा विवाह भकूट दोष से पीड़ित है जिसके चलते इन देशों में होने वाले विवाहों में तलाक अथवा पति पत्नि में से किसी एक की मृत्यु की दर केवल भकूट दोष के कारण ही 33% होनी चाहिए। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि भकूट दोष कुंडलीं मिलान के समय बनने वाले अनेक दोषों में से केवल एक दोष है तथा कुंडली मिलान में बनने वाले अन्य कई दोषों जैसे कि नाड़ी दोष, गण दोष, काल सर्प दोष, मांगलिक दोष आदि में से प्रत्येक दोष भी अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार लगभग 30% से 50% कुंडली मिलान के मामलों में तलाक तथा वैध्वय जैसीं समस्याएं पैदा करने में पूरी तरह से सक्षम है। इन सभी दोषों को भी ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि संसार में होने वाला लगभग प्रत्येक विवाह ही तलाक अथवा वैध्वय जैसी समस्याओं का सामना करेगा क्योंकि अपनी प्रचलित परिभाषाओं के अनुसार इनमें से कोई एक अथवा एक से अधिक दोष लगभग प्रत्येक कुंडलीं मिलान के मामले में बन जाएगा। क्योंकि यह तथ्य वास्तविकता से बहुत परे है इसलिए यह मान लेना चाहिए कि भकूट दोष तथा ऐसे अन्य दोष अपनी प्रचलित परिभाषाओं के अनुसार क्षति पहुंचाने में सक्षम नहीं हैं।

                इसलिए कुंडली मिलान के किसी मामले में केवल भकूट दोष का उपस्थित होना अपने आप में ऐसे विवाह को तोड़ने में सक्षम नहीं है तथा ऐसा होने के लिए कुंडली में किसी ग्रह द्वारा बनाया गया कोई अन्य गंभीर दोष अवश्य होना चाहिए। मैने अपने ज्योतिष के कार्यकाल में हजारों कुंडलियों का मिलान किया है तथा यह देखा है कि केवल भकूट दोष के उपस्थित होने से ही विवाह में कोई गंभीर समस्याएं पैदा नहीं होतीं तथा ऐसे बहुत से विवाहित जोड़ों की कुंडलियां मेरे पास हैं जहां पर कुंडली मिलान के समय भकूट दोष बनता है किन्तु फिर भी ऐसे विवाह वर्षों से लगभग हर क्षेत्र में सफल हैं जिसका कारण यह है कि लगभग इन सभी मामलों में ही वर वधू की कुंडलियों में विवाह के शुभ फल बताने वाले कोई योग हैं जिनके कारण भकूट दोष का प्रभाव इन कुंडलियों से लगभग समाप्त हो गया है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि किसी भी कुंडली में किसी ग्रह द्वारा बनाया गया विवाह संबंधी कोई शुभ या अशुभ योग गुण मिलान के कारण बनने वाले दोषों की तुलना में बहुत अधिक प्रबल होता है तथा दोनों का टकराव होने की स्थिति में लगभग हर मामले में ही विजय कुंडली में बनने वाले शुभ अथवा अशुभ योग की ही होती है। इसलिए कुंडली में विवाह संबंधी बनने वाला मांगलिक योग अथवा मालव्य योग जैसा कोई शुभ योग गुण मिलान में भकूट दोष अथवा अन्य भी दोष बनने के पश्चात भी जातक को सफल तथा सुखी वैवाहिक जीवन देने में सक्षम है जबकि कुंडली में विवाह संबंधी बनने वाले मांगलिक दोष अथवा काल सर्प दोष जैसे किसी भयंकर दोष के बन जाने से भकूट मिलने के पश्चात तथा 36 में से 30 या इससे भी अधिक गुण मिलने के पश्चात भी ऐसे विवाह टूट जाते हैं अथवा गंभीर समस्याओं का सामना करते हैं।

               इसलिए विवाह के लिए उपस्थित संभावित वर वधू को केवल भकूट दोष के बन जाने के कारण ही आशा नहीं छोड़ देनी चाहिए तथा अपनी कुंडलियों का गुण मिलान के अलावा अन्य विधियों से पूर्णतया मिलान करवाना चाहिए क्योंकि इन कुंडलियों के आपस में मिल जाने से भकूट दोष अथवा गुण मिलान से बनने वाला ऐसा ही कोई अन्य दोष ऐसे विवाह को कोई विशेष हानि नहीं पहुंचा सकता। इसके पश्चात एक अन्य शुभ समाचार यह भी है कि कुंडली मिलान में बनने वाले भकूट दोष का निवारण अधिकतर मामलों में ज्योतिष के उपायों से सफलतापूर्वक किया जा सकता है जो हमे इस दोष से न डरने का एक और कारण देता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी