दुर योग, दरिद्र योग

Important Yogas in Vedic Astrology
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दुर योग तथा दरिद्र योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली मे बनने वाले योगों में से अशुभ माना जाता है तथा अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में इन दोनों योगों में से किसी योग के बन जाने से जातक के व्यवसाय तथा आर्थिक समृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

दुर योग : वैदिक ज्योतिष में प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में दसवें घर का स्वामी ग्रह कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में दुर योग बन जाता है जो जातक के व्यवसाय पर बहुत अशुभ प्रभाव डाल सकता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दुर योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों की आर्थिक स्थिति जीवन भर खराब ही रहती है तथा ऐसे जातकों को भारी शारीरिक परिश्रम वाले कार्य करके ही जीवन निर्वाह करना पड़ता है। वहीं पर कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दुर योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अनैतिक तथा अवैध कार्यों के माध्यम से धन कमाते हैं जिसके कारण इन जातकों का समाज में कोई सम्मान नहीं होता तथा ऐसे जातक अपने लाभ के लिए दूसरों को चोट पहुंचाने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते।

           दुर योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह योग प्रत्येक चौथी कुंडली में बनता है क्योंकि कुंडली के दसवें घर के स्वामी ग्रह की किसी कुंडली के बारह में से किन्हीं तीन विशेष घरों में स्थित होने की संभावना प्रत्येक चौथी कुंडली में रहती है। इस प्रकार संसार के प्रत्येक चौथे व्यक्ति की कुंडली में दुर योग बनता है तथा संसार का हर चौथा व्यक्ति दुर योग के अशुभ प्रभाव के कारण अति निर्धन अथवा अपराधी होता है। यह तथ्य वास्तविकता से पर है तथा इसीलिए दुर योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार इस योग का निर्माण नहीं होना चाहिए। मैने अपने अनुभव में यह पाया है कि यदि किसी कुंडली में दसवें घर का स्वामी ग्रह अशुभ होकर कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में बैठ जाए तो ऐसी कुंडली में दुर योग का निर्माण हो सकता है तथा दसवें घर के स्वामी ग्रह के कुंडली में शुभ होकर 6, 8 अथवा 12वें घर में से किसी घर में बैठ जाने पर कुंडली में दुर योग का निर्माण नहीं होता बल्कि ऐसा शुभ ग्रह कुंडली के इन घरों में स्थित होकर कोई शुभ योग भी बना सकता है। कुंडली में दसवें घर के स्वामी ग्रह पर अन्य अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर कुंडली में बनने वाला दुर योग और भी अधिक अशुभ फलदायी हो जाता है।

           उदाहरण के लिए अशुभ मंगल यदि किसी कुंडली में दसवें घर के स्वामी होकर छ्ठे घर में स्थित हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में कुंडली में दुर योग का निर्माण हो सकता है तथा ऐसे मंगल के साथ अशुभ शनि अथवा राहु के भी स्थित हो जाने पर इस योग का फल और भी अधिक अशुभ हो जाता है जिसके चलते इस योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भयंकर अपराधी बन सकते हैं। किन्तु उपरोक्त उदाहरण में कुंडली के इसी छठे घर में बैठा मंगल यदि शुभ हो तो कुंडली में दुर योग नहीं बनेगा तथा ऐसा जातक चिकित्सक, वकील, जज, ज्योतिषी, पुलिस अधिकारी, सेना अधिकारी आदि बन सकता है। इसी प्रकार शुभ मंगल के दसवें घर का स्वामी होकर कुंडली के बारहवें घर में स्थित हो जाने से भी कुंडली में दुर योग नहीं बनता तथा ऐसा जातक धन कमाने के लक्ष्य से विदेश में स्थापित हो सकता है तथा ऐसा जातक विदेश में बहुत धन कमा सकता है। इसलिए किसी कुंडली में दुर योग के बनने या न बनने का निर्णय लेने के लिए कुंडली में दसवें घर के स्वामी ग्रह का स्वभाव तथा कुंडली के अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में जान लेना अति आवश्यक है।

दरिद्र योग : वैदिक ज्योतिष में प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में 11वें घर का स्वामी ग्रह कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में दरिद्र योग बन जाता है जो जातक के व्यवसाय तथा आर्थिक स्थिति पर बहुत अशुभ प्रभाव डाल सकता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दरिद्र योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों की आर्थिक स्थिति जीवन भर खराब ही रहती है तथा ऐसे जातकों को अपने जीवन में अनेक बार आर्थिक संकट का सामाना करना पड़ता है। वहीं पर कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दरिद्र योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अनैतिक तथा अवैध कार्यों के माध्यम से धन कमाते हैं जिसके कारण इन जातकों का समाज में कोई सम्मान नहीं होता तथा ऐसे जातक अपने लाभ के लिए दूसरों को चोट पहुंचाने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते।

             दरिद्र योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह योग प्रत्येक चौथी कुंडली में बनता है क्योंकि कुंडली के 11वें घर के स्वामी ग्रह की किसी कुंडली के बारह में से किन्हीं तीन विशेष घरों में स्थित होने की संभावना प्रत्येक चौथी कुंडली में रहती है। इस प्रकार संसार के प्रत्येक चौथे व्यक्ति की कुंडली में दरिद्र योग बनता है तथा संसार का हर चौथा व्यक्ति दरिद्र योग के अशुभ प्रभाव के कारण अति निर्धन अथवा अपराधी होता है। यह तथ्य वास्तविकता से पर है तथा इसीलिए दरिद्र योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार इस योग का निर्माण नहीं होना चाहिए। मैने अपने अनुभव में यह पाया है कि यदि किसी कुंडली में 11वें घर का स्वामी ग्रह अशुभ होकर कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में बैठ जाए तो ऐसी कुंडली में दरिद्र योग का निर्माण हो सकता है तथा 11वें घर के स्वामी ग्रह के कुंडली में शुभ होकर 6, 8 अथवा 12वें घर में से किसी घर में बैठ जाने पर कुंडली में दरिद्र योग का निर्माण नहीं होता बल्कि ऐसा शुभ ग्रह कुंडली के इन घरों में स्थित होकर कोई शुभ योग भी बना सकता है। कुंडली में 11वें घर के स्वामी ग्रह पर अन्य अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर कुंडली में बनने वाला दरिद्र योग और भी अधिक अशुभ फलदायी हो जाता है।

                उदाहरण के लिए अशुभ बृहस्पति यदि किसी कुंडली में 11वें घर के स्वामी होकर 8वें घर में स्थित हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में कुंडली में दरिद्र योग का निर्माण हो सकता है जिसके चलते इस योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक निर्धन, अति निर्धन, चोर, ठग, जेबकतरे तथा धन कमाने के लिए किसी न किसी प्रकार का धोखा करने वाले हो सकते हैं। किन्तु उपरोक्त उदाहरण में कुंडली के इसी 8वें घर में बैठा बृहस्पति यदि शुभ हो तो कुंडली में दरिद्र योग नहीं बनेगा तथा ऐसा जातक ज्योतिषी, आध्यात्मिक गुरु, आध्यात्मिक प्रवक्ता, योगाचार्य, हस्त रेखा विशषज्ञ, जादूगर, बैंक अधिकारी अथवा वित्तिय सलाहकार आदि बन सकता है। कुंडली के आठवें घर में स्थित इस प्रकार का शुभ बृहस्पति जातक को लाटरी, उत्तराधिकार, वसीयत अथवा अन्य कई प्रकार के अचानक हो जाने वाले धन लाभ भी प्रदान कर सकता है। इसलिए किसी कुंडली में दरिद्र योग के बनने या न बनने का निर्णय लेने के लिए कुंडली के 11वें घर के स्वामी ग्रह का स्वभाव तथा कुंडली के अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में जान लेना अति आवश्यक है।

लेखक
हिमांशु शंगारी