नाग दोष

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नाग दोष की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह माना जाता है कि यदि किसी कुंडली में राहु अथवा केतु कुंडली के पहले घर में, चन्द्रमा के साथ अथवा शुक्र के साथ स्थित हों तो ऐसी कुंडली में नाग दोष बन जाता है जो कुंडली में इस दोष के बल तथा स्थिति के आधार पर जातक को विभिन्न प्रकार के कष्ट तथा अशुभ फल दे सकता है। जैसे कि राहु अथवा केतु की चन्द्रमा के साथ स्थिति के कारण बनने वाला नाग दोष जातक को मानसिक परेशानियां, व्यवसायिक समस्याएं आदि जैसे अशुभ फल दे सकता है, राहु अथवा केतु के किसी कुंडली में लग्न में स्थित होने से बनने वाला नाग दोष जातक को स्वास्थ्य, व्यवसाय तथा वैवाहिक जीवन से संबंधित समस्याएं प्रदान कर सकता है तथा किसी कुंडली में राहु अथवा केतु की शुक्र के साथ स्थिति के कारण बनने वाला नाग दोष जातक के वैवाहिक जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याएं पैदा कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के नाग दोष से पीड़ित जातक का एक अथवा एक से भी अधिक विवाह टूट भी सकते हैं। अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि नाग दोष से पीड़ित जातक ने अपने किसी स्वार्थ के चलते नागों अथवा सांपों को सताया होता है अथवा उन्हें मारा होता है जिसके कारण उन नागों के शाप के कारण जातक की कुंडली में नाग दोष बनता है।

              नाग दोष की एक अन्य प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में राहु अथवा केतु कुंडली के 1, 2, 5 , 7 अथवा 8वें घर में स्थित हों तो ऐसी कुंडली में नाग दोष बनता है जिसके कारण जातक को विभिन्न प्रकार की समस्याओं तथा विपत्तियों का सामना करना पड़ सकता है जो जातक की कुंडली में राहु तथा केतु की स्थिति पर निर्भर करतीं हैं। नाग दोष की प्रचलित परिभाषाओं के अनुसार यदि इस दोष के निर्माण का अध्ययन किया जाए तो इस परिणाम पर पहुंचा जा सकता है कि लगभग प्रत्येक दूसरी कुंडली में नाग दोष बनता है। इसलिए प्रत्येक दूसरा व्यक्ति इस दोष के दुष्प्रभावों से पीड़ित होना चाहिए तथा प्रत्येक दूसरे व्यक्ति ने अपने पिछले जन्म में नागों को मारा होगा जैसा कि इस दोष के निर्माण के साथ जोड़ा जाता है। वर्तमान में दुनिया की कुल जनसंख्या लगभग 7 अरब है जिसका अभिप्राय यह है कि इनमें से लगभग साढ़े तीन अरब लोगों ने अपने पिछले जन्म में सांपों को मारा होगा जिसका अभिप्राय यह है कि संसार की वर्तमान जनसंख्या ही लगभग चार अरब सांपों को मार चुकी है।

            इन आंकड़ों पर विश्वास करना कठिन लगता है तथा यह मान लेना भी व्यवहारिक दृष्टि से उचित तथा तर्कसंगत नहीं है कि संसार के प्रत्येक दूसरे व्यक्ति की कुंडली में नाग दोष बनता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष में प्रचलित कोई भी योग या दोष इतना सहज सुलभ नहीं होता कि संसार के हर दूसरे व्यक्ति की कुंडली में इसका निर्माण हो जाए। इसलिए यह कहा जा सकता है कि किसी कुंडली में नाग दोष का निर्माण अपनी प्रचलित परिभाषाओं के अनुसार नहीं होता तथा इस दोष के निर्माण के लिए अन्य कुछ नियम भी अवश्य ही होने चाहिएं। किसी भी अन्य दोष की भांति ही नाग दोष के निर्माण के लिए भी कुंडली में राहु तथा केतु का अशुभ होना आवश्यक है क्योंकि राहु और केतु क शुभ होने की स्थिति में कुंडली में नाग दोष नहीं बनेगा क्योंकि शुभ ग्रह किसी भी कुंडली में कभी भी दोष नहीं बनाते। राहु और केतु के अशुभ होने के पश्चात इनका कुंडली में सक्रिय होना भी आवश्यक है क्योंकि बिना सक्रिय हुए कोई अशुभ ग्रह भी कुंडली में दोष नहीं बनाता तथा किसी कुंडली के कुछ विशेष घरों में राहु अथवा केतु की स्थिति ही नाग दोष बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। किसी कुंडली में नाग दोष के निर्माण की पुष्टि हो जाने पर कुंडली में इस दोष का बल, इस दोष के अशुभ प्रभाव में आने वाले जातक के जीवन के इस दोष से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों आदि का भी भली भांति निरीक्षण कर लेना चाहिए। कुंडली में बनने वाले नाग दोष के दुष्प्रभावों को वैदिक ज्योतिष के उपायों जैसे कि मंत्र, यंत्र, रत्न तथा कुछ अन्य उपायों के माध्यम से बहुत कम किया जा सकता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी