यंत्रों की कार्यप्रणाली

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मंत्रों की भांति ही वैदिक ज्योतष में यंत्रों को भी किसी कुंडली में उपस्थित दोषों के निवारण के लिए तथा शुभ योगों के फल बढाने के लिए एक शक्तिशाली उपाय की भांति प्रयोग किया जाता है। यंत्रों का प्रयोग किसी विशेष देवी, देवता अथवा ग्रह से शुभ फल प्राप्त करने के लिए अथवा किसी अशुभ ग्रह के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है। मंत्रों की भांति ही यंत्रों को भी कुंडली के शुभ तथा अशुभ दोनों ही प्रकार के ग्रहों से लाभ प्राप्त करने के लिए उपयोग किया जा सकता है जबकि रत्नों का प्रयोग केवल कुंडली के शुभ ग्रहों से लाभ प्राप्त करने के लिए ही किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी कुंडली में सूर्य शुभ रूप से कार्य कर रहा है तो इस शुभ सूर्य के शुभ फलों को बढ़ाने के लिए उत्तम उपाय है माणिक्य को धारण करना जिससे सूर्य को अतिरिक्त उर्जा प्राप्त होगी तथा जातक को अपनी कुंडली के अनुसार सूर्य ग्रह से मिलने वाले शुभ फल में वृद्धि हो जाएगी। किन्तु यदि सूर्य किसी कुंडली में अशुभ रूप से काम कर रहा है तो इस स्थिति में जातक को सूर्य का रत्न माणिक्य धारण नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से कुंडली में अशुभ रूप से कार्य कर रहे सूर्य को अतिरिक्त बल प्राप्त हो जाएगा जिसके चलते ऐसा अशुभ सूर्य जातक को और भी अधिक हानि पहुंचाना शुरू कर देगा। इसलिए इस प्रकार की स्थिति में सूर्य का रत्न धारण नहीं करना चाहिए तथा इसी प्रकार कुंडली में अशुभ रूप से कार्य कर रहे किसी भी ग्रह का रत्न धारण नहीं करना चाहिए।

             कुंडली में उपस्थित अशुभ अथवा नकारात्मक ग्रहों के उपचार के लिए मंत्र तथा यंत्र बहुत अच्छे उपाय सिद्द हो सकते हैं जिनके उचित प्रयोग से कुंडली के अशुभ ग्रहों को शांत किया जा सकता है तथा उनसे लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है। मंत्रों के प्रयोग की प्रक्रिया कठोर नियमों तथा अनुशासन का पालन करने की मांग करती है जिसके चलत जन साधारण के लिए इस प्रक्रिया का अभ्यास अति कठिन है। वहीं दूसरी ओर यंत्रों का प्रयोग रत्नो की भांति ही सहज तथा सरल है जिसके कारण अधिकतर जातक यंत्रों के प्रयोग से लाभ ले सकते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि यंत्रों तथा मंत्रों के माध्यम से भी शुभ ग्रहों को अतिरिक्त शक्ति प्रदान की जा सकती है किन्तु इन स्थितियों में रत्नों का प्रयोग ही उत्तम है क्योंकि रत्न किसी भी ग्रह को शक्ति प्रदान करने का सबसे तीव्र गति वाला तथा सरल उपाय है। रत्नों की तुलना में यंत्रों को अधिक ध्यान देना पड़ता है तथा इन्हें नियमित रूप से नमन इत्यादि भी करना पड़ता है जबकि मंत्रों के प्रयोग में कठोर नियम तथा अनुशासन का पालन करना पड़ता है तथा इसलिए यंत्रों और मंत्रों का प्रयोग अशुभ ग्रहों को नियंत्रित करने के लिए ही करना उचित है। मंत्रों की तुलना में यंत्र कहीं कम नियम तथा अनुशासन की मांग करते हैं तथा इसके अतिरिक्त यंत्र, पूजा की तुलना में बहुत सस्ते भी होते हैं जिसके चलते सामान्य जातक के लिए इनका प्रयोग सुलभ है तथा इसी कारण यंत्रों का प्रचलन दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।

                   आइए अब देखें कि किसी यंत्र की फल प्रदान करने की क्षमता के पीछे कौन सी शक्ति काम करती है। यंत्र आम तौर पर किसी धातु के टुकड़े पर किसी ग्रह विशेष के चित्रों, मंत्रों तथा अंकों इत्यादि का चित्रण करते हैं तथा इन्ही सब के माध्यम से अपने ग्रह विशेष की उर्जा तरंगों को संग्रहित तथा प्रसारित भी करते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि अपना उचित शुभ फल प्रदान करने के लिए किसी भी यंत्र का शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया से होकर निकलना अति आवश्यक है तथा इन प्रक्रियाओं से बिना निकले ही प्रयोग किये जाने वाले यंत्र किसी जातक को कोई विशेष फल नहीं दे पाते। उदाहरण के लिए हम सभी जानते हैं कि एक मोमबत्ती के भीतर हमें प्रकाश देने योग्य अग्नि होती है किन्तु किसी बाहरी उपकरण अर्थात माचिस इत्यादि की सहायता के बिना यह आग प्रकट नहीं होती। इसी प्रकार कोई भी लोहे का टुकड़ा तब तक चुम्बक की भांति व्यवहार नहीं कर सकता जब तक किसी बाहरी उपकरण की सहायता से इसे चुम्बकीय गुण प्रदान न कर दिये जाएं। इसी प्रकार यंत्रों से शुभ फल प्राप्त करने के लिए उनका भी शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा करनी पड़ती है जिसके पश्चात ही इन यंत्रों में अपने ग्रह विशेष की शुभ उर्जा का संग्रह होता है जिसे वे निरंतर प्रसारित करते रहते हैं। किसी भी यंत्र को फल प्रदान करने की क्षमता देने के लिए इसे पहले वैदिक विधियों के द्वारा शुद्ध किया जाता है, तत्पश्चात इस यंत्र में विशेष विधियों तथा मंत्रों के द्वारा इस यंत्र के ग्रह विशेष की उर्जा का संग्रह किया जाता है तथा इसके पश्चात इस यंत्र को किसी व्यक्ति विशेष के लिए संकल्पित किया जाता है जिससे इस यंत्र के शुभ फल केवल उस व्यक्ति को ही प्राप्त हों।

                 यंत्र को विधिवत बनाने के लिए सबसे पहले चरण में यंत्र का शुद्धिकरण किया जाता है जिसके द्वारा कुछ विशेष वैदिक विधियों, मंत्रों तथा पूजा के माध्यम से इस यंत्र को किसी भी प्रकार की अशुद्धियों अथवा नकारात्मक उर्जा से रहित कर दिया जाता है। अगले चरण में यंत्र को उसके ग्रह विशेष के मंत्रों की सहायता से तथा कुछ अन्य विशेष विधियों के माध्यम से उर्जा प्रदान की जाती है जिसे यंत्र अपने भीतर संग्रहित कर लेता है तथा इसके पश्चात अगले चरण में यंत्र को किसी व्यक्ति विशेष के लिए फल प्रदान करने के लिए संकल्पित किया जाता है तथा तत्पश्चात इस यंत्र को फल देने के लिए सक्रिय कर दिया जाता है जिसके पश्चात यह यंत्र अपने धारक को शुभ फल प्रदान करने के लिए सक्षम हो जाता है। इस प्रकार किसी भी यंत्र को फल प्रदान करने के लिए इन सभी आवश्यक चरणों में से निकलना अति आवश्यक है तथा इन सभी प्रक्रियाओं में से विधिवत निकलने के बाद ही यंत्र अपने धारक को वांछित फल देने में सक्षम हो पाता है। यंत्रो को सक्षम बनाने में प्रयोग होने वाली ये विधियां अति विशेष तथा गोपनीय हैं तथा केवल अपने कार्य में प्रवीण कुछ विशिष्ट वैदिक पंडित ही इन विधियों को ठीक प्रकार से करने में सक्षम होते हैं।

                  विधिवत रूप से बनाया गया यंत्र आपको प्राप्त होने के पश्चात अगले चरण में आपको इस यंत्र को अपने ज्योतिषि के परामर्श अनुसार अपने पास स्थापित करना होता है। आपका ज्योतिषि आपको अपने यंत्र को आपके घर में स्थित पूजा के स्थान में स्थापित करने के लिए कह सकता है अथवा इस यंत्र को सदैव अपने पास अपने बटुए अथवा जेब इत्यादि में रखने को भी कह सकता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक यंत्र के साथ अभ्यास करने के लिए कुछ विशेष विधियां भी दीं जातीं हैं जिनका अभ्यास जातक को नियमित रूप से करना होता है जिससे उसका यंत्र उत्तम रूप से कार्य करता रहता है।

               आइए अब किसी यंत्र के फल देने की वास्तविक कार्यप्रणाली से जुड़े कुछ तथ्यों के बारे में चर्चा करते हैं। सामान्यतया प्रत्येक यंत्र विधिवत स्थापित होने के पश्चात अपने ग्रह विशेष की शुभ उर्जा तरंगें प्रसारित करता है जो उस ग्रह की आपके आभामंडल में पहले से ही उपस्थित उर्जा तरंगो के साथ जाकर मिल जातीं हैं तथा आपके आभामंडल में उस ग्रह की उर्जा को पहले की तुलना में शुभ बना देतीं हैं। उदाहरण के लिए, विधिवत बनाया गया तथा स्थापित किया गया एक सूर्य यंत्र सूर्य ग्रह की शुभ उर्जा तरंगें प्रसारित करता है तथा यह उर्जा तरंगें यंत्र के लिए संकल्पित जातक के आभामंडल में प्रवेश करके वहां पर पहले से ही उपस्थित सूर्य की उर्जा तरंगों को अतिरिक्त उर्जा तथा शुभता प्रदान करतीं हैं जिससे जातक का आभामंडल पहले की तुलना में अधिक शुभ हो जाता है तथा जिसके कारण जातक को लाभ होता है। इस प्रकार इस सूर्य यंत्र से प्रसारित होने वाली सूर्य की शुभ उर्जा तरंगें जातक के आभामंडल में उपस्थित सूर्य ग्रह की उर्जा तरंगों के अशुभ होने की स्थिति में उनकी अशुभता को निरंतर कम करती जाएंगी तथा इन उर्जा तरंगों के शुभ होने की स्थिति में इन उर्जा तरंगों को और भी अधिक शुभ तथा बलवान बनाती जाएंगीं जिससे जातक को अपनी कुंडली के अनुसार सूर्य से प्राप्त होने वाले लाभ में निरंतर वृद्धि होती जाएगी। इस प्रकार किसी ग्रह विशेष के यंत्र का प्रयोग उस ग्रह के शुभ फल बढ़ाने के लिए तथा अशुभ फल कम करने के लिए किया जा सकता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी