रत्नों की संभाल कैसे करें

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रत्न धारण करने वाले बहुत से जातक रत्नों की गुण्वत्ता, कार्यक्षमता तथा रत्नों को धारण करने की विधि के विषय में बहुत ध्यानपूर्वक निर्णय लेते हैं किन्तु जब बात रत्नों की संभाल की हो तो अधिकतर जातक या तो इस विषय में जानते ही नहीं अथवा जानते हुए भी इस ओर अधिक ध्यान नहीं देते। रत्न धारण करने वाले अधिकतर जातक यह नहीं जानते कि उनके द्वारा धारण किये गए रत्न कुछ समय के पश्चात अपना प्रभाव कम कर देते हैं जिसके कारण रत्न धारक को इन रत्नों से उस प्रकार के लाभ नहीं प्राप्त हो पाते जैसे इन रत्नों को धारण करने के बाद शीघ्र ही प्राप्त होते हैं। इसका कारण यह है कि समय बीतने के साथ साथ किसी जातक द्वारा अंगूठी अथवा पैंडंट में धारण किये हुए रत्नों पर धूल, मैल तथा अन्य कई प्रकार की अशुद्धियां संग्रहित हो जाती हैं जिनके कारण रत्न अपनी उच्च क्षमता के अनुरूप कार्य करने में सक्षम नहीं रह जाते तथा इन रत्नों से पहले जैसे लाभ लेने के लिए रत्नों पर संग्रहित इन अशुद्धियों को दूर करना अति आवश्यक होता है। आज के इस लेख में हम रत्नों की संभाल तथा सफाई से जुड़े कुछ आसान किन्तु महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में बात करेंगें तथा यह भी देखेंगे कि किस प्रकार रत्नों की संभाल तथा देख रेख घर मे उपलब्ध सामान्य साधनों के माध्यम से ही की जा सकती है।

                 सबसे पहले यह जान लेना आवश्यक है रत्न अपने जीवनकाल के आधार पर दो प्रकार के होते हैं जिनमें से पहली प्रकार के रत्न बहुत लंबे समय तक जीवित रहने वाले होते हैं जिनमें माणिक्य, पन्ना, सभी प्रकार के पुखराज जैसे पीला पुखराज, सफेद पुखराज, नीलम, गोमेद तथा लहसुनिया शामिल हैं तथा दूसरी प्रकार के रत्न अल्पजीवी होते हैं जिनका जीवन केवल कुछ वर्षों तक ही सीमित होता है तथा इन रत्नों में मोती एवं मूंगा शामिल है। इनमें से पहली प्रकार के रत्नों अर्थात दीर्घजीवी रत्नों की संभाल तथा देख रेख की आवश्यकता दूसरी प्रकार के रत्नों की तुलना में कहीं अधिक होती है। समय बीतने के साथ साथ धूल, पसीने, तैलिय पदार्थों तथा अन्य कुछ पदार्थों के कारण इन रत्नों की सतहों पर मैल की परतें जमनी शुरू हो जातीं हैं जो धीरे धीरे मोटी होतीं जातीं हैं तथा जिनके कारण ये रत्न अपने ग्रह विशेष की उर्जा को आकर्षित तथा स्थानांतरित करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं रह जाते जिससे इन रत्नों की कार्यक्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। हालांकि रत्न धारण करने वाले अधिकतर जातक इन रत्नों की दिखाई देने वाली उपरी सतहों पर जमने वाली मैल के प्रति सतर्क रहते हैं तथा जाने अनजाने इस मैल को साफ भी करते रहते हैं जिसके चलते अधिकतर रत्नों की उपरी सतह तो लगभग मैल रहित ही रहती है किन्तु अधिकतर रत्न धारक रत्नों की निचली तथा छिपी रहने वाली सतह पर ध्यान देना भूल जाते हैं जिसके कारण इस सतह पर मैल की परतें जमनी शुरू हो जातीं हैं जो इन रत्नों की कार्यक्षमता को कम कर देतीं हैं क्योंकि निचली सतह पर मैल जमने के कारण रत्न की उपरी सतह से आकर्षित की गईं उर्जा तरंगों को निचली सतह से रत्न धारक के शरीर में स्थानांतरित करने की क्षमता क्षीण हो जाती है। जैसे जैसे मैल की यह परतें समय बीतने के साथ साथ मोटी होती जातीं हैं वैसे वैसे रत्न की कार्यक्षमता कम होती जाती है तथा एक निश्चित सीमा से अधिक मैल जमने पर तो रत्न अपना कार्य करना लगभग बंद ही कर देते हैं जिसके चलते उत्तम गुणवत्ता का रत्न धारण करने के पश्चात भी रत्न धारक को इसका लाभ मिलना बंद हो जाता है।

                      इस लिए रत्न धारण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने रत्नों की नियमित रूप से संभाल एव सफाई करते रहना चाहिए जिससे इन रत्नों पर मैल जमा न हो सके तथा रत्न अपना काम सुचारू रूप से करते रहें। रत्नों को साफ करने का एक आसान तरीका यह है कि आप अपने रत्न को चलते पानी के नीचे एक हाथ से पकड़ कर दूसरे हाथ से किसी टूथब्रश वगैरह से उस रत्न को साफ करने का प्रयास करें जिससे रत्न पर जमा होने वाली मैल ब्रश की क्रिया तथा जल के प्रवाह के चलते हट जाती है। इस प्रकार आप ब्रश की सहायता से अपने रत्न को सभी ओर से साफ कर सकते हैं तथा रत्न की किसी भी सतह पर जमी हुई मैल को दूर कर सकते हैं। कई बार रत्नों पर जमी हुई मैल बहुत तैलिए स्वभाव की होती है जिसके चलते ऐसी मैल केवल जल तथा ब्रश के प्रयोग से ही दूर नहीं होती। इस स्थिति में किसी डिब्बे अथवा बर्तन में थोड़ा सा पानी लेकर उसमें कोई शैम्पू अथवा साबुन मिला दें तथा इस मिश्रण में अपने रत्न अथवा रत्नों को लगभग आधा घंटा अथवा एक घंटा रखें तथा तत्पश्चात अपने रत्नों को इस मिश्रण से बाहर निकाल कर ब्रश तथा साफ पानी की सहायता से साफ करें जिससे आपके रत्न अथवा रत्नों पर जमी हुई जिद्दी मैल भी दूर हो जाएगी तथा आपके रत्न पुन: सुचारू रूप से काम करने के योग्य हो जाएंगे। सामान्यतया इस प्रक्रिया को कुछ महीनों में एक बार कर लेना पर्याप्त होता है किन्तु कुछ स्थितियों में इस प्रक्रिया को अधिक बार भी करना पड़ सकता है, विशेषतया तब जब रत्न धारक कोई ऐसा काम करता हो जिसके कारण रत्नों पर अधिक मैल जमने की संभावनाएं बनती हों।

                   दूसरी प्रकार के रत्नों अर्थात अल्पजीवी रत्नों जिनमें मोती तथा मूंगा शामिल हैं, की सफाई तथा संभाल का तरीका पहली प्रकार के रत्नों की संभाल तथा सफाई के तरीके से भिन्न है। अल्पजीवी रत्न हमारी तव्चा, हवा, पानी, पसीने तथा साबुन इत्यादि के साथ होने वाली क्रियाओं के कारण घिसते रहते हैं ऐसे ही निरंतर घिसते रहने के कारण ये रत्न धीरे धीरे समाप्त होते रहते हैं। इसलिए इन रत्नों को पानी तथा साबुन इत्यादि से यथासंभव दूर ही रखना चाहिए तथा इन रत्नों को धारण करने वाली व्यक्ति को अपने हाथ धोने के समय अथवा नहाने के समय इन रत्नों को उतार देना चाहिए जिससे इनका जीवनकाल लंबा हो जाता है। इन रत्नों की सतहों पर अधिक मैल जमा हो जाने की चिंता कम रहती है क्योंकि इन रत्नों की बाहरी सतहें समय के साथ साथ धीरे धीरे घिस कर लुप्त होती जातीं हैं तथा नीचे सी भीतरी तथा नईं सतहें निकलती रहतीं हैं जिसके कारण बाहरी सतहों पर जमने वाली मैल भी इन सतहों के साथ ही समाप्त होती रहती है। किन्तु यदि फिर भी इन रत्नों की बाहरी सतहों पर मैल जम जाए तो आप इसे किसी गीले तथा नर्म कपड़े की सहायता से अथवा किसी गीले ब्रश की सहायता से साफ कर सकते हैं तथा इस मैल के अधिक तैलिय होने की स्थिति में आप किसी साबुन आदि का प्रयोग भी कर सकते हैं। परन्तु इस बात का ध्यान रखें कि अल्पजीवी रत्नों को साफ करते समय साबुन अथवा शैम्पू इत्यादि का प्रयोग कम से कम करें क्योंकि इनके प्रयोग से इन रत्नों का जीवनकाल अधिक घिसने के कारण कम हो जाता है।

                इस प्रकार इन साधारण सीं दिखने वालीं किन्तु प्रभावशाली प्रक्रियाओं की सहायता से आप अपने रत्नों की नियमित रूप से सफाई तथा संभाल रख सकते हैं तथा इन प्रक्रियों के नियमित अभ्यास से आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि आपके द्वारा धारण किए गए रत्न आपको सदैव अपनी पूर्ण कार्यक्षमता के अनुसार फल प्रदान करते रहें।

लेखक
हिमांशु शंगारी