रत्नों की गुणवत्ता तथा भार

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वैदिक ज्योतिष में रत्नों का प्रचलन बढ़ने के साथ साथ ही रत्नों से संबंधित प्रश्नों की संख्या भी बढ़ती जा रही है जिनमें से एक प्रश्न यह भी है कि किसी रत्न के किसी जातक विशेष के लिए उसकी कुंडली के अनुसार उपयुक्त होने पर उस रत्न का कितना भार जातक को धारण करना चाहिए तथा अन्य एक प्रश्न यह भी है कि किसी रत्न के उपयुक्त होने पर रत्न की गुणवत्ता रत्न की फल देने की क्षमता को किस सीमा तक प्रभावित करती है। किसी कुंडली का अध्ययन करने के पश्चात जातक के लिए उपयुक्त रत्न का चुनाव कर लेना ही अपने आप में पर्याप्त नहीं है तथा इस तथ्य का निर्धारण करना भी अति आवश्यक है कि किसी रत्न विशेष का कितना भार किसी जातक विशेष के लिए उसकी कुंडली के आधार पर उपयुक्त है क्योंकि किसी एक ही रत्न का उपयुक्त भार विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकता है तथा रत्न का भार उपयुक्त न होने पर कई बार रत्न से प्राप्त होने वाले लाभ सीमित हो जाते हैं तथा कई बार तो ऐसा करने से धारक को हानि भी उठानी पड़ सकती है जिसके कारण प्रत्येक रत्न का किसी जातक विशेष के लिए ग्रहण करने योग्य भार महत्वपूर्ण होता है। रत्नों की गुणवत्ता भी एक महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि कम अथवा बहुत कम गुणवत्ता का रत्न धारण करने पर रत्न जातक के लिए उपयुक्त होने के पश्चात भी कोई विशेष शुभ फल प्रदान नहीं कर पाता।

                      रत्नों के लिए उपयुक्त भार के महत्व के बारे में यदि चर्चा करें तो इस तथ्य को जान लेना अति आवश्यक है कि किसी भी रत्न विशेष का किसी जातक विशेष के लिए उपयुक्त होना अपने आप में जातक को समुचित मात्रा में शुभ फल प्रदान करने के लिए पर्याप्त नहीं है तथा उपयुक्त रत्न का ग्रहण करने योग्य भार जानना भी अति आवश्यक होता है। मैने ऐसे कई जातकों को देखा है जो अपने लिए उपयुक्त रत्नों से समुचित लाभ केवल इस लिए नहीं उठा सके कि उन्होने इन रत्नों के लिए उपयुक्त बताए गए भार की अपेक्षा बहुत कम भार के रत्न धारण किये थे तथा दूसरी ओर मैने कुछ जातकों को उपयुक्त रत्न धारण करने के पश्चात भी केवल इसी लिए हानि उठाते देखा है कि उन्होनें इन रत्नों के लिए उपयुक्त बताए गए भार की अपेक्षा बहुत अधिक भार के रत्न धारण किये थे। रत्न बहुत सीमा तक औषधियों की भांति ही कार्य करते हैं तथा हम जानते हैं कि किसी रोग के लिए उपयुक्त किसी औषधि का केवल नाम जान लेना ही रोग के निवारण के लिए पर्याप्त नहीं है तथा औषधि के सेवन की विधि, तथा औषधि के सेवन की उचित मात्रा को जानना भी अति आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए इंसुलिन नामक औषधि का प्रयोग मधुमेह को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है किन्तु इस औषधि की मात्रा विभिन्न रोगियों के लिए भिन्न भिन्न होती है जो रोगी के रोग की दशा को देखने का बाद ही निर्धारित की जाती है। यदि किसी व्यक्ति को रक्त में शर्करा अथवा शूगर बढ़ने का रोग है तथा चिकित्सक ने इस व्यक्ति को दिन में तीन बार इंसुलिन की 10 इकाई इंजैक्शन के माध्यम से शरीर में डालने का दिशा निर्देश दिया है तो ऐसी स्थिति में यदि यह रोगी दिन में केवल 2 इकाई इंसुलिन का सेवन करे तो इस व्यक्ति की रक्त शर्करा नियंत्रित नहीं होगी क्योंकि इंसुलिन की 2 इकाई इस व्यक्ति की रक्त शर्करा को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं है। दूसरी ओर यदि यही व्यक्ति इंसुलिन की 20 या 30 इकाईयों का सेवन करना शुरू कर दे तो इस व्यक्ति की रक्त शर्करा अचानक ही सामान्य स्तर से भी नीचे गिर जाएगी जिसके चलते इस व्यक्ति को गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। इस प्रकार किसी भी औषधि का एक निश्चित मात्रा में सेवन करना ही लाभप्रद होता है।

                     इसी प्रकार जब कोई जातक किसी उपयुक्त रत्न के ग्रहण करने योग्य भार से बहुत अधिक भार का रत्न धारण करता है तो ऐसा रत्न जातक के लिए उपयुक्त होने के पश्चात भी जातक को हानि पहुंचा सकता है। अधिकतर जातकों की कुंडलियों में शुभ ग्रह भी इस प्रकार से स्थित होते हैं कि इनके रत्न धारण करके इन्हें एक निश्चित मात्रा में उर्जा प्रदान करके इनसे लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं जबकि इन्हीं शुभ ग्रहों को जब आवश्यकता से अधिक उर्जा प्राप्त हो जाती है तो ये ग्रह अत्याधिक शक्ति के चलते निरंकुश हो जाते हैं तथा कुंडली के दूसरे ग्रहों की कार्यप्रणाली को विपरीत रूप से प्रभावित कर देते हैं जिसके चलते जातक के आभामंडल में अवांछनीय परिवर्तन हो जाते हैं जिनके कारण जातक को विचित्र स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है तथा हानि भी उठानी पड़ सकती है। एक अन्य उदाहरण के लिए बहुत से लोग विटामिनों तथा खनिजों की कमी के चलते इन विटामिनों तथा खनिजों से भरपूर विशेष औषधियों का सेवन करते हैं जिससे उनके शरीर में इन विटामिनों तथा खनिजों की कमी को पूरा किया जा सके किन्तु एक सीमा से अधिक इन औषधियों का सेवन करने से शरीर में ये विटामिन तथा खनिज आवश्यकता से अधिक हो जाते हैं जिसके कारण इनका सेवन करने वाले लोगों को इस बहुतायत के कारण होने वाले दुष्प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं जो कई बार तो गभीर स्थिति भी पैदा कर सकते हैं। किसी रत्न के लिए धारण करने योग्य उपयुक्त भार उस रत्न से संबंधित ग्रह को वह आवश्यक उर्जा उपलब्ध करवाता है जिसकी उस ग्रह के पास कुंडली में अपनी स्थिति को लेकर अथवा अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण कमी होती है तथा इस आवश्यक अतिरिक्त उर्जा को प्राप्त करने पर वह ग्रह अपना कार्य सुचारू रूप से करना शुरू कर देता है जिससे रत्न धारक को लाभ होता है। किन्तु इसी रत्न का भार आवश्यकता से बहुत अधिक बढ़ जाने पर यह रत्न अपने ग्रह विशेष को आवश्यकता से कहीं अधिक उर्जा प्रदान कर सकता है जिसके कारण इस अतिरिक्त उर्जा के कारण वह ग्रह अनियंत्रित अथवा निरंकुश होकर जातक को हानि भी पहुंचा सकता है तथा इसीलिए किसी भी रत्न को धारण करने से पूर्व उस रत्न का उपयुक्त भार जान लेना भी अति आवश्यक है।

                     रत्नों की गुणवत्ता के बारे में यदि चर्चा की जाए तो यह देखने में आता है कि बहुत से जातक धन बचाने के लिए कम अथवा बहुत कम गुणवत्ता वाले रत्न खरीद लेते हैं किन्तु ऐसे जातक यह भूल जाते हैं कि किसी भी रत्न में अपना फल देने के लिए एक निर्धारित गुणवत्ता तथा कार्यक्षमता का होना अति आवश्यक है तथा इनके न होने की स्थिति में रत्न अपने फल ठीक प्रकार से नही दे पाता अथवा दे ही नहीं पाता। रत्न अपनी उपरी सतह से अपने ग्रह विशेष की उर्जा तरंगों को आकर्षित करते हैं तथा अपनी निचली सतह से इन उर्जा तरंगों को धारक के शरीर में स्थानांतरित कर देते हैं। रत्न की उपरी सतह से लेकर रत्न की निचली सतह तक जाने के लिए उर्जा की इन तरंगों को रत्न के भीतर से होकर जाना पड़ता है तथा यहां पर रत्न की गुणवत्ता का विशेष महत्व होता है। रत्नों के भीतर कई प्रकार की अशुद्धियां पायीं जातीं हैं जो सामान्यतया बिंदुओं के रूप में, रेखाओं के रूप में अथवा बादलों के रूप में देखीं जातीं है। रत्नों के भीतर उपस्थित ये अशुद्धियां किसी ग्रह विशेष की उर्जा तरंगों को रत्न की उपरी सतह से लेकर रत्न की निचली सतह तक जाने से रोक देतीं हैं तथा इन उर्जा तरंगों को रास्ते से ही वापिस लौटा देतीं हैं जिसके चलते रत्न की उपरी सतह से रत्न के भीतर प्रवेश करने वाली सभी उर्जा तरंगें निचली सतह के माध्यम से रत्न धारक के शरीर में स्थानांतरित नहीं हो पातीं तथा रत्न धारक को रत्न का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता।

                 इस प्रकार किसी रत्न में अशुद्धियों की मात्रा जितनी अधिक होती है उस रत्न की कार्यक्षमता तथा गुणवत्ता उतनी ही कम होती है। यदि कोई रत्न अपनी उपरी सतह से प्रवेश करने वाली सभी की सभी उर्जा तरंगों को निचली सतह से धारक के शरीर में स्थानांतरित करने में सक्षम हो तो ऐसे रत्न की कार्यक्षमता शत प्रतिशत अथवा 100% कही जाती है तथा जैसे जैसे रत्न के भीतर अशुद्धियों की मात्रा बढ़ती जाती है, रत्न की कार्यक्षमता कम होती जाती है। मैने अपने अध्ययन तथा शोध में यह पाया है कि किसी भी रत्न में अपने धारक को दिखाई देने वाले शुभ फल प्रदान करने के लिए कम से कम 40% कार्यक्षमता का होना आवश्यक है जिसका अर्थ यह है कि यह रत्न अपनी उपरी सतह से अपने भीतर प्रवेश करने वालीं उर्जा की प्रत्येक 100 तरंगों में से कम से कम 40 उर्जा तरंगों को अपनी निचली सतह से रत्न धारक के शरीर में स्थानांतरित करने की क्षमता का स्वामी हो तथा यह तभी संभव है जब रत्न के भीतर उपस्थित अशुद्धियां एक निश्चित मात्रा से कम हों। जैसे जैसे रत्नों के भीतर की अशुद्धियां कम होती जातीं हैं वैसे वैसे रत्नों की कार्यक्षमता तथा गुणवत्ता बढ़ती जाती है। उत्तम रत्नों की कार्यक्षमता 95% तक या इससे भी अधिक हो सकती है जिसका अर्थ यह है कि ऐसे रत्न अशुद्धियों से लगभग रहित होने के कारण अपने भीतर प्रवेश करने वाली उर्जा की लगभग सभी तरंगों को रत्न धारक के शरीर में स्थानांतरित करने की क्षमता रखते हैं।

                यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि उत्तम गुणवत्ता वाले रत्न अपने ग्रह विशेष की कुछ ऐसी विशिष्ट उर्जा तरंगें भी आकर्षित करने में सक्षम होते हैं जो अन्य उर्जा तरंगों की तुलना में विशेष होने के कारण धारक को विशिष्ट लाभ प्रदान कर सकतीं हैं तथा इन विशिष्ट उर्जा तरंगों को आकर्षित कर पाना कम गुणवत्ता वाले रत्नों के लिए संभव नहीं होता। इस लिए रत्नों को खरीदते समय यह निश्चित कर लेना आवश्यक है कि आपके द्वारा खरीदा जाने वाला रत्न एक निश्चित कार्यक्षमता तथा गुणवत्ता से नीचे नहीं है। बहुत कम दामों में किसी ऐसे माणिक्य अथवा पीले पुखराज को खरीद लेना जिसकी कार्यक्षमता 10% या इससे भी कम हो, इसे धन की बचत नहीं कहा जा सकता बल्कि ऐसे रत्न की खरीद में लगाया गया सारे का सारा धन ही व्यर्थ समझना चाहिए। इसलिए रत्नों की खरीद करते समय उनकी कार्यक्षमता तथा गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। धन बचाने के लिए 80% कार्यक्षमता की तुलना में 50% कार्यक्षमता वाले रत्न का चुनाव करना एक उचित निर्णय हो सकता है किन्तु 10% कार्यक्षमता वाला रत्न खरीदना अधिकतर स्थितियों में बचत अथवा बुद्दिमानी न होकर एक अनुचित निर्णय ही होता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी