रत्नों का शुद्दिकरण एवं प्राण प्रतिष्ठा

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वैदिक ज्योतिष द्वारा सुझाए जाने वाले नवग्रहों के रत्नों को धारण करने वाले जातकों की तथा इनसे लाभ उठाने वाले जातकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है क्योंकि यह तथ्य अब बलवान होता जा रहा है कि वैदिक ज्योतिष द्वारा बताए जाने वाले उपायों में रत्नों का अपना एक विशिष्ट स्थान है तथा रत्न बहुत अल्प समय में ही धारक को अनेक प्रकार के शुभ फल देने में सक्षम होते हैं। रत्न धारण करने का प्रचलन बढ़ने के साथ साथ ही रत्न धारण करने से जुड़े कई प्रकार के प्रश्न भी उत्पन्न हो रहे हैं जैसे कि रत्नों की पहचान कैसे की जाए, रत्न को धारण करने की सही विधि क्या है, रत्नों की देखभाल कैसे करनी चाहिए, इत्यादि। अनेक ज्योतिषियों का यह मानना है कि नवग्रहों में से किसी ग्रह के रत्न से उचित लाभ तभी प्राप्त किया जा सकता है जब इस रत्न को धारण करने से पूर्व नियमित रूप से इसका शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा की गई हो तथा बिना शुद्धिकरण और प्राण प्रतिष्ठा के किसी रत्न को धारण करने का कोई लाभ नहीं होता उल्टा ऐसा करने से रत्न अशुभ फल भी दे सकता है। रत्नों के शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा की विधि अतंयत तकनीकी है तथा कुछेक विशेषज्ञ वैदिक पंडितों एवं विद्वानों के अतिरिक्त अधिकतर व्यक्ति इस विधि को उचित रूप से पूरा करने में सक्षम नहीं होते जिसके कारण बहुत से रत्न धारक अपने रत्नों की उचित विधि से प्राण प्रतिष्ठा नहीं करवा पाते तथा इन जातकों के मन में यह शंका बनी रहती है कि क्या बिना प्राण प्रतिष्ठा के तथा शुद्धिकरण करवाए धारण किए गए रत्न उन्हें लाभ प्रदान करेंगें अथवा नहीं। इसलिए आज के लेख में हम इसी विषय पर चर्चा करेंगें कि रत्नों के शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा का क्या महत्व है तथा क्या बिना शुद्धिकरण एवं प्राण प्रतिष्ठा करवाए किसी रत्न को धारण करना चाहिए अथवा नहीं।

                     सबसे पहले आइए इस तथ्य पर विचार करते हैं कि रत्नों के शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा की वास्तव में आवश्यकता क्या है। कोई भी रत्न किसी जातक के द्वारा धारण किए जाने से पहले बहुत से व्यक्तियों के हाथों से निकलता है तथा इन सभी व्यक्तियों का आभामंडल इस रत्न को प्रभावित करता है तथा अपना प्रभाव इस रत्न पर संग्रहित कर देता है। इस प्रकार लगभग सभी रत्नों पर अनेक प्रकार के व्यक्तियों के आभामंडल का प्रभाव होता है तथा विभिन्न प्रकार के इन व्यक्तियों के आभामंडल तथा उनके प्रभाव भी भिन्न भिन्न प्रकार के हो सकते हैं जैसे कि यदि किसी व्यक्ति का आभामंडल शुभ है तो उस व्यक्ति के छूने से किसी रत्न पर उसके शुभ आभामंडल का प्रभाव संग्रहित हो जाएगा तथा यदि किसी व्यक्ति का आभामंडल अशुभ है तो उस व्यक्ति के स्पर्श से किसी रत्न पर उसके अशुभ आभामंडल का प्रभाव संग्रहित हो जाएगा। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि हालांकि किसी रत्न को स्पर्श करने वाले सभी व्यक्तियों का शुभ अथवा अशुभ आभामंडल उस रत्न को प्रभावित करता है किन्तु जिन व्यक्तियों ने किसी रत्न को बहुत कम अथवा अल्प समय के लिए स्पर्श किया होता है, उनके आभामंडल का शुभ अथवा अशुभ प्रभाव उस रत्न पर बहुत अधिक नहीं पड़ता जिसके कारण रत्नों को किए गए ऐसे स्पर्श रत्न धारक के लिए अधिक चिंता का विषय नहीं होते। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों ने किसी रत्न का स्पर्श लंबे समय के लिए किया हो तो उनका शुभ अथवा अशुभ आभामंडल उस रत्न पर अपना प्रबल प्रभाव संग्रहित कर देता है तथा ऐसे प्रभाव के अशुभ अथवा नकारात्मक होने पर यह प्रभाव रत्न धारण करने वाले के लिए चिंताएं उत्पन्न कर सकता है। उदाहरण के लिए यदि किसी रत्न को किसी व्यक्ति ने कुछ महीनों के लिए अथवा कुछ वर्षों के लिए धारण किया हो तो उस व्यक्ति के आभामंडल का प्रबल प्रभाव उस रत्न पर संग्रहित हो जाता है जिसके चलते इस रत्न को उस व्यक्ति के पश्चात धारण करने वाले धारक को रत्न के साथ साथ उस व्यक्ति के आभामंडल का प्रभाव भी ग्रहण करना पड़ता है तथा यदि यह आभामंडल अशुभ अथवा नकारात्मक हो तो ऐसा आभामंडल रत्न धारक के लिए समस्या पैदा कर सकता है।

                   इस प्रकार किसी अशुभ आभामंडल द्वारा प्रभावित रत्न को धारण करने से धारक को हानि उठानी पड़ सकती है जो उस रत्न का दुष्प्रभाव न होकर उस रत्न पर पूर्व संग्रहित किसी अन्य व्यक्ति के अशुभ आभामंडल का प्रभाव होता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि यदि अशुभ आभामंडल से प्रभावित कोई रत्न किसी व्यक्ति के लिए शुभ है तो उस अशुभ आभामंडल के साथ साथ रत्न के द्वारा धारक के शरीर में उसके ग्रह विशेष की शुभ उर्जा का स्थानांतरण भी होगा जिसके चलते ऐसे जातक को यह रत्न एक ही समय में अशुभ तथा शुभ उर्जाओं का प्रभाव देगा तथा ऐसी ही स्थितियों के लिए रत्नों के शुद्धिकरण की विधि का उपयोग किया जाता है। रत्नों के शुद्धिकरण की प्रक्रिया वह विधि है जिसके माध्यम से मंत्रों तथा पूजा की शक्ति से तथा कुछ अन्य तकनीकी प्रक्रियाओं की सहायता से किसी भी रत्न पर पूर्व संग्रहित किसी भी प्रकार के अशुभ आभामंडल के प्रभाव को दूर कर दिया जाता है जिससे ऐसा रत्न किसी भी प्रकार के अन्य अशुभ प्रभाव से रहित होकर केवल अपना वास्तविक प्रभाव ही देने में सक्षम हो जाता है। इस प्रकार विधिवत शुद्ध किया हुआ रत्न धारण करने से धारक को केवल उस रत्न का प्रभाव ही प्राप्त होता है तथा किसी भी अन्य प्रकार का कोई अशुभ प्रभाव धारक को प्राप्त नहीं होता। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि किसी रत्न को अल्प समय के लिए स्पर्श करने वाले व्यक्ति का आभामंडल उस रत्न पर सामान्यतया कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाता जिसके कारण रत्न को बाद में धारण करने वाले व्यक्ति को ऐसा आभामंडल विशेष रूप से प्रभावित नहीं कर पाता तथा बाद वाले धारक का अपना आभामंडल शीघ्र ही पहले वाले आभामंडल पर प्रभावी हो जाता है। किन्तु लंबे समय के लिए स्पर्श किये गये किसी रत्न पर स्पर्श करने वाले व्यक्ति का आभामंडल अपना प्रबल प्रभाव संग्रहित कर देता है तथा किसी अन्य व्यक्ति के इसी रत्न को धारण करने पर यह प्रभाव कुछ दिनों अथवा कुछ महीनों तक भी धारक को प्रभावित कर सकता है जिसके कारण ऐसे रत्न का शुद्धिकरण करवा लेना ही उत्तम उपाय है।

                   आइए अब रत्नों की प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया के बारे में चर्चा करते हैं। किसी रत्न की प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया वह विधि है जिसके माध्यम से उस रत्न को उसके ग्रह विशेष के मंत्रों की शक्ति से अतिरिक्त तथा शुभ उर्जा प्रदान की जाती है तथा कुछ अन्य विशिष्ट विधियों तथा पूजन के माध्यम से उस रत्न को किसी व्यक्ति विशेष को लाभ देने के प्रयोजन से निर्देशित भी किया जाता है जिसके चलते यह रत्न अपने धारक को अपने सामान्य फल के अतिरिक्त विशेष रूप से इसमें संग्रहित किया गये शुभ फल भी प्रदान करता है जिसके कारण रत्नों की प्राण प्रतिष्ठा की इस विधि का भी अपना एक विशेष महत्व है क्योंकि विधिवत प्राण प्रतिष्ठित रत्न सदैव ही अपने धारक को पहले से कहीं अच्छा फल देने में सक्षम होता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि प्राण प्रतिष्ठा के बिना भी प्रत्येक रत्न अपने धारक के शरीर में अपने ग्रह विशेष की उर्जा स्थानांतरित करने में सक्षम होता है किन्तु प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया के पश्चात रत्न अपने ग्रह विशेष के साथ अपेक्षाकृत अधिक गहन रूप से जुड़ जाता है जिसके चलते धारक को इस रत्न के फल सामान्य रत्न की तुलना में अधिक प्राप्त होते हैं। इस प्रकार किसी रत्न की प्राण प्रतिष्ठा को रत्न धारण करने से पूर्व किए जाने वाली एक आवश्यक प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि प्रत्येक रत्न बिना प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया के भी अपने फल देने में सक्षम होता है तथा प्राण प्रतिष्ठा की इस प्रक्रिया को किसी रत्न विशेष के शुभ फल बढ़ा देने वाली प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।

                लेख के अंत में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि रत्नों के शुद्धिकरण की प्रक्रिया तभी आवश्यक है यदि आपसे पूर्व उस रत्न को किसी व्यक्ति ने धारण किया हो अथवा लंबे समय के लिए स्पर्श किया हो। यदि आप को पूर्ण विश्वास है कि आपसे पूर्व रत्न को किसी ने भी धारण नहीं किया है तो आप रत्न के शुद्धिकरण की इस प्रक्रिया की उपेक्षा भी कर सकते हैं किन्तु किसी अन्य व्यक्ति के आपसे पूर्व किसी रत्न को धारण करने की स्थिति में ऐसे रत्न का शुद्धिकरण करवा लेने में ही बुद्धिमानी है। अब जहां तक बात है किसी रत्न की प्राण प्रतिष्ठा की, तो यह प्रक्रिया किसी भी रत्न को धारण करने से पूर्व की जाने वाली आवश्यक क्रिया के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए अपितु रत्नों की प्राण प्रतिष्ठा की इस प्रक्रिया को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए जो आपके द्वारा धारण किये जाने वाले रत्न के शुभ प्रभावों को बढ़ा सकती है। 

लेखक
हिमांशु शंगारी