नवग्रहों के रत्न ही क्यों

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ज्योतिष में रत्नों का महत्व दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है तथा अधिक से अधिक लोग अब रत्न धारण करने के प्रति रुचि दिखाने लगे हैं जिसका कारण शायद यह है कि वैदिक ज्योतिष में उपलब्ध अन्य उपायों की तुलना में रत्न कहीं अधिक शीघ्रता से अपना कार्य करने में सक्षम होते हैं जिसके चलते जन सामान्य का रुझान रत्न धारण करने की ओर बढ़ता जा रहा है। रत्न धारण करने का प्रचलन बढ़ने के साथ ही बाजारों में अनेक प्रकार के रत्न विभिन्न दुकानों पर उपलब्ध हो गये हैं हालांकि वैदिक ज्योतिष इनमें से केवल नवग्रहों से संबंधित रत्न धारण करने का सुझाव ही देता है। पिछले कुछ समय से मेरे बहुत से पाठक यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि क्या वे नवग्रहों के रत्नों के अतिरिक्त कोई और रत्न भी धारण कर सकते हैं तथा बाजार में उपलब्ध इतने सारे रत्नों में से केवल कुछ विशिष्ट रत्न ही क्यों धारण किए जाने चाहिएं। इसलिए आज के लेख में हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे कि केवल नवग्रहों से संबंधित रत्न ही क्यों धारण करने चाहिएं तथा वैदिक ज्योतिष अन्य प्रकार के रत्नों को धारण करने का सुझाव क्यों नहीं देता।

                       सबसे पहले आइए हम रत्नों की कार्यप्रणाली पर एक दृष्टि डाल लेते हैं। प्रत्येक रत्न अपनी उपरी सतह से किसी विशिष्ट ग्रह की उर्जा तरंगें अपनी ओर आकर्षित करता है तथा यह रत्न इन उर्जा तरंगों को अपनी निचली सतह से रत्न धारण करने वाले व्यक्ति के शरीर में स्थानांतरित कर देता है। नवग्रहों में से किसी एक ग्रह विशेष की उर्जा को आकर्षित करने के लिए किसी रत्न में उस उर्जा की विशिष्ट वेवलैंथ को आकर्षित करने की क्षमता का होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त रत्न में इस उर्जा को अल्प समय के लिए अपने भीतर बना कर रखने की क्षमता तथा इस उर्जा को स्थानांतरित करने की क्षमता भी होनी चाहिए जिसके चलते यह रत्न किसी ग्रह विशेष की उर्जा को आकर्षित करके रत्न धारण करने वाले के शरीर में स्थानांतरित कर सके। बाजार में बिकने वाले बहुत से रत्न नवग्रहों में से किसी भी ग्रह की विशिष्ट उर्जा को आकर्षित तथा स्थानांतरित करने की क्षमता नहीं रखते जिसके चलते वैदिक ज्योतिष ऐसे रत्नों को धारण करने का परामर्श नहीं देता। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्राचीन वैदिक ज्योतिषियों ने कुछ प्रयोगों के माध्यम से अवश्य ही यह निश्चित कर लिया होगा कि अनेक प्रकार के उपलब्ध रत्नों में से कौन से रत्न नवग्रहों में से किसी ग्रह विशेष की उर्जा को नियंत्रित कर सकते हैं तथा उसी के आधार पर नवग्रहों को किन्हीं विशिष्ट रत्नों के साथ जोड़ा गया।

                                नवग्रहों में से किसी ग्रह विशेष की उर्जा को आकर्षित कर लेना तथा उस उर्जा को रत्न धारण करने वाले व्यक्ति के शरीर में स्थानांतरित कर देने की क्षमता रखना किसी रत्न को नवग्रहों में से किसी ग्रह विशेष का रत्न घोषित कर देने के लिए पर्याप्त नहीं है तथा इस तथ्य का परीक्षण कर लेना भी आवश्यक है कि कहीं यह रत्न अपने विशिष्ट ग्रह के साथ साथ किसी अन्य ग्रह की उर्जा को आकर्षित तो नहीं कर रहा क्योंकि कुछ रत्न एक से अधिक ग्रहों की उर्जा को आकर्षित तथा स्थानांतरित करने की क्षमता भी रखते हैं जिसके चलते इन रत्नों को किसी एक ग्रह के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। उदाहरण के लिए, पीतांबरी नामक एक रत्न जो पुखराज परिवार से संबंध रखता है, बृहस्पति के साथ साथ शनि ग्रह की उर्जा को भी आकर्षित करता है जिसके चलते इस रत्न को बृहस्पति अथवा शनि दोनों में से किसी एक ग्रह के साथ भी नहीं जोड़ा जा सकता तथा इसी प्रकार नीलांबरी नामक रत्न भी उपरोक्त दोनों ग्रहों की ही उर्जा को आकर्षित करता है जिसके चलते इस रत्न को भी बृहस्पति अथवा शनि किसी भी ग्रह के साथ नहीं जोड़ा जा सकता तथा इन दोनों में से किसी भी रत्न का चुनाव अकेले शनि अथवा अकेले बृहस्पति की उर्जा को आकर्षित तथा स्थानांतरित करने के लिए नहीं किया जा सकता क्योंकि ये दोनो ही रत्न उपरोक्त दोनो ग्रहों की ही उर्जा को धारक के शरीर में स्थानांतरित कर देंगें जिसके चलते यदि शनि अथवा बृहस्पति दोनों में से कोई भी ग्रह रत्न धारक की जन्म कुंडली में नकारात्मक रुप से काम कर रहा है तो रत्न धारक को ये रत्न लाभ की जगह हानि पहुंचा देंगें जिसके कारण इस स्थिति में नीलम अथवा पीले पुखराज में से ही किसी एक रत्न का चुनाव करना चाहिए जो क्रमश: शनि तथा बृहस्पति के रत्न हैं तथा जो अपने अपने ग्रह विशेष के अतिरिक्त किसी भी अन्य ग्रह की उर्जा को आकर्षित नहीं करते।

                           इसके पश्चात कुछ रत्न ऐसे भी हैं जो केवल किसी एक ग्रह विशेष की उर्जा को ही आकर्षित तथा स्थानांतरित करते हैं किन्तु ये रत्न उर्जा के स्थानांतरण को आवश्यक गति के साथ नहीं कर पाते जिसके चलते इन रत्नों की कार्यक्षमता बहुत अच्छी नहीं मानी जाती तथा इस कारण ऐसे रत्नों को भी नवग्रहों में से किसी ग्रह विशेष का मुख्य रत्न नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार नवग्रहों के रत्नों का निर्धारण करने के समय कुछ अन्य आवश्यक तथ्यों का भी ध्यान रखा जाता है तथा इन सभी महत्वपूर्ण कसौटियों पर सफल होने वाले रत्नों को ही नवग्रहों में से किसी ग्रह विशेष का रत्न निर्धारित किया जाता है। नवग्रहों के लिए निर्धारित किए गए रत्न इस प्रकार हैं :

सूर्य के लिए वैदिक ज्योतिष के अनुसार माणिक्य रत्न धारण किया जाना चाहिए।

चन्द्रमा के लिए मोती धारण किया जाना चाहिए।

बृहस्पति के लिए पीला पुखराज रत्न के रूप में धारण किया जाना चाहिए।

शुक्र के लिए हीरा अथवा श्वेत पुखराज रत्न के रूप में धारण किया जाना चाहिए।

मंगल के लिए लाल मूंगा रत्न के रूप में धारण किया जाना चाहिए।

बुध के लिए पन्ना रत्न के रूप में धारण किया जाना चाहिए।

शनि के लिए नीलम रत्न के रूप में धारण किया जाना चाहिए।

राहू के लिए गोमेद रत्न के रूप में धारण किया जाना चाहिए।

केतु के लिए लहसुनिया रत्न के रूप में धारण किया जाना चाहिए।

 

लेखक

हिमांशु शंगारी