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ज्येष्ठा

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                        वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से ज्येष्ठा को 18वां नक्षत्र माना जाता है। ज्येष्ठा के आगमन के साथ ही नौ नक्षत्रों की मघा नक्षत्र से आरंभ हुई श्रृंखला का अंत हो जाता है। ज्येष्ठा का अर्थ है सबसे बड़ा तथा इसी के अनुसार इस नक्षत्र को बड़ा, परिपक्व, सुनियोजित आदि अर्थों के साथ जोड़ा जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने आयु से पूर्व ही शारीरिक तथा मानसिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक तावीज को ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। इस प्रकार के तावीज को प्राचीन काल के लोग बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए पहनते थे तथा प्राचीन काल में प्रभुत्व वाले विशेष व्यक्ति भी तावीज पहनते थे। इस प्रकार तावीज का यह प्रतीक चिन्ह ज्येष्ठा नक्षत्र को रक्षा, सुरक्षा तथा प्रभुत्व के साथ जोड़ देता है। तावीज का प्रयोग पारलौकिक तथा परा विज्ञान से जुड़े लोग भी करते हैं जिसके चलते ज्येष्ठा नक्षत्र का संबंध पारलौकिक तथा परा विज्ञान के साथ भी जुड़ जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक छाते को भी ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। छाते का प्रयोग धूप तथा वर्षा से रक्षा के लिए किया जाता है तथा प्राचीन काल में राजा महाराजा छत्र के नाम से जाने जाने वाले एक विशाल छाते का प्रयोग करते थे जो रक्षा के साथ साथ प्रभुत्व का प्रदर्शन भी करता था। इस प्रकार ज्येष्ठा को रक्षा, सुरक्षा, परिपक्वता, पारलौकिक तथा प्रभुत्व के साथ जुड़े एक नक्षत्र के रूप में देखा जा सकता है।

                         देवताओं के राजा माने जाने वाले इन्द्र देव को वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है जिसके चलते इन्द्र का इस नक्षत्र पर प्रभाव पड़ता है तथा इन्द्र के चरित्र की कुछ विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। इन्द्र को अन्य विशेषताओं के साथ साथ एक स्वार्थी, अभिमानी तथा छलिया देवता के रूप में भी जाना जाता है तथा इन्द्र के चरित्र की इन विशेषताओं से जुड़े बहुत से प्रसंग वैदिक साहित्य में उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए भारतीय मिथिहास के एक प्रसंग के अनुसार, प्राचीन भारत में गौतम नाम के एक सिद्ध ॠषि हुए हैं जिनकी पत्नि अहिल्या बहुत सुंदर थी। एक बार देवराज इन्द्र ने अहिल्या को देखा तथा उसकी सुंदरता से मोहित हो कर इन्द्र ने अहिल्या के साथ शारीरिक संबंध बनाने का निर्णय कर लिया हालांकि अहिल्या एक विवाहता स्त्री थी तथा अपने पति गौतम के प्रति पूर्ण रूप से निष्ठावान थी। एक दिन ॠषि गौतम जब स्नान करने के लिए अपनी कुटिया से निकले तो इन्द्र ने छल से गौतम ॠषि का वेष धारण कर लिया और उनकी कुटिया में प्रवेश करके अहिल्या के साथ शारीरिक संबंध बना लिया तथा अहिल्या ने भी इस संसर्ग के प्रति कोई आपत्ति नहीं उठाई क्योंकि इन्द्र उस समय अहिल्या के पति के भेष में थे।  अपनी कामना की पूर्ति के पश्चात जब इन्द्र गौतम ॠषि की कुटिया से निकल रहे थे तो गौतम ॠषि आ गये तथा इन्द्र को अपने भेष में अपनी कुटिया से निकलते देख कर सारा मामला समझ गए। क्रोध में आकर ॠषि गौतम ने अपनी पत्नि अहिल्या को इन्द्र के साथ संसर्ग करने के लिए शाप देकर पत्थर की शिला बना दिया तथा अहिल्या को बहुत लंबे समय तक पत्थर की शिला बने रहने के पश्चात भगवान श्री राम की कृपा से ही पुन: अपना वास्तविक रूप प्राप्त हुआ था।

                       भारतीय मिथिहास के अनुसार इन्द्र एक ऐसे देवता के रूप में जाने जाते हैं जिनके चरित्र में सकारात्मक विशेषताओं की तुलना में नकारात्मक विशेषताएं कहीं अधिक हैं तथा इन्द्र के चरित्र की इन नकारात्मक विशेषताओं में से कुछ विशेषताएं ज्येष्ठा नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होतीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य हैं कि ज्येष्ठा की भांति ही इन्द्र विशाखा नक्षत्र के भी अधिपति देवता हैं तथा विशाखा नक्षत्र के माध्यम से भी इन्द्र के चरित्र की अनेक नकारात्मक विशेषताएं हीं प्रदर्शित होतीं हैं। इस प्रकार विशाखा तथा ज्येष्ठा दोनों ही नक्षत्र इन्द्र की नकारात्मक विशेषताओं के प्रभाव में आकर कई बार एक सा आचरण भी करते हैं किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि ज्येष्ठा नक्षत्र विशाखा नक्षत्र की तुलना में कहीं अधिक संतुलित नक्षत्र है तथा इस नक्षत्र की उर्जा बहुत सी कुंडलियों में सकारात्मक रूप से भी कार्य करती है। इसका मुख्य कारण यह माना जाता है कि ज्येष्ठा नक्षत्र का अधिपति ग्रह वैदिक ज्योतिष के अनुसार बुध को माना जाता है तथा बुध अपनी कुछ विशेषताएं जैसे बुद्धिमता, व्यवहारिकता तथा विवेक आदि ज्येष्ठा नक्षत्र को प्रदान करते हैं जिनके कारण ज्येष्ठा नक्षत्र विशाखा नक्षत्र की तुलना में कहीं अधिक संतुलित हो जाता है। यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र के सभी चार चरण वृश्चिक राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर वृश्चिक राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह मंगल का भी प्रभाव पड़ता है। मंगल को वैदिक ज्योतिष में तर्क से जुड़ा हुआ ग्रह मानते हैं तथा मंगल अपनी तर्क करने की क्षमता इस नक्षत्र को प्रदान करता है जिसके चलते मंगल तथा बुध के संयुक्त प्रभाव में आने के कारण तथा तर्क, बुद्धि तथा विवेक जैसी विशेषताओं का स्वामी होने के कारण ज्येष्ठा नक्षत्र विशाखा नक्षत्र की तुलना में कहीं अधिक संतुलित हो जाता है।

                    ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक अन्य कई नक्षत्रों के जातकों की तुलना में शारीरिक तथा मानसिक रूप से अधिक परिपक्व हो जाते हैं। ज्येष्ठा के जातक अपने अधिकतर निर्णय लेते समय अपनी बुद्धि तथा विवेक का प्रयोग करते हैं तथा इन जातकों में उचित और अनुचित में भेद करने की क्षमता भी होती है। ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक अपनी सामाजिक छवि को लेकर बहुत सावधान रहते हैं तथा ऐसे अधिकतर जातक समाज में अपनी छवि एक अच्छे व्यक्ति के रूप में ही बनाना पसंद करते हैं फिर भले ही इनका वास्तविक रूप अपनी सामाजिक छवि के एकदम विपरीत ही क्यों न हो। ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक अपनी भावनाओं तथा अपने प्रयोजन को छिपाने में दक्ष होते हैं तथा इसी के साथ ये जातक अभिनय करने की कला में भी निपुण होते हैं जिसके चलते ऐसे जातक अपनी एक ऐसी छवि बनाने में भी सफल हो जाते हैं जो इनके वास्तविक चरित्र से बिल्कुल ही विपरीत हो। आज के युग के बहुत से ऐसे नेता इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में माने जा सकते हैं जिनकी सामाजिक छवि तो बहुत अच्छी है किन्तु जिनका वास्तविक चरित्र अच्छा नहीं है। ऐसे नेता अपनी इस झूठी किन्तु अच्छी दिखने वाली छवि के चलते जनता को उल्लू बनाते रहते हैं तथा लाभ उठाते रहते हैं। इन राजनेताओं के साथ जुड़ी शक्ति तथा प्रभुत्व जैसी विशेषताएं पुन: इस तथ्य को प्रमाणित करतीं हैं कि ज्येष्ठा नक्षत्र का शक्ति तथा प्रभुत्व के साथ गहरा संबंध है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि बहुत से ज्येष्ठा जातकों की सामाजिक छवि अच्छी होने के साथ साथ ये जातक वास्तविकता में भी इस छवि के अनुसार ही अच्छे चरित्र के स्वामी होते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी मानते हैं कि सभी सताइस नक्षत्रों में से ज्येष्ठा नक्षत्र सबसे चतुर तथा जोड़ तोड़ करने में सबसे निपुण नक्षत्र है।

                 ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक सामान्यतया अपने कर्तव्यों को पूरा करने में विश्वास रखने वाले होते हैं तथा ये जातक अपने प्रत्येक कार्य को करने के समय अनुशासन का ध्यान रखने वाले होते हैं। ज्येष्ठा के जातक दूसरों की सहायता करने के लिए भी तत्पर रहते हैं तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ जातक तो किसी निर्बल की सहायता करने के लिए अपनी सामर्थ्य से भी बहुत बड़ी किसी संस्था अथवा व्यक्ति के साथ भी लड़ाई कर लेते हैं। ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक सामान्यतया न्यायप्रिय होते हैं तथा इन अधिकतर विवादों को न्यायपूर्ण ढंग से सुलझाने में ही रूचि होती है हालांकि ये जातक उस स्थिति में न्यायिक प्रणाली के साथ छेड़-छाड़ भी कर सकते हैं जब मामले का निर्णय सीधा इनके लाभ या हानि के साथ जुड़ा हुआ हो। ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक ज्योतिष तथा ऐसी ही अन्य विद्याओं में विश्वास रखने वाले होते हैं तथा अपने जीवनकाल में समय समय पर ये जातक सफलता प्राप्त करने की लिए ऐसी विद्याओं की सहायता भी लेते रहते हैं। ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ विशिष्ट जातक ज्योतिष अथवा ऐसे ही अन्य किसी पारलौकिक क्षेत्र के साथ जुड़ी विद्या में अभ्यास करने को अपना व्यवसाय भी बना सकते हैं। अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि ज्येष्ठा नक्षत्र का पारलौकिक तथा रहस्यवाद के साथ सदैव ही गहरा संबंध रहता है।

                       आइए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष ज्येष्ठा को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जिसका कारण कुछ वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र के अधिपति ग्रह बुध को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है तथा इस नक्षत्र को गण से राक्षस माना जाता है और इसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र के द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली नकारात्मक विशेषताओं को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र को गुण से सात्विक माना जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र के अधिपति देवता इन्द्र को माना जाता है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से वायु तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

अनुराधा

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                   वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणनाएं करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से अनुराधा को 17वां नक्षत्र माना जाता है। अनुराधा का शाब्दिक अर्थ है राधा के बाद आने वाली अथवा राधा जैसी। राधा शब्द को वैदिक ज्योतिष में सफलता, आनंद तथा सौभाग्य के साथ जोड़ा जाता है जिसके चलते अनुराधा नक्षत्र को भी इन विशेषताओं के साथ जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार तपस्वियों द्वारा धारण किये जाने वाले दंड को अनुराधा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि सिद्ध तपस्वियों द्वारा धारण किया जाने वाला दंड देखने में तो किसी साधारण से डंडे के समान ही लगता है किन्तु इस दंड के भीतर इन तपस्वियों की वर्षों की तपस्या से प्राप्त की हुई शक्ति वास करती है जिसका प्रयोग समय समय पर इन तपस्वियों द्वारा आत्मरक्षा के लिए तथा दुर्जनों को दंड देने के लिए किया जाता है। सिद्ध तपस्वी अपने इस शक्तिशाली दंड का प्रयोग कभी भी विनाश लीला करने के लिए अथवा अपना स्वार्थों की पूर्ति के लिए नहीं करते बल्कि इस दंड का प्रयोग वे केवल आवश्यकता पड़ने पर तथा हितकारी कामों के लिए ही करते हैं। इस प्रकार अनुराधा नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में प्रयोग होने वाला यह दंड इस नक्षत्र को बुद्धिमता, विवेक, संरक्षण की क्षमता, शक्ति धारण करने तथा उस शक्ति का सदुपयोग करने की क्षमता के साथ जोड़ता है तथा ये सारी विशेषताएं इस नक्षत्र के नाम से प्रकट हुइं विशेषताओं जैसे कि सफलता तथा सौभाग्य आदि के साथ जुड़ कर इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कमल के फूल को भी अनुराधा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। कमल के फूल को देवी सरस्वती का आसन माना जाता है जिसके चलते कमल के फूल को विद्या, ज्ञान, प्रकाश तथा शुभता के साथ जोड़ा जाता है और कमल के फूल की ये सारी विशेषताएं भी अनुराधा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिसके चलते वैदिक ज्योतिष में अनुराधा को एक शुभ नक्षत्र माना जाता है।

                       बारह आदित्यों में से एक माने जाने वाले मित्र देव को वैदिक ज्योतिष के अनुसार अनुराधा नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर मित्र देव का भी प्रभाव पड़ता है। मित्र देव अपने नाम के अर्थ के साथ मेल खातीं विशेषताओं जैसे कि मित्र बनाना, मित्रों की सहायता करना तथा मित्रों से सहायता प्राप्त करना, दूसरे लोगों की सहायता करना तथा उदारता आदि जैसी विशेषताओं के स्वामी हैं तथा मित्र देव की ये सभी विशेषताएं अनुराधा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। मित्र देव को जीवन के प्रत्येक स्तर पर मित्रता को प्रोत्साहित करने की विशेषता के लिए जाना जाता है जिसके चलते अनुराधा को एक ऐसा नक्षत्र माना जाता है जो विश्व बंधुत्व की भावना से काम करता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक जीवन भर मित्र बनाते रहते हैं, मित्रों की सहायता करते रहते हैं, मित्रों की सहायता प्राप्त करके अपने कई कार्यों में सफलता प्राप्त करते हैं तथा अकेले कार्य करने की अपेक्षा समूह में काम करने में रूचि दिखाते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार देवी सरस्वती को भी अनुराधा नक्षत्र की देवी के रूप में जाना जाता है जिसके चलते देवी सरस्वती के चरित्र की कुछ विशेषताएं जैसे कि संगीत, कला तथा प्रत्येक प्रकार की विद्या और ज्ञान को सीखने की क्षमता आदि भी इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं।

                           नवग्रहों में से शनि ग्रह को वैदिक ज्योतिष के अनुसार अनुराधा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर शनि ग्रह का भी प्रभाव पड़ता है और फलस्वरूप शनि की कुछ विश्षताएं जैसे व्यवहारिकता, विश्लेषणात्मक क्षमता तथा अनुशासन आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। इन सभी विशेषताओं के कारण अनुराधा नक्षत्र अपने से पूर्व आने वाले नक्षत्र विशाखा की तुलना में बहुत संतुलित नक्षत्र बन जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने जीवन में अधिकतर निर्णय अपने विवेक तथा व्यवहारिकता से लेते हैं तथा अनुराधा नक्षत्र के इन जातकों का विशाखा नक्षत्र के जातकों की भांति पथ भ्रष्ट हो जाना अथवा अनुचित निर्णय लेते रहना बहुत कठिन होता है। अनुराधा नक्षत्र के जातक अधिकतर परिस्थितियों में उचित तथा अनुचित का विचार करके तथा अपने विवेक का प्रयोग करके सही निर्णय ही लेते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अनुराधा नक्षत्र के चारों चरण वृश्चिक राशि में स्थित होते हैं जिसके चलते इस नक्षत्र पर वृश्चिक राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह मंगल का प्रभाव भी पड़ता है तथा इस कारण मंगल के चरित्र की कुछ विशेषताएं भी इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। मंगल को वैदिक ज्योतिष में उर्जा तथा मित्रता के साथ जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है तथा मंगल की ये विशेषताएं अनुराधा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिसके कारण अनुराधा नक्षत्र के जातक मित्र बनाने में तथा मित्रों की सहायता से कठिन से कठिन कार्य भी कर लेने में सक्षम होते हैं। अनुराधा नक्षत्र के जातकों में सीखने की प्रबल क्षमता होती है जिसके चलते ये जातक अपने जीवन काल में बहुत से नए विषयों पर ज्ञान प्राप्त करते हैं। अनुराधा नक्षत्र के जातकों में जटिल गणनाओं को भी आसानी से कर लेने की क्षमता होती है जिसके चलते इस नक्षत्र के जातक उन व्यवसायिक क्षेत्रों में सफल देखे जाते हैं जिनमें सफलता प्राप्त करने के लिए तेज गणनाएं करने की आवश्यकता होती है।

                          वृश्चिक राशि का अनुराधा नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को रहस्यवाद के साथ जोड़ता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष में वृश्चिक राशि को रहस्यों की राशि माना जाता है। इस प्रभाव के चलते तथा अपनी कुशल गणनात्मक क्षमता के चलते अनुराधा नक्षत्र के जातक ज्योतिष, अंक गणित, खगोल शास्त्र तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में भी सफल देखे जाते हैं। अनुराधा नक्षत्र के जातकों का वाणी कौशल भी अच्छा होता है तथा ऐसे जातक प्राय: किसी भी उम्र तथा किसी भी प्रकार के लोगों के साथ शीघ्र ही घुल मिल जाते हैं तथा लगभग प्रत्येक प्रकार के लोग इनकी संगत में बहुत शीघ्रता से सहज हो जाते हैं। अनुराधा नक्षत्र वैश्विक बंधुत्व को प्रोत्साहित करने वाला नक्षत्र है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक के मित्र विभिन्न उम्रों, देशों, जातियों तथा सभ्यताओं से संबंध रखने वाले होते हैं। मंगल के इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव के कारण अनुराधा नक्षत्र के जातक समाज की पुरानी तथा निरर्थक हो चुकी परंपराओं तथा प्रथाओं को बदल देने की क्षमता रखते हैं तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ विशेष जातक अपने जीवन काल में बहुत सी निरर्थक परंपराओं का अंत करके नई तथा सार्थक परंपराओं की नींव रखते हैं। शनि का इस नक्षत्र पर प्रभाव इन जातकों को जन समुदाय के साथ जुड़ने की क्षमता देता है जबकि मंगल का इस नक्षत्र पर प्रभाव इन जातकों को परिवर्तन लाने के लिए आवश्यक साहस तथा क्षमता प्रदान करता है क्योंकि मंगल को वैदिक ज्योतिष में उर्जा तथा क्रांति के साथ जुड़ा ग्रह माना जाता है तथा मंगल का अनुराधा नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र के जातकों को भी क्रांतिकारी बना देता है। अनुराधा नक्षत्र के जातकों में नया से नया सीखने तथा नई से नई दुनिया की खोज करने की प्रबल रूचि होती है जिसके चलते ये जातक बहुत से देशों में भ्रमण करते हैं तथा बहुत सी विदेशी भाषाओं का ज्ञान भी प्राप्त करते हैं तथा इस नक्षत्र के कुछ जातक तो स्थायी तौर पर किसी विदेशी भूमि में ही बस जाते हैं। अनुराधा नक्षत्र के जातकों में परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल लेने की प्रबल क्षमता होती है जिसके चलते ये जातक नई से नई परिस्थितियों में भी अपने आप को शीघ्र ही सहज कर लेते हैं।

                      आईए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष अनुराधा नक्षत्र को एक पुरुष नक्षत्र मानता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का मित्र, मंगल तथा शनि के साथ संबंध मानता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अनुराधा नक्षत्र को वर्ण से शूद्र तथा गुण से तामसिक माना जाता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का शनि तथा मंगल के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष अनुराधा नक्षत्र को देव गण प्रदान करता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का मित्र देव के साथ संबंध तथा इस नक्षत्र की विशेषताओं को मानते हैं। अनुराधा नक्षत्र वैश्विक बंधुत्व को प्राप्त करने की दिशा में प्रयत्नशील रहता है तथा इस विशेषता को देवताओं के साथ जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से अग्नि तत्व को अनुराधा नक्षत्र के साथ जोड़ता है जिसका कारण इस नक्षत्र पर आग्नेय प्रवृति वाले ग्रह मंगल का प्रभाव माना जाता है। 

लेखक
हिमांशु शंगारी

विशाखा

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                          वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणनाएं करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से विशाखा को 16वां नक्षत्र माना जाता है। विशाखा का शाब्दिक अर्थ है विभाजित अथवा एक से अधिक शाखाओं वाला और इसी के अनुसार वैदिक ज्योतिष में यह माना जाता है कि विशाख नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं जब भाग्य इनके सामने एक से अधिक अथवा दो रास्ते या विकल्प रख देता है तथा इन जातकों की सफलता या असफलता इन दो रास्तों में से उचित या अनुचित विकल्प चुनने पर निर्भर करती है। भारतवर्ष में विवाह आदि जैसे कार्यों के लिए प्रयोग किये जाने वाले एक सुसज्जित द्वार को वैदिक ज्योतिष के अनुसार विशाखा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। जिस प्रकार सुसज्जित द्वार का प्रयोग आम तौर पर किसी खुशी अथवा उपलब्धि के बाहरी दिखावे अथवा प्रदर्शन के लिए किया जाता है उसी प्रकार विशाखा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी बाहरी दिखावे तथा प्रदर्शन में बहुत विश्वास रखने वाले होते हैं तथा ऐसे जातक अपने जीवन काल में समय समय पर प्राप्त होने वालीं उपलब्धियों का बाहरी प्रदर्शन अन्य बहुत से नक्षत्रों के जातकों की तुलना में कहीं अधिक करते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि सुसज्जित द्वारों का प्रयोग आम तौर पर लोग अपनी समृद्धि, शक्ति तथा सामर्थ्य का प्रदर्शन करने के लिए ही करते हैं अथवा किसी ऐसी घटना की खुशी मनाने के लिए करते हैं जो उनके जीवन में नए अध्याय का आरंभ दर्शाती हो। इस प्रकार वैदिक ज्योतिष में विशाखा नक्षत्र को खुशी, उपलब्धि अथवा नए आरंभ के बाहरी प्रदर्शन के साथ तथा सुंदरता के साथ जोड़ा जाता है क्योंकि इन सभी उपलक्ष्यों में मनाए जाने वाले उत्सव सुंदरता से भरपूर होते हैं।

                     वैदिक ज्योतिष के अनुसार विशाखा नक्षत्र को दो अधिपति देवताओं के साथ जोड़ा जाता है जिनमें से पहले हैं देवताओं के राजा इन्द्र तथा दूसरे हैं पंच तत्वों में से अग्नि तत्व के स्वामी अग्नि देव तथा इसी कारण विशाखा नक्षत्र पर इन दोनों अधिपति देवताओं का प्रभाव रहता है। इन्द्र देव तथा अग्नि देव चरित्र एक दूसरे से भिन्न होने के कारण इन दोनों देवताओं का प्रभाव इस नक्षत्र को भी विभिन्न प्रकार की विशेषताओं का मिश्रण बना देता है। इन्द्र को स्वर्ग लोक तथा देवताओं का राजा माना जाता है जिनमें अग्नि देव भी शामिल हैं। इन्द्र को वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक लक्ष्य केंद्रित देवता माना जाता है जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उचित तथा अनुचित का विचार किए बिना किसी भी प्रकार के कार्य को कर देते हैं तथा अपनी इसी विशेषता के चलते इन्द्र कई बार ऐसे कार्य भी कर देते हैं जिन्हें वैदिक ज्योतिष की दृष्टि से अनुचित माना जाता है। उदाहरण के लिए इन्द्र ने एक बार राक्षसों के तत्कालीन राजा हिरण्यक्षिपु की गर्भवती पत्नी को मारने की चेष्टा की थी। हिरण्यक्षिपु शक्ति प्राप्ति के लिए ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर रहा था तथा इन्द्र को यह भय हो गया था कि हिरण्यक्षिपु तपस्या से प्राप्त शक्ति के बल पर उनसे स्वर्ग लोक का राज्य छीन लेगा तथा इसी कारण इन्द्र ने हिरण्यक्षिपु की तपस्या भंग करने के लिए उसकी गर्भवती पत्नि का अपहरण कर लिया और हिरण्यक्षिपु को धमकी दी कि यदि उसने अपनी तपस्या को भंग नहीं किया तो वह उसकी गर्भवती पत्नि की हत्या कर देंगे जिसके साथ ही उसका पुत्र भी मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। बाद में देव ॠषि नारद ने हस्ताक्षेप करके इन्द्र को यह अनुचित कार्य करने से रोका तथा हिरण्यक्षिपु की गर्भवती पत्नि को देवर्षि नारद ने अपनी सुरक्षा में ले लिया।

                          उपरोक्त उदाहरण से यह सपष्ट हो जाता है कि इन्द्र एक लक्ष्य केंद्रित देवता हैं तथा अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे किसी भी प्रकार के उचित अथवा अनुचित कार्य को कर सकते हैं। किसी गर्भवती स्त्री की हत्या करना वैदिक ज्योतिष के अनुसार बहुत अनुचित कार्य माना जाता है परन्तु इन्द्र अपना सिंहासन बचाने के लिए इस कार्य को करने के लिए भी तत्पर हो गए थे जिससे उनकी लक्ष्य केंद्रित प्रवृति पूर्ण रूप से सपष्ट हो जाती है। इन्द्र के प्रबल प्रभाव में आने के कारण विशाखा नक्षत्र के जातक भी अपने जीवन काल में अनेक बार किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उचित तथा अनुचित की चिंता किये बिना ऐसे कार्य कर देते हैं जो बाद में इन जातकों को कठिनाई में डाल सकते हैं। इन्द्र अपनी मदिरापान, स्त्रियों के प्रति अपनी आसक्ति तथा प्रत्येक प्रकार के आनंद का भोग करने के लिए तत्पर रहने जैसी विशेषताओं के लिए भी जाने जाते हैं तथा इन्द्र के चरित्र के ये विशेषताएं भी विशाखा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में इन्द्रियों का सुख भोगने की लालसा अन्य बहुत से नक्षत्रों के जातकों की तुलना में कहीं अधिक होती है। विशाखा नक्षत्र से जुड़े दूसरे देवता अग्नि देव का चरित्र इन्द्र से बिल्कुल भिन्न माना जाता है तथा वैदिक ज्योतिष के अनुसार अग्नि देव को उचित तथा अनुचित का विचार करके आचरण करने वाला देवता माना जाता है जिसके चलते अग्नि देव का विशाखा नक्षत्र पर पड़ने वाला प्रभाव जहां एक ओर इस नक्षत्र को अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आवश्यक उर्जा प्रदान करता है वहीं दूसरी ओर अग्नि देव का विशाखा नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को उचित तथा अनुचित में अंतर करके आचरण करने की विशेषता भी प्रदान करता है। इस प्रकार विशाखा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक का चरित्र तथा आचरण बहुत सीमा तक इस तथ्य पर निर्भर करता है कि उसकी कुंडली में विशाखा नक्षत्र पर अधिक प्रभाव इन्द्र का है या अग्नि का।

                         नवग्रहों में से बृहस्पति को वैदिक ज्योतिष के अनुसार विशाखा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण बृहस्पति का भी इस नक्षत्र पर प्रभाव पड़ता है। इन्द्र का इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव होने के कारण बृहस्पति के चरित्र की कुछ नकारात्मक विशेषताएं भी इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। बृहस्पति की लक्ष्य प्राप्ति के लिए कार्यरत रहने की क्षमता अथा आशावाद जैसीं विशेताओं का विशाखा नक्षत्र के माध्यम से नकारात्मक उपयोग हो सकता है क्योंकि इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बृहस्पति की इन विशेषताओं का प्रयोग अनुचित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भी कर सकते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार विशाखा नक्षत्र के पहले तीन चरण तुला राशि में स्थित होते हैं जबकि इस नक्षत्र का चौथा चरण वृश्चिक राशि में स्थित होता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर तुला राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह शुक्र का और वृश्चिक राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह मंगल का प्रभाव भी पड़ता है। इस प्रकार विशाखा नक्षत्र पर इन्द्र तथा अग्नि जैसे दो भिन्न स्वभावों वाले देवताओं की भांति बृहस्पति तथा शुक्र जैसे दो भिन्न चरित्रों वाले ग्रहों का भी प्रभाव पड़ता है जिसके कारण विशाखा एक जटिल नक्षत्र बन जाता है तथा इसकी उर्जा समय समय पर इन विभिन्न प्रभावों के चलते असंतुलित भी हो जाती है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि एक दूसरे से भिन्न देवताओं तथा ग्रहों के प्रभाव में आने के कारण ही इस नक्षत्र का नाम विशाखा रखा गया है क्योंकि इस नक्षत्र की उर्जा विभिन्न प्रभावों में विभाजित है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार बृहस्पति तथा शुक्र स्वभाव में एक दूसरे से लगभग विपरीत हैं तथा विशाखा नक्षत्र के माध्यम से शुक्र की विशेषताओं का ही अधिक प्रदर्शन होने की संभावना रहती है क्योंकि इस नक्षत्र के अधिपति देवता इंद्र की मदिरापान, भोग विलास में लिप्त रहने तथा उपलब्धियों का दिखावा करने के लिए उत्सव आयोजित करने की विशेषताएं शुक्र की विशेषताओं से ही मेल खातीं हैं। इसी के अनुसार विशाखा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में लक्ष्य प्राप्ति की प्रबल अभिलाषा रहती है तथा ऐसे जातक आम तौर पर लक्ष्य के उचित या अनुचित होने का विचार नहीं करते जिसके कारण विशाखा नक्षत्र के जातकों की अनुचित अथवा अवैध कार्यों में संलग्न होने की भी आशंका रहती है क्योंकि इस नक्षत्र के जातकों के लिए लक्ष्य मायने रखता है, लक्ष्य को प्राप्त करने का ढंग नहीं। 

                          विशाखा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक शराब, संभोग तथा अन्य भौतिक सुखों की प्रबल लालसा रखने वाले होते हैं तथा अपने इंद्रिय सुख की प्राप्ति करने के लिए इन जातकों को प्राय: बहुत धन तथा साधनों की आवश्यकता होती है जिसकी प्राप्ति सामान्यतया उचित, नैतिक तथा वैध कार्यों के माध्यम से संभव नहीं होती जिसके चलते विशाखा नक्षत्र के जातक अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनुचित रास्तों का चयन भी कर लेते हैं। विशाखा नक्षत्र के जातक भौतिक तथा दैहिक सुखों के प्रति आसानी से आकर्षित हो जाते हैं तथा इन जातकों में दैहिक सुखों को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा होती है और विशाखा नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले कुछ जातकों में तो यह इच्छा इतनी प्रबल होती है कि ये जातक जितना ही इस प्यास को बुझाने की कोशिश करते हैं, ये और भी बढती जाती है। इसी कारण से विशाखा नक्षत्र के कई जातक अपने जीवन काल में मदिरापान, दैहिक सुख तथा अन्य भोगों के क्षेत्रों में चरम सींमाएं छूते देखे जाते हैं। विशाखा नक्षत्र के जातक आम तौर पर समाजिक तथा नैतिक मूल्यों की अधिक चिन्ता नहीं करते तथा अपना लक्ष्य प्राप्त करने की धुन में लगे रहते हैं फिर भले ही इनका लक्ष्य समाज के लिए हानिकारक ही क्यों न हो। अपने सकारात्मक स्तर पर विशाखा नक्षत्र की उर्जा जातक को दृढ़ संकल्प तथा लक्ष्य को प्राप्त कर लेने की क्षमता प्रदान करती है जिसके चलते विशाखा नक्षत्र के जातक बहुत आशावादी तथा संघर्षशील होते हैं। विशाखा नक्षत्र के जातक जीवन की हर खुशी का आनंद भोगना जानते हैं तथा इन्हें जीवन को आनंद से जीने की कला भी प्राप्त होती है। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि विशाखा नक्षत्र के जातकों के विषय में सबसे महत्वपूर्ण वस्तु इनका विवेक होता है जो यह निर्धारित करता है कि इन्हें अपने जीवन में उचित या अनुचित कौन सा रास्ता चुनना है।

                          आइए अब देखें इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों को जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष विशाखा को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस तथ्य को मानते हैं कि विशाखा अपने माध्यम से इर्ष्या, दिखावा करने की प्रवृति तथा ऐसी ही अन्य कई विशेषताएं प्रदर्शित करता है जो स्त्री जाति के विशेष गुण कहलातीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार विशाखा नक्षत्र को वर्ण से शूद्र माना जाता है तथा वैदिक ज्योतिष इस नक्षत्र को राक्षस गण प्रदान करता है। अधिकतर वैदिक ज्योतिषी विशाखा नक्षत्र के इस वर्ण और गण निर्धारण का कारण इस नक्षत्र के व्यवहार तथा आचरण को ही मानतें हैं। वैदिक ज्योतिष विशाखा नक्षत्र को सात्विक गुण प्रदान करता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का बृहस्पति के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष विशाखा नक्षत्र को पंच तत्वों में से अग्नि तत्व के साथ जोड़ता है जिसका कारण इन नक्षत्र की कार्यशैली तथा इस नक्षत्र का अग्नि देव के साथ संबंध माना जाता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

स्वाति

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                        वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से स्वाति को 15वां नक्षत्र माना जाता है। स्वाति का शाब्दिक अर्थ है स्वत: आचरण करने वाला अथवा स्वतंत्र तथा वैदिक ज्योतिष स्वाति शब्द को स्वतंत्रता, कोमलता तथा तलवार के साथ जोड़ता है तथा स्वाति के ये विभिन्न अर्थ इस नक्षत्र को विभिन्न विशेषताओं के साथ जोड़ते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार हवा में झूल रहे एक छोटे पौधे को स्वाति नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। छोटा पौधा कोमल होता है जिसके चलते स्वाति नक्षत्र का कोमलता के साथ संबंध जुड़ जाता है। तीव्र हवा में अपना अस्तित्व बचाने का प्रयास करता हुआ यह छोटा पौधा स्वतंत्रता, अस्तित्व बनाए रखने की प्रवृति तथा संघर्ष करने की क्षमता का संकेत देता है तथा इस पौधे के द्वारा प्रदर्शित ये विशेषताएं भी स्वाति नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी मूंगे को भी स्वाति नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मानते हैं। मूंगे को एक ऐसे पौधे के रूप में जाना जाता है जो अपना विकास तथा प्रजनन करने में स्वयं ही सक्षम होता है तथा इसे अपना विकास और प्रजनन करने के लिए किसी बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं होती। स्वाति नक्षत्र का यह प्रतीक चिन्ह भी स्वतंत्रता तथा आत्म-निर्भरता को दर्शाता है तथा इस प्रकार स्वाति नक्षत्र का संबंध स्वतंत्रता, कोमलता, आत्म-निर्भरता, कोमलता तथा संघर्ष करने की क्षमता के साथ जुड़ जाता है।

                     वायु के देवता माने जाने वाले वायु देव अथवा पवन देव को वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है तथा जैसा कि हम पहले ही देख चुके हैं कि वायु का स्वाति नक्षत्र के साथ प्रगाढ़ संबंध है। वायु देव को स्वर्ग लोक में निवास करने वाले पांच मुख्य देवताओं में से एक माना जाता है तथा वायु देव को पंच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश तत्व में से वायु तत्व के अधिपति देव माना जाता है। वायु देव के स्वाति नक्षत्र के अधिपति देवता होने के कारण इस नक्षत्र पर वायु देव का प्रबल प्रभाव रहता है तथा वायु देव के चरित्र की बहुत सीं विश्षताएं स्वाति नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी देवी सरस्वती को भी स्वाति नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी मानते हैं जिसके कारण देवी सरस्वती का भी इस नक्षत्र पर प्रभाव रहता है तथा देवी सरस्वती की कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। देवी सरस्वती को विद्या, ज्ञान, संगीत तथा वाणी की देवी माना जाता है तथा देवी सरस्वती की ये विशेषताएं स्वाति नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से राहू को स्वाति नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है तथा राहू वैदिक ज्योतिष में हालांकि माया के ग्रह से जाने जाते हैं किन्तु राहू के चरित्र की कुछ अन्य विशेषताएं जैसे कि कूटनीति, समाजिक गठबंधन बनाने की क्षमता, सामाजिक व्यवहार में कुशलता, सीखने की प्रबल प्रवृति तथा क्षमता आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि वैदिक ज्योतिष में देवी सरस्वती को राहू ग्रह की अधिष्ठात्री देवी भी माना जाता है इसलिए स्वाति नक्षत्र के माध्यम से राहू की उन्हीं विशेषताओं का प्रदर्शन होना स्वभाविक है जो देवी सरस्वती की विशेषताओं से मेल खातीं हैं क्योंकि देवी सरस्वती को स्वाति नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

                      वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति नक्षत्र के सभी चार चरण तुला राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर तुला राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह शुक्र का भी प्रभाव पड़ता है। नवग्रहों में से शुक्र को सुंदरता, सामाजिकता, भौतिकवाद, कूटनीति तथा आसक्ति आदि के साथ जोड़ा जाता है तथा शुक्र की ये विशेषताएं स्वाति नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि स्वाति नक्षत्र के अधिपति देवता पवन देव वायु तत्व के देवता हैं, स्वाति नक्षत्र का अधिपति ग्रह राहू भी वैदिक ज्योतिष में वायु तत्व से जुड़े हुए ग्रह के रूप में जाना जाता है तथा तुला राशि को भी वैदिक ज्योतिष के अनुसार वायु तत्व के साथ ही जोड़ा जाता है। इसलिए स्वाति नक्षत्र पर वायु तत्व का प्रभाव बहुत प्रबल रहता है जिसके कारण वायु की अनेक विशेषताएं जैसे कि लचकीला स्वभाव, अस्थिरता, ठोसता का अभाव होना, दिखावा करने की प्रवृति, स्थिति अनुसार अपने आप को ढाल लेने की क्षमता आदि इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। इसी प्रभाव के कारण स्वाति नक्षत्र के जातक अपने जीवन में अनेक स्थितियों में निर्णय लेने बहुत देर कर देते हैं तथा कई बार तो ये जातक ठोसता का अभाव होने के कारण निर्णय ले ही नहीं पाते। इसका कारण प्राय: इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में वायु तत्व की बहुतयात तथा पृथ्वी तत्व की कमी होता है क्योंकि वायु अपने आप में खोखली अथवा खाली होती है जबकि पृथ्वी ठोस तथा किसी प्रकार के ठोस निर्णय पर पहुंचने के लिए पृथ्वी तत्व की आवश्यकता होती है। स्वाति नक्षत्र के जातकों में दिखावा करने की प्रवृति भी पायी जाती है जिसका कारण इस नक्षत्र पर शुक्र तथा राहू का प्रभाव है क्योंकि वैदिक ज्योतिष इन दोनों ही ग्रहों को चरम भौतिकवाद के साथ जोड़ता है तथा दिखावा करने की प्रवृति चरम भौतिकवादी होने का संकेत ही देती है।

                         स्वाति नक्षत्र स्वभाव से बहुत भौतिकवादी नक्षत्र है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए तथा शारीरिक सुख की लालसा के लिए प्रयासरत देखे जा सकते हैं। स्वाति नक्षत्र के जातकों में बहुत सहनशीलता तथा संयम होता है जिसके चलते ये जातक किसी कार्य का फल प्राप्त करने की शीघ्रता में नहीं होते अपितु स्वाति नक्षत्र के जातक बहुत संयम से परिणाम के अपने पक्ष में आने की प्रतीक्षा करने में सक्षम होते हैं। किन्तु कुछ मामलों में स्वाति नक्षत्र के जातकों की यह विशेषता नकारात्मक रूप से भी काम करती है जिसके कारण इस नक्षत्र के जातक किसी कार्य के परिणाम के लिए बहुत लंबे समय तक प्रतीक्षा करते रहते हैं विशेषतया तब जब उस कार्य का सकारात्मक परिणाम निकलने की कोई भी संभावना न शेष हो। स्वाति नक्षत्र पर वायु तत्व का अधिक प्रभाव रहने के कारण इस नक्षत्र के जातक निर्णय लेने में प्राय: बहुत समय लगाते हैं तथा ऐसे बहुत से जातक अपने विचारों को व्यवहारिक रूप देने में बहुत समय लगाते हैं हालांकि इनके विचार बहुत अच्छे तथा व्यवहारिक रूप से सफल होने वाले भी हो सकते हैं। किन्तु इन जातकों का मन पृथ्वी तत्व की ठोसता का अभाव होने के कारण तथा वायु तत्व का प्रभाव अधिक होने के कारण अस्थिर रहता है जिसके कारण इन्हें अपने द्वारा लिए हुए निर्णयों के सफल होने के बारे में भी शंका लगी रहती है। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि स्वाति नक्षत्र के जो जातक अपने विचारों को व्यवहारिक रूप देने की कला सीख लेते हैं तथा ठोस निर्णय लेने में सक्षम हो जाते हैं, वे जातक स्वाति के अन्य जातकों की अपेक्षा कहीं अधिक सफल देखे जाते हैं। किसी कुंडली में स्वाति नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को कई प्रकार के रचनात्मक तथा नवीन विचार प्रदान कर सकता है जिन्हें व्यवाहारिकता में उतार कर ये जातक बहुत सफल हो सकते हैं। इस प्रकार स्वाति नक्षत्र के बहुत से जातकों की सफलता तथा असफलता के मध्य अंतर केवल ठोस निर्णय लेने की क्षमता का ही रह जाता है तथा स्वाति के जो जातक ठोस निर्णय लेने की कला सीख लेते हैं, वे स्वाति नक्षत्र के शेष जातकों की तुलना में कहीं अधिक सफल देखे जाते हैं।

                             वैदिक ज्योतिष स्वाति नक्षत्र को बहुत सीं अच्छी विशेषताओं के साथ भी जोड़ता है जिसका मुख्य कारण इस नक्षत्र पर वायु देव तथा देवी सरस्वती का प्रभाव माना जाता है। स्वाति नक्षत्र के जातक प्राय: सुंदर तथा आकर्षक होते हैं जिसका कारण इस नक्षत्र पर शुक्र तथा राहू का संयुक्त प्रभाव माना जाता है। स्वाति नक्षत्र के जातक कूटनीति तथा सामाजिक व्यवहार में निपुण होते हैं क्योंकि इन दोनों क्षेत्रों में निपुणता प्राप्त करने के लिए लचकीले स्वभाव का होना आवश्यक है जो कि वायु तत्व की विशेषता होने के कारण इन जातकों में भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त शुक्र तथा राहू दोनो ही ग्रहों को वैदिक ज्योतिष में सामाजिक व्यवहार कुशलता के लिए जाना जाता है तथा राहू और शुक्र की ये विशेषताएं स्वाति नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होतीं हैं जिसके चलते ये जातक बहुत व्यवहार कुशल होते हैं तथा इन्हें प्राय: सामाजिक पार्टियों में दूसरे लोगों के साथ संबंध बनाते तथा संबंध बढ़ाते हुए देखा जा सकता है। स्वाति नक्षत्र के जातकों में सामाजिक गठजोड़ अथवा नेटवर्किंग की प्रबल रूचि होती है जिसके चलते इन जातकों का सामाजिक दायरा अन्य कई नक्षत्रों के जातकों की अपेक्षा बहुत बड़ा होता है। आज के युग में सामाजिक नेटवर्किंग को चरम सीमा तक पहुंचाने वालीं फेसबुक जैसीं वैबसाइट्स निश्चित रूप से स्वाति नक्षत्र के प्रभाव का ही परिणाम है। आज की दुनिया को अधिक से अधिक सामाजिक बनाने में स्वाति की उर्जा का निश्चित रूप से बहुत बड़ा योगदान है। स्वाति नक्षत्र के जातक अपने लचकीले स्वभाव के कारण स्थिति के अनुसार व्यवहार करने में कुशल होते हैं जिसके कारण इनका सामाजिक आधार बढ़ता ही जाता है तथा आज के युग में बहुत बड़े सामाजिक दायरे वाले अधिकतर जातक इसी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में देखे जाते हैं।

                       स्वाति नक्षत्र के जातकों में सहनशीलता भी बहुत होती है जिसके चलते ये जातक अपने द्वारा किये गए कार्यों के परिणाम की बिना विचलित हुए प्रतिक्षा करने में सक्षम होते हैं। स्वाति नक्षत्र की सहनशीलता तथा संयम जैसी विशेषताओं के चलते ही शनि इस नक्षत्र में स्थित होकर अपने सर्वोच्च बल को प्राप्त करते हैं जिसके कारण इन्हें वैदिक ज्योतिष में उच्च का शनि भी कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर सूर्य स्वाति नक्षत्र में स्थित होकर एकदम क्षीण हो जाते हैं जिसके चलते इन्हें नीच का सूर्य कहकर भी संबोधित किया जाता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि शनि को वैदिक ज्योतिष में संयम तथा सहनशीलता से जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है जिसके कारण शनि स्वाति नक्षत्र में स्थित होकर अपने आप को अधिक बली पाते हैं जबकि सूर्य को वैदिक ज्योतिष में तत्काल निर्णय लेने की प्रवृति वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है तथा स्वाति नक्षत्र के अस्थिर एवम वायुवत वातावरण में आने पर सूर्य स्वयं को असहज पाते हैं और इसी कारण सूर्य इस नक्षत्र में स्थित होने पर बहुत क्षीण हो जाते हैं। स्वाति नक्षत्र में स्थित होने पर राहू तथा शुक्र भी बली हो जाते हैं क्योंकि राहू तथा शुक्र दोनों का स्वभाव ही स्वाति नक्षत्र के स्वभाव से मेल खाता है।

                        आइए अब देखें इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की ओर जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष स्वाति को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का देवी सरस्वती तथा शुक्र के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का राहू के साथ संबंध होना मानते हैं। वैदिक ज्योतिष स्वाति नक्षत्र को देव गण प्रदान करता है जिसका कारण इस नक्षत्र का देवी सरस्वती तथा वायु देव के साथ गहरा संबंध माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्वाति नक्षत्र को गुण से राजसिक माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस वर्गीकरन का कारण स्वाति नक्षत्र का शुक्र के साथ जुड़ा होना तथा इस नक्षत्र का व्यवहार और आचरण मानते हैं क्योंकि स्वाति के जातक भौतिक सुखों की प्रबल इच्छा रखने वाले होते हैं। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से अग्नि तत्व को स्वाति नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

चित्रा

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                        अश्विनी से लेकर रेवती तक चलने वाली नक्षत्रों की यात्रा में चित्रा मध्यांतर अथवा मध्य के पड़ाव को दर्शाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणना करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से चित्रा को 14वां नक्षत्र माना जाता है तथा इस नक्षत्र के पूर्व और पश्चात दोनों ओर तेरह नक्षत्र होने के कारण इसे नक्षत्रों की यात्रा का मध्यांतर भी कहा जाता है। चित्रा का शाब्दिक अर्थ है चित्र की भांति सुंदर, अदभुत अथवा आश्चर्यजनक और इस अर्थ को समझने के लिए कुछ तथ्यों पर विचार करना आवश्यक होगा। वैदिक काल में जब इन नक्षत्रों का नामकरण किया गया था तो आज की भांति टैलिविजन अथवा कैमेरे नहीं होते थे जिसके कारण चित्रकारों के हाथ से बनाए गए चित्रों को ही समृति के रूप में आगे चलाया जाता था। अच्छे तथा निपुण चित्रकार उस काल में अधिकतर या तो उन लोगों के चित्र बनाते थे जो बहुत सुंदर अथवा महत्वपूर्ण होते थे या फिर किसी अन्य वस्तु अथवा परिस्थिति का जो अपने आप में अदभुत अथवा आश्चर्यजनक हो। इस प्रकार प्राचीन काल में बहुत सुंदर व्यक्ति या स्त्री को चित्र की भांति सुंदर भी कहा जाता था क्योंकि तब चित्र अधिकतर सुंदर पुरुषों के अथवा सुंदर स्त्रियों के ही बनते थे। इस प्रकार चित्रा शब्द का सुंदर, आश्चर्यजनक अथवा अदभुत के साथ संबंध माना जाता है तथा अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि चित्रा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक इन विशेषताओं का प्रदर्शन करते हैं।

                            वैदिक ज्योतिष के अनुसार बड़े आकार के एक चमकीले रत्न को चित्रा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि जिस प्रकार रत्न भूमि के भीतर एक लंबी अवधि के पश्चात तथा कई प्रकार की जैविक तथा रसायनिक क्रियाओं जैसे कि चरम तापमान, चरम दबाव तथा सूक्ष्म जीवों के प्रभाव के पश्चात बनता है उसी प्रकार चित्रा नक्षत्र के माध्यम से भी उस कला का प्रदर्शन होता है जो कलाकार के जीवन की चरम भावनात्मक अथवा रचनात्मक परिस्थितियों में जन्म लेती है। रत्नों को कला तथा शिल्प का नमूना भी माना जाता है तथा इसी प्रकार चित्रा नक्षत्र भी कला तथा शिल्प जैसीं विशेषताएं प्रदर्शित करता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी मोती को भी चित्रा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मानते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि अपने आप में कला का एक नमूना माने जाने वाले मोती का जन्म भी चरम तथा उत्तेजित करने वाली परिस्थितियों में ही होता है। कोई बाहरी पदार्थ जैसे ही सीप के बाहरी खोल के भीतर प्रवेश पाने में सफल हो जाता है तो सीप के अंदर एक उत्तेजना तथा रक्षा की भावना पैदा हो जाती है जिसके चलते सीप अपने भीतर से नैक्र नाम का एक पदार्थ छोड़ती है जो उस बाहरी पदार्थ से लिपट कर उसके उपर बहुत सी सतहें बना लेता है तथा सीप की इस रक्षात्मक तथा उत्तेजित प्रतिक्रिया के स्वरुप मोती का जन्म होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अपने आप में बहुत सुंदर माने जाने वाले मोती का जन्म वास्तव में चरम परिस्थितियों में होता है। इसी प्रकार चित्रा नक्षत्र भी कला के उस नमूने को प्रदर्शित करता है जिसका जन्म कलाकार के उत्तेजना, उग्रता, उदासी अथाव ऐसी ही किसी स्थिति में होने से होता है।

                        शिल्प कला में सबसे निपुण माने जाने वाले विश्व कर्मा को वैदिक ज्योतिष के अनुसार चित्रा नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर विश्वकर्मा का प्रबल प्रभाव रहता है। विश्वकर्मा शिल्प कला के सुंदर तथा अदभुत नमूने बनाने के लिए जाने जाते हैं तथा विश्वकर्मा के चरित्र की ये विशेषता चित्रा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होती है। विश्व कर्मा को रचना से जुड़े प्रत्येक प्रकार के रहस्य तथा माया का ज्ञाता माना जाता है तथा विश्वकर्मा के इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव के कारण इस नक्षत्र के जातक भी लगभग शून्य से ही कला के उत्कृष्ट नमूने बनाने में दक्ष होते हैं। इस प्रकार चित्रा नक्षत्र माया के बहुत से भेद जानने वाले नक्षत्र के रूप में जाना जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक ऐसी सुंदर से सुंदर कृतियों की रचना करने में सक्षम होते हैं जिसकी कल्पना करना भी अन्य बहुत से नक्षत्र के जातकों के लिए बहुत कठिन होता है। इसी कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी चित्रा नक्षत्र को अपार प्रतिभा का धनी मानते हैं जो माया तथा रहस्यवाद को भेदकर बहुत सी सुंदर कृतियों को जन्म दे सकता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से मंगल ग्रह को चित्रा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर मंगल ग्रह का भी प्रभाव रहता है। वैदिक ज्योतिष में मंगल को अग्नि, उर्जा तथा शक्ति से जुड़े हुए एक ग्रह के रूप में जाना जाता है तथा मंगल का चित्रा नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र को वह आवश्यक उर्जा तथा प्रोत्साहन प्रदान करता है जो इसे अपनी कला को सजीव रूप देने के लिए आवश्यक रूप से चाहिए होती है। इस प्रकार मंगल का इस नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र की रचनात्मकता तथा कलात्मकता को और भी बढ़ा देता है।

                           वैदिक ज्योतिष के अनुसार चित्रा नक्षत्र के पहले दो चरण कन्या राशि में स्थित होते हैं जबकि इस नक्षत्र के शेष दो चरण तुला राशि में स्थित होते हैं जिसके चलते इस नक्षत्र पर कन्या राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बुध और तुला राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह शुक्र का भी प्रभाव रहता है। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि बुध तथा शुक्र का चित्रा नक्षत्र पर प्रभाव इस नक्षत्र की कलात्मकता तथा रचनात्मकता को और भी बढ़ा देता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष के अनुसार बुध तथा शुक्र को रचनात्मकता तथा कलात्मकता के साथ जोड़ा जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी चित्रा नक्षत्र का संबंध राहू से भी जोड़ते हैं क्योंकि इन ज्योतिषियों के अनुसार राहू कन्या राशि के सह-अधिपति हैं। इस प्रकार राहू का इस नक्षत्र पर प्रभाव होने के कारण राहू की विशेताओं का भी इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शन होता है जिनमें रहस्यवाद तथा माया भी शामिल है। चित्रा नक्षत्र में विश्वकर्मा, बुध, शुक्र तथा राहू की विभिन्न विशेषताओं का समावेश इस नक्षत्र को एक जटिल प्रकार का नक्षत्र बना देता है जिसके कारण इस नक्षत्र की उर्जा कई बार असुंतुलित हो जाती है जबकि कई बार इन विशेषताओं का संयुक्त प्रभाव इस नक्षत्र को कला के उत्कृष्ट नमूने रचने में सहायता भी करता है।

                             चित्रा नक्षत्र के जातक किसी न किसी स्तर पर रचनात्मकता के साथ जुड़े होते हैं क्योंकि चित्रा नक्षत्र अपने आप में रचनात्मकता का ही दूसरा रूप है। चित्रा नक्षत्र के जातकों को प्रकृति की सुंदर से सुंदर कृतियों के रहस्य को समझने में बहुत रूचि होती है तथा बहुत बार ये जातक इन रहस्यों को समझने में सफल भी हो जाते हैं क्योंकि चित्रा नक्षत्र के जातकों में जटिल से जटिल रहस्य को भी भेद देने की क्षमता अन्य कई नक्षत्रों के जातकों से बहुत अधिक होती है। आज के युग में चित्रा नक्षत्र के जातक वास्तु कला के क्षेत्र में, फैशन जगत के क्षेत्र में तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में कार्यरत पाये जा सकते हैं जिनमें सफलता प्राप्त करने के लिए रचनात्मक कल्पना शक्ति का होना आवश्यक है। चित्रा नक्षत्र के जातक अपने उच्च स्तर पर माया के रहस्य समझने में तथा दूसरे लोकों के साथ जुड़ने में भी सक्षम होते हैं। चित्रा नक्षत्र के जातकों के चरित्र तथा इनकी कृतियों को एक प्रकार का रहस्यवाद घेर कर रखता है तथा रहस्य के इस घेरे को भेद कर इन जातकों की वास्तविकता को समझ लेना अधिकतर व्यक्तियों के लिए कठिन कार्य हो सकता है। उदाहरण के लिए अपनी भविष्य की किसी कृति पर कार्य कर रहा चित्रा का कोई जातक अपने इर्द गिर्द वाले लोगों को किसी रहस्यमयी चरित्र की भांति लग सकता है क्योंकि इस जातक के द्वारा किया जाने वाला कार्य इन लोगों की समझ से परे होता है तथा इन लोगों को ऐसा लगता है कि चित्रा का यह जातक अपनी इस कृति पर केवल अपना समय ही व्यर्थ कर रहा है तथा जब यही चित्रा का जातक अपनी इस कृति को एक सुंदर रूप में पूर्ण करने में सफल हो जाता है तो ये लोग अचम्भित रह जाते हैं। चित्रा नक्षत्र के जातकों में अपने चरित्र तथा रचनात्मकता के चलते अन्य लोगों को अचम्भित करने की प्रबल क्षमता होती है।

                            आइए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग किए जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष चित्रा को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का बुध तथा शुक्र के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष चित्रा नक्षत्र को वैश्य वर्ण प्रदान करता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस तथ्य को मानते हैं कि अधिकतर कृतियों का निर्माण काम करने की श्रेणी में आने वाले लोग करते हैं तथा वैश्य जाति का संबंध इसी श्रेणी से माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार चित्रा नक्षत्र को गुण से तामसिक तथा गण से राक्षस माना जाता है। अधिकतर वैदिक ज्योतिष इस वर्गीकरण का कारण इस तथ्य को मानते हैं कि चित्रा नक्षत्र का माया के साथ प्रबल संबंध है तथा माया के भेद समझने में राक्षस जाति अन्य सभी जातियों की तुलना में कहीं आगे है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से अग्नि तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है तथा यह अग्नि चित्रा की रचनात्मकता को उर्जा प्रदान करने वाली अग्नि मानी जाती है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

हस्त

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                           वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणना करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से हस्त को तेरहवां नक्षत्र माना जाता है। हस्त का शाब्दिक अर्थ है हाथ और इसी के अनुसार वैदिक ज्योतिष में हस्त नक्षत्र को हाथ तथा इसके साथ जुड़ी विशेषताओं के साथ जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष में प्रचलित धारणा के अनुसार हाथ की खुली हुई हथेली को इस नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। हाथ की खुली हुई हथेली भाग्य को दर्शाती है क्योंकि खुली हुई हथेली में हाथ की रेखाएं चित्रित होतीं हैं जिनका अध्ययन हस्त रेखा विज्ञान में जातक का भाग्य बताने के लिए किया जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार हाथ का प्रयोग कर्म करने की क्षमता को दर्शाने के लिए भी किया जाता है जिसके चलते इस नक्षत्र को परिश्रम करने की क्षमता तथा विशेष रूप से हाथ की कला से किये जाने वालो कार्यों के साथ भी जोड़ा जाता है। इस प्रकार हस्त नक्षत्र का यह प्रतीक चिन्ह इस नक्षत्र की परिश्रम करने की विशेषता को दर्शाता है तथा साथ ही साथ इस नक्षत्र का कर्म करने में विश्वास तथा भाग्य के प्रति विश्वास भी दर्शाता है जिसके कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक परिश्रम करने वाले तथा भाग्य को बताने वाली विद्याओं पर विश्वास करने वाले तथा उनमें रूचि रखने वाले होते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी बंद मुट्ठी को भी हस्त नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मानते हैं। बंद मुट्ठी सामान्यतया व्यक्ति के दृढ़ संकल्प, गोपनीयता तथा कभी कभी क्रोध को भी दर्शाती है तथा बंद मुट्ठी के द्वारा प्रदर्शित की जाने वालीं ये विशेषताएं भी हस्त नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं।

                           बारह आदित्यों में से एक माने जाने वाले सावित्र को वैदिक ज्योतिष के अनुसार हस्त नक्षत्र का देवता माना जाता है। सावित्र को वैदिक ज्योतिष में रचना करने की प्रवृति तथा रचना करने को प्रोत्साहन देने की प्रवृति के साथ जोड़ा जाता है तथा सावित्र के चरित्र की ये विशेषताएं हस्त नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। सावित्र को एक चंचल, चुलबुला तथा हंसमुख देवता भी माना जाता है जो प्रत्येक प्रकार के खेल तथा मनोरंजन को भी प्रोत्साहित करता है तथा विशेषतया उन खेलों को जिनमें शारीरिक क्षमता का प्रयोग होता हो अथवा मानसिक क्षमता का प्रयोग होता हो तथा सावित्र की ये विशेषताएं हस्त नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होती हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सावित्र को हस्तशिल्प की कला में भी निपुण माना जाता है जो हस्तशिल्प तथा हाथ की कला और कौशल से जुड़ी अन्य कलाओं को भी प्रोत्साहित करता है। सावित्र के चरित्र की ये सभी विशेषताएं हस्त नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक किसी न किसी प्रकार की हस्तकला, खेल अथवा शारीरिक क्षमता की मांग करने वाले क्षेत्रों में रूचि रखने वाले होते हैं। सावित्र को झूठ बोलने तथा छल करने की कला में भी निपुण माना जाता है तथा सावित्र की ये विशेषताएं भी हस्त नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं हालांकि हस्त नक्षत्र इन विशेषताओं का प्रदर्शन तभी करता है जब यह नक्षत्र किसी कुंडली में नकारात्मक रूप से काम कर रहा हो। किन्तु फिर भी बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि हस्त नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों का शीघ्रता से विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसे जातकों में छल करने की प्रवृति पायी जाती है।

                          नवग्रहों में से चन्द्रमा को वैदिक ज्योतिष के अनुसार हस्त नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर चन्द्रमा का भी प्रभाव रहता है तथा चन्द्रमा के चरित्र की कुछ विशेषताएं जैसे कि संवेदनशीलता, भावुकता, पारिवारिक मूल्यों में विश्वास रखना तथा संरक्षण आदि विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। चन्द्रमा की इन विशेषताओं के प्रभाव के कारण हस्त नक्षत्र का छलिया स्वभाव उन लोगों के प्रति बहुत सीमा तक कम हो जाता है जो हस्त जातकों के परिवार के सदस्य अथवा इनके अतरंग मित्र होते हैं जिसके कारण इन जातकों का व्यवहार इन सभी लोगों के प्रति आमतौर पर छलरहित ही रहता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार हस्त नक्षत्र के सभी चार चरण कन्या राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर कन्या राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बुध का भी प्रभाव रहता है। बुध के चरित्र की कई विशेषताएं जैसे कि परिश्रम करने की प्रवृति, विशलेषणात्मक स्वभाव, भेद करने की क्षमता, हास्य विनोद करने की विशेषता, छल तथा धोखा करने की विशेषता तथा ऐसीं हीं अन्य कुछ विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। इस प्रकार हस्त नक्षत्र के माध्यम से सावित्र, चन्द्रमा तथा बुध की विशेषताओं का मिश्रित रूप से प्रदर्शन होता है तथा किसी कुंडली में इस नक्षत्र का व्यवहार इस नक्षत्र पर प्रभाव डालने वाले ग्रहों और देवता के बल तथा स्वभाव पर भी निर्भर करता है। अपने सकारात्मक स्तर पर हस्त पारिवारिक मूल्यों को समझने वाले, परिवार बनाने में रुचि रखने वाले तथा परिवार का संरक्षण करने वाले नक्षत्र के रूप में जाना जाता है तथा किसी कुंडली में इस नक्षत्र का प्रबल प्रभाव संतान उत्पत्ति के लिए शुभ माना जाता है। हस्त नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक बहुत विनोदी स्वभाव के होते हैं जिसके चलते ये जातक अपने आप को तथा अपने संपर्क में आने वाले लोगों को भी समय समय पर हंसाते रहते हैं।

                          हस्त नक्षत्र के जातकों की बौधिक तथा गणनात्मक क्षमता अच्छी होती है जिसके चलते ऐसे जातक प्रत्येक स्थिति के अनुसार शीघ्रता से गणना करके व्यवहार करने में भी कुशल होते हैं। हस्त के जातक अपने संपर्क में आने वाले लोगों का शीघ्रता से विश्वास नहीं करते तथा ये जातक किसी का विश्वास करने में बहुत समय लेते हैं। यहां पर यह बात रोचक तथा ध्यान देने योग्य है कि हस्त नक्षत्र के जातक व्यवसायिक तथा सामाजिक संबंध बनाने में कुशल होते हैं तथा अपनी इस कुशलता के चलते ये जातक इन क्षेत्रों में सफल भी देखे जाते हैं किन्तु हस्त के जातक अपने व्यवसायिक तथा सामाजिक संपर्क में आने वाले अधिकतर लोगों का विश्वास नहीं करते भले ही वे लोग सामाजिक अथवा व्यवसायिक रूप से इनके बहुत समीप माने जाते हों। हस्त नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में शंका करने की प्रवृति स्वभाविक रूप से पायी जाती है जिसका कारण सामान्यतया इन जातकों के भीतर छिपी किसी न किसी प्रकार की असुरक्षा की भावना ही होती है। इसलिए भले ही हस्त नक्षत्र के जातक बहुत से लोगों के साथ मेल मिलाप तथा संबंध बनाते दिखते हों किन्तु इन जातकों के लिए अपने आस पास के इन लोगों पर पूर्ण रूप से विश्वास करना तथा इन लोगों के साथ विश्वास पर आधारित एक सुरक्षित संबंध बनाना कठिन होता है। हस्त नक्षत्र के जातक शारीरिक रूप से सक्रिय होते हैं तथा इसी के अनुसार ये जातक अपने लिए किसी ऐसे ही व्यवसायिक क्षेत्र का चुनाव करते हैं जिसमें इन्हें शारीरिक श्रम करते रहना पड़े। हस्त नक्षत्र के जातक बहुत सोच समझ कर चलने वाले तथा अनुशासित रहने वाले होते हैं तथा इन्हें किसी भी काम के सभी पक्षों को समझे बिना उसे करना पसंद नहीं होता।

                            कुंडली में हस्त नक्षत्र का प्रबल नकारात्मक प्रभाव जातक को छलिया, कपटी तथा ठग प्रवृति का बना देता है जिसके चलते ऐसे जातक को लोगों को छलने तथा मूर्ख बनाने में बहुत आनंद आता है। हस्त नक्षत्र के ये जातक बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को भी छलने में सक्षम होते हैं क्योंकि हस्त के ये जातक एक के बाद एक नए प्रपंचों तथा विचारों को जन्म देने में दक्ष होते हैं। हस्त नक्षत्र का प्रबल नकारात्मक प्रभाव जातक को कुशल जुआरी भी बना सकता है अथवा जातक हाथ की कला से अन्य लोगों के ठगने अथवा लूटने की कला में दक्ष हो सकता है जैसे कि ताश के खेल के माध्यम से लोगों को छलने वाले जातक, जेब काटने की कला के माध्यम से लोगों को छलने वाले जातक आदि। हस्त नक्षत्र के जातक अपने आप को वयस्त रखने में विश्वास रखते हैं तथा ये जातक अपने शरीर को कम से कम आराम देकर अधिक से अधिक काम लेने में भी विश्वास रखते हैं जिसके चलते इन्हें समय समय पर बैचेनी तथा अनिद्रा जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है। बुध ग्रह का इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव हस्त के जातकों को व्यापार तथा व्यवसाय से जुड़ीं सफलताएं प्रदान कर सकता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष में बुध को व्यापार के साथ जुड़े हुए ग्रह के रुप में माना जाता है। हस्त नक्षत्र के जातकों को सामान्यतया ऐसे सभी विज्ञानों के प्रति गहरी रूचि होती है जिनके माध्यम से कोई व्यक्ति अपना भविष्य जान सकता है जैसे कि ज्योतिष, हस्त रेखा विज्ञान, अंक विज्ञान तथा ऐसी ही अन्य विद्याएं तथा कुंडली में कुछ विशेष योग होने पर ये जातक इन विद्याओं का व्यवासायिक रूप में अभ्यास भी करते हैं। 

                          आइए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्य के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष हस्त नक्षत्र को एक पुरुष नक्षत्र मानता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का सावित्र के साथ गहरा संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार हस्त नक्षत्र को वर्ण से वैश्य माना जाता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का बुध के साथ संबंध मानते हैं क्योंकि बुध को वैदिक ज्योतिष के अनुसार व्यापार से जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है तथा व्यापार करने की कला वैश्य जाति से जोड़ी जाती है। वैदिक ज्योतिष में हस्त नक्षत्र को राजसिक गुण प्रदान किया जाता है जो इस नक्षत्र की कार्यशैली के आधार पर समझा जा सकता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार हस्त नक्षत्र को देव गण प्रदान किया जाता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का सावित्र तथा चन्द्रमा के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से अग्नि तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

उत्तराफाल्गुनी

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                          भारतीय वैदिक ज्योतिष के आधार पर कुंडली से गणना करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र को बारहवां नक्षत्र माना जाता है। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र अपने से पिछले नक्षत्र पूर्वाफाल्गुनी के साथ जोड़ा बनाता है तथा अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि इन दोनों के व्यवहार तथा आचरण में बहुत सी समानताएं हैं। उत्तरा फाल्गुनी का शाब्दिक अर्थ है बाद में आने वाला लाल रंग वाला तथा इस अर्थ के अनुसार ही इस नक्षत्र की अनेक विशेषताएं पूर्वाफाल्गुनी के साथ मेल खातीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार दिन के समय विश्राम करने के लिए प्रयोग किये जाने वाली चारपाई अथवा दीवान की पिछली दो टांगों को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है जिसके चलते इस नक्षत्र को भी पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र की भांति विश्राम आदि जैसी विशेषताओं के साथ जोड़ा जाता है। किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि उत्तरा फाल्गुनी का यह प्रतीक चिन्ह विश्राम की प्रारंभिक स्थिति को न दर्शा कर विश्राम की अंतिम तथा हल्की स्थिति को दर्शाता है जो कि एक प्रकार का विस्तारित विश्राम कहा जा सकता है जो आवश्यक नहीं है बल्कि विश्राम करने वाले की कुछ और विश्राम करने की इच्छा के कारण किया जाता है। इस प्रकार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह दवारा प्रदर्शित किया जाने वाला विश्राम कुछ अर्थों में पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र द्वारा दर्शाये जाने वाले विश्राम के समान होने के पश्चात भी बहुत से अर्थों में उससे भिन्न भी है।

                     बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह द्वारा दर्शाया जाने वाला विश्राम व्यक्ति की उस स्थिति को दर्शाता है जिसमें वह अपनी छोटी अवधि की निद्रा को पूरा कर चुका है तथा अब जागृत अवस्था में कुछ और शारीरिक विश्राम की इच्छा के चलते लेटा हुआ है। इस स्थिति में विश्राम करने वाले व्यक्ति का मानसिक विश्राम निद्रा के भंग होते ही समाप्त हो चुका है तथा यह व्यक्ति अब केवल शारीरिक विश्राम कर रहा है तथा यह व्यक्ति किसी मानसिक गतिविधि जैसे कि चिंतन करना अथवा किसी प्रकार की मनोरंजक गतिविधि जैसे कि टैलीविज़न आदि देखने में भी व्यस्त हो सकता है। इस प्रकार यह विश्राम का अंतिम चरण माना जा सकता है जिसमें व्यक्ति अपना विश्राम लगभग पूरा कर चुका है तथा अब कार्य करने के लिए तैयार हो रहा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार आर्यमान को उत्तराफाल्गुनी का अधिपति देवता माना जाता है। आर्यमान भी भग की भांति बारह आदित्यों में से एक हैं तथा आर्यमान उदारता, दूसरों की सहायता करने तथा दूसरों से सहायता प्राप्त करने, आतिथ्य, सभ्य स्वभाव तथा ऐसी ही कई अन्य विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और आर्यमान के चरित्र की ये विशेषताएं उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र पर उनका प्रबल प्रभाव होने के कारण इस नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होतीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार आर्यमान को एक ऐसा देवता माना जाता है जो मित्र बनाने के लिए तत्पर रहता है, मित्रों की सहायता करने तथा उनसे सहायता प्राप्त करने के लिए भी तत्पर रहता है तथा जो मित्रों को बहुत महत्व देता है और आर्यमान के चरित्र की यह विशेषता भी उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होती है। 

                       नवग्रहों के राजा माने जाने वाले सूर्य को वैदिक ज्योतिष के अनुसार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण सूर्य का भी इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव रहता है और सूर्य के चरित्र की कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का पहला चरण सिंह राशि में स्थित होता है जबकि इस नक्षत्र के शेष तीन चरण कन्या राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर कन्या राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बुध का प्रभाव भी रहता है और इसी लिए बुध के चरित्र की कुछ विशेषताएं भीं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। सूर्य तथा बुध का संयुक्त प्रभाव इस नक्षत्र को विशिष्ट बना देता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य तथा बुध की युति को बहुत अच्छा माना जाता है। किसी कुंडली में सूर्य तथा बुध की युति होने पर बहुत से वैदिक ज्योतिषियों के अनुसार कुंडली में बुध आदित्य योग का निर्माण हो जाता है जिसके चलते इस योग के प्रभाव में आने वाले जातक बहुत बुद्धिमान, व्यवहारिक, संतुलित तथा शासकीय क्षमताओं के स्वामी हो जाते हैं। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र पर सूर्य तथा बुध का संयुक्त प्रभाव होने के कारण बुधआदित्य योग की विशेषताएं भी इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के अधिपति देवता आर्यमान भी एक आदित्य अर्थात सूर्य पुत्र हैं तथा इसी के कारण आर्यमान के चरित्र की बहुत सी विशेषताएं भी सूर्य के चरित्र की विशेषताओं के साथ मेल खातीं हैं जिसके चलते उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के उपर पड़ने वाला इसके अधिपति देवता तथा अधिपति ग्रहों का प्रभाव पूर्वाफाल्गुनी की भांति एक दूसरे के विपरीत न होकर समान प्रकार का प्रभाव है जिसके कारण उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र की तुलना में कहीं अधिक संतुलित नक्षत्र माना जाता है।

                            इस प्रकार उपर वर्णित ग्रहों तथा देवता का संयुक्त प्रभाव उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र पर प्रभावी रहता है जिसके कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बुद्धिमान, मित्रवत, मित्र बनाने में विश्वास रखने वाले तथा मित्रों और मित्रता को महत्वपूर्ण मानने वाले, दयालु, व्यवहारिक तथा सामाजिक व्यवहार में कुशल होते हैं। ऐसे जातक समय समय पर अपने मित्रों की सहायता करते रहते हैं तथा समय आने पर अपने मित्रों से सहायता प्राप्त भी करते हैं। उत्तरा फाल्गुनी के जातक स्वभाव से स्वतंत्र प्रवृति के होते हैं तथा ऐसे जातक आंखें बंद करके समाज अथवा लोगों के द्वारा निर्धारित किए गए रास्तों पर चलना पसंद नहीं करते बल्कि इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने रास्ते स्वयं तय करने में विश्वास रखते हैं तथा इनके आस पास के बहुत से लोग इन जातकों के द्वारा बनाए गए रास्तों पर चलते हैं। अनेक वैदिक ज्योतिषी इसका कारण नवग्रहों के राजा सूर्य का इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव मानते हैं जो इस नक्षत्र को स्वभाविक रूप से नेतृत्व क्षमता की विशेषता प्रदान करता है। यहां पर यह बार रोचक तथा ध्यान देने योग्य है कि पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र पर शुक्र का प्रभाव होने के कारण इस नक्षत्र के जातक आम तौर पर समाज के द्वारा निश्चित किये गए रास्तों पर ही चलना पसंद करते हैं जबकि सूर्य के प्रभाव वाले उत्तरफाल्गुनी के जातक अपने रास्ते स्वयं निश्चित करना पसंद करते हैं जिससे इन दोनों ग्रहों तथा इन दोनो नक्षत्रों के स्वभाव का एक बड़ा अंतर सपष्ट हो जाता है।

                             अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि सूर्य के चरित्र की अनेक विशेषताएं जैसे कि आक्रमकता, नेतृत्व करने की क्षमता, क्रोध, जीतने की प्रबल इच्छा रखने की प्रवृति, स्वतंत्र विचार रखने की और स्वतंत्र आचरण करने की प्रवृति तथा ऐसी ही अन्य कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र सूर्य के प्रतिनिधित्व में आने वाले अन्य नक्षत्र कृतिका की अपेक्षा कहीं अधिक नम्र स्वभाव का है तथा इस नक्षत्र के जातक आक्रमकता का प्रदर्शन तभी करते हैं जब ऐसा करना स्थिति के अनुसार अनिवार्य हो जाए तथा साथ ही साथ इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक क्रोध आने पर कृतिका नक्षत्र के जातकों की अपेक्षा अधिक संतुलित व्यवहार करते हैं और अपेक्षाकृत शीघ्रता से शांत भी हो जाते हैं। बुध का उत्तराफाल्गुनी पर प्रभाव इस नक्षत्र को बुद्धिमता, हास्य, व्यवहार कुशलता तथा व्यवहारिकता जैसी विशेषताएं प्रदान करता है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक ऐसे सभी क्षेत्रों में सफल देखे जाते हैं जिनमें सफलता प्राप्त करने के लिए इन विशेषताओं की आवश्यकता होती है। उत्तराफाल्गुनी के जातक सूर्य की भांति साहसी तथा बुध की भांति कुशल और बुद्धिमान होते हैं जिसके कारण ये जातक बहुत से क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।

                        आइए अब विचार करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों में प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष उत्तरा फाल्गुनी को एक स्त्री नक्षत्र मानता है जो अपने आप में चकित कर देने वाला निर्धारण है क्योंकि इस नक्षत्र पर प्रभाव डालने वाला ग्रह सूर्य तथा देवता आर्यमान दोनो ही पुरुष ग्रह हैं तथा इस नक्षत्र का व्यवहार तथा आचरण भी अधिकतर पुरुषों के व्यवहार की भांति ही है। वैदिक ज्योतिष में उत्तराफाल्गुनी को स्वभाव से तीव्र नक्षत्र माना जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र पर सूर्य के प्रबल प्रभाव को माना जाता है। वैदिक ज्योतिष उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र को क्षत्रिय वर्ण प्रदान करता है तथा इस नक्षत्र को गुण से राजसिक माना जाता है और इस नक्षत्र के गुण और गण निर्धारण के कारण को भी इस नक्षत्र पर सूर्य के प्रबल प्रभाव तथा इस नक्षत्र के आचरण के साथ जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र को मानव गण के साथ जोड़ता है जिसका कारण इस नक्षत्र का भौतिकवाद के साथ जुड़ा होना तथा मानवता की विशेषताएं प्रदर्शित करने को माना जाता है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से जल तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

पूर्वाफाल्गुनी

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                           भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से पूर्वाफाल्गुनी को 11वां नक्षत्र माना जाता है। पूर्वाफाल्गुनी का शाब्दिक अर्थ है पहले आने वाला लाल रंग वाला तथा इसी के अनुसार वैदिक ज्योतिषी पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र को विभिन्न प्रकार के अर्थों के साथ जोड़ते हैं। लाल रंग को कामनाओं का रंग माना जाता है तथा वैदिक ज्योतिष के अनुसार लाल रंग को विवाह आदि कार्य के लिए शुभ माना जाता है तथा इसीलिए विवाह के समय वधु को लाल रंग के कपड़े पहनाए जाते हैं। इस प्रकार पूर्वाफाल्गुनी लाल रंग के माध्यम से कामनाओं, विवाह आदि कार्यों तथा और भी कई विशेषताओं के साथ जुड़ जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह दिन के समय बैठने तथा आराम करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले दीवान अथवा चारपाई की आगे वाली दो टांगें हैं। इस दीवान का प्रयोग दिन के समय विश्राम करने के लिए किया जाता है तथा इस प्रकार पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का यह प्रतीक चिन्ह इस नक्षत्र को विश्राम करने जैसी विशेषताओं के साथ जोड़ता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में दीवान की केवल आगे वाली दो टांगें ही प्रयोग की जातीं हैं जिसके कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं पूर्वाफाल्गुनी का संबध विश्राम की आरंभिक अवस्था के साथ है न कि विश्राम की बाद वाली अवस्था के साथ। विश्राम की पहली अवस्था को गहरे विश्राम के साथ जोड़ा जाता है जिसमें व्यक्ति का तन तथा मन दोनों ही विश्राम की गहन अवस्था में होते हैं तथा इसी के अनुसार बहुत से ज्योतिषी पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र को भी आराम तथा विश्राम से जुड़ा हुआ नक्षत्र मानते हैं।

                         उदाहरण के लिए दोपहर के भोजन के बाद ली जाने वाली छोटी अवधि की निद्रा को विश्राम का पहला चरण माना जा सकता है जिसमें व्यक्ति का तन तथा मन दोनों ही विश्राम की अवस्था में चले जाते हैं जबकि इस नींद से जाग जाने के पश्चात जागृत अवस्था में दीवान के उपर लेट कर कुछ और विश्राम तथा चिंतन करने की अवस्था को विश्राम की अवस्था का अगला चरण माना जा सकता है क्योंकि इस अवस्था में आम तौर पर व्यक्ति का केवल तन ही आराम की अवस्था में होता है जबकि उसका मन किसी प्रकार का चिंतन करने में अथवा किसी प्रकार की योजना बनाने में भी लगा हो सकता है। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र विश्राम की प्रथम तथा गहन अवस्था को दर्शाता है जबकि विश्राम की बाद वाली अवस्था को पूर्वाफाल्गुनी के बाद आने वाला नक्षत्र उत्तर फाल्गुनी दर्शाता है। उपरोक्त उदाहरण से यह सपष्ट हो जाता है कि पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र विश्राम की गहन अवस्था को दर्शाता है तथा इसी के चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों को भी आराम तथा सुख सुविधाएं बहुत पसंद होतीं हैं तथा ऐसे जातक आमतौर पर प्रत्येक परिस्थिति में अपने लिए आराम तथा सुविधा खोजने का प्रयास करते रहते हैं। उदाहरण के लिए भीड़ से भरी हुई किसी जगह में अपने लिए आरामदायक स्थान खोजने वाले तथा इन आरामदायकों स्थानों पर बैठे या लेटे हुए जातक आम तौर पर पूर्वाफाल्गुनी के जातक ही होते हैं। इसी प्रकार इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक आम तौर पर उन्हीं व्यवसायिक क्षेत्रों में कार्यशील देखे जाते हैं जिनमें शारीरिक श्रम अधिक न करना पड़ता हो।

                            बारह आदित्यों में से एक माने जाने वाले भग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है। भग को वैदिक ज्योतिष में आनंद, विश्राम, ऐश्वर्य, सुख सुविधा तथा ऐसी ही अन्य विशेषताओं के साथ जोड़ा जाता है तथा बहुत से ऐश्वर्यों से जुड़े होने के कारण परमात्मा का एक नाम भगवान भी माना जाता है। भग का पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव होने के कारण इस देवता की बहुत सी विशेषताएं पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिनमें आनंद, ऐश्वर्य, मनोरंजन, भौतिक वस्तुओं का अधिक से अधिक भोग आदि विशेषताएं भीं सम्मिलित हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से शुक्र को इस नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर शुक्र का भी प्रभाव रहता है तथा इसी के अनुसार शुक्र के चरित्र की वे विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जो भग के चरित्र की विशेषताओं के साथ समानता रखतीं हैं। शुक्र का विशेष प्रभाव इस नक्षत्र को ऐश्वर्य, सुख भोग तथा शारीरिक सुख भोगने की तीव्र लालसा देता है तथा शुक्र के प्रबल प्रभाव के कारण इस नक्षत्र को शारीरिक संबंधों तथा विवाह आदि को प्रोत्साहित करने वाला नक्षत्र भी माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पूर्वाफाल्गुनी के सभी चरण सिंह राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर सिंह राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह सूर्य का भी प्रभाव पड़ता है। सूर्य तथा शुक्र को वैदिक ज्योतिष में परस्पर शत्रु भाव रखने वाले ग्रह माना जाता है तथा पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के माध्यम से सूर्य तथा शुक्र की परस्पर विरोधी विशेताएं भी प्रदर्शित होतीं हैं जिसके कारण पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में सूर्य तथा शुक्र की इन परस्पर विरोधी विशेषताओं का मिश्रण कई बार बहुत नाटकीय, संवेदनशील तथा उग्र स्थितियों को भी जन्म दे देता है।

                       वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से सूर्य को आत्मा तथा आत्म के साथ जोड़ा जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में सूर्य का प्रबल प्रभाव जातक को आत्मकेंद्रित बना देता है तथा ऐसा जातक समाज तथा लोगों से घुलने मिलने तथा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करने की अपेक्षा ऐसा अपने भीतर से अपने अस्तित्व को खोजने का प्रयास करता है। वहीं दूसरी ओर वैदिक ज्योतिष के अनसार शुक्र को एक सामाजिक ग्रह माना जाता है तथा अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि शुक्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने अस्तित्व की खोज करने की अपेक्षा भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए अधिक प्रयास करते हैं। शुक्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक समाज के साथ घुलने मिलने, लोगों को प्रसन्न करने तथा भौतिक सुखों के लिए प्रयत्न करने वाले होते हैं। इस प्रकार पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में सूर्य तथा शुक्र की दो परपस्पर विरोधी उर्जाओं का मिलन होता है जिसके फलस्वरूप पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का स्वभाव विस्फोटक, नाटकीय, अस्थिर तथा अप्रत्याशित हो जाता है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक समय समय पर ऐसा व्यवहार कर सकते हैं जो उनके सामान्य आचरण के बिलकुल विपरीत हो। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि शुक्र का इस नक्षत्र पर प्रभाव सूर्य से अधिक रहता है जिसका कारण शुक्र का इस नक्षत्र का अधिपति ग्रह होना तथा भग का इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव होना है क्योंकि भग के चरित्र की अधिकतर विशेषताएं शुक्र की विशेषताओं से मेल खातीं हैं। इसलिए पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक आम तौर पर आरामपसंद, भोग विलास तथा अन्य भौतिक सुखों के लिए प्रयत्न करने वाले होते हैं।

                           पूर्वाफाल्गुनी के जातक आम तौर पर बहुत धीमे से काम करने वाले तथा शिथिल स्वभाव के होते हैं तथा इन्हें किसी भी काम को करने की जल्दी नहीं होती बल्कि ऐसे जातक अपने काम को बहुत आराम से धीरे धीरे करना पसंद करते हैं। बहुत से पूर्वाफाल्गुनी जातक सुबह देर से उठना पसंद करते हैं तथा इसके बाद अपनी दिनचर्या को धीरे धीरे से शुरु करते हैं। पूर्वाफाल्गुनी के जातक सामाजिक व्यवहार में बहुत कुशल होते हैं तथा ये जातक समाज द्वारा तय किए गए नियमों को मानने वाले होते हैं। ऐसे जातक समाज में प्रचलित नियमों, रीतियों तथा परंपराओं को बदलने में विश्वास रखने वाले नहीं होते बल्कि इस नक्षत्र के जातक समाज के नियमों के अनुसार अपने आप को ढाल लेने में विश्वास रखते हैं। पूर्वाफाल्गुनी के जातक आम तौर पर समाज को नई दिशा देने वाले न होकर समाज के द्वारा निश्चित दिशा में चलने वाले होते हैं। ऐसे जातक आम तौर पर सामाजिक व्यवहार में बहुत शिष्ट तथा सभ्य होते हैं किन्तु कई बार ये जातक बिलकुल अशिष्ट तथा असभ्य व्यवहार भी कर देते हैं। ऐसा विशेषतया तब देखा जाता है जब कोई इनकी विश्राम की अवस्था में बाधा डालने की कोशिश करे अथवा इनके सुख साधनों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश करे।

                            आइए अब इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में चर्चा करते हैं जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों में प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पूर्वाफाल्गुनी को एक स्त्री नक्षत्र माना जाता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी शुक्र के साथ इस नक्षत्र का गहरा संबंध मानते हैं। पूर्वाफाल्गुनी को स्वभाव से एक उग्र नक्षत्र माना जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र पर सूर्य तथा शुक्र के परस्पर विरोधी प्रभावों को माना जाता है। वैदिक ज्योतिष पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र को ब्राह्मण वर्ण प्रदान करता है जिसका कारण पुन: शुक्र का इस नक्षत्र के साथ गहरा संबंध माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पूर्वाफाल्गुनी को गुण से राजसिक माना जाता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी सूर्य तथा शुक्र के इस नक्षत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष में पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र को मानव गण प्रदान किया जाता है तथा इस निर्धारण को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र की भौतिक वस्तुओं को पाने की अभिलाषा के साथ जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से जल तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

मघा

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                                 वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से मघा को दसवां नक्षत्र माना जाता है। अश्लेषा नक्षत्र के साथ ही नौ-नौ नक्षत्रों की तीन श्रृंखलाओं में से पहली श्रृंखला का अंत हो जाता है तथा मघा नक्षत्रों की दूसरी श्रृंखला का आरंभ है। मघा का शाब्दिक अर्थ है बलवान अथवा अति बलशाली तथा महत्वपूर्ण और इसी के अनुसार यह नक्षत्र किसी न किसी प्रकार की ताकत तथा प्रभुत्व के साथ जुड़ा होना दर्शाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में मघा नक्षत्र का प्रबल प्रभाव होने पर जातक अपने जीवन काल में किसी न किसी की प्रकार शासकीय अथवा प्रशासकीय शक्ति अवश्य प्राप्त करता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मघा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह राज सिंहासन को माना जाता है। जैसा कि हम जानते हैं कि राज सिहांसन सीधे तौर पर शासन, शक्ति, राजस, प्रभुत्व तथा दायित्व से जुड़ा होता है, इसी प्रकार ये सारी विशेषताएं मघा नक्षत्र के माध्यम से भी प्रदर्शित होतीं हैं जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक किसी न किसी प्रकार के शासकीय या प्रशासकीय पद को प्राप्त कर पाने में सफल हो जाते हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी मघा नक्षत्र के द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली शक्ति तथा प्रभुत्व को उत्तराधिकार अथवा विरासत के साथ जोड़ते हैं तथा इन ज्योतिषियों का यह मानना है कि मघा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों को आम तौर पर शक्ति तथा प्रभुत्व उत्तराधिकार के रूप में ही प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए अपने पिता के राजा अथवा शासक होने के कारण उनका पद उत्तराधिकार में पाने वाले जातक मघा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक माने जाते हैं। हंसिया या दरांती को भी मघा नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में मान्यता दी जाती है तथा यह माना जाता है कि जिस प्रकार दरांती का संबंध पक चुकी फसल काटने से है, उसी प्रकार मघा नक्षत्र का संबंध पूर्व जन्म के पक चुके कर्म इस जन्म में काटने से है।

                            बहुत से वैदिक ज्योतिषी मानते हैं कि सताइस नक्षत्रों में से मघा वह पहला नक्षत्र है जिसमें आत्म का बोध तथा ज्ञान जन्म लेता है। पित्रों को वैदिक ज्योतिष के अनुसार मघा नक्षत्र के अधिपति देवता माना जाता है तथा इस प्रकार इस नक्षत्र पर पित्रों का प्रबल प्रभाव रहता है और संभवत यही कारण है कि मघा नक्षत्र को उत्तराधिकार के साथ जोड़ा जाता है क्योंकि उत्तराधिकार अपने आप में पित्रों से जुड़ा हुआ है। विद्वानों के मत के अनुसार मृत्यु के पश्चात कुछ विशेष पित्र उस समय तक पित्र लोक में वास करते हैं जब तक उनके अगले जन्म के लिए निश्चित किया गया समय नहीं आ जाता। यह एक सिद्ध वैज्ञानिक तथ्य है कि अधिकतर मनुष्य अपने पूर्वजों द्वारा आनुवंशिक रूप से मिले गुणों, अवगुणों तथा विशेषताओं का ही अनुसरण करते हैं। इसी कारण इस नक्षत्र के द्वारा प्रदर्शित आत्म बोध तथा आत्म ज्ञान को भी बहुत से वैदिक ज्योतिषी पित्रों की ही देन मानते हैं क्योंकि हम में से अधिकतर लोगों का वर्तमान रूप तथा विशेषताएं  हमें आनुवंशिक रूप से ही प्राप्त हुईं होतीं हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि हमारे वर्तमान व्यक्तित्व की बहुत सीं विशेषताएं हमें आनुवंशिक रूप से ही प्राप्त हुईं होतीं हैं तथा पित्रों के बिना हमारा वर्तमान व्यक्तित्व अपने आप में पूर्ण नहीं हो पाता।

                        वैदिक ज्योतिष के अनुसार केतु को मघा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है जिसके चलते इस नक्षत्र पर केतु का भी प्रबल प्रभाव रहता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि वैदिक ज्योतिष के अनुसार केतु को भी आनुवंशिकता से जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी केतु को प्रभुत्व, शक्ति तथा राजस के साथ भी जोड़ते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मघा नक्षत्र के सभी चार चरण सिंह राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर सिंह राशि तथा इसके स्वामी ग्रह सूर्य का प्रभाव भी पड़ता है। सूर्य तथा सिंह राशि दोनो को ही वैदिक ज्योतिष में शक्ति, राजस, शासन तथा प्रभुत्व के साथ जोड़ा जाता है तथा सूर्य और सिंह राशि के चरित्र की ये विशेषताएं मघा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। सूर्य तथा केतु दोनों के प्रभाव में आने के कारण इन दोनों ग्रहों की एक दूसरे से समानता रखने वाली विशेताएं जैसे कि प्रभुत्व, शासन, शक्ति, गहरी अंतर्दृष्टि तथा ऐसी ही अन्य कई विशषताएं मघा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि नवग्रहों में से सूर्य को आत्म तथा पित्रों के साथ जोड़ा जाता है तथा किसी कुंडली में सूर्य पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव कुंडली में पित्र दोष का निर्माण कर देता है। केतु को भी वैदिक ज्योतिष के अनुसार भूत काल से जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है तथा कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि हमारे पिछलों जन्मों के अच्छे बुरे कर्मों का फल भी बहुत सीमा तक हमें केतु के माध्यम से ही मिलता है तथा केतु ग्रह की इस विशेषता का प्रदर्शन भी मघा नक्षत्र के माध्यम से होता है।

                        बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि मघा नक्षत्र भूत काल से जुड़ा हुआ एक नक्षत्र है तथा हमारे पिछले जन्मों के अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार ही यह नक्षत्र हमें इस जीवन में फल प्रदान करता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मघा को एक उग्र तथा सक्रिय नक्षत्र माना जाता है तथा अधिकतर वैदिक ज्योतिषी मानते हैं कि यह नक्षत्र अच्छा या बुरा किसी भी प्रकार का फल जातक को बहुत तीव्रता के साथ देने में सक्षम है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बहुत कम समय में ही बहुत बड़े सौभाग्य के स्वामी बनते देखे गए हैं अथवा ऐसे जातक बहुत कम समय में ही बहुत भारी विपत्तियों में फंसते भी देखे गए हैं। हालांकि मघा के साथ जुड़े दोनो ही ग्रह सूर्य तथा केतु आत्मकेंद्रित ग्रह माने जाते हैं फिर भी मघा नक्षत्र को वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक सामाजिक नक्षत्र माना जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक सामान्य तौर पर सामाजिक व्यवाहार में अच्छे देखे जाते हैं। किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि मघा नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक आम तौर पर अपने आप को अपने साथ जुड़े समाज से श्रेष्ठतर समझते हैं तथा ये जातक अपने साथ जुड़े लोगों से यह अपेक्षा भी करते हैं कि वे लोग इन्हें आदर तथा प्रभुत्व प्रदान करते रहें। मघा नक्षत्र के जातकों की इस विशेषता को बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह तथा नवग्रहों में से राजा सूर्य के इस नक्षत्र पर प्रभाव के साथ जोड़ कर देखते हैं।

                     इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक आम तौर पर परंपराओं के प्रति बहुत आदर तथा दायित्व की भावना रखते हैं जिसका कारण इस नक्षत्र पर पित्रों का प्रबल प्रभाव माना जाता है क्योंकि परंपराएं भी हमें पित्रों से ही प्राप्त होतीं हैं। मघा के जातक सामान्यतया ऐसे लोगों को पसंद नहीं करते जो अपने परिवार तथा समाज की परंपराओं का आदर तथा पालन नहीं करते और मघा के जातक ऐसे लोगों के प्रति अपने क्रोध तथा असंतोष को अधिकतर स्थितियों में प्रकट भी कर देते हैं। कई बार तो मघा नक्षत्र के जातक परंपराओं को तोड़ने वाले लोगों पर बहुत क्रोधित होकर इन्हें किसी प्रकार का दंड भी दे देते हैं। मघा के जातक अपने वंश तथा वंशावली पर गर्व करने वाले होते हैं तथा अपने परिवार और वंश का नाम समाज में और उंचा करने के लिए ये जातक अपनी ओर से भरसक प्रयास करते हैं। मघा के जातक समाजिक तथा नैतिक नियमों का पालन करने में विश्वास रखने वाले होते हैं तथा नियम तोड़ने वाले लोगों को मघा के जातक पसंद नहीं करते। मघा के जातकों में प्रजनन के माध्यम से अपने वंश की वृद्धि करने की रूचि अन्य कई नक्षत्रों के जातकों की तुलना में बहुत अधिक होती है तथा ऐसे जातक मघा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव के कारण आम तौर पर बहुत सी संतानें पैदा करने में सक्षम होते हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में मघा नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक के वंश की वृद्धि में बहुत सहायक होता है।

                           आइए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की, जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली गुण मिलान की विधि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मघा को एक स्त्री नक्षत्र माना जाता है जो कि अपने आप में आश्चर्यचकित कर देने वाला है क्योंकि मघा से जुड़े ग्रह तथा देवता सभी पुरूष माने जाते हैं। वैदिक ज्योतिष में मघा को स्वभाव से उग्र तथा सक्रिय माना जाता है जो इस नक्षत्र की कार्यप्रणाली से सपष्ट ही है। वैदिक ज्योतिष में मघा नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है तथा मघा नक्षत्र का यह वर्ण निर्धारण अपने आप में पुन: चकित कर देने वाला है क्योंकि वैदिक ज्योतिष के अनुसार मघा नक्षत्र को सूर्य जैसे ग्रह तथा राज शासन जैसे कार्यों के साथ जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मघा नक्षत्र को गुण से तामसिक तथा गण से राक्षस माना जाता है जो फिर से चकित कर देने वाला है तथा कुछ वैदिक ज्योतिष इसका कारण इस नक्षत्र का केतु के साथ संबंध मानते हैं। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से जल तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी

अश्लेषा

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                       अधिकतर वैदिक ज्योतिषी अश्लेषा को सताइस नक्षत्रों में सबसे भयावह माने जाने वाले कुछ नक्षत्रों में से एक मानते हैं तथा किसी कुंडली पर इस नक्षत्र का प्रबल प्रभाव आशंका की दृष्टि से ही देखा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी कुंडली विशेष में अश्लेषा नक्षत्र में चन्द्रमा की उपस्थिति उस कुंडली में गंड मूल दोष बना देती है जो जातक के मानसिक सुख तथा अन्य कई प्रकार के सुखों को विपरीत रूप से प्रभावित करता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से गणनाएं करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से अश्लेषा नक्षत्र को नौवां नक्षत्र माना जाता है तथा अश्लेषा नक्षत्र के आगमन के साथ ही सताइस नक्षत्रों में से नौ नक्षत्रों की तीन श्रृखलाओं में से पहली श्रृंखला पूर्ण हो जाती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सभी नवग्रहों को तीन तीन नक्षत्रों का अधिपति बनाया गया है तथा इस प्रकार सभी सताइस नक्षत्र एक क्रमबद्ध ढंग से एक के बाद एक आते हैं तथा नौ नक्षत्रों के पूरा होने के पश्चात ग्रहों के नक्षत्रों पर आधिपत्य का वही क्रम पुन: शुरु हो जाता है। उदाहरण के लिए केतु पहले नक्षत्र अश्विनी के स्वामी ग्रह हैं तथा नौ नक्षत्रों का पहला क्रम पूरा हो जाने पर दूसरी श्रृंखला के आरंभ में दसवें स्थान पर पुन: केतु के आधिपत्य वाले मघा नक्षत्र को ही स्थान दिया जाता है। इस प्रकार केतु पहले नक्षत्र अश्विनी, दसवें नक्षत्र मघा तथा उन्नीसवें नक्षत्र मूल के स्वामी माने जाते हैं तथा शेष ग्रहों को भी अपने क्रम से तीन तीन नक्षत्रों का आधिपत्य प्राप्त होता है।

                        अश्लेषा शब्द का अर्थ किसी प्रकार की कुंडली मारने से लिया जाता है तथा इस शब्द के अर्थ को पूर्ण रूप से समझने के लिए हमें इस नक्षत्र से जुड़े प्रतीक चिन्ह का भी अध्ययन करना होगा। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली मार कर बैठे हुए एक सर्प को अश्लेषा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है जिसके चलते अश्लेषा नक्षत्र को सर्पों तथा उनके गुणों के प्रभाव में आने वाले एक नक्षत्र के रूप में देखा जाता है। वैदिक काल से ही सर्पों को भयावह जीव माना जाता है तथा आज के युग में भी अधिकतर लोग सर्पों के नाम से ही भयभीत हो जाते हैं तथा इसी प्रकार अश्लेषा नक्षत्र का यह प्रतीक चिन्ह भी बहुत से ज्योतिषियों के मन में कई प्रकार की आशंकाएं पैदा कर देता है। सर्पों के साथ इस नक्षत्र का संबंध केवल अपने नाम से तथा प्रतीक चिन्ह के माध्यम से ही नहीं है अपितु अपने अधिपति देवता के माध्यम से भी है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नाग देवताओं को अश्लेषा नक्षत्र के अधिपति देवता माना जाता है तथा कुछ वैदिक ज्योतिषी शेषनाग को इस नक्षत्र का अधिपति देवता मानते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्लेषा नक्षत्र के अधिपति माने जाने वाले ये नाग देवता वास्तव में आधे सर्प के तथा आधे मनुष्य के शरीर वाले देवता हैं। इस प्रकार सर्पों से अश्लेषा नक्षत्र का गहरा संबंध है जिसके कारण सर्पों के चरित्र में पायीं जाने वालीं बहुत सी विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होती हैं जिसके फलस्वरूप इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी इन विशेषताओं का प्रदर्शन करते हैं।

                         रहस्यमयता वह सबसे पहली विशेषता है जिसे सर्पों के साथ जोड़ा जाता है। सर्पों को बहुत ही रहस्यमयी जीव माना जाता है तथा यही सबसे प्रमुख कारण है जिसके चलते अधिकतर लोग सर्पों से भयभीत रहते हैं। सर्पों को भ्रम पैदा करने की कला में निपुण, सम्मोहन पैदा करने की कला का ज्ञान रखने वाले तथा विषैले जीवों के रूप में जाना जाता है तथा सर्पों के चरित्र की ये विशेषताएं अश्लेषा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि जिस प्रकार सर्प साधारण स्थितियों में बिल्कुल निष्क्रिय तथा निष्प्राण से होकर पड़े रहते हैं किन्तु अवसर आने पर विलक्षण सक्रियता का प्रदर्शन करते हैं उसी प्रकार अश्लेषा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी गोपनीय, जोड़ तोड़ करने की कला में निपुण तथा षड़यंत्रकारी होते हैं। अश्लेषा के जातकों के चरित्र की ये विशेषताएं इन्हें उस स्थिति में बहुत खतरनाक बना देतीं है जब इन जातकों की प्रवृति रचनात्मक न होकर विनाशकारी हो। सर्पों की भांति अश्लेषा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी रहस्य की पर्तों में लिपटे रहते हैं जिससे इनके सामने बैठे बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को भी कई बार इनके असली चरित्र का पता नहीं चल पाता तथा यह अनुमान लगाना बहुत कठिन हो जाता है कि अश्लेषा के जातक किसी विशेष अवसर पर किस प्रकार का आचरण करेंगे। अश्लेषा के जातक रहस्यों को गुप्त रखने में दक्ष होते हैं तथा अपने मन के विचारों को ऐसे जातक अपने सगे संबंधियों के साथ भी नहीं बांटते। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्लेषा नक्षत्र के जातक जन्म से ही किसी प्रकार की असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होते हैं जिसके कारण ये जातक किसी के भी साथ अपने मन के भावों को बांटने में असुरक्षा अनुभव करते हैं।

                          वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्लेषा नक्षत्र का अधिपति ग्रह बुध को माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि बुध ग्रह के चरित्र के सबसे बुरे गुण इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होते हैं। बुध की धोखा देने की विशेषता, अपना लाभ लेने के लिए चालाकी से दूसरे की हानि करने की विशेषता, वाक पटुता से सामने वाले व्यक्ति को अपने जाल में फंसाने की विशेषता तथा अन्य ऐसी ही कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। अश्लेषा नक्षत्र के सभी चार चरण कर्क राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर कर्क राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह चन्द्रमा का भी प्रभाव पड़ता है किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि अधिकतर वैदिक ज्योतिषियों का यह मत है कि अश्लेषा नक्षत्र पर सबसे प्रबल प्रभाव इसके अधिपति नाग देवताओं का ही रहता है तथा किसी भी कुंडली में अश्लेषा नक्षत्र का आचरण अन्य किसी ग्रह के प्रबल होने से विशेष प्रभावित नहीं होता। इसी कारण यह माना जाता है कि चन्द्रमा जैसे मातृत्व से भरपूर ग्रह का प्रभाव भी इस नक्षत्र के स्वभाव के विष को दूर करने में अधिक सफलता प्राप्त नहीं करता बल्कि कुछ वैदिक ज्योतिषी तो यह भी मानते हैं कि चन्द्रमा के चरित्र की बहुत सीं नकारात्मक विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। उदाहरण के लिए चन्द्रमा की जन समुदाय के साथ जुड़ने की तथा जन समुदाय को प्रभावित कर लेने की क्षमता का इस नक्षत्र के प्रभाव में आने पर दुरुपयोग होता है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले कई जातक जन समुदाय को विश्वास में लेकर अपना कार्य सिद्ध कर लेते हैं तथा कार्य सिद्ध हो जाने के बाद ऐसे जातक जन समुदाय की ओर मुड़ कर भी नहीं देखते। ऐसे जातक जनता के बीच में अपनी एक झूठी किन्तु अच्छी छवि बनाने में सफल हो जाते हैं तथा वास्तिवक जीवन में बहुत बुरे होने के बावजूद भी जनता इन्हें बहुत अच्छा इंसान समझती रहती है जिससे इन्हें जनता के इस विश्वास के चलते बड़े लाभ प्राप्त होते हैं।

                         और हालांकि वैदिक ज्योतिष से संबंधित अधिकतर ग्रंथों में इस नक्षत्र के बारे में बुरी बातें ही देखने को मिलती हैं किन्तु मेरे अनुभव में ऐसा सदा नहीं होता तथा मैने कुछ ऐसे जातकों की कुंडलियां भी देखीं है जो इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में होने के पश्चात भी इस नक्षत्र की उर्जा का उपयोग सकारात्मक ढंग से करने में सफल हुए हैं। अपने सकारात्मक स्तर पर अश्लेषा नक्षत्र का किसी कुंडली में प्रबल प्रभाव जातक को कई विशेषताएं प्रदान करता है जिनमें व्यापार कौशल, संकट को समय से पूर्व ही भांप लेने की क्षमता, गहन विशलेषणात्मक प्रवृति तथा किसी भी स्थिति के मूल तक पहुंच जाने की क्षमता भी शामिल है। अश्लेषा नक्षत्र का किसी कुंडली में विशेष सकारात्मक प्रभाव जातक को आलौकिक तथा पारलौकिक शक्तियों से भी जोड़ सकता है। अश्लेषा नक्षत्र का यह विशेष प्रभाव जातक की कुंडलिनी शक्ति को प्रभावित कर सकता है जिसके चलते जातक को आलौकिक तथा पारलौकिक जगत के अनुभव भी हो सकते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्लेषा नक्षत्र का मनुष्य के शरीर में वास करने वाली कुंडलिनी शक्ति से बहुत गहरा संबंध है तथा कुछ ज्योतिषी तो यह भी मानते हैं कि अश्लेषा नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में दर्शाया जाने वाला कुंडलीधारी सर्प वास्तव में और कुछ न होकर कुंड़लनी शक्ति का ही प्रतीक है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि कुंडलिनी शक्ति का चित्रण भी बिल्कुल इसी प्रकार से कुंडली धारण किए हुए सर्प के रूप में ही किया जाता है। इस विषय का ज्ञान रखने वाले विद्वान जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में कुंडलिनी शक्ति सुप्त अवस्था में विद्यमान रहती है तथा किसी प्रकार के प्रभाव के कारण इस शक्ति के सक्रिय हो जाने पर ऐसे व्यक्ति को आलौकिक तथा पारलौकिक जगत से जुड़े अनुभव होने शुरु हो जाते हैं। यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि कुंडलिनी शक्ति प्रत्येक मनुष्य के शरीर में प्राय: उसी प्रकार से सुप्त अवस्था में रहती है जिस प्रकार एक सर्प अधिकतर समय सुप्त अवस्था में ही पड़ा रहता है।

                             आइए अब चर्चा करते हैं इस नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हे वैदिक ज्योतिष में विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनसार अश्लेषा को एक स्त्री नक्षत्र माना जाता है तथा हालांकि इसका कोई सपष्ट कारण उपलब्ध नहीं है किन्तु अश्लेषा का यह लिंग निर्धारण संभवत: इस नक्षत्र का कुंडलिनी शक्ति से गहरा संबंध हो सकता है। वैदिक ज्योतिष अश्लेषा नक्षत्र को वर्ण से शूद्र मानता है तथा वैदिक ज्योतिष द्वारा इस नक्षत्र के साथ जोड़े गए नकारात्मक पक्षों पर विचार करने के पश्चात इस वर्ण निर्धारण को समझना कठिन नहीं है। वैदिक ज्योतिष अश्लेषा नक्षत्र को राक्षस गण प्रदान करता है तथा अश्लेषा नक्षत्र के आचरण पर विचार करके इस निर्धारण को भी आसानी से समझा जा सकता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्लेषा नक्षत्र को गुण से सात्विक माना जाता है तथा अश्लेषा नक्षत्र का यह गुण निर्धारण इस नक्षत्र के व्यवहार, आचरण तथा इस नक्षत्र से जुड़े देवताओं और ग्रहों को देखने के बाद सर्वथा चकित कर देने वाला है। यहां पर भी ध्यान देने योग्य एक रोचक तथ्य यह है कि मानव शरीर में वास करने वाली कुंडलिनी भी और कुछ न होकर शुद्ध रूप से केवल शक्ति ही है तथा शक्ति अपने वास्तविक तथा शुद्ध रूप में सात्विक मानी जाती है। वैदिक ज्योतिष पंच तत्वों में से जल तत्व को अश्लेषा नक्षत्र के साथ जोड़ता है।

लेखक
हिमांशु शंगारी